उलझन..

6 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये

सीधे कहूं या बात घुमाकर कहूं? किसी जाननेवाले ने कहा सीधे कहने की बात मत ही कहना क्‍योंकि तुम्‍हें जाननेवाले (जितना जान सकते हैं) समझ ही लेंगे मज़ाक कर रहे हो, टेढ़ा ही कहो मगर भगवान के लिए चंद्रबिंदु ताक पर रखकर मत कहा करो! मैंने नाराज़ होकर एकदम टेढ़ेपन में कहा, "हे हमें पहचाननेवाले, मेरे लिखने में चंद्रबिंदु की अनुपस्थिति मेरे भाषायी प्रयोग की पैदावार नहीं, हिंदी रेमिंग्‍टन की की-बोर्ड में दर्ज़ सीमाओं का संसार है, रवि रतलामियों और देबआशीष की नाक़ामियों के मद्देनज़र है, लेकिन हमारे ब्‍लॉग पर चांद का मुंह टेढ़ा तो क्‍या कभी चांद का कैसा भी मुंह दिखा जैसी बात उन्‍होंने कभी की कहां है?" मुझे जानने का भरम रखनेवाले भाई साहब ने मुंह टेढ़ा करके कहा- सीधा नहीं कह सकते? कुछ भी? मैंने सीधे सोचने की कोशिश की, एक छोटे पॉज़ (पाज़, ऑक्‍तावियो नहीं. भारत नहीं, मैक्सिको व इतिहास के बारे में उनकी एक किताब है, बड़ी अच्‍छी है लेकिन इस वक़्त नाम याद नहीं पड़ रहा, जबकि गुलशन नन्‍दा के सभी टाइटल्‍स एकदम ज़ुबान पर धरे हुए हैं? स्‍मृति इस तरह के भद्दे मज़ाक क्‍यों करती है? आपके साथ करती होगी, ठीक है, वैसी ही आपकी चिरई-बुद्धि है, लेकिन मेरे साथ?) के टेक पर मैंने कहा, "दोस्‍त (कहां का दोस्‍त? कैसा दोस्‍त?), एक के बाद एक दो सामाजिक फ़ि‍ल्‍में देख ली हैं, समाज और हिंसा दोनों से लबरेज़, संभवत: उसी के असर में दिशा लड़खड़ा गई है, वर्ना आप मुझ जैसे सीधवे में कुछ ज्यादा ही टेढ़ा प्रक्षेपित कर रहे हो, वह हूं नहीं जो दीखता हूं, और जो दीखता हूं वह कभी कहां हो पाता हूं?"

मुझे जानने का स्‍वांग रचनेवाला, जैसे कभी हमें जाना ही न हो की अदा में मुंह सिये आगे निकल गया. पीछे से मैंने आवाज़ लगायी, 'वैसे आपकी चंद्रबिंदु वाली बात जायज़ है लेकिन उसका मुझसे ज़्यादा कसूरवार हिंदी में माइक्रोसॉफ़्ट के एजेंट रवि रतलामी की शैतानी है..' तो ज़ाहिर है मैंने आवाज़ लगायी और उसका अपेक्षित असर न हुआ, आवाज़ वापस मेरे पास लौट आयी, और फिर मेरे पास ही बनी रही.

सोचनेवाली बात है अपनी हिंदी रेमिंग्‍टन वाली गैरहा‍ज़ि‍र चंद्रबिंदु का क्‍या किया जा सकता है, या सीधी बात को टेढ़े तरीके से कहने के अपने तरीकों का. इतनी देर से सोच रहा हूं मगर जवाब नहीं सूझ रहा. इतनी देर से सोचने पर याद आया कि अब तो थोड़ी देर में यह नौबत भी आ सकती है कि सोचने लगूं इतनी देर से सोच क्‍या रहा हूं? सचमुच, इतने दिनों से आखिर क्‍या सोच रहा हूं? सोचते हुए अपने को इस तरह सोचता देखने के बिम्‍ब-बमकारी ख़्याल से काफ़ी घबराहट हो रही है. ऐसी कोई किताब हाल में बाज़ार में नहीं आयी है जिसे उलटते-पुलटते जाना जा सके कि इन दिनों मैं क्‍या सोच रहा हूं? सम बुक? एनी डैम बुक?

क्‍या करुं सोचने से बचने के लिए घबराकर मिलोराद पाविच को ही पढ़ना शुरु कर दूं? लेकिन मेरे पास जो इकलौती किताब की प्रति थी वह किसी भाई ने उड़ा ली है (हो सकता है हरामख़ोर किसी भगिनी ने ही उड़ायी हो, मगर देखिए, देखिए, देखिए हमारी उदारता कि ऐसे गाढ़े वक़्त में चाहकर भी हम स्‍त्री जन-दुर्जन के प्रति अनुदार नहीं हो पा रहे!), टेढ़ायी का फिर दूसरा काम क्‍या करें?

 
This Post has 6 Comments Add your own!
Udan Tashtari - November 11, 2009 5:31 AM

टेढ़ाई का एक ठो और काम बतायें??

ऐसी ही एक ठो पोस्ट ओउर ठेल कर आपन पीठ थपथपाईये होले होले...साथे दाँते चियारे रखियेगा!!

Beji - November 11, 2009 9:00 AM

leaning tower of patan...and still askin...

गलती का भी अपना सौंदर्यशास्त्र है ,

उस गलती का और जो टेढ़ी हो ...

इस टेढ़े की महिमा पर मुझे एक कविता सूझी ---

'' टेढा मन टेढ़े वचन
टेढी सब करतूत |
टेढा चंदा न ग्रसै
राहु सरीखा धूत || ''

सीधा-सीधा शुक्रिया ...

चंद्रबिंदु रतलामी की शैतानी हो सकती है। पर आप उस में क्यों उलझे पड़े हैं। इन्स्क्रिप्ट तो शुद्ध हिन्दुस्तानी भी है उसी की शरण में आ जाएँ। मुझे सिर्फ एक सप्ताह लगा इस परिवर्तन में।

काजल कुमार Kajal Kumar - November 14, 2009 1:12 PM

बेचारे गुलशन नन्‍दा पर कहर बनकर टूट पड़ने वालों को कोई परहेज़ नहीं दोयम फ़िल्में देखकर खीस निपोरते हुए तालियां पीटने से...

भंगार - November 20, 2009 12:54 PM

बहुत उम्दा ....बहुत अच्छी सोच ...कई बार पढने के बाद ......

Post a Comment