Friday, November 20, 2009

दुनिया रोज़ बदलती है?

कहीं कवि कह गया है तो उसके कल्पना-विधान में बदलती होगी ही. वैसे भी हिंदी में भौतिक जगत पर रुमानी भाववाद आरोपित करने का भयकारी, लगभग उन्मादभारी, प्रगतिशील प्रचलन काफी पुरातन रहा है. सारे कवि लाइन से बताते नहीं थकते कि हे इहलोक के जाने किन अंधारकोनों में छिपे, पसिंजर रेलों में फंसे कराह-कुमुद जनसमुद्र, घबराना नहीं, दुनिया बदिल रही है, समाजबात, बाबू, धीरे-धीरे पसिंजर गाड़ी में पीछू-पीछू आय रही है! ‘छुक-छुक.. दुनिया.. छुक-छुक.. रोज़.. छुक-छुक.. बदिल.. छुक-छुक.. रही है.. छुक-छुक..’ मुंगेर और मोतिहारी में डेढ़ सौ कबिता के सर्कुलेशन और राजधानी पटना और महाराजधानी दिल्ली में एगो गोष्ठी निष्पादन से ‘दुनिया बदिल रही है!’ का एगो महानुष्ठान, क्रांतिधारी पोस्टंर तैयार हो जाता है. एक बच्चे की शादी के सिलसिले में मैं पिछले पांच दिनों पटना के पड़ोस, मसौढ़ी में था, दुनिया बदलने के इस विज्ञान की बहुत थाह नहीं ले सका. अलबत्ता बांह में तीन जगह और पैर में दो चोटों के महीन सिंगार के अवसर वैसे ही सहज-सुलभ हुए जैसे आमतौर पर बिहार की फिसलनभरी सड़कों पर हमारी तरह के सुलझे पथिकों को हो ही जाते हैं, फिर भी विवाह जैसे सामाजिक गैदरिंग के अवसर पर यह अफ़सोस बना रहा ही कि स्कोर्पियो, बोलेरो की झांकियों की ‘नवके’ सजाव में बराती के ‘पुरनके’ भेड़-ठंसाव में हम समाजोत्थान की परिघटना का ठीक-ठीक अनुशीलन कर क्यों नहीं पाये?

आखिर क्या वज़ह रही होगी कि हिंदी का कवि एक मुस्‍कीभरी नज़रों में जो पढ़ जाता है, वह हम बारहा चश्मा़ पोंछ-पोंछकर भी देखने से रह गए? इसलिए कि हाईस्कू‍ल में अंकगणित में अट्ठारह नंबर पाये थे? और शायद इसीलिए भी कि सायंस फ़ि‍क्‍शन में अपनी कभी गति बना नहीं पाये? सोचकर गुस्सा् आता है कि गुणाकर मु‍ले ने विज्ञान पर इतना लिखा, ‘विज्ञान के वंचितों के नुकसान’ वाली भी एक किताब लिखकर छोड़ गए होते? लोग पढ़ते नहीं, ठीक है, लेकिन लिखकर कहीं छूटी तो रहती?

मगर ‘हेने’ और ‘होने’ ‘जेकरा-जेकरा’ और ‘जेतना’ सब जो ‘बदिल’ रहा है (झारखंड में मधु कोड़ाई करके सब ले गए वाले कौड़ाओं का तो बदले गया है!) के विज्ञान को ठीक से पढ़ पाने का चश्मा जाने पटना के किस सुपरमॉल में बिक रहा है, हम दु:खीमन ‘अकनालेज’ कर रहे हैं ‘नवका’ बना बाथरुम का ‘बिछिलाहट’ देख लिए, ज्ञानधन का ‘चमकाहट’ लोकेट नहीं कर सके! अशोक राजपथ पर थोड़ी देर के लिए राजकमल प्रकाशन की ‘दुकनिया’ में भी कुल जमा चार गो टाइटिल जो ‘कीने’ वो भी ज्ञानपिपासा का सांति से डेस्पेरेशन का खांसी का कंट्रोलिंग ‘डेभाइस’ कहीं ज़्यादा था!

दुनिया रोज़ बदलती है. अरे? देखिए, फिर ले खांसी का दौरा सुरु हो गया!

6 comments:

  1. शादी को सोशल गेदरिंग की नज़र से देख ही नहीं पाए हम तो.. वैसे कल की दुनिया आज लग नहीं रही है.. वाकई बदली तो है..

    आप खांसी की दवाई लीजिये..

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  2. राजेंदर यादव जी की हर बात से सहमत नहीं होते पर उन्होंने एक बात मार्के की कही है ....हिन्दुतानके हर गली मोहल्ले में एक कवि है ..खांसी की कडवीदवा रात को ले लीजियेगा

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  3. बाप रे! क्या भासा है... एकदम फुलटुस... आप बिहार के है क्या ? तब्बे इतना जेकरा-जेकरा’ और ‘जेतना’ सब जो ‘बदिल’ भी है... हसते हस्ते बुरा हाल है... अबरी पटना आयिगा तो हमरा से मिलिएगा पीलीज़... बहुते इक्छा है...

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  4. कहाँ बदल रही है दुनिया ....ईमानदार कोशिशों को जंग जरुर लग रही है ..खैर ..दवाई लीजिये.

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  5. हा!हा! प्रमोद भाई अब क्या करियेगा हेना जेतना सब जो भी बदिल रहा है, सचे बात ये है कि ई कवि लोग को भी नहीं सुझता...झुठे लिख रहे है....हमहु लिख देते हैं...कल एक ठो कविता पढ़ रहे थे ओय में किसी का कत्थई आंख का जिकर था...अब बताइये कभी देखे हैं कभी किसी का कत्थईबा आंख...

    राजकमल तो...आजकल तो गांधी मैदान में पुस्तक मेला भी लगा है ना...परसों जाने का हमरा प्रोग्राम है।

    आपको पढ़ते रहते हैं अक्सर...

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  6. अरे सर इंडिया अऊर उहो बिहार. सरजी इहा तो हर चीज में गैदरिंग है. बदलने दिजिये दुनिया को, शायद बदल के फिर से इहे चहुपेगा.
    बाकी पोस्ट तो लाजबाब है. आज एक कविता सुझी थी. जिसमें लडकी को सूरज की किरण कह रहा हूं.
    पोस्ट डाल दिया है मैंने वैसे.

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