Saturday, October 31, 2009

एक मुस्‍कराती औरत के चित्र..

ग्यारह साल की बच्ची ने बुरा मानकर मुंह बनाया, ‘व्हॉट? मालूम है आप मेरे आनसर से हैप्पी नहीं हो, ठीक है फिर, आप बताओ?’

औरत मुस्कराकर बच्ची के गिरे मन को ऊपर उठाने की कमज़ोर कोशिश करती बोली, ‘हो सकता है, बेटा, मैं अपने आनसर से भी हैप्पी न होऊं, देन? मैं सिर्फ़ इतना कह रही थी..’

लेकिन बच्ची तब तक मुंह फेरकर, पैर पटकती कमरे से बाहर निकलकर ज़ाहिर कर चुकी थी कि अपने को मंद, बंदबुद्धि दिखाये जाने के लिए वह अपनी मां को दोषी मान रही है.

औरत के चेहरे पर चली आयी मुस्कराहट अब भी अपनी जगह वैसे ही अटकी पड़ी थी, हालांकि किसके लिए मुस्करा रही हूं का अहसास अब स्टुपिड भी लग रहा था, फिर भी जैसे एक ज़ि‍द में, औरत मुस्कराती रही.

बच्ची ने ऐसा क्या कह दिया था, या उसकी काट में औरत ही क्या़ बोल गई थी असल प्रश्न वह है भी नहीं. असल मुश्किल है प्रश्नों के किसी एक निश्चित भूगोल का न होना. उस भूगोल के बदलते ही प्रश्नों की प्रकृति, अंतर्वस्तु भी नाटकीय तरीके से बदल जाती है, ऐसे में स्थितिबद्ध, इस तरह के एकांगी ज़ि‍रह, वह भी एक छोटी बच्ची को उलझाये हुए, का मतलब क्या? कुछ अनासक्त भाव से सोचना संभव बनाती औरत सोचती और मुस्कराती उदास बनी रही..

***

औरत सुखी है. समाज ने सुख की जैसी जो दुनिया बनायी है, औरत उसी सुखी दुनिया में अवस्थित है. सुखी घर, सुखी बच्चे, सुखधन्य पति सबकी सुखी-सुखी सा‍माजिक पहचान है, फिर भी रह-रहकर जैसे किसी नशे में सरोबार औरत का क्लांत, उदासी में नहाया मन कहीं अकुलाया भागना चाहता है, किस दु:ख की पहचान में किस सागर की ठांव दौड़ता है? वहां पहुंचकर, फिर उस भूगोल में अवस्थित, व्यवस्थित होकर सुखी बन सकेगा, बना रहेगा? औरत सोचती है, और सोचते हुए समझती है उसके पास वाजिब जवाब नहीं, और फिर अपने में हारी मुस्कराती रहती है.

दरअसल यह सच नहीं, पूरे तौर से सच नहीं. ऐसे कोई दु:ख नहीं जिनकी ठीक-ठीक पहचान करके औरत ने कोई लिस्ट तैयार कर रखी हो, नहीं. इसलिए यह कहना ज़्यादा सही होगा कि औरत सुखी है, लेकिन यह भी सही है कि अपने आसपास भौतिकता के अनुराग में जागते, सोये समाज के ख़्याल से उसे विरक्ति होती है, इस सबके बीच धंसे होने और आगे का सारा जीवन यूं ही गुज़रेगा के बोध में सांस उखड़ने लगती है, हाथ गोद से उठाकर बालों तक ले जाना पहाड़ होने लगता है.. और औरत, जैसा बचपन के अपने एक अज़ीज़ को पत्र लिखती, लेकिन अब लिखने से बचती है, स्टुपिडली मुस्काराती रहती है!

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पति और बच्चों के पीछे खोयी एस्कलेटेर के रेलिंग पर हाथ टिकाये औरत सर्द सांस लेकर सोचती सुपर मॉल्स से सब सुखी हैं फिर उसे इतनी क्यों नफ़रत है. डिब्बाबंद खाना, किसी विंडो पर बजता गाना, कॉफ़ी बार, चकमक कपड़ों की बहार सब उसकी आंखों पर जलते कोयलों की मानिंद झरते, गिरते रहते हैं, औरत उसी क्षण सब भूलकर वहीं मर जाना चाहती है, कि कहीं और, किसी नये तरीके से, एक नये जीवन में ज़िंदा हो सके..

औरत शहर के शोर से दूर किसी पहाड़ के सूनसान में अपने को पाकर संभाल लेना चाहती है, जैसे वह अभी ताज़ा दुनिया में आयी चिड़ि‍या का बच्चा हो और उसे हर बुरे असर से बचा लिये जाने की ज़रूरत हो, फिर यह सोचकर औरत का मन हदसने लगता है कि पहाड़ पर वह साफ़ पानी कहां पायेगी? साफ़ सैनिटेशन, एक अदद साफ़ स्पेस (गंदी जगहों में औरत का माथा चलने लगता है), पहाड़ में अपना आईपॉड ले जाना नैतिक रुप से सही होगा? औरत सोचती है और दु:खी होकर फिर मुस्कराती रहती है..

