Monday, November 30, 2009

समय पीछे जाकर भी कितना पीछे जाता है?..

एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल की सीढ़ि‍यां उतरते नयनमोहन घोषाल ने थके-हारे स्वर ऐलान किया, ‘क्या फरक पड़ता क्लैरिनेट-मैन किदर गुमा, कोन समय गुमा. हम हामारा बाड़ी सोब दिनेइ होताम, किंतु सोत्ती‍ अगर आप जिग्या‍सा करेन, क्वेश्चेन पुट करेन तोमाय कोथाय पावा जाबे, नोयोनमोहोन? बाड़ी थाको तो तुमि? तो आप क्या सोचते हामारा पास कोनो स्ट्रेट आनसार आछे की? नेइ. सेइ तो आमादेर सोबार लाइफेर बिग क्वेश्चन. केउ जाने ना कोथाय बास आमादेर! रियल वी, बुझेछेन तो?’

पुनकी नेतराम को कुच्छो नहीं ‘बोझाता’. घोषाल बाबू के पान, तंबाकू और सुराही में ठंडे पानी के इंतज़ाम और साहब लोगों के चमकते जूतों और मेमिन जान के सजीले छातों के गोपनीय लोक में मुंडी फोडते रहने से जब उसे फ़ुरसत मिलती है, वह दूसरे गुमाश्तों की संगत में गोटी खेलने की जगह अपने परिचित प्रश्नलोक में लौट आता है और फिर अकल भिड़ाये भेद फोड़ने की कोशिश में जुटा रहता है कि आखिर वह कैसा फर्क़ है कि गिलहरी बराबर ज़रा सी नौकरी में घोषाल बाबू के चेहरे की रंगत उड़ी रहती है, जबकि बड़के लाट प्रिंसेप साहब सारा दिन टकसाल में माथा फोड़े के बाद भागे-भागे सोसैटी आते हैं, और पहुंचते ही पोथी-पतरों में खुद को ढांप लेते हैं और समूचे चेहरे पर, मनोहर किरिया, ‘खिलन’ खिली रहती है!

तीस-बत्तीस पन्नों की खुद की तैयार की रिपोर्ट पर नज़र फिराते निकोलस यादव के चेहरे पर ऐसे हिकारती भाव बनते हैं मानो इस उम्र में वह किस लड़कपन में समय खराब कर रहे हैं, थोड़ी देर तक होंठ भींचे रहने के बाद बुझी हुई पाइप वह मुंह में फंसाकर बुदबुदाते हैं, ‘इट्स ऑल नानसेंस, एक अर्द्धविक्षिप्त वृद्ध भिक्खु की सेवा में अजामिलकुसुम आश्रम, गोपेश्वर में एक लंबे अंतराल पर ‘वह’ देखा गया था, इस बात की कोई तस्दीक नहीं किसने देखा था, और जब देखा था तब क्या क्लैरिनेट मैन वॉज़ प्लेइंग हिज़ क्लैरिनेट? नहीं, यहां उसका उत्तर नहीं. इस तरह से यह जांच कहीं नहीं जा रही, हम कहीं नहीं जा रहे. डैम इट, यादव!

जुसेप्पे, चुप है. मेरे नहीं टोहने पर वह कुछ नहीं कहता. कलकत्ते में सारे दिन की आवारागर्दी के बाद अपने लिनेन का घिसा जैकेट उतारकर एक कुर्सी की पीठ पर फेंक, कैनवस के गंदे जूतों को लिये-दिये जाने किस ज़माने के पुराने पलंग पर चित्त ढेर हो जाता है, अंतत: मेरी ख़ामोशी तोड़कर सवाल करने पर कि प्रिंसेप की डायरी मिली? के जवाब में मुस्कराकर इंकार में सिर हिलाता है. मैं चिढ़कर, पूरी कोशिश से अपना गुस्सा दबाये फिर, पूछता हूं, ‘तो सारे दिन इसी नहीं मिला की खोज में लगे रहे?’

जुसेप्पे कनपटी को हाथ का सहारा देकर उठंगा लेटता है, शरारत से मुस्कंराता है, ‘मैं कुछ और पीछे लौट गया था, विलियम जोन्स और चार्ल्स विल्किंस की कहानियों की टोह में निकल गया था. नहीं, तुम हल्ला मचाने से पहले मेरी बात सुनो, सुन रहे हो? समय क्या है? उसे कितना भी पीछे खींचो, वहां जाकर भी यही दिखता है कि समय के बड़े फलक का वह कितना लघुतम बिंदु है, समझ रहे हो?

