Thursday, October 22, 2009

गिरते, नशे में उड़ते की लोरी..

भारी देह का विरुप चेहरे वाला आदमी, उंगलियों पर तीन दिनों का मैल चढ़ा, माथे पर गिरे आते बेमतलब महीन लंबे बाल, मुंदी आंखें जाने किस सुरीले की मुहब्‍‍बत में नहायी हौले-हौले बेहयायी में मुस्कबरातीं, ब- ब- ब कहने से हारकर फिर फ्रांको बुदबुदातीं..

नशे में डूबे शराब का जवाब किसने देखा? देखा, मन के गहरे उठते जंगलराज का अमंगलगान भटके किसी पथिक ने सुना? पैर कहां किसके पीछे खिंचे जाते हैं? कोई सामने बैठा हाथ में हाथ लिए सारे राज़ सुलझाये, कहां से आया मीठी सड़क का यह कैसा जादूलोक कहां तक फैला जाएगा का उलझे भेद समझाए..

पहले बत्तियातो गा रहे ‘प्यार का परायापन’, पीछे चलते उसी परायेपन की महीनी को फिर अपनी उखड़ाहट में, कड़वे-मिठास में साध रही कारमेन कोनसोली..

न जमे तो मत सुनिएगा, अपनी बहक में अभी आपका न सुनना भी मैं सुन नहीं रहा होऊंगा..



1 comment:

  1. न जमे तो मत सुनिएगा, अपनी बहक में अभी आपका न सुनना भी मैं सुन नहीं रहा होऊंगा.

    गीत तो समझ में नहीं आया, हाँ फ्रांको की बियोग्राफी पसंद आई...

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