मन का पतंग किसी खूंटे उड़ता होता, भाग्य पढ़ने की किताब किसी झोले छुटी होती, वैसी नाउम्मीदी में सुख टकराता ऐसे ही किसी मामूली राह, भूली पगडंडी पर, और फिर इसके पहले समझें अचक्के हुआ क्या, यह कैसा फेर, गुरु, सचमुच मिले सुख से ऐसा अपना नसीब, कि जाने किन जलेबी हवाओं की कैसी तो खड़खड़ाहट में पानी का गिलास उलट जाता, पुराने दीवार का पलस्तर दरककर गिरता, टूटते खपड़े ख़ामोशी में अपना गुस्सा निकालते, सारे दिन धीमे-धीमे धूल बरसता चलता, ज़माना हुआ गए मौसी को लेकिन उसकी आवाज़ गूंजती,
तू किसी और गांव चला जा बच्चा!..