मोतीहाराना से ग्यारह वर्ष की कन्या, सोनाबिनी, जो नयनमोहन घोषाल के यहां आई थी, यह उसका दूसरा व्याह था. पहले व्याह के वक्त उसकी उम्र आठ वर्ष थी, और जिससे हुई थी इसके पहले कि वह उसे देख पाती, अभागा बाढ़ की नदी में नाव पलटने से काल-कवलित हो गया था. स्वयं से उम्र में तिगुने नयनमोहन को देखने की कन्या में कैसी कामना थी, इसका उत्तर देना भी कुछ उतना ही मुश्किल है जितना यह जानना कि नयनमोहन घोषाल स्वयं क्लैरिनेट-मैन को कितना जानते थे, जानते थे? सचमुच?

(बाकी..)

गुम..

सन् अट्ठारह सौ तीस के आसपास की घटना है, या शायद कल रात के आखिरी पहर के दरमियान की कभी, कहना मुश्किल है. तथ्यत: मुश्किल इसलिए भी है कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे दक्षिणी बिहार में भटकते जिस शख्‍स का किस्सा है वह अभी भी लापता है. नयनमोहन घोषाल मामले पर कुछ प्रकाश डाल सकते थे लेकिन जेम्स प्रिंसेप की मातहती में ब्राह्मी लिपि संबंधी कागज़-पत्तर सहेजते हुए वैसे ही इन दिनों वह मानसिक रुप से कालाजारग्रस्त हैं, अंग्रेज की पागल सनक में घर में मोतीहाराना से ग्यारह वर्ष की कन्या विदा होकर आई है, ठीक से उसका मुख देखने तक का अभी अवकाश नहीं बना, ऐसे में टमटम के काफिले पर पश्चिम बंगाल के तीन जिलों की धूल फांककर लौटे पुलिस सुपर निकोलस यादव की खिन्नता, झुंझलाहटों का किस तरह, क्या खाकर सामना करें? फिर हरे चमड़े की मेज़ पर कुहनी धंसाये, सूखी कनपटियों में उंगलियां गड़ाये बाबू नयनमोहन को लगता जीवन में सुख देखना शायद उनके नसीब में नहीं, अच्छा होता बचपन के संस्कृत पाठशाला के सखा पूर्णज्‍योति की तरह, वह भी सोलह वर्ष की अवस्था में अघोरी साधुओं की संगत में गोरखपुर, नेपाल की तरफ भाग गए होते, कलकत्ते के काले बुखार से रोज़-रोज़ की इन भारी लड़ाइयों से निजात मिल जाती..

पुराने कपड़े में लपेटकर धरा क्लैरिनेट, यही तो? बांसुरी नहीं था, क्लैबरिनेट ही था, पक्का?..

कहानी है गुमनेवाला कभी आदिवासियों की संगत में ‘बजा-बजानिया’ की बहकी-संझाओं की लम्बी-लम्बी तानें छेड़े रहता था? बांसुरी नहीं, क्लैरिनेट की संगत में करता था? आश्चर्य..

“आश्‍चर्य तो यह भी है कि दीवाने, बहकबिहारी के झोले में ओवी विजयन का वह पतला, पहला मलयाली उपन्यास ‘खसककिंते इतिहासम्(द लिजेंड्स ऑव खसक) क्या कर रहा था. कब छपी थी, साप्ताहिक मातृभूमि में सिलसिलेवार 1968 और किताब की शक्ल में 1969 में?” सूखे ललिहर मैदान की उदास सांझ निकोलस यादव अपने लिए खासतौर पर बेल्जियम से मंगवाये दूधिया टेंट में अपनी खास ब्रांडी का घूंट भरकर फुसफुसाते और माथे के सवालों का धुंधलका साफ़ नहीं होता तो हारे मन धीमे मेज़ पर उंगलियों की थाप देने लगते.

पुराने कपड़े में लपेटकर धरा क्लैरिनेट, यही तो? बांसुरी नहीं था, क्लैरिनेट ही था, पक्का?..

क्या कहा निकोलस यादव ने, बहकबिहारी तो? यह कैसा विशेषण हुआ भला? लेकिन बहकबिहारीजी गुमे किधर.. किस समय में?



(बाकी..)

(क्‍लैरिनेट की ऑडियो का टुकड़ा वॉल्‍कर श्‍लोनदोर्फ़ की 1971 की जर्मन फ़ि‍ल्‍म, "द सडेन वेल्‍थ ऑव द पुअर पिपुल ऑव कॉमबाख" से)

Tuesday, November 24, 2009

कविता के सूनसान, मैदान, में..