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एक अन्य वर्ज़न. वही कहानी है, बस औरत की जगह इस बार हम आदमी को मुस्कुराता, अपने मुस्काने में घबराता देखते हैं.

Friday, October 30, 2009

कुएं के..



टर्र टर्र, टर्र टर्र
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Thursday, October 29, 2009

पराये में अपनों की ज़मीन और आसमान..

एक ही दिन मन चार छोर खड़ा हो चौदह किस्मों की चित्रकारी करे, सात रंगों की शरबत पिये का भी जीवन कैसा, क्या अजीब खेल है. अपने एंड पर एक पारिवारिक खबर से सुबह चित्त उखड़ा, दोपहर ढलते-ढलते तक दो जिरह में उलझकर डेढ़ झगड़े कर लिये, और सांझ की ढलान पर दिन का हिसाब लगाने बैठें तबतक किसी अप्रत्याशित कोने से एक मुंहजबानी रेल और पीछे-पीछे मेल आया कि तुम्हारी फलानी चीज़ पढ़ी, और ढिमकाने स्तर के सस्ते दारु सा आनंद आया! सुनकर-पढ़कर बाग-बाग और बाघ होने की जगह, और शायद इसलिए भी कि आमतौर पर हमें कड़वी जलेबी की गोलाइयों से खुद को नपवाते रहने की आदत-सी हो गई है, सो आदत से मजबूर, स्‍वभावत: हम संशयग्रस्त होने लगे, फिर चूंकि देर रात आंख फोड़ने की आदत से मज़बूर हैं सो इस बार किसी और की जगह, अपनी से ही फोड़ते रहे, और फिर थोड़ा ताज्जुब ही हुआ कि फोड़ते में आंखों के साथ-साथ मन को भी ऐसी तक़लीफ़ नहीं हो रही थी!

ख़ैर, यह फिर ठिलाई का इंट्रो हुआ, आगे की बात यह कि कुछ जो फलतुआ हैं, आंख और दिल फोड़वाने से जिनको गुरेज नहीं, एक संयोग में दुबारा की यह याद उनके लिए है कि चाहें तो वे भी कभी आयें, इस कोने लटकें.. संभवत: अनुभव ऐसा निरानंदी नहीं होगा..

Tuesday, October 27, 2009

मुलाक़ात..

मन का पतंग किसी खूंटे उड़ता होता, भाग्य पढ़ने की किताब किसी झोले छुटी होती, वैसी नाउम्मीदी में सुख टकराता ऐसे ही किसी मामूली राह, भूली पगडंडी पर, और फिर इसके पहले समझें अचक्के हुआ क्या, यह कैसा फेर, गुरु, सचमुच मिले सुख से ऐसा अपना नसीब, कि जाने किन जलेबी हवाओं की कैसी तो खड़खड़ाहट में पानी का गिलास उलट जाता, पुराने दीवार का पलस्तर दरककर गिरता, टूटते खपड़े ख़ामोशी में अपना गुस्सा निकालते, सारे दिन धीमे-धीमे धूल बरसता चलता, ज़माना हुआ गए मौसी को लेकिन उसकी आवाज़ गूंजती, तू किसी और गांव चला जा बच्चा!..

Monday, October 26, 2009

महाजनी पथ की घिसटती सांझ पर लड़का-लड़की..

हाथ में हाथ नहीं था लेकिन लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. चूंकि कथा है और लातखाये प्रदेश की पिटी हुई ज़बान के रंजन हेतु है, आगे ठिलने के लिए लड़की और लड़के का चयन ही अभीष्ठ था. और अच्छा था कमसिन, कोमलांगी थे, चालीस से ऊपर के होते उससे कथा के स्पोंडिलाइटिस और डाइबीटिक-व्यथा में बदलने के ख़तरे होने लगते, बेचारा हारा प्रेमातुर लोलुप मन मेडीकल ऊबटन में गंधाने लगता, श्रृंगार की सारी बहार कपूर की तरह उड़ गई होती- वैसे ही जैसे देखते-देखते हिंदी का समानांतर सिनेमा भुर्र हो गया, सन् अस्सी के दरमियान से हिंदी के राष्ट्रीय अरमान!.. ख़ैर, तो लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. उसी महाजनी-पथ पर जा रहे थे जिस पथ पहले मार्केटियर्स गए और आगे जाकर अदिदास, नाइके और रेलायंस फ्रेश की सजीली, सुरीली झांकियों में जीवन चकमत होता नहीं भी तो किसी दिन होगा ही की चमकभरी संभावना दीखती रहती. महाजनी ताप में दिप्-दिप् दमकूंगी किसी दिन की उत्कंठा में मचलती लड़की सोचती प्रेमपथ चलकर आई है उसीके आंच में मन ऐसे घनघन रौशन हो रहा है, एकबारगी चौंककर ऐलान करती, ‘कितना अच्छा लग रहा है न?’

