Monday, November 30, 2009

गुम..

सन् अट्ठारह सौ तीस के आसपास की घटना है, या शायद कल रात के आखिरी पहर के दरमियान की कभी, कहना मुश्किल है. तथ्यत: मुश्किल इसलिए भी है कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे दक्षिणी बिहार में भटकते जिस शख्‍स का किस्सा है वह अभी भी लापता है. नयनमोहन घोषाल मामले पर कुछ प्रकाश डाल सकते थे लेकिन जेम्स प्रिंसेप की मातहती में ब्राह्मी लिपि संबंधी कागज़-पत्तर सहेजते हुए वैसे ही इन दिनों वह मानसिक रुप से कालाजारग्रस्त हैं, अंग्रेज की पागल सनक में घर में मोतीहाराना से ग्यारह वर्ष की कन्या विदा होकर आई है, ठीक से उसका मुख देखने तक का अभी अवकाश नहीं बना, ऐसे में टमटम के काफिले पर पश्चिम बंगाल के तीन जिलों की धूल फांककर लौटे पुलिस सुपर निकोलस यादव की खिन्नता, झुंझलाहटों का किस तरह, क्या खाकर सामना करें? फिर हरे चमड़े की मेज़ पर कुहनी धंसाये, सूखी कनपटियों में उंगलियां गड़ाये बाबू नयनमोहन को लगता जीवन में सुख देखना शायद उनके नसीब में नहीं, अच्छा होता बचपन के संस्कृत पाठशाला के सखा पूर्णज्‍योति की तरह, वह भी सोलह वर्ष की अवस्था में अघोरी साधुओं की संगत में गोरखपुर, नेपाल की तरफ भाग गए होते, कलकत्ते के काले बुखार से रोज़-रोज़ की इन भारी लड़ाइयों से निजात मिल जाती..

पुराने कपड़े में लपेटकर धरा क्लैरिनेट, यही तो? बांसुरी नहीं था, क्लैबरिनेट ही था, पक्का?..

कहानी है गुमनेवाला कभी आदिवासियों की संगत में ‘बजा-बजानिया’ की बहकी-संझाओं की लम्बी-लम्बी तानें छेड़े रहता था? बांसुरी नहीं, क्लैरिनेट की संगत में करता था? आश्चर्य..

“आश्‍चर्य तो यह भी है कि दीवाने, बहकबिहारी के झोले में ओवी विजयन का वह पतला, पहला मलयाली उपन्यास ‘खसककिंते इतिहासम्(द लिजेंड्स ऑव खसक) क्या कर रहा था. कब छपी थी, साप्ताहिक मातृभूमि में सिलसिलेवार 1968 और किताब की शक्ल में 1969 में?” सूखे ललिहर मैदान की उदास सांझ निकोलस यादव अपने लिए खासतौर पर बेल्जियम से मंगवाये दूधिया टेंट में अपनी खास ब्रांडी का घूंट भरकर फुसफुसाते और माथे के सवालों का धुंधलका साफ़ नहीं होता तो हारे मन धीमे मेज़ पर उंगलियों की थाप देने लगते.

पुराने कपड़े में लपेटकर धरा क्लैरिनेट, यही तो? बांसुरी नहीं था, क्लैरिनेट ही था, पक्का?..

क्या कहा निकोलस यादव ने, बहकबिहारी तो? यह कैसा विशेषण हुआ भला? लेकिन बहकबिहारीजी गुमे किधर.. किस समय में?



(बाकी..)

(क्‍लैरिनेट की ऑडियो का टुकड़ा वॉल्‍कर श्‍लोनदोर्फ़ की 1971 की जर्मन फ़ि‍ल्‍म, "द सडेन वेल्‍थ ऑव द पुअर पिपुल ऑव कॉमबाख" से)

3 comments:

  1. अजब गजब की रवानी है.....

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  2. बाबू निकोलस प्रसाद यादव उर्फ़ कप्तान साहब जब से गूली चलाना शुरू किए,डंडा बजाना शुरू किए, क्लैरिनेट बजाना भूल गए . सो उसे पुराना कपड़ा में तहा कर रख दिये . तबै न ब्रांडी पीकर दूधिया टेंट में टेबलवा पर तबला बजाते हैं . अपने झारखंड के हैं तो क्या हुआ,हैं तो निकोलस . बांसुरी काहे बजाएंगे . ऊ त क्लैरिनेट ही बजाएंगे . अब तो ससुरा ऊ भी पुराना कपड़ा में तहा कर रख दिए हैं . अब रिटायरमेंट के बाद ओकरा नम्बरवा आएगा . तब लौ फेफड़ा कीर्तन करने लगेगा .

    क्लैरिनेट मैन की कोरे,किम्वा कैमोन कोरे लाठी-गूली मैन होए जाए शेटा भाबते हौबे .

    कौथा किन्तु चमत्कार भाबे भालो जाच्छे .

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