सुनती हो सुन रही हो, कविता? रिक्शे का कोना लिये, गोद में दोना, बात-बात पर मुँह फुलाती, वस्त्र यही पहनूंगी और भाषा मेरी बेस्ट फ्रेंड है उससे प्रॉपरली बिहेव करना के तानों का गाना गुनगुनाती किस दुनिया बहलती, बहती रहती हो, कविता? यही होगा, यही, और ‘यही’ के बाद ‘वही’ की बही के बस्तों पर कब तक गाल की लाली करोगी, ज़ुबान की जुगाली, हूं? कुछ बहकन आती है समझ, बात और वक़्त का बीहड़? फिसलन की ढलान, अंधेरों में छूटे कितने, कई सारे बाण? घुप्प अंधेरिया रात की अचानक कौंधी बिजलियां, करियाये लाल के कई दिनों की जख़्मसनी पसलियां? कि सिर्फ़ अपनी सहूलियत का चिरकुट लैमनचूस चूसना जानती हो, मोहल्ले की गली और गुमटी की रंगीनी में खुद को पहचानना? अपने गुमान की आग में चिनकती कभी शर्म के फूटते कोयलों में भी जलना जानतीं, कविता? मेरे प्रथम पुरुष का दर्प दिखाती, चिन्हाती रहती हो, उसके उदास परायेपन के क़ि‍स्से तार-तार सुलझाके साहित्यिक रवानी का एक अलग ही संगीत बुनना भी ज़रा जानतीं? कभी? कभी अपने लबर-झबर व्यास और केदार-सम्मान के रिक्शे से उतर मुहब्बत की उमग के उस सहज असाधरणता की साइकिल- सवारी करतीं, सामाजिक गलबंहिया न सही, फुसफुसाकर मीठी नज़र के तीन छोटे टेक ही लेतीं, कि तुम्हारी दिलदारी, समय-समाज की गहिन बेक़रारी, और अपनी चोटखायी साहित्यकारी, यारी, में कुछ कहीं यक़ीन होता, कविता?

Saturday, November 21, 2009

पहाड़ पर मुठभेड़..

सपने में दिखे वॉग्नर, मुख्य सड़क से हटकर कहीं अंदर गए टीले की नोक पर के चिरकुट सजावटी रेलिंग पर कुहनी गड़ाये सस्ती सिगरेट धूंक रहे थे. सामने, नीचे दूर तक फैले घाटियों के विस्तार की अथाह उदासियां थीं, गजर-मजर बादलों के धुंधलकों की अराजकता एक बेमतलब मोहब्बत की भावुकता की तरह उन पर धीमे-धीमे चू रही थी. मैं वही देखता पागल बना रह सकता था, लेकिन घबराकर मैंने यह थाहने की कोशिश की कि संगीत-सरदार पनामा पी रहे हैं या चारमिनार!

दांत निपोरे-निपोरे मैं हर्षकातर दीखा, ‘देखिए, अर्दोनो वाली किताब जाने कब किसके यहां से चुराये रहने के बावज़ूद आपके संगीत को आजतक भले नहीं पहचान सका, आप मगर पहली ही नज़र में पकड़ा गए! लेकिन हुज़ूर, बात समझ नहीं आई, वियेना के बाजू किसी पहाड़ी रेसॉर्ट में दीखते, यहां हलद्वानी के सस्ते तलछट में क्या ढूंढ़ने आए हैं? यहां संगीत का ‘स’ भी नहीं मिलेगा, मंगलेश की कविता भी दिल्ली में ही अपने शब्दं सहेजती है?’

वॉग्नर बाबू चुप्पे –चुप्पे तकते रहे. उन नज़रों में प्रूस्त ने रिल्कें को जिन नज़रों तका होगा वह दंग अंतरंग मनभावनता भी नहीं थी, एक प्रैग्माटिक डकैत की सूनसान आंखों का घिसा घसियारापन था, फुसफुसाकर कुछ देर तक एक लंबे मंत्र सरीखा बोलते रहे, गुरुवर फ्रेंच में बोलते तो थाह भी लेता, लेकिन यहां तो खालिस जर्मन बीयर बह रहा था, मैंने घबराकर हाथ जोड़ दिये- क्षमा करें, मालिक, ताज़ा-ताज़ा पटना से लौटा हूं और फिलहाल ‘चखना’ बंद कर रखा है!

‘कब था आखिरी बार जब हमें सुने?’ यह संगीत-सरदार ने खांटी संस्कृत में कहा, हम समझ गए मगर साथ ही यह भी समझ आया कि हम सरीखे संस्कृतिविहीन के लिए सांगितिक सुरबहार की जिरह में उतरना कैसी टेढ़ी खीर साबित होनेवाली है!