कभी एक टीवी शो में गुलज़ार साहब के लिए ताली पीटनेवाले लड़के का मन अभी लड़की के प्यार की लपकती बिजलियों में नहीं, ऊपर आसमान में टंगे एक फ़ोन के विज्ञापन की बदलियों में खोया होता, चौंककर सिर हिलाता, ‘हां, हां, वेरी.’

और जोड़े दिखते. स्क्रिप्ट नहीं, बाज़ार की ज़रुरत में ज़्यादा सुखी दिखते, उनको सुखी देख लड़की गुमसुम फुसफुसाकर कहती, ‘लेकिन आज जल्दी लौटना है! शाम घर पर मुझे देखने आनेवाले हैं..’

इसके बाद लड़की एक कार की बंद खिड़की के शीशे में अपना सौंदर्य आंकती लड़के के जवाब की राह तकती, लड़का अन्यमनस्क हाथ के सेलफ़ोन को तकता कि आधे घंटे से ऊपर हुआ यह बजा नहीं, कैसी दुश्वारी है हम हैं मगर हमें कोई याद क्यों करता नहीं?

फिर लड़के का ध्यान लड़की के तने चेहरे की ओर जाता, ‘तुम्हें मालूम है हमारे पास समय कितना कम है?’

लड़का हारकर कुछ उसी संज़ीदगी से- जिस संज़ीदगी से राजेश खन्ना ने कभी पज़ोलिनी की कविताएं और बेर्तोलुच्ची के ‘द स्पाइडर्स स्ट्रेटेजम’ को एक नज़र देखकर उलट दिया होगा, फिर ‘द रेड रोज़’ की सुर्खी मापने लगे होंगे- इस अटके रोमान के अस्त को थाहते चोट में कहा, ‘मालूम है. एक ब्लॉगपोस्ट और एक प्यार की उम्र क्या हो सकती है!’

बाशो और हाइकू के शुद्ध अज्ञान में धंसे लड़के ने ऐसा कुछ कहा नहीं, लेकिन नहीं कहा तो भी प्रेमनहायी लड़की ज़रुर समझ जाएगी की नज़रों ख़ामोश लड़की को तकता रहा. लड़की ने भी फ्लॉबेयेर और तॉल्स़तॉय नहीं पढ़ी हूं इसका यह मतलब नहीं कि रोज़ अपने भीतर अंतर्द्वंद्व जीती नहीं की नज़र लड़के का देखना देखती रही.

एक-दूसरे के बाद लड़का और लड़की चुपचाप अपना आसपास तकते रहे. असित सेन के ख़ामोशी के राजेश खन्ना के नाव पर सफ़ेद कपड़ों में लिपटी वहीदा रहमान को उदास गाने में रंगने की तरह सांझ नज़दीक आती रही की ही तरह पोस्ट भी कहीं जाती ही होगी की एक खुशफहम भोली उम्मीद बनती रही, इतना तो बन ही सकता था, ख़ास तौर पर जब प्रेमीजनों की उपस्थिति इतनी ज़्यादा नज़दीक हो, जिनका होना यूं भी इस और उस उम्मीद की उंगली पकड़कर चलने में ही होता है..

लेकिन तभी कोई ‘मां!’ कहकर चीखा, या कि चीखा जैसा लगा, लड़की एकदम से लिखनेवाले की ओर पलटी.. लिखनेवाले ने अदबदाकर ‘पब्लिश पोस्‍ट’ पर उंगली पटकी..

पुनश्‍च: एक नज़र यहां मार लिया जाए, इसे समझने के लिए मयुरासन भी नहीं करना होगा.

Saturday, October 24, 2009

कैसी लिखाई, कहीं पहुंचाई?..

लिखो, लिखो, लिखते चले जाओ. चले जा ही रहे हैं, भौतिक रुप से कहीं पहुंच न रहे हों तो भी शब्दधन, और अंधारवन का विस्तारण तो हो ही रहा है! वैसे यह सवाल भी दिलचस्प है कि कहीं पहुंचना दरअसल कहां पहुंचना होता है? हो सकता है? कभी? उसकी एक्चुअल मार्किंग हो सकती है, एवर? जहां पहुंचना था अनिल अंबानी और शह और मात ख़ान चहुंप गए हैं या अभी और आगे गाना है? आगेवाला गाना कितना बड़ा फ़साना होता है, दो सौ करोड़, बारह, चौबीस, बहत्तपर करोड़, ऑर स्टिल मोर? ये ‘मोर’ मांगनेवाला दिल किस, किसी मोर के ठोर पर आकर कभी ठहरता है, ठहरेगा? हाऊ बिग इज़ रियली द बिग? अदरवाइज़ मन के आंतरिक कंगलेपने का यह कैसा निर्मम साम्राज्यावादी विस्ता़र है?

