Wednesday, September 16, 2009

शैलेंदर वाला वो गाना था.. ओह, कितने तो थे!

बाकियों से कुछ अलग खड़ा एक मुंह बिगाड़कर ख़बरदार करता है, इतना पिटे अब संभल जाओ हमारे फेर न पड़ो, हवा में उकेरी लकीरें हैं मुहब्‍बत की तरह बाद में साथ देने को सिर्फ़ दर्द की तस्‍वीरें होंगी, हम होंगे कहीं पराया घर होगा, किसी और के सपने में होंगे!..

सपने की आवाज़ रूखी है, अंदाज़.. क्‍यों रूखा है? जैसे कुछ दिनों पहले जंगल के गहरे तलघर हाथियों का एक पथभूला दल मिला था, सिर नवाये, ललकभरी अपनी सहज ऊंचाइयों से सूखा. किसी अनजाने जंगल के बेगाने खेल में कैसे बेवकूफ़ थे क्‍यों जाकर फंस गए की हार में शर्मसार, वापस अपने ठौर लौट रहा था. पराये शहर पराये लोगों के बीच घबराहट में आवाज़ अटककर कैसी तो रूखी निकलती है, उसी उदास रुखाई में एक हाथी ने इशारा किया, हमारी क़ि‍स्‍मत, किसी फ़रेबी गाने में बहक गए, मगर तुम तो समझदार दिखते हो इन अंधेरी छांहों में कहां-कैसे उलझ गए?

आदमी ने चौंककर डूबी नींद में भीतर अवचेतन का कोई एक और जंगला देखा था, जंगले के पार सफ़ेद पंखोंवाले हाथी थे नन्‍हें मेमनों से भी ज़्यादा हल्‍के थे, अपने कंधे थपकियां देता आदमी उन चोटलगे पंखों को सुलाता, सहलाता रहा था..

एक आवारा औसत घरबार, परिवार भूला कुत्ता दिखता, जाने किस निर्दोष निश्‍छलता में नहाया, ललक की चौंध में उमग की नोंक पर सवार सबको पीछे छोड़ आगे कंटीली झाड़घने रस्‍ते दौड़ा जाता, खूब दूर निकल फिर न्‍यौते की मुनादी पीटता, ‘भौं, भौं!’

रोज़-रोज़ के कटने-पिटने, ख़ून और खखारभरी सड़कों पर दौड़ते-भटकने में भी आदमी के होंठों एक फीकी हंसी आकर सज जाती कि देखो, ऐसे दुर्दिन में भी नहाने को सपना है! पानी में डूबे हाथों की नम-रसनहायी उंगलियों पर प्‍यार की थरथराहट है! क्‍या राज़ है कैसे बनी रहती है थरथराहट, कैसे थिरता में अचानक डोलकर उभर आता है सामने सपनादार जल?

औरत कहती है कहां खो गए क्‍या खाओगे, बोलते क्‍यों नहीं? आदमी मिश्रीवाली आवाज़ में दुलार से कहता तबसे कह ही तो रहा हूं, तुम्‍हीं हो, कहां सुन रहीं..

***

सपने के भीतर एक और सपना होता. जैसे पिता होते मुस्‍कराते हुए, वहीं बगल के सपने में ताज्जुब और अविश्‍वास में सिर हिलाते दिखते, जीवन में हारे रहा, अब सपने में अभिनय करना सीख गया है! कुछ दिन हुए स्‍कूल के दिनों का एक साथी दिखा, दूसरे में वही बताता कि तुम मुझे पहचानोगे नहीं, क्‍योंकि कितना अर्सा हो गया स्‍कूल के छत से गिरकर मुझे मरे. इस सपने की कोई बड़ी शख़्सि‍यत दूसरे सपने में जाकर छोटा हो जाती है, गंदे नाखूनवाले मामूली पैर, सूती का मामूली शर्ट. फिर कितने चेहरे ऐसे जो कितने-कितने सपनों का देखना निकल जाता, नज़र नहीं आते. और जब मन समझता है पता नहीं किसके जीवन की बातें थीं अब तो कुछ याद भी नहीं, तो अचक्‍के फिर किसी भूली फ़ि‍ल्‍म के बिसराये-बासी पोस्‍टर पर उकरे उभर आते हैं. सपने के भीतर वहीं कहीं छिपे जाने कितने और सपने होते! कभी-कभी तो खुदी को भूला आदमी आज़ि‍ज़ इससे निकलकर उसमें और किधर-किधर आवाज़ लगाकर खुद को ढूंढता फिरता, इस बात की ख़बर रहती कि इतने सारे तैरते दृश्‍यों में वह है वहीं कहीं, किसी छोटे किरदार की शक्ल में ही सही, है, लेकिन अपने को छू नहीं पाता..