मैं एकदम से हंसने लगा. वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार का मामला सामने आते ही भारतीय नेता उच्च रक्तचाप और छाती में तक़लीफ़ की शिकायत करके जेल की जगह अस्पताल की शरण में निकल जाता है, या हिंदी प्रदेश की लड़कियां बौद्धिकता का सीधे सामना होने पर अकेलेपन के बीहड़ रास्तों पर निकलने के, मुस्कराती शादी के सहूलती संसार की तरफ गोड़ बढ़ा लेती हैं..

आंख खुली तो देखकर राहत हुई कि चलो, ससुर, अपना ऑईपॉड नहीं ही काम कर रहा, क्या ज़रुरत थी, खामखा पिटे हुए पहाड़ पर संगीत-शिखर से ठिलने पहुंच गए?

Friday, November 20, 2009

दुनिया रोज़ बदलती है?

कहीं कवि कह गया है तो उसके कल्पना-विधान में बदलती होगी ही. वैसे भी हिंदी में भौतिक जगत पर रुमानी भाववाद आरोपित करने का भयकारी, लगभग उन्मादभारी, प्रगतिशील प्रचलन काफी पुरातन रहा है. सारे कवि लाइन से बताते नहीं थकते कि हे इहलोक के जाने किन अंधारकोनों में छिपे, पसिंजर रेलों में फंसे कराह-कुमुद जनसमुद्र, घबराना नहीं, दुनिया बदिल रही है, समाजबात, बाबू, धीरे-धीरे पसिंजर गाड़ी में पीछू-पीछू आय रही है! ‘छुक-छुक.. दुनिया.. छुक-छुक.. रोज़.. छुक-छुक.. बदिल.. छुक-छुक.. रही है.. छुक-छुक..’ मुंगेर और मोतिहारी में डेढ़ सौ कबिता के सर्कुलेशन और राजधानी पटना और महाराजधानी दिल्ली में एगो गोष्ठी निष्पादन से ‘दुनिया बदिल रही है!’ का एगो महानुष्ठान, क्रांतिधारी पोस्टंर तैयार हो जाता है. एक बच्चे की शादी के सिलसिले में मैं पिछले पांच दिनों पटना के पड़ोस, मसौढ़ी में था, दुनिया बदलने के इस विज्ञान की बहुत थाह नहीं ले सका. अलबत्ता बांह में तीन जगह और पैर में दो चोटों के महीन सिंगार के अवसर वैसे ही सहज-सुलभ हुए जैसे आमतौर पर बिहार की फिसलनभरी सड़कों पर हमारी तरह के सुलझे पथिकों को हो ही जाते हैं, फिर भी विवाह जैसे सामाजिक गैदरिंग के अवसर पर यह अफ़सोस बना रहा ही कि स्कोर्पियो, बोलेरो की झांकियों की ‘नवके’ सजाव में बराती के ‘पुरनके’ भेड़-ठंसाव में हम समाजोत्थान की परिघटना का ठीक-ठीक अनुशीलन कर क्यों नहीं पाये?

आखिर क्या वज़ह रही होगी कि हिंदी का कवि एक मुस्‍कीभरी नज़रों में जो पढ़ जाता है, वह हम बारहा चश्मा़ पोंछ-पोंछकर भी देखने से रह गए? इसलिए कि हाईस्कू‍ल में अंकगणित में अट्ठारह नंबर पाये थे? और शायद इसीलिए भी कि सायंस फ़ि‍क्‍शन में अपनी कभी गति बना नहीं पाये? सोचकर गुस्सा् आता है कि गुणाकर मु‍ले ने विज्ञान पर इतना लिखा, ‘विज्ञान के वंचितों के नुकसान’ वाली भी एक किताब लिखकर छोड़ गए होते? लोग पढ़ते नहीं, ठीक है, लेकिन लिखकर कहीं छूटी तो रहती?

मगर ‘हेने’ और ‘होने’ ‘जेकरा-जेकरा’ और ‘जेतना’ सब जो ‘बदिल’ रहा है (झारखंड में मधु कोड़ाई करके सब ले गए वाले कौड़ाओं का तो बदले गया है!) के विज्ञान को ठीक से पढ़ पाने का चश्मा जाने पटना के किस सुपरमॉल में बिक रहा है, हम दु:खीमन ‘अकनालेज’ कर रहे हैं ‘नवका’ बना बाथरुम का ‘बिछिलाहट’ देख लिए, ज्ञानधन का ‘चमकाहट’ लोकेट नहीं कर सके! अशोक राजपथ पर थोड़ी देर के लिए राजकमल प्रकाशन की ‘दुकनिया’ में भी कुल जमा चार गो टाइटिल जो ‘कीने’ वो भी ज्ञानपिपासा का सांति से डेस्पेरेशन का खांसी का कंट्रोलिंग ‘डेभाइस’ कहीं ज़्यादा था!

