Saturday, November 21, 2009

पहाड़ पर मुठभेड़..

सपने में दिखे वॉग्नर, मुख्य सड़क से हटकर कहीं अंदर गए टीले की नोक पर के चिरकुट सजावटी रेलिंग पर कुहनी गड़ाये सस्ती सिगरेट धूंक रहे थे. सामने, नीचे दूर तक फैले घाटियों के विस्तार की अथाह उदासियां थीं, गजर-मजर बादलों के धुंधलकों की अराजकता एक बेमतलब मोहब्बत की भावुकता की तरह उन पर धीमे-धीमे चू रही थी. मैं वही देखता पागल बना रह सकता था, लेकिन घबराकर मैंने यह थाहने की कोशिश की कि संगीत-सरदार पनामा पी रहे हैं या चारमिनार!

दांत निपोरे-निपोरे मैं हर्षकातर दीखा, ‘देखिए, अर्दोनो वाली किताब जाने कब किसके यहां से चुराये रहने के बावज़ूद आपके संगीत को आजतक भले नहीं पहचान सका, आप मगर पहली ही नज़र में पकड़ा गए! लेकिन हुज़ूर, बात समझ नहीं आई, वियेना के बाजू किसी पहाड़ी रेसॉर्ट में दीखते, यहां हलद्वानी के सस्ते तलछट में क्या ढूंढ़ने आए हैं? यहां संगीत का ‘स’ भी नहीं मिलेगा, मंगलेश की कविता भी दिल्ली में ही अपने शब्दं सहेजती है?’

वॉग्नर बाबू चुप्पे –चुप्पे तकते रहे. उन नज़रों में प्रूस्त ने रिल्कें को जिन नज़रों तका होगा वह दंग अंतरंग मनभावनता भी नहीं थी, एक प्रैग्माटिक डकैत की सूनसान आंखों का घिसा घसियारापन था, फुसफुसाकर कुछ देर तक एक लंबे मंत्र सरीखा बोलते रहे, गुरुवर फ्रेंच में बोलते तो थाह भी लेता, लेकिन यहां तो खालिस जर्मन बीयर बह रहा था, मैंने घबराकर हाथ जोड़ दिये- क्षमा करें, मालिक, ताज़ा-ताज़ा पटना से लौटा हूं और फिलहाल ‘चखना’ बंद कर रखा है!

‘कब था आखिरी बार जब हमें सुने?’ यह संगीत-सरदार ने खांटी संस्कृत में कहा, हम समझ गए मगर साथ ही यह भी समझ आया कि हम सरीखे संस्कृतिविहीन के लिए सांगितिक सुरबहार की जिरह में उतरना कैसी टेढ़ी खीर साबित होनेवाली है!

मैं एकदम से हंसने लगा. वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार का मामला सामने आते ही भारतीय नेता उच्च रक्तचाप और छाती में तक़लीफ़ की शिकायत करके जेल की जगह अस्पताल की शरण में निकल जाता है, या हिंदी प्रदेश की लड़कियां बौद्धिकता का सीधे सामना होने पर अकेलेपन के बीहड़ रास्तों पर निकलने के, मुस्कराती शादी के सहूलती संसार की तरफ गोड़ बढ़ा लेती हैं..

आंख खुली तो देखकर राहत हुई कि चलो, ससुर, अपना ऑईपॉड नहीं ही काम कर रहा, क्या ज़रुरत थी, खामखा पिटे हुए पहाड़ पर संगीत-शिखर से ठिलने पहुंच गए?

4 comments:

  1. मुक्तिबोध याद आने लगे
    ''क्या करून कहाँ जाऊं ,
    दिल्ली या उज्जैन | ''

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  2. "हिंदी प्रदेश की लड़कियां बौद्धिकता का सीधे सामना होने पर अकेलेपन के बीहड़ रास्तों पर निकलने के, मुस्कराती शादी के सहूलती संसार की तरफ गोड़ बढ़ा लेती हैं.."

    How about guys? and ladkiyan of non-hindi pradesh

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  3. आपकी बहुत बढ़िया लिखाई मेरे लिए और बढ़िया हो जाती, अगर मेरी संगीत निरक्षरता आपकी विज्ञान निरक्षरता से होड़ न ले रही होती।

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