Monday, October 12, 2009

कैसी तो छूटी बेहया शराब..

क्या होता है संगीत के साथ? मन के मोह में धंसे, कान की नोक पर बने रहने के बाद एक दिन गायब होता है, और फिर महीनों गायब बना रहता है. मन चावेला वारगास, चार्ली पार्कर, चार्ली क्रिस्च्यिन कोई होंगे, कभी सुना था, ठीक है, फिर एक जीवन भी तो है की पगडंडियों में बहका-भटका अपने जोड़-घटाव दुरुस्त करता रहता है, और वे सारे महीन सुरभरे, रागहरे गहरे क्षण कहीं किसी कोने छूटे, बिसरा जाते हैं, महीनों निकल जाते हैं. महीनों महीनों महीने निकल जाते हैं! और एक दिन.. और एक दिन कोई एक बेमतलब का बहाना बनता है, कोई बचकानी-सी वज़ह.. रुखे हाथ और उखड़ा अनमना सूखा मन संगीत की त्वचा से टकराता है.. जैसे नाउम्मीदी के डेस्पेयर में अरसे बाद अचानक पहचानी कपड़ों की झिलमिल के पार वह गाल छू गए हों, वह नज़र की मोहब्बत और मदहोश दीवानापन छू गया हो जिसके बारे में जाने मन ने किन गफलत और असमंजस के क्षणों में फ़ैसला कर लिया था कि भई, यह कहानी तो खत्म हुई, ग़म और भी हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा एटसेट्रा, एटसेट्रा.. दो पल नहीं लगता उन सारे एटसेट्राज़ की ऐसी-तैसी हो जाने में!

कैसे कलेजे से लगाता है मन अपनी पहचानी मधुरताओं को.. जैसे सालों-साल, सालों-साल अपने आंख के मोती बेटे से बाप जो नफ़रत करता रहा कि समूची दुनिया इधर से उधर हो गई लेकिन यह गधा नहीं सुधरा, और उसी ‘गधे’ को सरेआम किसी पुलिसवाले के हाथ जलील होता देख जैसे चेहरे पर दो दिनों के दाढ़ी की खूंट पर हाथ धरे सन्न बुढ़ाते बाप के दिल में तड़ सूराख़ बनता होगा कि अबे, हरामख़ोर, पुलिस की औलाद, तुम्हारी मजाल कैसे हुई हमारे दिलअज़ीज़, बत्तख के बच्चे से बच्चे को छूने की!..

क्या होता है यह मोहब्बत, रहते-रहते कहां चला जाता है? और जब अचानक अचक्के. लौटकर आता है तो मन में ऐसे गहरे मरोड़ क्यों जगाता है? मीठी तक़लीफ़ों की ऐसी गहरी कहानियां क्यों बुनने लगता है?

नीचे दो गानें नत्थी कर रहा हूं, बादवाली वारगास की दु:खभरी आवाज़ का पहचाना खिताब है, पहले, उसके ऊपर पाओलो कोंते की कैसी, किन दुनियाओं में भटकानेवाली शराब..



6 comments:

  1. ऑफिस में हूँ तो गाना तो सुन नहीं पाउँगा.. पर आपके शब्दों की झंकार सुन पा रहा हूँ.. यकीनन इसका माधुर्य कुछ जुदा है..

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  2. आप एक ज्ञान का बड़ा समंदर हो सर जी......बहुते बड़ा ....

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  3. सच! कभी - कभी तो लगता है जैसे किसी लोकप्रिय आर. जे. का प्रोग्राम सुन रहा हूँ... देर रात...


    """""फिर एक जीवन भी तो है की पगडंडियों में बहका-भटका अपने जोड़-घटाव दुरुस्त करता रहता है, और वे सारे महीन सुरभरे, रागहरे गहरे क्षण कहीं किसी कोने छूटे, बिसरा जाते हैं, महीनों निकल जाते हैं. महीनों महीनों महीने निकल जाते हैं! और एक दिन.. और एक दिन कोई एक बेमतलब का बहाना बनता है, कोई बचकानी-सी वज़ह.. रुखे हाथ और उखड़ा अनमना सूखा मन संगीत की त्वचा से टकराता है.. जैसे नाउम्मीदी के डेस्पेयर में अरसे बाद अचानक पहचानी कपड़ों की झिलमिल के पार वह गाल छू गए हों, वह नज़र की मोहब्बत और मदहोश दीवानापन छू गया हो जिसके बारे में जाने मन ने किन गफलत और असमंजस के क्षणों में फ़ैसला कर लिया था कि भई, यह कहानी तो खत्म हुई, ग़म और भी हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा एटसेट्रा, एटसेट्रा.. """""

    याद रहने वाली लाइन... आहा ! आनंद! घोर आनंद...

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  4. बहुत खूब लिख दिया। अब गीत सुनने जा रहा हूं जी। आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूं। और अच्छा लगा।

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  5. आपके ब्लॉग पर आकर एक सबसे अलग अंदाज पढने को मिलता है ...
    कभी सुना था, ठीक है, फिर एक जीवन भी तो है की पगडंडियों में बहका-भटका अपने जोड़-घटाव दुरुस्त करता रहता है, और वे सारे महीन सुरभरे, रागभरे गहरे क्षण कहीं किसी कोने छूटे, बिसरा जाते हैं, महीनों निकल जाते हैं. महीनों महीनों महीने निकल जाते हैं! और एक दिन.. और एक दिन कोई एक बेमतलब का बहाना बनता है, कोई बचकानी-सी वज़ह.. रुखे हाथ और उखड़ा अनमना सूखा मन संगीत की त्वचा से टकराता है....
    शब्दों से खेलना कोई आपसे सीखे ...

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