दुनिया रोज़ बदलती है. अरे? देखिए, फिर ले खांसी का दौरा सुरु हो गया!

Wednesday, November 11, 2009

उलझन..

सीधे कहूं या बात घुमाकर कहूं? किसी जाननेवाले ने कहा सीधे कहने की बात मत ही कहना क्‍योंकि तुम्‍हें जाननेवाले (जितना जान सकते हैं) समझ ही लेंगे मज़ाक कर रहे हो, टेढ़ा ही कहो मगर भगवान के लिए चंद्रबिंदु ताक पर रखकर मत कहा करो! मैंने नाराज़ होकर एकदम टेढ़ेपन में कहा, "हे हमें पहचाननेवाले, मेरे लिखने में चंद्रबिंदु की अनुपस्थिति मेरे भाषायी प्रयोग की पैदावार नहीं, हिंदी रेमिंग्‍टन की की-बोर्ड में दर्ज़ सीमाओं का संसार है, रवि रतलामियों और देबआशीष की नाक़ामियों के मद्देनज़र है, लेकिन हमारे ब्‍लॉग पर चांद का मुंह टेढ़ा तो क्‍या कभी चांद का कैसा भी मुंह दिखा जैसी बात उन्‍होंने कभी की कहां है?" मुझे जानने का भरम रखनेवाले भाई साहब ने मुंह टेढ़ा करके कहा- सीधा नहीं कह सकते? कुछ भी? मैंने सीधे सोचने की कोशिश की, एक छोटे पॉज़ (पाज़, ऑक्‍तावियो नहीं. भारत नहीं, मैक्सिको व इतिहास के बारे में उनकी एक किताब है, बड़ी अच्‍छी है लेकिन इस वक़्त नाम याद नहीं पड़ रहा, जबकि गुलशन नन्‍दा के सभी टाइटल्‍स एकदम ज़ुबान पर धरे हुए हैं? स्‍मृति इस तरह के भद्दे मज़ाक क्‍यों करती है? आपके साथ करती होगी, ठीक है, वैसी ही आपकी चिरई-बुद्धि है, लेकिन मेरे साथ?) के टेक पर मैंने कहा, "दोस्‍त (कहां का दोस्‍त? कैसा दोस्‍त?), एक के बाद एक दो सामाजिक फ़ि‍ल्‍में देख ली हैं, समाज और हिंसा दोनों से लबरेज़, संभवत: उसी के असर में दिशा लड़खड़ा गई है, वर्ना आप मुझ जैसे सीधवे में कुछ ज्यादा ही टेढ़ा प्रक्षेपित कर रहे हो, वह हूं नहीं जो दीखता हूं, और जो दीखता हूं वह कभी कहां हो पाता हूं?"

मुझे जानने का स्‍वांग रचनेवाला, जैसे कभी हमें जाना ही न हो की अदा में मुंह सिये आगे निकल गया. पीछे से मैंने आवाज़ लगायी, 'वैसे आपकी चंद्रबिंदु वाली बात जायज़ है लेकिन उसका मुझसे ज़्यादा कसूरवार हिंदी में माइक्रोसॉफ़्ट के एजेंट रवि रतलामी की शैतानी है..' तो ज़ाहिर है मैंने आवाज़ लगायी और उसका अपेक्षित असर न हुआ, आवाज़ वापस मेरे पास लौट आयी, और फिर मेरे पास ही बनी रही.

सोचनेवाली बात है अपनी हिंदी रेमिंग्‍टन वाली गैरहा‍ज़ि‍र चंद्रबिंदु का क्‍या किया जा सकता है, या सीधी बात को टेढ़े तरीके से कहने के अपने तरीकों का. इतनी देर से सोच रहा हूं मगर जवाब नहीं सूझ रहा. इतनी देर से सोचने पर याद आया कि अब तो थोड़ी देर में यह नौबत भी आ सकती है कि सोचने लगूं इतनी देर से सोच क्‍या रहा हूं? सचमुच, इतने दिनों से आखिर क्‍या सोच रहा हूं? सोचते हुए अपने को इस तरह सोचता देखने के बिम्‍ब-बमकारी ख़्याल से काफ़ी घबराहट हो रही है. ऐसी कोई किताब हाल में बाज़ार में नहीं आयी है जिसे उलटते-पुलटते जाना जा सके कि इन दिनों मैं क्‍या सोच रहा हूं? सम बुक? एनी डैम बुक?

