Wednesday, September 30, 2009

मछलीघर

गए इतवार भास्‍कर में एक कहानी छपी थी, उसी को चिपका रहा हूं..

भायंदर में जहां बोउ दी का घर है पीछे की खिड़की या जंगलेनुमा बालकनी से पीछे पटरियों का जाल, या सीधे-सीधे गाड़ि‍यों का आना-जाना नहीं दिखता, भोर से देर रात तक उनकी थरथरायी बेचैनी कानों में उतरती है, और उनके गुज़र जाने के बाद भी देर तक माथे में गूंजती रहती है - ‘खट्-खट्-खटाक!’, ‘खट्-खट्-खटाक!’.. बोउ दी मिताली को समझाती है, ‘तू ध्यान देना बंद कर दे, देखना फिर सुनाई नहीं देगा! शुरु-शुरु में हमको भी ऐसे ही तकलीफ होती थी..’

यहां, मुंबई आये कुल तीन महीने हो गए लेकिन ध्यानन देना मिताली अभी तक बंद नहीं कर सकी है.

किसी पड़ोसी का किस्सा सुन रही हो, बोउ दी को बाल काढ़ते गुनगुनाते देख रही हो, उंगलियां लहसुन छीलती हों, या झुमुर की गीली जांघिया बदलने में मन फंसा हो, सबकुछ अपनी जगह अचानक अटक जाता, हवा में एक बेचैन थरथराहट-सी उठती, और फिर पलक झपकते में वही ‘खट्-खट्-खटाक!’, खट्-खट्-खटाक!’..

दीवार से छूटकर बायें हाथ छिपकली गिरी, दायें से झटक उसे परे फेंक दिया की तरह दिन किसी तरह निकल भी जाता, लेकिन रात.. अंधेरे सूनसान में गूंथे शोर के सांपों सा उसके अवचेतन में कुछ दौड़ता रहता, कनपटियों पर रह-रहकर एक अस्थिर कर्कशता बजती रहती- खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!

झालदा में सब इससे दु:खी थे कि इकतीस के पहाड़ से छूटकर बत्तीस पर गिरी लड़की से अब कौन शादी करेगा, फिर इससे होने लगे कि शहर में इतने बंगाली हैं लेकिन इसे ट्यूशन पढ़ाने को एक आदिवासी का घर ही मिला? ठीक है ट्यूशन के पैसों से अपना शैम्पू -नेल पॉलिश करती है लेकिन किसी बंगाली लड़की के चर्च जाने की बात सुनी है किसी ने? वह भी अपने से उम्र में चार साल छोटे उस टोप्पो छोकरे से चिपककर, उसके बाइक पर पीछे बैठकर?

खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!.. मिताली अंधेरे में झुककर सुनने की कोशिश करती है कि नन्हीं झुमुर की सांसें इस झंझावात में अविरल अपने को बचा ले जाती हैं, या बेकल शोर हर बार आकर उन्हें लील लिये जाता है, फिर छाती पर हाथ बांधे चुपचाप अपलक आंखों अंधेरा तकती रही. दूसरे कमरे से सुरोजीत दा की नाक एक लय में अपना बाजना करता रहा.

झालदा में भी सब एक पहर की नींद पूरी कर लेते थे मिताली अंधेरा तकती जगी रहती. बोउ दी के यहां आकर इतना ही फर्क़ हुआ है कि जगने को देखो, पलकों पर चींटियां चल रही हैं जैसा एक बहाना हो गया है. खट्-खट्-खटाक!

सुरोजीत दा गंजी ऊपर सरकाकर नीचे भारी, गोरा पेट खुजाते मिताली को समझाते हैं, ‘तोमरा दी हर चीज़ तीन बार बोलके बताती है, काहे? तुमारा भलाई बास्ते. पराया जागा कुछ उल्टा-सीधा हुआ फिर दोष लोक किसको देगा, बलो?

मिताली चिढ़कर जवाब देती है, ‘क्या उल्टा-सीधा हो जाएगा? रेलवे फाटक तक जाऊंगी तो क्याच उधर आमिर खान मेरे को चोरी करके ले जाएगा? जेइ कथा गुलो तुमि बलो, दादा!

