एक ही दिन मन चार छोर खड़ा हो चौदह किस्मों की चित्रकारी करे, सात रंगों की शरबत पिये का भी जीवन कैसा, क्या अजीब खेल है. अपने एंड पर एक पारिवारिक खबर से सुबह चित्त उखड़ा, दोपहर ढलते-ढलते तक दो जिरह में उलझकर डेढ़ झगड़े कर लिये, और सांझ की ढलान पर दिन का हिसाब लगाने बैठें तबतक किसी अप्रत्याशित कोने से एक मुंहजबानी रेल और पीछे-पीछे मेल आया कि तुम्हारी फलानी चीज़ पढ़ी, और ढिमकाने स्तर के सस्ते दारु सा आनंद आया! सुनकर-पढ़कर बाग-बाग और बाघ होने की जगह, और शायद इसलिए भी कि आमतौर पर हमें कड़वी जलेबी की गोलाइयों से खुद को नपवाते रहने की आदत-सी हो गई है, सो आदत से मजबूर, स्वभावत: हम संशयग्रस्त होने लगे, फिर चूंकि देर रात आंख फोड़ने की आदत से मज़बूर हैं सो इस बार किसी और की जगह, अपनी से ही फोड़ते रहे, और फिर थोड़ा ताज्जुब ही हुआ कि फोड़ते में आंखों के साथ-साथ मन को भी ऐसी तक़लीफ़ नहीं हो रही थी! ख़ैर, यह फिर ठिलाई का इंट्रो हुआ, आगे की बात यह कि कुछ जो फलतुआ हैं, आंख और दिल फोड़वाने से जिनको गुरेज नहीं, एक संयोग में दुबारा की यह याद उनके लिए है कि चाहें तो वे भी कभी आयें, इस कोने लटकें.. संभवत: अनुभव ऐसा निरानंदी नहीं होगा..