क्‍या करुं सोचने से बचने के लिए घबराकर मिलोराद पाविच को ही पढ़ना शुरु कर दूं? लेकिन मेरे पास जो इकलौती किताब की प्रति थी वह किसी भाई ने उड़ा ली है (हो सकता है हरामख़ोर किसी भगिनी ने ही उड़ायी हो, मगर देखिए, देखिए, देखिए हमारी उदारता कि ऐसे गाढ़े वक़्त में चाहकर भी हम स्‍त्री जन-दुर्जन के प्रति अनुदार नहीं हो पा रहे!), टेढ़ायी का फिर दूसरा काम क्‍या करें?

Saturday, November 7, 2009

एक सवाल..

हैं तो बहुत सारे, फ़ि‍लहाल इसी एक को आगे कर रहा हूं. एक भोली उम्‍मीद है दूसरे बहुत सारे आगे-पीछे इससे जुड़े चले आएंगे. कुछ पैसों के अनसुलझे, विहंगम रंगीन कैलेंडर हैं, बहुत सारा तो लगता है जैसे क्‍या मेरे जन्‍म के पहले के हैं- इधर मैंने जन्‍म लिया, उधर कैलेंडर की गड़बड़ छपायी शुरु हो गई- कितने सारे तो गड़बड़ एलिमेंट हैं, जाने कब सोर्टआउट होंगे, कभी होंगे भी या नहीं? लेकिन फिर यह उतना व्यक्तिगत भी कहां है? एशिया और अफ्रीका में जाने कितने सारे मुल्‍क होंगे, बीसवीं सदी की उनकी पूरी उठा-पटक ही संभवत: इन एलिमेंटों को दुरुस्‍त करने की कसरत रही हो, तो उस लिहाज़ से हम कहां किस खेत की कोई ख़ास मूली हुए? (अलबत्‍ता इतने के ज़ि‍क्र से महसूस हो ले कि हमने बात-बात में देखो, एक बड़ा परिदृश्‍य, चित्र ठेल दिया! मुझे हो रहा है, हो सकता है आप कहें क्‍या बकवास रो रहा है..). पैसों का ही एक दूसरा, सबसिडियरी, फिंका हुआ एक और एलिमेंट है कि कंधे पर प्‍लंबिंग का एक मुगदर गिरा हुआ है- कैसे सुलझाएंगे मालूम नहीं, लेकिन जवाब हासिल कर नहीं पाये जानकर रोज़ रात सोते हुए धन्‍य होते रहेंगे. रोज़ 'इतनी' मात्रा में लिखना है की अंडरस्‍टैंडिग है लेकिन 'उतनी' मात्रा तक में न लिख पाने का असंतोष भी साथ उसके नीचे घुसा हुआ है. पास में अच्‍छे मोज़े नहीं हैं. मोज़े होते तो पास में अच्‍छे जूते कैसे हों उनकी फिर एक रुमानी स्‍वप्‍नकथा बुन सकता. कॉर्डरॉय की एक मटियायी, खाकी पैंट, कछुआ-गर्दन एक क्रीम कलर का स्‍वेटर, मेरे छरहरेपने और घोड़ा-जुल्‍फ़ों में चार चांद लगाता, आज किसी कला-मिलन में क्‍योतो, तो कल किसी काव्‍य-पाठ के लिए हवाना पहुंचाता?

देखिए, ठीक से एक निहायत छोटी बात कह दूं, उस बात का 'ब' उच्‍चरित न हुआ, और मेरी बहक बहकने लगी? सुबह-सुबह बिना कोई अच्‍छा संगीत सुने, या किसी छोटी बच्‍ची से इसरार में नाक लड़ाये बगैर, कहां से इस तरह मन मचलने लगता है? क्‍यों? जबकि बात जैसी कोई बात करनी भी न हो, एक अदद सिंपल सवाल सामने रखना हो? सचमुच, सोचकर इससे भी दंग होता रहता हूं कि मैं क्‍यों इस कदर बेहद हूं!

ख़ैर, सिंपल सवाल पूछ रहा हूं, और उम्‍मीद करता हूं आप थोक में जवाब देंगे, और शर्माना होगा तो अपनी पत्‍नी और मियां बाबू से लजायेंगे, हमसे नहीं शर्मायेंगे..

हां, तब बताइए. आपके दिमाग में इस सवाल का जवाब क्‍या बनता है: जीवन कैसे जियें?

Friday, November 6, 2009

कहां है द रियल वन?