एनीवे, मैं लिखाई की, और लिखते-लिखते की बढ़ाई की कह रहा था, कि अगड़म-बगड़म-तगड़म ससुर लिखे जाते हैं, इनको गिरा दिया, उनको पटक दिये, अरे? सचमुच? ऐसी पहुंच है शब्दों की, ऐसे शब्दसिद्ध आप कि ऐसा भावुक भोलापन कि आप शब्दों के साथ दौड़ रहे हो और पीछे-पीछे सब सध रहा, सेटाय रहा है? चार अख़बार और तीन बहार की झलकी लेकर ‘देख लिये दुनिया, समझ गए जीवन’ का ऐसा भोथरा, चिरकुट गुमान? अंधों में काने राजा का खोखला बाजा? लिखे लिखे लिखे गए, चार पैरा के विस्तार में सत्य बिछाकर लेट गए, धन्य हुए, जानना था सब जान लिये, उसके बाद तृप्ति की एक डकार हासिल की?

विकट प्रश्न है सत्य क्या है? वह है जो लिखते, लिखे जाते उच्चार रहा हूं, और सामनेवाले के पल्ले घेले भर नहीं पड़ रहा, मुस्कियाते हुए वह उसे बुहार रहा है, एक दूसरी झुनझुनी बजाकर किसी दूसरे सुर में पुकार रहा है? मेरा सत्य ही दिन की चार मन:स्थितियों में चौदह बार बदलता है, अभी थोड़ी देर पहले का प्रमुदित मन थोड़े अंतराल पर कलुषित कालेपन में घिघियाने, सबसे आंख बचाने लगता है, तो इससे अपने सत्य के बाबत ही क्या नतीजा निकले? जो भी निकलेगा वह तथ्यत: एकमेव और संपूर्ण होगा? और नहीं होगा तो उसके अनेकमय में मेरा अपना ठीक-ठीक क्या मैं कैसे छांटूं? इज़ इट आस्किंग द इम्पॉसिबल?

मैं कौन? जो लगभग तीसेक साल पहले राऊरकेला, उड़ीसा से बाहर के ज़रा विस्तृत संसार की तरफ़ निकला? या वह जो इतने लंबे फ़ासले पर खड़ा उस पीछे को परायेपन में देख रहा है? व्हिच वन इज़ द रियल ‘मी’ एंड व्हिच वन इज़ द ‘डबल’? मैं वह हूं जो लिखने के बाद अपने लिखे को एक डिटैच्ड निर्ममता से देखने की सजगता रख सकता है, या वही, उतना भर ही मैं, मेरापन है जो अहा, अपने लिखे को लिखते आह्लादित, उन्मादित है? अब आया जाये ज़रा काम के सीरियस शबदावली पर. बार्थ साहब कहते हैं, “the writer no longer contains within himself passions, humors, sentiments, impressions, but that enormous dictionary, from which he derives a writing which can know no end or halt: life can only imitate the book, and the book itself is only a tissue of signs, a lost, infinitely remote imitation.”

ख़ैर, अदरवाइज़ सिसिफस के मिथ की कहानी है ही, एक पत्थर है हम ढोये चलते हैं, ब्लॉग है तो लिखे, ठेले चलते हैं, किसी दिन सचमुच बैठकर हिसाब करने लगें कि गुरु, कर क्यों रहे हैं तो हो सकता है हाथ-पैर फूल जायें, और ज़माने पहले अल्ला-मियां की चाकरी में गईं नानी याद आने लगें? किशोर कुमार का वह ‘पिया का घर’ फ़ि‍ल्मवाला गाना भी है ही, ‘‘ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है रंग-रुप..’’

दरअसल इस घुमड़न-बहकन का मतलब मत निकालिये, दो घंटे बाद हो सकता है ठीक-ठीक जवाब देना मेरे लिए भी मुश्किल हो जाये, इस दौड़ती लिखाई का तात्का़लिक कारण सिर्फ़ इतना भर है कि बाबू बार्थ ने (देख-देखकर दंग हो रहे हैं) काम की बहुत सारी महत्व्पूर्ण लिखाई ठेल रखी है, और साठ के शुरुआत से ही ठेलते रहे हैं, हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो वह तो हिंदी की अनोखी मेधा का एक एंगल है, हिंदी के अपने बुद्धत्व से अलग हिंदी में फिर भला क्या उपलब्ध है? अंग्रेजी में नेट से ऊपरियाया एक निबंध अभय ने हमारी तरफ़ ठेला तो हम लड़ि‍याने लगे कि तुमने हमारा इलाहाबाद के रेल का बर्थ तो ख़ैर खराब किया ही, कम से कम अब बार्थ दुरुस्त़ करो, एक समूची किताब न सही, अदद लेखन पर के एक लेख का तर्जु़मा तो कर ही दो! अभय ने दबी आवाज़ में ‘हां’ किया, दो घंटे बाद फैली आवाज़ में ‘क्यों करें?’ हूकने लगें के बचाव का बहाना बना ये पंक्तियां घसीट दीं, आप घिसटे हुए इतनी बुद्धि निकाल-संभाल लेंगे इस उम्मीद में इसे बिना दहले ठेल रहा हूं..

