Saturday, October 24, 2009

कैसी लिखाई, कहीं पहुंचाई?..

लिखो, लिखो, लिखते चले जाओ. चले जा ही रहे हैं, भौतिक रुप से कहीं पहुंच न रहे हों तो भी शब्दधन, और अंधारवन का विस्तारण तो हो ही रहा है! वैसे यह सवाल भी दिलचस्प है कि कहीं पहुंचना दरअसल कहां पहुंचना होता है? हो सकता है? कभी? उसकी एक्चुअल मार्किंग हो सकती है, एवर? जहां पहुंचना था अनिल अंबानी और शह और मात ख़ान चहुंप गए हैं या अभी और आगे गाना है? आगेवाला गाना कितना बड़ा फ़साना होता है, दो सौ करोड़, बारह, चौबीस, बहत्तपर करोड़, ऑर स्टिल मोर? ये ‘मोर’ मांगनेवाला दिल किस, किसी मोर के ठोर पर आकर कभी ठहरता है, ठहरेगा? हाऊ बिग इज़ रियली द बिग? अदरवाइज़ मन के आंतरिक कंगलेपने का यह कैसा निर्मम साम्राज्यावादी विस्ता़र है?

एनीवे, मैं लिखाई की, और लिखते-लिखते की बढ़ाई की कह रहा था, कि अगड़म-बगड़म-तगड़म ससुर लिखे जाते हैं, इनको गिरा दिया, उनको पटक दिये, अरे? सचमुच? ऐसी पहुंच है शब्दों की, ऐसे शब्दसिद्ध आप कि ऐसा भावुक भोलापन कि आप शब्दों के साथ दौड़ रहे हो और पीछे-पीछे सब सध रहा, सेटाय रहा है? चार अख़बार और तीन बहार की झलकी लेकर ‘देख लिये दुनिया, समझ गए जीवन’ का ऐसा भोथरा, चिरकुट गुमान? अंधों में काने राजा का खोखला बाजा? लिखे लिखे लिखे गए, चार पैरा के विस्तार में सत्य बिछाकर लेट गए, धन्य हुए, जानना था सब जान लिये, उसके बाद तृप्ति की एक डकार हासिल की?

विकट प्रश्न है सत्य क्या है? वह है जो लिखते, लिखे जाते उच्चार रहा हूं, और सामनेवाले के पल्ले घेले भर नहीं पड़ रहा, मुस्कियाते हुए वह उसे बुहार रहा है, एक दूसरी झुनझुनी बजाकर किसी दूसरे सुर में पुकार रहा है? मेरा सत्य ही दिन की चार मन:स्थितियों में चौदह बार बदलता है, अभी थोड़ी देर पहले का प्रमुदित मन थोड़े अंतराल पर कलुषित कालेपन में घिघियाने, सबसे आंख बचाने लगता है, तो इससे अपने सत्य के बाबत ही क्या नतीजा निकले? जो भी निकलेगा वह तथ्यत: एकमेव और संपूर्ण होगा? और नहीं होगा तो उसके अनेकमय में मेरा अपना ठीक-ठीक क्या मैं कैसे छांटूं? इज़ इट आस्किंग द इम्पॉसिबल?

मैं कौन? जो लगभग तीसेक साल पहले राऊरकेला, उड़ीसा से बाहर के ज़रा विस्तृत संसार की तरफ़ निकला? या वह जो इतने लंबे फ़ासले पर खड़ा उस पीछे को परायेपन में देख रहा है? व्हिच वन इज़ द रियल ‘मी’ एंड व्हिच वन इज़ द ‘डबल’? मैं वह हूं जो लिखने के बाद अपने लिखे को एक डिटैच्ड निर्ममता से देखने की सजगता रख सकता है, या वही, उतना भर ही मैं, मेरापन है जो अहा, अपने लिखे को लिखते आह्लादित, उन्मादित है? अब आया जाये ज़रा काम के सीरियस शबदावली पर. बार्थ साहब कहते हैं, “the writer no longer contains within himself passions, humors, sentiments, impressions, but that enormous dictionary, from which he derives a writing which can know no end or halt: life can only imitate the book, and the book itself is only a tissue of signs, a lost, infinitely remote imitation.”

ख़ैर, अदरवाइज़ सिसिफस के मिथ की कहानी है ही, एक पत्थर है हम ढोये चलते हैं, ब्लॉग है तो लिखे, ठेले चलते हैं, किसी दिन सचमुच बैठकर हिसाब करने लगें कि गुरु, कर क्यों रहे हैं तो हो सकता है हाथ-पैर फूल जायें, और ज़माने पहले अल्ला-मियां की चाकरी में गईं नानी याद आने लगें? किशोर कुमार का वह ‘पिया का घर’ फ़ि‍ल्मवाला गाना भी है ही, ‘‘ये जीवन है, इस जीवन का यही है, यही है रंग-रुप..’’

दरअसल इस घुमड़न-बहकन का मतलब मत निकालिये, दो घंटे बाद हो सकता है ठीक-ठीक जवाब देना मेरे लिए भी मुश्किल हो जाये, इस दौड़ती लिखाई का तात्का़लिक कारण सिर्फ़ इतना भर है कि बाबू बार्थ ने (देख-देखकर दंग हो रहे हैं) काम की बहुत सारी महत्व्पूर्ण लिखाई ठेल रखी है, और साठ के शुरुआत से ही ठेलते रहे हैं, हिंदी में उपलब्ध नहीं है तो वह तो हिंदी की अनोखी मेधा का एक एंगल है, हिंदी के अपने बुद्धत्व से अलग हिंदी में फिर भला क्या उपलब्ध है? अंग्रेजी में नेट से ऊपरियाया एक निबंध अभय ने हमारी तरफ़ ठेला तो हम लड़ि‍याने लगे कि तुमने हमारा इलाहाबाद के रेल का बर्थ तो ख़ैर खराब किया ही, कम से कम अब बार्थ दुरुस्त़ करो, एक समूची किताब न सही, अदद लेखन पर के एक लेख का तर्जु़मा तो कर ही दो! अभय ने दबी आवाज़ में ‘हां’ किया, दो घंटे बाद फैली आवाज़ में ‘क्यों करें?’ हूकने लगें के बचाव का बहाना बना ये पंक्तियां घसीट दीं, आप घिसटे हुए इतनी बुद्धि निकाल-संभाल लेंगे इस उम्मीद में इसे बिना दहले ठेल रहा हूं..

वैसे विनीत का ऑडियो रेकॉर्डर मिला या नहीं? उन संभावित नामों की लिस्ट भेजूं जिनके सामान की जांच में उसके पाये जाने की शर्तिया गारंटी होगी?

1 comment:

  1. वैसे यह सवाल भी दिलचस्प है कि कहीं पहुंचना दरअसल कहां पहुंचना होता है? हो सकता है? कभी? उसकी एक्चुअल मार्किंग हो सकती है, एवर? हाऊ बिग इज़ रियली द बिग? अदरवाइज़ मन के आंतरिक कंगलेपने का यह कैसा निर्मम साम्राज्यावादी विस्ता़र है?

    sabase badaa savaal bhi yahi hai. Setting a limit is the limitation of imagination. Like perfection is also beyond which creativity is blind.

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