दादा ने कभी आपत्ति ‍ नहीं की लेकिन बोउ दी को मिताली का बाहर निकलना पसंद नहीं. मिताली दी से जिरह नहीं करती, जैसा जो-जो बोउ दी कहती है वैसा-वैसा कर देती है. लेकिन वैसा-वैसा करते रहकर भी फिर एक बिन्दु आता है अपने से हारी मिताली का मन उचट जाता है. ये ऐसे करो वो वैसे करनेवाली मिताली थक जाती है, और फिर झुमुर गोद में हो तो अच्छा, नहीं तो यूं ही अपने अकेलेपन के ही दुलार में चोट खाये मन का दुनिया देखने का ढंग समझने मिताली बाहर निकल आती है. इसलिए नहीं कि बोउ दी की नज़र बचाकर वह किसी एसटीडी बूथ के शीशों के पीछे अपने कटी पतंगपने का कोई ठौर पा लेगी, नहीं. वह तो बोउ दी सोचती हैं उनका वहम है. बोउ दी का, बिश्टु , खोखोन, ताप्ती दी और मामुनि का.

दूसरों की शिकायती कहानियों में जीनेवाले कहते रहे और सच ही कहे जोसेफ टोप्पो की बाइक पर उससे सटकर बैठी थी मिताली. सही है, एक बार नहीं बहुत बार बैठी है, तो? किसी के बाइक के पीछे सटकर बैठने से बाइक के पीछे बैठना ही होता है, दिल में गड्ढा करके खुद को भूल लेना होता है किसने कहा? बिश्टु, खोखोन और ताप्ती दी को जो सोचना है सोचें, उनकी सोच से मिताली पहले जीवन नहीं चलाई न आगे कभी चलायेगी.. क्यों कि दिल में गड्ढा कर लेना, खुद को भुलाकर पत्ते की तरह हल्का‍ हो लेना क्या होता है जानती है, जियी है मिताली! उस गड्ढे की अंधेरी मदहोशी में किस तरह अपना सबकुछ कहीं छोड़ आई खो ली लड़की कितने वक़्त बाद तक आईने में खुद को देखकर हंसती कभी चुपचाप आंसू बहाती होती, वह तो नहीं देखा बिश्टुं ने! खोखोन और ताप्ती दी ने! बोउ दी समझती हैं जानती हैं मिताली को, नहीं जानतीं.

मिताली खुद भी क्या खाक़ जानती थी. उसको तक कितना जानती थी. सच! कितना शातिर, कैसा पहुंचा बहुरुपिया था, किस बेरहमी से छला एक बेवकूफ़ बेचारी भोली लड़की को. छील गया!... ओ रफीक़, केनो, कोथाय गायब हुए तुम? क्यों? क्यों? ऐसी थी तुम्हारी वो फरहत, जैसी मिताली सात जनम में नहीं होती, ऐसी?.. याद में अपमान से चेहरा दहक जाता है. सेइ दू कोड़ी मेयेर जोन्ने? जिसको नज़रुल गीती तक का शउर नहीं, उसके लिये, उसके? कितनी बार मन हुआ कहीं से छुरा लेकर आये, घोंप आये उस बदकार बदजात लड़की के सीने. उसके बाद फिर वो निमकहेराम रफीक.. एक बारे सब खेला खतम!..

रफीक, केनो.. फिरे आओ ना आमार काजे, आर एक बार? लौट आओ लौट आओ! मेरे पास! अपनी छाती में छिपाकर तुम्हारी सब दुश्टामियां माफ़ कर दूंगी, तुमको मन के सबसे उजले कोने बचाके रखूंगी, जनम-जनम, तुमि देखबे!...

खट्-खट्-खटाक!

जगर-मगर लगे घरों की तंग गली में मिताली भोली उम्मीमद बुनती है कि भीड़ और अजनबियत के रेलों में मन के अंदर रह-रहकर उठता बेहोशी ले आनेवाला यह बवंडर शायद भूल जाये! भूल पाएगा?..