वैसे विनीत का ऑडियो रेकॉर्डर मिला या नहीं? उन संभावित नामों की लिस्ट भेजूं जिनके सामान की जांच में उसके पाये जाने की शर्तिया गारंटी होगी?

Friday, October 23, 2009

बवालिया मन..

बैठा मुरझाया, अझुराया मन अचानक उमग में बहकने लगे, बिना ‘मधुमती’ वाली जॉनी वॉकर का वीडियो देखे, मैकदा और जगजीत सिंह की ‘ओह, कैसी तो मीठी उदासी’ की पैकेजिंग सुने अपने ही नशे में एकदम ताज़ा सुलगन में चिटकने लगे, फिर? और जबकि न ही बैंक से किसी ने फ़ोन करके सूचना दी हो कि बड़े आदमी, कुछ कम करके अहसान करो, तुम्हारे बोझ में बैंक बैठा जा रहा है! या यही कि किसी छब्बी़ड़शी (षोड़शी की तर्ज़ पर) रुपसी ने रात के डेढ़ बजे फ़ोन पर दिल तोड़ देनेवाली आवाज़ में ऐलान किया हो कि जीवन में इतना अन्याय क्यों है, अंकिल? आप दस साल बाद नहीं पैदा हो सकते थे, या मैं ही दस साल पहले? न ही ये हुआ है कि रोलां बार्थ या ज़ाक देरिदा के साठ के दशक के किसी ‘माइंड बॉगलिंग’ निबंध में मुझे क्वोट करने का लोभ नामधन्य बुद्धिधनी संवरण नहीं कर सके हैं. या ड्यूक एलिंगटन के अबतक जाने कहां दबे रहे, धीरे-धीरे ऊपरिया रहे सीक्रेट पेपर्स के अनावरण में ड्यूक के बहुत सारे सुसुप्त के साथ-साथ मैं भी कुछ इस तरह अनावृत्त हुआ हूं जैसे गुप्त क्षणों में कभी अपने आगे भी न हुआ था? ओह, कैसे रोमान की चिटकन है यह? कैसी कैसी कैसी? जबकि किसी मस्तानी, दीवानी हथरानी तो क्या मैं सात घोड़ों के वेस्टर्न वैगन की रहने दें, कृश्न चंदर की गदह-सवारी भी नहीं किये हुए, फिर?..

फिर, फिर, फिर? अभी तो जाड़े और टर्टलनेक का रोमान भी शुरु नहीं हुआ. और हुआ भी होता तो अपन गरीबदास के पास कछुआगर्दन सजाव कहां? न ही एक फिरंगीचाम सुफ़ेद मित्र से चिरौरी किये थे बारह किताबों की लिस्ट थमा रहे हैं, ई-मेल के कीज़ नहीं हमारे ज़ि‍गर का ख़ून समझना, और अगली डाक के पहले हमारे पैकेट तैयार करने लगना, और हमारे कहने के पहले ही मित्र मित्रधर्म में ख़ून जलाने लगे थे, नहीं, ऐसा कुछ कहां होता, ऐसे मित्र अब कहां होते हैं? ऐसा बुद्धिप्रवण मित्रसंपन्न समय कहां होता है? उसके भोले मुग़ालते होते हैं, न चाहते हुए भी फिर अल्बेयर कामू के ‘द मिथ ऑफ सिसिफस’ से झांकता सत्य दीख ही जाता है कि, “..man must recognize two things: that all he can rely upon is himself, and what goes on inside his head; and that the universe is indifferent, even hostile, that life is a struggle, that we are all like Sisyphus, pushing a stone uphill, and that if we stop, it will roll back down again.” आगे बाबू पीटर वॉटसन ने कहा है, और शायद बहुत ग़लत कहा भी नहीं, “This may seem—may indeed be—futile, but it is all there is.”

तब? मन की यह कैसी उमड़न है? होना तो यह चाहिए, जैसा आमतौर पर यात्रा-रद्द और सिनेमा देखने गए और टिकट न मिला के रद्दी क्षणों में होता है कि आदमी चटकर सेरवांतेस की जगह कर्नल रंजीत की शायरी पढ़ने लगता है, फिर मैं संगीत क्यों सुन रहा हूं? और ऊपर से उमग भी रहा हूं? आई फाइंड द होल बिज़नेस रियली फनी, डोंट यू?

