Monday, October 19, 2009

बस्‍ते के भीतर रोज़..

तालाबंद नल और अटकी हवा की तरह सब ठहरा होता है, उधारी के सस्ते जूतों पर धूल चढ़ती होती है, फ़ोन देरतक मुंह सिये आख़ि‍रकार हारकर बुदबुदाता है, हमें बजाओ, नई किताब का चमकीला कवर कबतक त्या़ज्य तिरस्कार झेलता फिरेगा, हुमसकर उमगता है, फिर, फिर, फिर, ऐ सुनो, आगे क्या हुआ, भई, बताओ? दरवाज़े के सूने फ़्रेम में एक अस्थिर शोर ढोल पीटता है, फ्रॉक के नीचे घुटना मोड़े एक पर दूसरा पैर टिकाये बच्ची पूछती है आओ, चलो, जाओगे नहीं?

एक से निकलकर दूसरे सूनेपन पर खड़ा मैं ख़ामोशी में मुस्कराता हूं. कहां जाना है, इस शहर से बाहर कोई और शहर? चारदीवारी के इस भारी जंगल से निकलकर कहीं और किसी दूसरी सड़क के छोर पर कोई दूसरा घर? उलझी चोटीवाली बच्ची के माथे वहां सझुराव होगा, मेरे अपने अस्थिर, अनिर्दिष्ट रह-रहकर चौंक जाते अपने मन से मेरा बचाव?

बाहर देरतक आंखें पथरीली टंगी होती हैं, सब जाने किस प्रागैतिहासिकता में रंगा वैसा ही थिर बियाबान बना रहता है, मन के कुएं में पानी पछाड़ें मारती पुरानी काली दीवारों पर बेमतलब निशान छोड़ती हैं, रंगउड़े पुराने झोले में घबराया मैं बीन-बीनकर भरता चलता हूं, तीन रुपये की मंगरैल, पांच की सरसों, इतना लहसुन, उतना पेंसिल, उम्बेर्तो एको के तीन पेज़, पांच कुरर्तुल के, लड़खड़ाया दो बायें, डेढ़ दायें घूमता हूं, अब इसके बाद किधर? जाना है आना है, कहां?

बच्ची़ इस बार कुछ नहीं कहती. किताब के पन्ने तक फड़फड़ाते नहीं, वह सिर्फ़ मेरा वहम होता है.

4 comments:

  1. शब्दों का गजब अजायबघर....अर्थ इतने खूबी से गुथे -मोठे की कितने ही निकल लो..गंभीरता लपेटे...वाह...दिल खुश हो गया तो शैली पर ही...बाकि विमर्श के प्रश्न तो खड़े ही हैं, शाश्वत..

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  2. कैसा ऊहापोह है दूर तलक, इस शहर से बाहर कोई और शहर ? जाएँ भी तो कहाँ,

    क्या फिर से शहर ?

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  3. तालाबंद नल और अटकी हवा.......
    त्या़ज्य तिरस्कार
    सूने फ़्रेम में एक अस्थिर शोर.....
    आंखें पथरीली टंगी......
    दूसरे सूनेपन पर .....
    बेमतलब निशान


    बित्ते भर की पोस्ट में इतना कुछ ठेल दिया सर जी....

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