एक बाबू भोलानाथ तिवाड़ी थे, बीन-बीनकर शब्द बांचते रहे, और जाने कितने वर्षों की मेहनत के बावज़ूद ले-देकर एक पतली किताब ही पैदा कर सके- शब्दों का जीवन! ज़ाहिर है गागर में सागर समाने का मुहावरा हो सकता है, शब्दों का जीवन की पतली किताब में सारे शब्द नहीं समा सकते, नहीं समाये, कपूर की तरह उड़ते रहे, उड़-उड़ बिलाते रहे, बहुतों का अब तक पूर्ण विलोपन हो भी चुका! बंद किवाड़ी पर इस बेमतलब की ठक-ठक के तिवाड़ी-खेल से होनहार, समझदार सबक ले सकते थे, हिंदी समाज ने लिया ही, किवाड़ी के पार के रहस्यलोक को समझने, साधने की ज़ि‍म्मेदारी से हाथ झाड़ लिया, लेकिन हर कहीं कुछ जीत कुमार होते ही हैं, हमारा दुर्भाग्य यहां भी हैं, हाथ में मसहरी लिए शब्दों की गहरी में बूड़ते रहते हैं, नतीजा? मिलता-जाता कुछ नहीं, खामखा के सवालों में सिर गांजे दिन खराब होता है!

मैं पूछता हूं ऐसे दुष्टामियों के खिलाफ़ समाज कोई सीधी कार्यवाही नहीं कर सकता? जैसे पज़ोलिनी की एक फ़ि‍ल्म है उसमें आदमियों की आवाज़ वाला एक कौवा है, मिनट-मिनट पर सवाल करके एक देहाती बाप-बेटे का जीवन हलकान किये हुए है, तो आखिरकार हारकर बाप के इशारे पर इधर कौवा सवाल दाग़ने के लिए मुंह खोलता है, उधर बेटा झपटकर उसकी गर्दन पर टूटता है, अगले दृश्य में दिखता है कौवे के सारे सवाल कपूर होकर उड़ गए हैं, और कौवे की जो देह थी बाप और बेटे के हाथ और मुंह में बोटियों की शक्ल में बदल गई है! बड़ा अच्छा प्रतीकात्मक खेल था, जीत कुमार भी चार कदम दौड़ने के बाद आगे कहीं लड़खड़ाकर गिरेंगे, अपना और समाज का सारा खेल खुलकर सामने आ जाएगा तब शायद इनकी बुद्धि खुले, अभी कहां खुल रही है? अभी तो ये ले और वो दे पूछ-पूछकर हलकान करने से बाज कहां आ रहे हैं? आज जैसे अभी सर्वजन ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ़ तीन रनों की हार से उबरा भी नहीं था और इन्होंने दन से पूछ लिया, ‘क्या होता है मातृभाषा का मतलब?अरे? हू आर यू, भाई, क्यों बतायें आपको अपने घर की प्राइवेट बात? मातृभाषा का मतलब! आप जो इधर-उधर घुस-घुसकर यहां-वहां खोजते रहते हो, इसका मतलब आपको समझ आ गया है? जो मैं जीवन और समझ में रोज़-रोज़ इधर चार और उधर बारह लात खा-खाकर भयानक निराशावादी हो गया हूं, और अभय को ताज्जुब होता है कि समाज के पिटाये, घिघियाये लोगों के प्रति मूर्ख भावुकताभरे स्त्रैण करुणा का लतखोर राग पीटते रहने की जगह, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का स्वागत करके सरकारी सुर में सकल समाज आशावादी हो सकता है, फिर भी नहीं हो पाता? क्यों नहीं हो पा रहा है कैन बी अ वैलिड क्वेश्चन!

देयर कैन बी अ हंड्रेड एंड सेवेंटी वन वैलिड क्वेनश्चन, और हो सकता है जवाब ठीक-ठीक किसी एक का भी हमारे पास न हो! कांग्रेस, सीपीएम, बसपा, भाजपा, माकपा के पास हो, थोड़े श्री श्री रविशंकरों के पास हो, हमारे पास बयाम-भर सवाल हों और नाद-भर गुस्सा हो, संतोष की तृप्तिदायी प्रीतकर जुगाली न हो? क्या फ़ायदा फिर बुद्धिवैभव का जो समझने के मुग़ालते देती हो, जवाब की जगह सूप में सिर्फ़ पानी परसती हो?

बड़ी तक़लीफ़ है. सचमुच. लेकिन तक़लीफ़ के साथ यह इच्छा भी है कि एक दिन हीगल, कांट, नीत्शे सबकी किताबों के बगल खड़े होकर केवल फैबइंडिया वाले कुरते में एक जावेद अख़्तर टाइप समझदारी वाली फोटू ही न खिंचवाऊं, बात-बात में हीगल और मार्क्स और हाबरमास को कोट कर पा रहा हूं जैसी एक वीडियो भी छपवाऊं! लेकिन इच्छा ही है, सच्चायी यह है कि कोट कर चुकने की अभी तक की अप्राप्य प्रतिभा के बावज़ूद मन की हदस जायेगी नहीं कि जवाब ठीक-ठीक आ नहीं रहे, सवाल जो हैं दिमाग़ में सोये पड़े हैं, कहीं जा नहीं रहे!

