Monday, October 26, 2009

महाजनी पथ की घिसटती सांझ पर लड़का-लड़की..

हाथ में हाथ नहीं था लेकिन लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. चूंकि कथा है और लातखाये प्रदेश की पिटी हुई ज़बान के रंजन हेतु है, आगे ठिलने के लिए लड़की और लड़के का चयन ही अभीष्ठ था. और अच्छा था कमसिन, कोमलांगी थे, चालीस से ऊपर के होते उससे कथा के स्पोंडिलाइटिस और डाइबीटिक-व्यथा में बदलने के ख़तरे होने लगते, बेचारा हारा प्रेमातुर लोलुप मन मेडीकल ऊबटन में गंधाने लगता, श्रृंगार की सारी बहार कपूर की तरह उड़ गई होती- वैसे ही जैसे देखते-देखते हिंदी का समानांतर सिनेमा भुर्र हो गया, सन् अस्सी के दरमियान से हिंदी के राष्ट्रीय अरमान!.. ख़ैर, तो लड़का, लड़की साथ थे और चले जा रहे थे. उसी महाजनी-पथ पर जा रहे थे जिस पथ पहले मार्केटियर्स गए और आगे जाकर अदिदास, नाइके और रेलायंस फ्रेश की सजीली, सुरीली झांकियों में जीवन चकमत होता नहीं भी तो किसी दिन होगा ही की चमकभरी संभावना दीखती रहती. महाजनी ताप में दिप्-दिप् दमकूंगी किसी दिन की उत्कंठा में मचलती लड़की सोचती प्रेमपथ चलकर आई है उसीके आंच में मन ऐसे घनघन रौशन हो रहा है, एकबारगी चौंककर ऐलान करती, ‘कितना अच्छा लग रहा है न?’

कभी एक टीवी शो में गुलज़ार साहब के लिए ताली पीटनेवाले लड़के का मन अभी लड़की के प्यार की लपकती बिजलियों में नहीं, ऊपर आसमान में टंगे एक फ़ोन के विज्ञापन की बदलियों में खोया होता, चौंककर सिर हिलाता, ‘हां, हां, वेरी.’

और जोड़े दिखते. स्क्रिप्ट नहीं, बाज़ार की ज़रुरत में ज़्यादा सुखी दिखते, उनको सुखी देख लड़की गुमसुम फुसफुसाकर कहती, ‘लेकिन आज जल्दी लौटना है! शाम घर पर मुझे देखने आनेवाले हैं..’

इसके बाद लड़की एक कार की बंद खिड़की के शीशे में अपना सौंदर्य आंकती लड़के के जवाब की राह तकती, लड़का अन्यमनस्क हाथ के सेलफ़ोन को तकता कि आधे घंटे से ऊपर हुआ यह बजा नहीं, कैसी दुश्वारी है हम हैं मगर हमें कोई याद क्यों करता नहीं?

फिर लड़के का ध्यान लड़की के तने चेहरे की ओर जाता, ‘तुम्हें मालूम है हमारे पास समय कितना कम है?’

लड़का हारकर कुछ उसी संज़ीदगी से- जिस संज़ीदगी से राजेश खन्ना ने कभी पज़ोलिनी की कविताएं और बेर्तोलुच्ची के ‘द स्पाइडर्स स्ट्रेटेजम’ को एक नज़र देखकर उलट दिया होगा, फिर ‘द रेड रोज़’ की सुर्खी मापने लगे होंगे- इस अटके रोमान के अस्त को थाहते चोट में कहा, ‘मालूम है. एक ब्लॉगपोस्ट और एक प्यार की उम्र क्या हो सकती है!’

बाशो और हाइकू के शुद्ध अज्ञान में धंसे लड़के ने ऐसा कुछ कहा नहीं, लेकिन नहीं कहा तो भी प्रेमनहायी लड़की ज़रुर समझ जाएगी की नज़रों ख़ामोश लड़की को तकता रहा. लड़की ने भी फ्लॉबेयेर और तॉल्स़तॉय नहीं पढ़ी हूं इसका यह मतलब नहीं कि रोज़ अपने भीतर अंतर्द्वंद्व जीती नहीं की नज़र लड़के का देखना देखती रही.

एक-दूसरे के बाद लड़का और लड़की चुपचाप अपना आसपास तकते रहे. असित सेन के ख़ामोशी के राजेश खन्ना के नाव पर सफ़ेद कपड़ों में लिपटी वहीदा रहमान को उदास गाने में रंगने की तरह सांझ नज़दीक आती रही की ही तरह पोस्ट भी कहीं जाती ही होगी की एक खुशफहम भोली उम्मीद बनती रही, इतना तो बन ही सकता था, ख़ास तौर पर जब प्रेमीजनों की उपस्थिति इतनी ज़्यादा नज़दीक हो, जिनका होना यूं भी इस और उस उम्मीद की उंगली पकड़कर चलने में ही होता है..

लेकिन तभी कोई ‘मां!’ कहकर चीखा, या कि चीखा जैसा लगा, लड़की एकदम से लिखनेवाले की ओर पलटी.. लिखनेवाले ने अदबदाकर ‘पब्लिश पोस्‍ट’ पर उंगली पटकी..

पुनश्‍च: एक नज़र यहां मार लिया जाए, इसे समझने के लिए मयुरासन भी नहीं करना होगा.

2 comments:

  1. मुझे यकीन नहीं हो रहा... इतनी अच्छी पोस्ट और एक भी कमेन्ट नहीं... अपना ब्लॉग कब बड़ा होगा ? बात को कैसे निकलना है यह आपसे कोई सीखे... दो लेखक ही ऐसे दीखते हैं... फणीश्वर नाथ रेणु और रामवृक्ष वेनीपुरी...

    ReplyDelete
  2. सागर जी, यही है हिंदी का संसार...

    ReplyDelete