गली के आखिर की ओर एक मछलीघर है. अलग-अलग रंगों के काँच के टैंक में मचलती-दौड़ती गोल-गोल घूमती मछलियां. जब कभी वहां से गुज़रना हुआ, थोड़ा बगल होकर मिताली उन मछलियों को नज़र भर देखना छोड़ नहीं पाती. दूकान की संभाल करता एक कमसिन-कमज़ोर गोरा लड़का है, मछलियों को कम, बाहर आंखें किये कुछ ढूंढता रहता है, जल्दीर-जल्दी गोद के पैड पर पेंसिल से कुछ उकेरता रहता है, ड्रॉईंग करता है? वह नज़रों से हट गई है, फिर भी कुछ दूर तक लड़के की आंखें गली में उसके पीछे-पीछे संगत में चलती रही हैं का ध्यान पहले भी किया है मिताली ने, लेकिन घर लौटने पर एक कमसिन-कमज़ोर गोरे लड़के ने देखा और क्यों देखता रहा की याद नहीं रहती. जबकि रफीक रहता है.. याद.. शोप्न देखी एकटा नतून घॉर...

आज मिताली को देखते ही लड़का खड़ा हो गया, असमंजस में सूखे बालों पर हाथ फिराता बाहर निकल आया, कुछ कहना चाह रहा था, या आवाज़ देकर मिताली को रोक रहा था?..

मिताली को अच्छा नहीं लगा. मिताली मछलियां देखने ठहरी थी, इसलिए नहीं कि लड़का इशारा करके उसकी तरफ़ आए! खीझी, इंकार में सिर हिलाया और तेज़ी से चलकर घर लौट आई.

मन में एक धुंधली, अप्रीतिकर तस्वीर बनी, ‘के दुश्टामी, देखो तो?’ फिर उस धुंधलके पर थकान और खीझ का धीमे-धीमे रिसना गिरता रहा- खट्-खट्-खटाक!

सुरोजीत दा के कोई परिचित हैं गोरेगांव किसी फैक्टरी में काम निकला है, सेफ़ और सेक्योर है का सुझाव लेकर आए, लेकिन फिर बोउ दी ने मना कर दिया इतनी दूर मिताली रोज़ गोरेगांव कैसे जाएगी. दादा हाथ खड़ा करके बोले, ‘फिर क्या? इधर भायंदर में ठेकना मिला, जॉब भी मिलेगा?’

मिताली ने कुछ नहीं कहा. कहकर क्या फ़ायदा? सब सुखी हैं कि घेरकर बोउ दी के यहां सुरक्षित बंद कर दिया गया है तो वह भी रहे सुखी. सबको दु:खी कर-करके थक नहीं गई है? काँच के टैंक में घूमती गोल-गोल मछली..

पैरों के पास गिरे खिलौनों को दूर ठेलती झुमुर की गोद में सिर रखकर सो लेना चाहती है मिताली. कितनी-कितनी अनसोई रातों की सब सारी नींदों का पूरा होना बाकी है, कब सोयेगी? कभी सोयेगी, मिताली?

अचानक पीछेवाली खिड़की हिली है, हवा में दबाव बना है, खिलौने पर झुकी झुमुर चौंकी, और फिर वही परिचित घड़घड़ाहट में घर की दीवारें डोलने लगी हैं- खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!

गाल पर किसी कीड़े के डंक का होश आया हो की तरह अचानक डरी झुमुर पलटकर मौसी की ओर लपकी जार-जार रोने लगी है, और बाहर के शोर और बच्ची के रोने का कुछ ऐसा सांगीतिक तारतम्य बना है कि रोती बच्ची को गोद में ऊपर किये मिताली जोर-जोर हंसने लगी है!

रसोई से भागी आई बोउ दी सवाल करती है, ‘क्‍या हुआ क्या, रे?’

रोती बच्ची के पैरों से माथा लगाये मिताली हंस रही है उसे दी का सवाल नहीं सुन पड़ता. उन क्षणों दिन को बेरहमी के बाजे में गूंथे वह कानखोर शोर भी थोड़ी देर के लिए गुम जाता है- खट्-खट्-खटाक! खट्-खट्-खटाक!

***

1 comment:

  1. पिछले सन्डे ही पढ़ ली थी जी रसरंग में.. और उससे पहले वाले एक एडिशन में तो मुख्य पृष्ट पर चित्र देखते ही पहचान गया था ये आपने ड्रो किया है फिर नाम देखा तो कंफर्म भी हो गया..

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