Thursday, October 22, 2009

गिरते, नशे में उड़ते की लोरी..

भारी देह का विरुप चेहरे वाला आदमी, उंगलियों पर तीन दिनों का मैल चढ़ा, माथे पर गिरे आते बेमतलब महीन लंबे बाल, मुंदी आंखें जाने किस सुरीले की मुहब्‍‍बत में नहायी हौले-हौले बेहयायी में मुस्कबरातीं, ब- ब- ब कहने से हारकर फिर फ्रांको बुदबुदातीं..

नशे में डूबे शराब का जवाब किसने देखा? देखा, मन के गहरे उठते जंगलराज का अमंगलगान भटके किसी पथिक ने सुना? पैर कहां किसके पीछे खिंचे जाते हैं? कोई सामने बैठा हाथ में हाथ लिए सारे राज़ सुलझाये, कहां से आया मीठी सड़क का यह कैसा जादूलोक कहां तक फैला जाएगा का उलझे भेद समझाए..

पहले बत्तियातो गा रहे ‘प्यार का परायापन’, पीछे चलते उसी परायेपन की महीनी को फिर अपनी उखड़ाहट में, कड़वे-मिठास में साध रही कारमेन कोनसोली..

न जमे तो मत सुनिएगा, अपनी बहक में अभी आपका न सुनना भी मैं सुन नहीं रहा होऊंगा..



Tuesday, October 20, 2009

क़ि‍स्‍मत-क़ि‍स्‍मत की बात..

“भई, कटोरी तैयार हुआ? संझा तलक हो जाएगा?” कटोरी से मतलब हुक्के की कटोरी. उसी के इंतज़ार में छुन्‍नन तब से इस पैर से उस पैर हो रहे हैं. मगर नामुराद औरत है जाने किस बात का बदला ले रही है! गरदन ऊपर करके फिर चिंहुके, “क्यों? उठकर चले जायें?”

“नहीं, यहां आकर हमारा गला घोंट जाइए!” भीतर से जवाब पल भर के फ़ासले पर आया. सुनकर छुन्नन लाल पलीता हो गए. यह नहीं कि ख़ामोशी से अपना काम करती फिरे, वह तो बदकार नहीं ही करेगी, मुंह से फिचकूर उड़ाये बिना भी गुज़र न होगा!

तबीयत हुई भीतर जाकर जैसे ज़ाहिर कर रही है हरामखोर के आज सचमुच अरमान पूरे कर ही दें, फिर अंजुम और नासिर के मुस्कराते चेहरों के ख़्याल में सीढ़ि‍यों से मुंह फेर यह भी सोचे बाहरी लोगों की हाजिरी में फिजूल क्या औरत जात से उलझना, दूजे इन दिनों पेट से है, अभी कल ही भरी बाल्टी लिये-दिये सीढ़ि‍यों से गिर पड़ी थी, ताश की बाजी के बीचों-बीच रो-रुलाकर सारा माहौल खराब कर दिया था!

“मैमनवा ने आज बड़ी देर कर दी!” नासिर मियां जेब से रेलायंस वाला फ़ोन बाहर करके वक़्त पढ़ने लगे.

“मेमन आज न आवेंगे. अपनी में आप समझ लो जिसमें अटके हुए हैं, पक्की ख़बर है.” अंजुम मुस्कराकर मूड़ी डोलाते रहे.

“क्या?” छुन्नन के यकीन न हुआ, “अबे, आएंगे कैसे नहीं? हम क्या फालतू हैं जो..”

छुन्न्न की बात का किसी ने जवाब न दिया. जवाब की वह उम्मीद कर भी नहीं रहे थे. ऐसी सोचनेवाली बात है भी नहीं कि चार हफ्तों की शादी में मेमन इतना बदले-बदले क्यों हैं. छोटी और नाज़ुक देह पर बारह सेर के कोंहड़े जैसा भारी सिर ढोते मेमन सहरा की बहकी नज़रों में खोकर चार दिन को यारबाजी भूल जायें उसमें क्या ताज़्ज़ुब?

जबकि ठीक उसी वक़्त नब्बे कदम की दूरी पर जवान जिस मुसीबत का सामना कर रहा था, उसके दोस्तों को उसका अंदाज़ नहीं हो सकता था. बाज़ार में बकरी का चारा और अब्बू् की दवाई खरीदते इतनी तैयारी से सोचा था घर पहुंचकर बीवी का हाथ थामें मज़ाक सुनायेंगे, ऐन वक़्त ज़बान धोखा दे गई, कमसिन, सांवली लड़की के आगे हकलाने लगे, मुंह से आखिर को बस इतना निकला, “फिर अं.. ब.. बताएंगे कभी..!”

