हैं तो बहुत सारे, फ़िलहाल इसी एक को आगे कर रहा हूं. एक भोली उम्मीद है दूसरे बहुत सारे आगे-पीछे इससे जुड़े चले आएंगे. कुछ पैसों के अनसुलझे, विहंगम रंगीन कैलेंडर हैं, बहुत सारा तो लगता है जैसे क्या मेरे जन्म के पहले के हैं- इधर मैंने जन्म लिया, उधर कैलेंडर की गड़बड़ छपायी शुरु हो गई- कितने सारे तो गड़बड़ एलिमेंट हैं, जाने कब सोर्टआउट होंगे, कभी होंगे भी या नहीं? लेकिन फिर यह उतना व्यक्तिगत भी कहां है? एशिया और अफ्रीका में जाने कितने सारे मुल्क होंगे, बीसवीं सदी की उनकी पूरी उठा-पटक ही संभवत: इन एलिमेंटों को दुरुस्त करने की कसरत रही हो, तो उस लिहाज़ से हम कहां किस खेत की कोई ख़ास मूली हुए? (अलबत्ता इतने के ज़िक्र से महसूस हो ले कि हमने बात-बात में देखो, एक बड़ा परिदृश्य, चित्र ठेल दिया! मुझे हो रहा है, हो सकता है आप कहें क्या बकवास रो रहा है..). पैसों का ही एक दूसरा, सबसिडियरी, फिंका हुआ एक और एलिमेंट है कि कंधे पर प्लंबिंग का एक मुगदर गिरा हुआ है- कैसे सुलझाएंगे मालूम नहीं, लेकिन जवाब हासिल कर नहीं पाये जानकर रोज़ रात सोते हुए धन्य होते रहेंगे. रोज़ 'इतनी' मात्रा में लिखना है की अंडरस्टैंडिग है लेकिन 'उतनी' मात्रा तक में न लिख पाने का असंतोष भी साथ उसके नीचे घुसा हुआ है. पास में अच्छे मोज़े नहीं हैं. मोज़े होते तो पास में अच्छे जूते कैसे हों उनकी फिर एक रुमानी स्वप्नकथा बुन सकता. कॉर्डरॉय की एक मटियायी, खाकी पैंट, कछुआ-गर्दन एक क्रीम कलर का स्वेटर, मेरे छरहरेपने और घोड़ा-जुल्फ़ों में चार चांद लगाता, आज किसी कला-मिलन में क्योतो, तो कल किसी काव्य-पाठ के लिए हवाना पहुंचाता?
देखिए, ठीक से एक निहायत छोटी बात कह दूं, उस बात का 'ब' उच्चरित न हुआ, और मेरी बहक बहकने लगी? सुबह-सुबह बिना कोई अच्छा संगीत सुने, या किसी छोटी बच्ची से इसरार में नाक लड़ाये बगैर, कहां से इस तरह मन मचलने लगता है? क्यों? जबकि बात जैसी कोई बात करनी भी न हो, एक अदद सिंपल सवाल सामने रखना हो? सचमुच, सोचकर इससे भी दंग होता रहता हूं कि मैं क्यों इस कदर बेहद हूं!
ख़ैर, सिंपल सवाल पूछ रहा हूं, और उम्मीद करता हूं आप थोक में जवाब देंगे, और शर्माना होगा तो अपनी पत्नी और मियां बाबू से लजायेंगे, हमसे नहीं शर्मायेंगे..
हां, तब बताइए. आपके दिमाग में इस सवाल का जवाब क्या बनता है: जीवन कैसे जियें?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
जीवन कैसे जियें?
जैसे अभी जी रहे हैं.
sorry ji ...comment ki jagah link hai
http://beji-viewpoint.blogspot.com/2007/10/blog-post.html
जीवन जीने के दो तरीके है...
१. वो हासिल कर लिया जाये जो पसंद है...
२. वो पसंद कर लिया जाये जो हासिल है..
जो बात दिल ले गयी वो है... जाने भी दो यारो...
एक दूसरा तरीका ये भी हो सकता है कि "जीवन कैसे जिया ?" और इसके पीछे प्रतयक्ष और परोक्ष कौन से समीकरण, प्रेरणा , और अवसर/चुनाव रहे? वैसे चाहिए , जिए तो एक अमूर्त सवाल है. और प्लान करके, बहुत प्लान करके भी जीवन किन्ही दूसरी ही दिशा मे निकल जाता है. एक तरह से जीवन हमें बीस दिशाओं मे धकेलता है, और हम उसे किसी एक दिशा मे. पर सोचने की बात ये भी है कि किसी एक ही दिशा मे हम उसे क्यों धकेलते है?
जीवन जीने के एक मार्ग का दरवाजा तो हमेशा खुला रहता है :
जाहि विधि राखे राम, वाही विधि रहिए।
सीता राम, सीता राम, सीता राम कहिए।।
"रोज़ 'इतनी' मात्रा में लिखना है की अंडरस्टैंडिग है लेकिन 'उतनी' मात्रा तक में न लिख पाने का असंतोष भी साथ उसके नीचे घुसा हुआ है."
ससुरा ये दिमाग कितनी जी बी की केपेसिटी का है सर जी ?
जैसा जीवन जीना चाहते थे, जी पाए क्या? क्या अपने हाथ में है इस तरह से जीना, जैसे चाहें बिलकुल वैसा।
जैसे जी पाओ, वैसे जियो। दूसरे का देखके क्या होता है?
------------------
और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।
जवाब कुछ ऐसा हो सकता है कि ऐसे जिएँ कि जीवन भी कह उठे, 'वाह,क्या जिया मुझे!'परन्तु ऐसा होता है क्या? सो जब तक है जिए जाओ, ऐसे, वैसे, कैसे भी।
घुघूती बासूती