Monday, October 19, 2009

तीन और तेरह..

परात में छूटी ढाई रोटी ढंककर रख दी जाएगी, ढिबरी में कहां का बहुत सारा अंधेरा, चमकते सियाह पर मलिन टिकुली-सी सजी खपड़े की बतियायें भूल गई होंगी संझा हसरतों की आहभरी नज़र किधर गई थी, कौन मुर्गी तल्लीन देरतक पंजे चमकाती रही थी, बेहया बिल्ली शामजतन की ब्याहता के लिसराते साड़ी से गाल सटाती खड़ी थी, उस सोये सन्न उजाड़ कुएं की जगत तब जनम-जनमों का अकेला वह सांप प्रकट होगा, फिर उसी तक़लीफ़ में दोहरा हरा होता कि कौन है कौन है, भीतर डोलता, गरदन तक पानी में डूबा, और रोज़ अनथक, बिला-लागा प्यास-प्यास पुकारता?

एक पराये शहर के पराये घर लड़की अचानक खुद को आईने में देखेगी और चौंक जाएगी. बिस्तरे पर अधखुला एक पराया बक्सा होगा, बेढंगी तरतीब और अधनंगे सपनों से स्वयं को बचाता, रहते-रहते जाने किस अप्रत्याशित की आशंका में सिहर जाता, लड़की देरतक बहुत, बहुत, बहुत सारा मंत्र बुदबुदायेगी, हर बुदबुहाहट में कांपती खुद को और-और अकेली पाएगी.

दामपुर, नामपुर, सुखधाम विश्रामपुर कहां के लिए तो निकली होगी मनिहारी की रंगीन साइकिल, फीता, फुंदनी, नेलपालिश, चूड़ी, परफ्यूममालिश के साज, सिंगार में लदर-फदर, हहर-हहर, नीमअंधेरे की चकमक बहार कोई ब्युनेस आइरस बाला होगी, या शंघाई की नौ बिल्ली खाईं खाला, मौज में मुस्की काटके पूछेगी, हमारे लिए क्या, बालन? हवा में बलखाइल, लहराइल रंगीनी एकदम वहीं धड़ामपुर होगा, दूर कहीं रास्ता भटकी टिटिहरी सैक्सोफ़ोन बजाएगी, उजड़े पुल पर ठहरी, अटकी, भूले में फिर आगे रेंगती जाती पुराने मालडिब्बों की रेल मुंह पर साड़ी ढांपे न आना बलम हमरे दुआरे की तीन दशक पुरानी ठुमरी गाएगी, गाती खुद को बिसराती जाती जाएगी.

एक बच्चा वहशी दूरतक दायरे के बाहर दौड़ता जाता होगा, पलट-पलटकर हंसता, अब? अब?

2 comments:

  1. तो ये हुई बात ..थोड़ी-थोड़ी गहमा-गहमी

    ReplyDelete
  2. ओह! हम तो फिर चकरा गये।

    इलाहाबाद आइए तो जरा समझाइए इसका मतलबवा..। :)

    ReplyDelete