इस अजीबो-गरीब बेडौल आदमी पर कितनी जल्‍दी छाती में कितना सारा तो प्‍यार उमड़ा आया था, फिर भी जाने किसी और लड़की की बात है, क्या है सोचती सहरा घबरा गई. मन खराब वैसे ही था, थोड़ी देर पहले रसोई में उसके हाथ से सूरन की तरकारी खराब हो गई थी..

लिखनेवाले ने आगे किताब में लिखा (लिखा मूलत: सर्बियन में, जिसका यह अंग्रेजी तर्ज़ुमा हुआ), बात घर से बिगड़ी एक औरत के मुंह बोलवाया, “There are women who only love sons, and there are others who love only husbands. The problem is that a woman immediately senses a man to whom a woman’s mouth is a moustache-binder. All women always go for the same men and always avoid the same men. Like those places on earth where dogs will never bark. And so some men are loved three times—first as sons, then as husbands, and finally as fathers—while others, those who were never loved by their mothers, will never be loved by their wives or their daughters either. Such men excrete and eat at the same time, like turtledoves.”

Monday, October 19, 2009

तीन और तेरह..

परात में छूटी ढाई रोटी ढंककर रख दी जाएगी, ढिबरी में कहां का बहुत सारा अंधेरा, चमकते सियाह पर मलिन टिकुली-सी सजी खपड़े की बतियायें भूल गई होंगी संझा हसरतों की आहभरी नज़र किधर गई थी, कौन मुर्गी तल्लीन देरतक पंजे चमकाती रही थी, बेहया बिल्ली शामजतन की ब्याहता के लिसराते साड़ी से गाल सटाती खड़ी थी, उस सोये सन्न उजाड़ कुएं की जगत तब जनम-जनमों का अकेला वह सांप प्रकट होगा, फिर उसी तक़लीफ़ में दोहरा हरा होता कि कौन है कौन है, भीतर डोलता, गरदन तक पानी में डूबा, और रोज़ अनथक, बिला-लागा प्यास-प्यास पुकारता?

एक पराये शहर के पराये घर लड़की अचानक खुद को आईने में देखेगी और चौंक जाएगी. बिस्तरे पर अधखुला एक पराया बक्सा होगा, बेढंगी तरतीब और अधनंगे सपनों से स्वयं को बचाता, रहते-रहते जाने किस अप्रत्याशित की आशंका में सिहर जाता, लड़की देरतक बहुत, बहुत, बहुत सारा मंत्र बुदबुदायेगी, हर बुदबुहाहट में कांपती खुद को और-और अकेली पाएगी.

दामपुर, नामपुर, सुखधाम विश्रामपुर कहां के लिए तो निकली होगी मनिहारी की रंगीन साइकिल, फीता, फुंदनी, नेलपालिश, चूड़ी, परफ्यूममालिश के साज, सिंगार में लदर-फदर, हहर-हहर, नीमअंधेरे की चकमक बहार कोई ब्युनेस आइरस बाला होगी, या शंघाई की नौ बिल्ली खाईं खाला, मौज में मुस्की काटके पूछेगी, हमारे लिए क्या, बालन? हवा में बलखाइल, लहराइल रंगीनी एकदम वहीं धड़ामपुर होगा, दूर कहीं रास्ता भटकी टिटिहरी सैक्सोफ़ोन बजाएगी, उजड़े पुल पर ठहरी, अटकी, भूले में फिर आगे रेंगती जाती पुराने मालडिब्बों की रेल मुंह पर साड़ी ढांपे न आना बलम हमरे दुआरे की तीन दशक पुरानी ठुमरी गाएगी, गाती खुद को बिसराती जाती जाएगी.

एक बच्चा वहशी दूरतक दायरे के बाहर दौड़ता जाता होगा, पलट-पलटकर हंसता, अब? अब?

बस्‍ते के भीतर रोज़..

तालाबंद नल और अटकी हवा की तरह सब ठहरा होता है, उधारी के सस्ते जूतों पर धूल चढ़ती होती है, फ़ोन देरतक मुंह सिये आख़ि‍रकार हारकर बुदबुदाता है, हमें बजाओ, नई किताब का चमकीला कवर कबतक त्या़ज्य तिरस्कार झेलता फिरेगा, हुमसकर उमगता है, फिर, फिर, फिर, ऐ सुनो, आगे क्या हुआ, भई, बताओ? दरवाज़े के सूने फ़्रेम में एक अस्थिर शोर ढोल पीटता है, फ्रॉक के नीचे घुटना मोड़े एक पर दूसरा पैर टिकाये बच्ची पूछती है आओ, चलो, जाओगे नहीं?

