Friday, October 23, 2009

बवालिया मन..

बैठा मुरझाया, अझुराया मन अचानक उमग में बहकने लगे, बिना ‘मधुमती’ वाली जॉनी वॉकर का वीडियो देखे, मैकदा और जगजीत सिंह की ‘ओह, कैसी तो मीठी उदासी’ की पैकेजिंग सुने अपने ही नशे में एकदम ताज़ा सुलगन में चिटकने लगे, फिर? और जबकि न ही बैंक से किसी ने फ़ोन करके सूचना दी हो कि बड़े आदमी, कुछ कम करके अहसान करो, तुम्हारे बोझ में बैंक बैठा जा रहा है! या यही कि किसी छब्बी़ड़शी (षोड़शी की तर्ज़ पर) रुपसी ने रात के डेढ़ बजे फ़ोन पर दिल तोड़ देनेवाली आवाज़ में ऐलान किया हो कि जीवन में इतना अन्याय क्यों है, अंकिल? आप दस साल बाद नहीं पैदा हो सकते थे, या मैं ही दस साल पहले? न ही ये हुआ है कि रोलां बार्थ या ज़ाक देरिदा के साठ के दशक के किसी ‘माइंड बॉगलिंग’ निबंध में मुझे क्वोट करने का लोभ नामधन्य बुद्धिधनी संवरण नहीं कर सके हैं. या ड्यूक एलिंगटन के अबतक जाने कहां दबे रहे, धीरे-धीरे ऊपरिया रहे सीक्रेट पेपर्स के अनावरण में ड्यूक के बहुत सारे सुसुप्त के साथ-साथ मैं भी कुछ इस तरह अनावृत्त हुआ हूं जैसे गुप्त क्षणों में कभी अपने आगे भी न हुआ था? ओह, कैसे रोमान की चिटकन है यह? कैसी कैसी कैसी? जबकि किसी मस्तानी, दीवानी हथरानी तो क्या मैं सात घोड़ों के वेस्टर्न वैगन की रहने दें, कृश्न चंदर की गदह-सवारी भी नहीं किये हुए, फिर?..

फिर, फिर, फिर? अभी तो जाड़े और टर्टलनेक का रोमान भी शुरु नहीं हुआ. और हुआ भी होता तो अपन गरीबदास के पास कछुआगर्दन सजाव कहां? न ही एक फिरंगीचाम सुफ़ेद मित्र से चिरौरी किये थे बारह किताबों की लिस्ट थमा रहे हैं, ई-मेल के कीज़ नहीं हमारे ज़ि‍गर का ख़ून समझना, और अगली डाक के पहले हमारे पैकेट तैयार करने लगना, और हमारे कहने के पहले ही मित्र मित्रधर्म में ख़ून जलाने लगे थे, नहीं, ऐसा कुछ कहां होता, ऐसे मित्र अब कहां होते हैं? ऐसा बुद्धिप्रवण मित्रसंपन्न समय कहां होता है? उसके भोले मुग़ालते होते हैं, न चाहते हुए भी फिर अल्बेयर कामू के ‘द मिथ ऑफ सिसिफस’ से झांकता सत्य दीख ही जाता है कि, “..man must recognize two things: that all he can rely upon is himself, and what goes on inside his head; and that the universe is indifferent, even hostile, that life is a struggle, that we are all like Sisyphus, pushing a stone uphill, and that if we stop, it will roll back down again.” आगे बाबू पीटर वॉटसन ने कहा है, और शायद बहुत ग़लत कहा भी नहीं, “This may seem—may indeed be—futile, but it is all there is.”

तब? मन की यह कैसी उमड़न है? होना तो यह चाहिए, जैसा आमतौर पर यात्रा-रद्द और सिनेमा देखने गए और टिकट न मिला के रद्दी क्षणों में होता है कि आदमी चटकर सेरवांतेस की जगह कर्नल रंजीत की शायरी पढ़ने लगता है, फिर मैं संगीत क्यों सुन रहा हूं? और ऊपर से उमग भी रहा हूं? आई फाइंड द होल बिज़नेस रियली फनी, डोंट यू?

4 comments:

  1. कितना उल्टा पुल्टा है ..मन बावलिया रहा है ...कई बार देखना पड़ेगा ...!!

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