***

फ़ोन पर दोस्‍त चिढ़कर कहता है क्‍या सपना-सपना लगा रखा है, जाकर पूछो सपनों से जानोगे वे भी खुद से कितना विलगे हुए हैं! आवारा लोगों का टाइमपास है, घर अगोरती औरतों के बहलने के झांसें हैं सपनों की कोई सड़क है तो वह कहीं जाती नहीं, हाथ में हरा देखने का हौसला करो, कब तक फिजूल की हरियालियां तकते फिरोगे?

ऐसा नहीं कि दोस्‍त स्‍वयं सपना नहीं देखता, पहले एक लड़की के प्रेम में हॉस्‍टल की दीवार से कूदकर पैर तुड़वा लिये के पागलपने सा दीवाना सपनालोक था, अब सपनों की एक प्रॉपर आर्काइविंग है, टैग्‍ड एंड प्रॉपरली फ़ाइल्‍ड. जैसे सरकारी दफ़्तरों और अस्‍पताल के दराज़ों में होता है. तरतीबवार, सब क्रॉनॉलिजिकल ऑर्डर में. रात को सोते समय तकिये के नज़दीक दवा के उचित खुराक़ की तरह सपनों की माप होती है..

***

किसी और के सपनों में चले आये हों और ज़रा सा दरवाज़ा खोलकर किसी और की स्‍त्री हैरत से सवाल करती हो, जी, बताइये?.. किसी और के सपनों की पटरियों पर किसी और के सपनों की रेल की सीटी छूटी हो, धड़-धड़-धड़ाक डिब्‍बे एक के पीछे एक दौड़ने लगे हों..

कोई डेढ़ेक साल का बच्‍चा, सांवला, हाय, कितना सजीला-गर्वीला, सुबह से मुंह फुलाये, आंख चुराये हो, अचानक खिलखिल हंस दे, प्रेमविह्वल नज़रों से छाती भीतर तक लपकती लपटों-सा भक्‍क् एकदम भर दे, आंख नचाये, नेह बरसाये, अपनी भोली हंसी में छिपाये जैसे कोई गहरा राज़ खोल दे, 'फिर?'

रुखाई नाकचढ़ायी सपनायी मुरझाई एक ओर कलेजा दलती बैठी रहेगी, सफ़ेद पंखों पर सवार सजीले सपनीले नीले हाथी उड़ते आवारा फिरेंगे.. शैलेंद्र का 'हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा!' हौले-हौले मन के पुराने ट्रांजिस्‍टर पर बजता होगा.. वहीदा बुढ़ाती होगी तो भी क्‍या रहमान के रहम भी तो रह-रहकर बरसते ही होंगे!

3 comments:

  1. बड़ी उलझी हुई शैली में लिखते हैं, जनाब..अपने तो पल्ले नहीं पड़ती आसानी से....जितना समझा अच्छी लगी...

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  2. @श्रीश,
    सही बोले, प्रखर, क्‍या करें, साथी.. अब शैलेंदर वाली भाषा कहां से लायें? "हाय, गजब कहीं तारा.. टूटा..", "सैंया, बेईमान..", "रात के हमसफ़र, थकके घर को चले..", "लाख मनाले दुनिया..".. कहां से, कहां से? लायें?

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  3. सपनों के बहुत से उलझे तागे हैं, कितना सुलझाइए उतना ही उलझते जाते हैं पर ये ऐसा ही है,यहीं पर ही कोई रहमान बुढ़ाती हुई वहीदा को कह सकता है, "हाय, गजब कहीं तारा टूटा.."

    ...पर फिर भी कुछ लोग ऐसे ही होते हैं जो अपने सपनों की दुनिया में ही जीते हैं चाहे वो मैले कुचैले हों या फिर परियों की दुनिया से खूबसूरत

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