सचमुच सवाल है एक के बाद दो के बाद तीन के बाद चार वाली सफ़ाई आदमी में कहां से आती है? और नहीं आती है तो कैसे नहीं आती है? क्या जवाबों का न पाना और सवालों के धुंधलके में इसी तरह खोये-खोये खुद को गंवाने का नाम जीवन है?

क्या मतलब है पूछने का क्या होता है मातृभाषा का मतलब? जीवन का? राजनीति का? ममता बनर्जी से पूछिये उनके पास सीधा जवाब होगा. या कालिया की ममता के? मेरे पास नहीं हैं. मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं अलबत्ता, लेकिन वह मैं किसी और दिशा में ठेल देना चा‍हता हूं, मगर फिर उठानेवाले सवाल उठा ही/भी सकते हैं कि तुम्हारे सवालों की दिशा की राजनीति क्या है, पार्टनर?

Wednesday, November 4, 2009

हंसता हुआ वाम बुद्धिजीवी..

कौन है यह हंसता आदमी? यह हंसी अश्लील है या समझदारी की भेदभरी? खुद को हीगल, मार्क्स और ज़ाक लकां के रास्ते का पथिक बताते माटसाब स्‍लावो ज़ीज़ू साइबरस्पेस, मीडिया, राजनीति, सिनेमा सब पर राय बनाते, बहुतों की नज़रों में दर्शन का एल्विस स्टाइल गाना गाते, यहां और वहां सबकी चुहल का झुनझुना बजाते दाढ़ीवाले हमारे समय को बूझे बाबा ठीक-ठीक कह क्या रहे हैं? एक फटाक कहन का नमूना यह रहा:

“..You get a kind of abstract, moralistic politics in which you focus on groups which are obviously underprivileged - other races, gays and so on - and then you explode in all your moralistic rage. This has to do with what you might call our cultural, post-political capitalism, in which the most passionate struggles are cultural ones. A large majority of the left doesn't question liberal democracy and capitalism as such. In the same way that when we were young we wanted socialism with a human face, what a large part of today's left want is capitalism with a human face.”
मालूम नहीं. अभी थके माथे ऐसे उत्कट, प्रत्यक्षावलोकन को पचा लेने की दिमागी सफ़ाई नहीं. बाद में सोचकर तय करुंगा बुद्धिबाबा कितना ज्ञान और कैसा संधान बोल रहे हैं. हो सकता है पेचीदिगियों की ढेरों परतें तब भी पल्ले न पड़ें. ज़्यादातर अब नहीं ही पड़ती हैं, सबके बीत चुकने के बाद असमंजसीय अकुलाहटों की कुछ खुरचन बची रहती है. देखते हैं ज़ीज़ू साहब के पीछे क्या बचता है. अभी, आज रात सिनेमा और विचारों की एक थकी खंगाल में पहली मर्तबा यह नाम कहीं से फुदककर सामने आया, पीछे-पीछे जो चीज़ें आईं उसे महज़ इस मोह में लिंकित कर रहा हूं कि बाद में तसल्ली से नज़र मारुंगा. हालांकि तय करना मुश्किल है कि यह बाद में कितने बाद आएगा.. ज़ीज़ू की दुनिया इस दरमियान पता नहीं कहां-कहां किस-किस तरह सुलगने लगे? मैं क्षोभ में हदसता रहूं, ज़ीज़ू बाबू और-और हंसने लगें?..

वैसे ज़ीज़ू अपनी उड़ाते, फाइनांसल टाइम्‍स के जॉन थॉर्नहिल के साथ लंचियाते का एक लिंक और मिला, एक दूसरा यह पूरे ज़ीज़ू बिरादरी का..

Sunday, November 1, 2009

चिदम्‍बरम साहेब की लड़ाई..

एक निबंध है, लंबा और अंग्रेजी में है् मगर चाहता हूं आपलोग पढ़ें. इसलिए नहीं कि दिल तोड़नेवाले ढेरों तथ्‍यों से रुबरु होने की ज़रुरत बनेगी, इसलिए भी, कि लेख को पढ़ते, सोचते हुए लगता है आनेवाले दिनों में इन चिंताओं से और-और दो-चार होते रहने की ज़रुरत बनेगी.. बनी रहेगी!

देखते-देखते निगाह गई इसी जिरह का एक टेलीविज़न बातचीत की शक्‍ल में विस्‍तार ब्‍लॉग पर कहीं और भी उपलब्‍ध है, एक नज़र यहां भी देखें.