एक से निकलकर दूसरे सूनेपन पर खड़ा मैं ख़ामोशी में मुस्कराता हूं. कहां जाना है, इस शहर से बाहर कोई और शहर? चारदीवारी के इस भारी जंगल से निकलकर कहीं और किसी दूसरी सड़क के छोर पर कोई दूसरा घर? उलझी चोटीवाली बच्ची के माथे वहां सझुराव होगा, मेरे अपने अस्थिर, अनिर्दिष्ट रह-रहकर चौंक जाते अपने मन से मेरा बचाव?

बाहर देरतक आंखें पथरीली टंगी होती हैं, सब जाने किस प्रागैतिहासिकता में रंगा वैसा ही थिर बियाबान बना रहता है, मन के कुएं में पानी पछाड़ें मारती पुरानी काली दीवारों पर बेमतलब निशान छोड़ती हैं, रंगउड़े पुराने झोले में घबराया मैं बीन-बीनकर भरता चलता हूं, तीन रुपये की मंगरैल, पांच की सरसों, इतना लहसुन, उतना पेंसिल, उम्बेर्तो एको के तीन पेज़, पांच कुरर्तुल के, लड़खड़ाया दो बायें, डेढ़ दायें घूमता हूं, अब इसके बाद किधर? जाना है आना है, कहां?

बच्ची़ इस बार कुछ नहीं कहती. किताब के पन्ने तक फड़फड़ाते नहीं, वह सिर्फ़ मेरा वहम होता है.

Monday, October 12, 2009

कैसी तो छूटी बेहया शराब..

क्या होता है संगीत के साथ? मन के मोह में धंसे, कान की नोक पर बने रहने के बाद एक दिन गायब होता है, और फिर महीनों गायब बना रहता है. मन चावेला वारगास, चार्ली पार्कर, चार्ली क्रिस्च्यिन कोई होंगे, कभी सुना था, ठीक है, फिर एक जीवन भी तो है की पगडंडियों में बहका-भटका अपने जोड़-घटाव दुरुस्त करता रहता है, और वे सारे महीन सुरभरे, रागहरे गहरे क्षण कहीं किसी कोने छूटे, बिसरा जाते हैं, महीनों निकल जाते हैं. महीनों महीनों महीने निकल जाते हैं! और एक दिन.. और एक दिन कोई एक बेमतलब का बहाना बनता है, कोई बचकानी-सी वज़ह.. रुखे हाथ और उखड़ा अनमना सूखा मन संगीत की त्वचा से टकराता है.. जैसे नाउम्मीदी के डेस्पेयर में अरसे बाद अचानक पहचानी कपड़ों की झिलमिल के पार वह गाल छू गए हों, वह नज़र की मोहब्बत और मदहोश दीवानापन छू गया हो जिसके बारे में जाने मन ने किन गफलत और असमंजस के क्षणों में फ़ैसला कर लिया था कि भई, यह कहानी तो खत्म हुई, ग़म और भी हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा एटसेट्रा, एटसेट्रा.. दो पल नहीं लगता उन सारे एटसेट्राज़ की ऐसी-तैसी हो जाने में!

कैसे कलेजे से लगाता है मन अपनी पहचानी मधुरताओं को.. जैसे सालों-साल, सालों-साल अपने आंख के मोती बेटे से बाप जो नफ़रत करता रहा कि समूची दुनिया इधर से उधर हो गई लेकिन यह गधा नहीं सुधरा, और उसी ‘गधे’ को सरेआम किसी पुलिसवाले के हाथ जलील होता देख जैसे चेहरे पर दो दिनों के दाढ़ी की खूंट पर हाथ धरे सन्न बुढ़ाते बाप के दिल में तड़ सूराख़ बनता होगा कि अबे, हरामख़ोर, पुलिस की औलाद, तुम्हारी मजाल कैसे हुई हमारे दिलअज़ीज़, बत्तख के बच्चे से बच्चे को छूने की!..

क्या होता है यह मोहब्बत, रहते-रहते कहां चला जाता है? और जब अचानक अचक्के. लौटकर आता है तो मन में ऐसे गहरे मरोड़ क्यों जगाता है? मीठी तक़लीफ़ों की ऐसी गहरी कहानियां क्यों बुनने लगता है?

नीचे दो गानें नत्थी कर रहा हूं, बादवाली वारगास की दु:खभरी आवाज़ का पहचाना खिताब है, पहले, उसके ऊपर पाओलो कोंते की कैसी, किन दुनियाओं में भटकानेवाली शराब..



Thursday, October 8, 2009

कितना कही कह गई जो नज़र..





क्‍या कहता है एक लेखक का चेहरा? बता पाता सुलझा जाता है क्‍या देखा होगा इन अलसायी आंखों ने, जिया होगा गाल के हाथ और बोतल के साथ ने? कैसे-कैसे शब्‍द.. कहां-कहां से चले आए होंगे? अभी, बिलकुल अभी आने, आनेवाले भी होंगे..

Tuesday, October 6, 2009

उस रात की ठुमरी.. अलसाहट की एक टेक..



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