Friday, November 6, 2009

कहां है द रियल वन?

एक बाबू भोलानाथ तिवाड़ी थे, बीन-बीनकर शब्द बांचते रहे, और जाने कितने वर्षों की मेहनत के बावज़ूद ले-देकर एक पतली किताब ही पैदा कर सके- शब्दों का जीवन! ज़ाहिर है गागर में सागर समाने का मुहावरा हो सकता है, शब्दों का जीवन की पतली किताब में सारे शब्द नहीं समा सकते, नहीं समाये, कपूर की तरह उड़ते रहे, उड़-उड़ बिलाते रहे, बहुतों का अब तक पूर्ण विलोपन हो भी चुका! बंद किवाड़ी पर इस बेमतलब की ठक-ठक के तिवाड़ी-खेल से होनहार, समझदार सबक ले सकते थे, हिंदी समाज ने लिया ही, किवाड़ी के पार के रहस्यलोक को समझने, साधने की ज़ि‍म्मेदारी से हाथ झाड़ लिया, लेकिन हर कहीं कुछ जीत कुमार होते ही हैं, हमारा दुर्भाग्य यहां भी हैं, हाथ में मसहरी लिए शब्दों की गहरी में बूड़ते रहते हैं, नतीजा? मिलता-जाता कुछ नहीं, खामखा के सवालों में सिर गांजे दिन खराब होता है!

मैं पूछता हूं ऐसे दुष्टामियों के खिलाफ़ समाज कोई सीधी कार्यवाही नहीं कर सकता? जैसे पज़ोलिनी की एक फ़ि‍ल्म है उसमें आदमियों की आवाज़ वाला एक कौवा है, मिनट-मिनट पर सवाल करके एक देहाती बाप-बेटे का जीवन हलकान किये हुए है, तो आखिरकार हारकर बाप के इशारे पर इधर कौवा सवाल दाग़ने के लिए मुंह खोलता है, उधर बेटा झपटकर उसकी गर्दन पर टूटता है, अगले दृश्य में दिखता है कौवे के सारे सवाल कपूर होकर उड़ गए हैं, और कौवे की जो देह थी बाप और बेटे के हाथ और मुंह में बोटियों की शक्ल में बदल गई है! बड़ा अच्छा प्रतीकात्मक खेल था, जीत कुमार भी चार कदम दौड़ने के बाद आगे कहीं लड़खड़ाकर गिरेंगे, अपना और समाज का सारा खेल खुलकर सामने आ जाएगा तब शायद इनकी बुद्धि खुले, अभी कहां खुल रही है? अभी तो ये ले और वो दे पूछ-पूछकर हलकान करने से बाज कहां आ रहे हैं? आज जैसे अभी सर्वजन ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ़ तीन रनों की हार से उबरा भी नहीं था और इन्होंने दन से पूछ लिया, ‘क्या होता है मातृभाषा का मतलब?अरे? हू आर यू, भाई, क्यों बतायें आपको अपने घर की प्राइवेट बात? मातृभाषा का मतलब! आप जो इधर-उधर घुस-घुसकर यहां-वहां खोजते रहते हो, इसका मतलब आपको समझ आ गया है? जो मैं जीवन और समझ में रोज़-रोज़ इधर चार और उधर बारह लात खा-खाकर भयानक निराशावादी हो गया हूं, और अभय को ताज्जुब होता है कि समाज के पिटाये, घिघियाये लोगों के प्रति मूर्ख भावुकताभरे स्त्रैण करुणा का लतखोर राग पीटते रहने की जगह, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का स्वागत करके सरकारी सुर में सकल समाज आशावादी हो सकता है, फिर भी नहीं हो पाता? क्यों नहीं हो पा रहा है कैन बी अ वैलिड क्वेश्चन!

देयर कैन बी अ हंड्रेड एंड सेवेंटी वन वैलिड क्वेनश्चन, और हो सकता है जवाब ठीक-ठीक किसी एक का भी हमारे पास न हो! कांग्रेस, सीपीएम, बसपा, भाजपा, माकपा के पास हो, थोड़े श्री श्री रविशंकरों के पास हो, हमारे पास बयाम-भर सवाल हों और नाद-भर गुस्सा हो, संतोष की तृप्तिदायी प्रीतकर जुगाली न हो? क्या फ़ायदा फिर बुद्धिवैभव का जो समझने के मुग़ालते देती हो, जवाब की जगह सूप में सिर्फ़ पानी परसती हो?

बड़ी तक़लीफ़ है. सचमुच. लेकिन तक़लीफ़ के साथ यह इच्छा भी है कि एक दिन हीगल, कांट, नीत्शे सबकी किताबों के बगल खड़े होकर केवल फैबइंडिया वाले कुरते में एक जावेद अख़्तर टाइप समझदारी वाली फोटू ही न खिंचवाऊं, बात-बात में हीगल और मार्क्स और हाबरमास को कोट कर पा रहा हूं जैसी एक वीडियो भी छपवाऊं! लेकिन इच्छा ही है, सच्चायी यह है कि कोट कर चुकने की अभी तक की अप्राप्य प्रतिभा के बावज़ूद मन की हदस जायेगी नहीं कि जवाब ठीक-ठीक आ नहीं रहे, सवाल जो हैं दिमाग़ में सोये पड़े हैं, कहीं जा नहीं रहे!

सचमुच सवाल है एक के बाद दो के बाद तीन के बाद चार वाली सफ़ाई आदमी में कहां से आती है? और नहीं आती है तो कैसे नहीं आती है? क्या जवाबों का न पाना और सवालों के धुंधलके में इसी तरह खोये-खोये खुद को गंवाने का नाम जीवन है?

क्या मतलब है पूछने का क्या होता है मातृभाषा का मतलब? जीवन का? राजनीति का? ममता बनर्जी से पूछिये उनके पास सीधा जवाब होगा. या कालिया की ममता के? मेरे पास नहीं हैं. मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं अलबत्ता, लेकिन वह मैं किसी और दिशा में ठेल देना चा‍हता हूं, मगर फिर उठानेवाले सवाल उठा ही/भी सकते हैं कि तुम्हारे सवालों की दिशा की राजनीति क्या है, पार्टनर?

3 comments:

  1. अब इतने सारे लिंक देंगे तो वे सब देखने के बाद टिप्पणी क्या देनी थी कहाँ याद रहेगा?
    घुघूती बासूती

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  2. जपुजी साहब में लिखा है-

    सोचै सोचि न होबई जे सोची लखवार
    चुपै चुप न होवई जे लाई रहा लिवतार।
    भुखिया भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार।


    हम का कहें? आपने इतनी सोच विचार कर लिखा है, तो सच ही लिखा होगा। मौन, शांत भाव से बांच लिए हैं।

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  3. बहुत महत्वपूर्ण सवाल है
    तुम्हारे सवालों की दिशा की राजनीति क्या है? हर एक को सोचना चाहिए, जानना चाहिए।

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