Sunday, November 1, 2009

चिदम्‍बरम साहेब की लड़ाई..

एक निबंध है, लंबा और अंग्रेजी में है् मगर चाहता हूं आपलोग पढ़ें. इसलिए नहीं कि दिल तोड़नेवाले ढेरों तथ्‍यों से रुबरु होने की ज़रुरत बनेगी, इसलिए भी, कि लेख को पढ़ते, सोचते हुए लगता है आनेवाले दिनों में इन चिंताओं से और-और दो-चार होते रहने की ज़रुरत बनेगी.. बनी रहेगी!

देखते-देखते निगाह गई इसी जिरह का एक टेलीविज़न बातचीत की शक्‍ल में विस्‍तार ब्‍लॉग पर कहीं और भी उपलब्‍ध है, एक नज़र यहां भी देखें.

3 comments:

  1. इस निबंध के लिए शुक्रिया। पढ़ लिया है। इस वास्तविकता से परिचित हूँ। लेकिन देश को इस सचाई को समझने में बहुत वक्त लगेगा। तब तक गंगा-गोदावरी में बहुत पानी बह चुका होगा।
    निश्चित रुप से मौजूदा राजसत्ता वित्तीय पूंजी की है। वही सब खेल खेल रही है। अब इस खेल को खेलने के लिए माओवाद का बहाना मिल गया है। चिदंबरम बहुत पहले से इस वित्तीय पूंजी के सेवक हैं। मुझे तो इस का अनुभव तभी हो गया था जब से जे.के. सिंथेटिक्स लि. ने अपने विविध खर्चों को 3.5 प्रतिशत से 12 प्रतिशत कर के पाँच बरस में कंपनी का बट्टा बैठा दिया और उस का सारा कसूर मजदूरों पर ढोल दिया था। इस आर्थिक अपराध की शिकायत वित्त मंत्री चिदम्बरम से की गई थी। उन्हों ने इस की जाँच के लिए एक अफसर को लगाया जो जाँच के लिए कभी आया ही नहीं था।

    ReplyDelete
  2. ये लेख मैं पढ़ चुकी हूं। अभी कुछ दिन पहले मेरे अखबार में राजदीप सरदेसाई का एक लेख छपा है चिदंबरम की प्रशंसा में। माओवादी को सिरे से नकारा नहीं है लेकिन बड़ी गोलमोल बात की है। उनका वही आर्टिकल एचटी में भी छपता है। लेकिन उधर मिला नहीं। वरना लिंक चस्‍पा कर देती। यह जानना कुछ मासूम भारतीयों की आंखें फाड़ने वाला है कि निजी हितों के समीकरण राजनीतिक धार को कितना कुंद कर देते हैं। एनडीटीवी के पत्रकार राजदीप और आज सीएनएन-आईबीएन के मालिक राजदीप में कितना ज्‍यादा फर्क है।

    ReplyDelete
  3. Thanks for these links. I realized after reading comments which are on Roy's article that middle class and everybody else has internalized the fact that
    "assimilation is inevitable and resistance is futile"

    Therefore the progresses of India has to be made on the cost of these subhuman creatures, and of course it is not a big cost! who cares?

    However, concerns and the repercussions will engulf the middle class very soon, may be a bit late, in terms of environmental cost, cost of an unending war and it may turn out to be very nasty?

    The violence in any form and from any side is not the solution. But civil society and freedom loving people must think about alternatives and realistic solutions, which can provide some breathing space for poorest of poor.

    ReplyDelete