Wednesday, November 4, 2009

हंसता हुआ वाम बुद्धिजीवी..

कौन है यह हंसता आदमी? यह हंसी अश्लील है या समझदारी की भेदभरी? खुद को हीगल, मार्क्स और ज़ाक लकां के रास्ते का पथिक बताते माटसाब स्‍लावो ज़ीज़ू साइबरस्पेस, मीडिया, राजनीति, सिनेमा सब पर राय बनाते, बहुतों की नज़रों में दर्शन का एल्विस स्टाइल गाना गाते, यहां और वहां सबकी चुहल का झुनझुना बजाते दाढ़ीवाले हमारे समय को बूझे बाबा ठीक-ठीक कह क्या रहे हैं? एक फटाक कहन का नमूना यह रहा:

“..You get a kind of abstract, moralistic politics in which you focus on groups which are obviously underprivileged - other races, gays and so on - and then you explode in all your moralistic rage. This has to do with what you might call our cultural, post-political capitalism, in which the most passionate struggles are cultural ones. A large majority of the left doesn't question liberal democracy and capitalism as such. In the same way that when we were young we wanted socialism with a human face, what a large part of today's left want is capitalism with a human face.”
मालूम नहीं. अभी थके माथे ऐसे उत्कट, प्रत्यक्षावलोकन को पचा लेने की दिमागी सफ़ाई नहीं. बाद में सोचकर तय करुंगा बुद्धिबाबा कितना ज्ञान और कैसा संधान बोल रहे हैं. हो सकता है पेचीदिगियों की ढेरों परतें तब भी पल्ले न पड़ें. ज़्यादातर अब नहीं ही पड़ती हैं, सबके बीत चुकने के बाद असमंजसीय अकुलाहटों की कुछ खुरचन बची रहती है. देखते हैं ज़ीज़ू साहब के पीछे क्या बचता है. अभी, आज रात सिनेमा और विचारों की एक थकी खंगाल में पहली मर्तबा यह नाम कहीं से फुदककर सामने आया, पीछे-पीछे जो चीज़ें आईं उसे महज़ इस मोह में लिंकित कर रहा हूं कि बाद में तसल्ली से नज़र मारुंगा. हालांकि तय करना मुश्किल है कि यह बाद में कितने बाद आएगा.. ज़ीज़ू की दुनिया इस दरमियान पता नहीं कहां-कहां किस-किस तरह सुलगने लगे? मैं क्षोभ में हदसता रहूं, ज़ीज़ू बाबू और-और हंसने लगें?..

वैसे ज़ीज़ू अपनी उड़ाते, फाइनांसल टाइम्‍स के जॉन थॉर्नहिल के साथ लंचियाते का एक लिंक और मिला, एक दूसरा यह पूरे ज़ीज़ू बिरादरी का..

2 comments:

  1. बीहड़ हंसी आपै
    जानौ...........
    हमैं तौ
    'मृदु-लंठाट्टहास'
    लागत है .......
    धन्यवाद .........

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  2. इन दिनों हम भी जिजेक बाबा के चंगुल में घुस रहे हैं। मुस्लिम 'पर्दे' पर इनका बहुत सिडक्टिव विवेचन इनके ऑनलाईन पंथियों से ही मिला, अब द सब्लाईम ऑब्जेक्ट ऑव ऑईडियोलॉजी में प्रेवश किया है। वैसे हंसी का कारण वाम नहीं, लाँका हैं :-)
    लाँका की जबरदस्त वापसी के इस दौर में किसी दिलजले ने कहा भी कि कुछ मार्क्सवादियों को लाकाँ की जरूरत है, किसी लाँकावादी को मार्क्स की नहीं। आपका ग्राफिक गल्प कुछ स्पीड लिया?

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