Saturday, October 31, 2009

एक मुस्‍कराती औरत के चित्र..

ग्यारह साल की बच्ची ने बुरा मानकर मुंह बनाया, ‘व्हॉट? मालूम है आप मेरे आनसर से हैप्पी नहीं हो, ठीक है फिर, आप बताओ?’

औरत मुस्कराकर बच्ची के गिरे मन को ऊपर उठाने की कमज़ोर कोशिश करती बोली, ‘हो सकता है, बेटा, मैं अपने आनसर से भी हैप्पी न होऊं, देन? मैं सिर्फ़ इतना कह रही थी..’

लेकिन बच्ची तब तक मुंह फेरकर, पैर पटकती कमरे से बाहर निकलकर ज़ाहिर कर चुकी थी कि अपने को मंद, बंदबुद्धि दिखाये जाने के लिए वह अपनी मां को दोषी मान रही है.

औरत के चेहरे पर चली आयी मुस्कराहट अब भी अपनी जगह वैसे ही अटकी पड़ी थी, हालांकि किसके लिए मुस्करा रही हूं का अहसास अब स्टुपिड भी लग रहा था, फिर भी जैसे एक ज़ि‍द में, औरत मुस्कराती रही.

बच्ची ने ऐसा क्या कह दिया था, या उसकी काट में औरत ही क्या़ बोल गई थी असल प्रश्न वह है भी नहीं. असल मुश्किल है प्रश्नों के किसी एक निश्चित भूगोल का न होना. उस भूगोल के बदलते ही प्रश्नों की प्रकृति, अंतर्वस्तु भी नाटकीय तरीके से बदल जाती है, ऐसे में स्थितिबद्ध, इस तरह के एकांगी ज़ि‍रह, वह भी एक छोटी बच्ची को उलझाये हुए, का मतलब क्या? कुछ अनासक्त भाव से सोचना संभव बनाती औरत सोचती और मुस्कराती उदास बनी रही..

***

औरत सुखी है. समाज ने सुख की जैसी जो दुनिया बनायी है, औरत उसी सुखी दुनिया में अवस्थित है. सुखी घर, सुखी बच्चे, सुखधन्य पति सबकी सुखी-सुखी सा‍माजिक पहचान है, फिर भी रह-रहकर जैसे किसी नशे में सरोबार औरत का क्लांत, उदासी में नहाया मन कहीं अकुलाया भागना चाहता है, किस दु:ख की पहचान में किस सागर की ठांव दौड़ता है? वहां पहुंचकर, फिर उस भूगोल में अवस्थित, व्यवस्थित होकर सुखी बन सकेगा, बना रहेगा? औरत सोचती है, और सोचते हुए समझती है उसके पास वाजिब जवाब नहीं, और फिर अपने में हारी मुस्कराती रहती है.

दरअसल यह सच नहीं, पूरे तौर से सच नहीं. ऐसे कोई दु:ख नहीं जिनकी ठीक-ठीक पहचान करके औरत ने कोई लिस्ट तैयार कर रखी हो, नहीं. इसलिए यह कहना ज़्यादा सही होगा कि औरत सुखी है, लेकिन यह भी सही है कि अपने आसपास भौतिकता के अनुराग में जागते, सोये समाज के ख़्याल से उसे विरक्ति होती है, इस सबके बीच धंसे होने और आगे का सारा जीवन यूं ही गुज़रेगा के बोध में सांस उखड़ने लगती है, हाथ गोद से उठाकर बालों तक ले जाना पहाड़ होने लगता है.. और औरत, जैसा बचपन के अपने एक अज़ीज़ को पत्र लिखती, लेकिन अब लिखने से बचती है, स्टुपिडली मुस्काराती रहती है!

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पति और बच्चों के पीछे खोयी एस्कलेटेर के रेलिंग पर हाथ टिकाये औरत सर्द सांस लेकर सोचती सुपर मॉल्स से सब सुखी हैं फिर उसे इतनी क्यों नफ़रत है. डिब्बाबंद खाना, किसी विंडो पर बजता गाना, कॉफ़ी बार, चकमक कपड़ों की बहार सब उसकी आंखों पर जलते कोयलों की मानिंद झरते, गिरते रहते हैं, औरत उसी क्षण सब भूलकर वहीं मर जाना चाहती है, कि कहीं और, किसी नये तरीके से, एक नये जीवन में ज़िंदा हो सके..

औरत शहर के शोर से दूर किसी पहाड़ के सूनसान में अपने को पाकर संभाल लेना चाहती है, जैसे वह अभी ताज़ा दुनिया में आयी चिड़ि‍या का बच्चा हो और उसे हर बुरे असर से बचा लिये जाने की ज़रूरत हो, फिर यह सोचकर औरत का मन हदसने लगता है कि पहाड़ पर वह साफ़ पानी कहां पायेगी? साफ़ सैनिटेशन, एक अदद साफ़ स्पेस (गंदी जगहों में औरत का माथा चलने लगता है), पहाड़ में अपना आईपॉड ले जाना नैतिक रुप से सही होगा? औरत सोचती है और दु:खी होकर फिर मुस्कराती रहती है..

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एक अन्य वर्ज़न. वही कहानी है, बस औरत की जगह इस बार हम आदमी को मुस्कुराता, अपने मुस्काने में घबराता देखते हैं.

7 comments:

  1. यदि वे पुराने पानी के स्रोत सूख न गए हों तो ठंडा निर्मल पानी तो मिल ही जाएगा। अन्य समस्याएँ तो होंगी ही। शायद पहाड़ भी बदल गए हों।
    घुघूती बासूती

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  2. ओर दुनिया कहती है औरत कहां बंधी हुई है ?

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  3. वैसे एक हितकांक्षी ने छुपाके प्रतिक्रिया भेजी है, वह इस लिखे पर कहीं ज्‍यादा वाजिब टिप्‍पणी है:

    तल्ख़ बैचेनियों का टू मिनिट मेग्गी नूडल समाधान,
    अज़दक से थोड़ी बेहतरी की उम्मीद करनी चाहिए?


    अब अज़दक से बेहतरी की क्‍या उम्‍मीद की जानी चाहिए इसका तो मेरे पास जवाब नहीं है, लेकिन सवालों के भावुक शब्‍द-चित्र जो बुनते हैं उसकी सीमाएं समझ ज़ाहिर हुईं, कम से कम यह समझ आता है.

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  4. कभी कभी तो कमेन्ट करने के लिए भी सोचना पड़ता है :)

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  5. ऐसी कितनी सारी मुस्‍कुराती औरतें हैं चारों ओर। एक मेरे बगल में, एक मेरे घर में और एक मेरे भीतर।

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