Saturday, November 28, 2009

सियाह बिछिलाहटें..

10 comments:

  1. हस्तलिपि खुद पढ़ने के लिए दुरुस्त है। रेखाचित्र अच्छा बना है।

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  2. दोनों चित्र खूबसूरत

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  3. मुझे आप की यह पोस्ट भाषा के पारम्परिक विधान से ब्लॉगरी की मुक्ति की तड़प सी लगती है।
    बिछलन है कि सम्प्रेषण को अक्षर और शब्द वाक्यों से अलग करना है।

    बिछ्लन है कि चित्रकारी की तरह नया विधान गढ़ना है।

    ..

    क्रम उलट गया है। रेखाचित्र को पहले आना चाहिए था और 'बिछ्लन लिखन' को बाद में - जिससे पारम्परिक विधानों से मुक्ति स्वयं सामने आती दिखती।
    रेखाकित्र में लाइनों के दो वर्ग हैं - एक व्यक्ति का चित्र गढ़ते हैं तो दूसरे परिवेश को अपनी बिछ्लन से अभिव्यक्त करते हैं।
    'बिछलन लिखन' में यह विभेद तनु हो जाता है और परिवेश को दिखाती लाइनें अक्षराभास देतीं उपर आ जाती हैं तो आकार दिखाती लाइनें अक्षराभास देती नीचे..मतलब कि एक सततता अस्तित्त्व और परिवेश के बीच। सम्प्रेषण क्या यही नहीं होता ?

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  4. पड़ोस की मेडिकल की दूकान पर ले जाकर पढवाता हूँ..

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  5. आप मानेंगे नहीं...?
    गरिष्ट के गरिष्ट ही रहेंगे। :(

    देखता हूँ कब समझ में आते हैं... :(

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  6. रेखाचित्र सुंदर हैं।

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  7. रेखाचित्रवा तो गजब का है----लेकिन राइटिंगिया नाहीं बुझात बा---
    हेमन्त कुमार

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  8. ऐसे पत्र हम प्रेमिका को लिखते थे... लिखते भी थे और पढ़ी ना जा सके यह भी मिशन रहता था... सब खुश!!!! बढ़िया फोटू...

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  9. ऊ धुन्ध और धुआं मा घिरे बाबू साहब का कौनो खरोष्ठी लिपि का शिलालेख बांच रहे हैं का ?

    हस्तलेख कौनौ कलाकार मनई का बुझाता है . ई त कौनौ सिद्ध कैलीग्राफर का कलमकारी है.

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