Monday, November 30, 2009

समय पीछे जाकर भी कितना पीछे जाता है?..

एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल की सीढ़ि‍यां उतरते नयनमोहन घोषाल ने थके-हारे स्वर ऐलान किया, ‘क्या फरक पड़ता क्लैरिनेट-मैन किदर गुमा, कोन समय गुमा. हम हामारा बाड़ी सोब दिनेइ होताम, किंतु सोत्ती‍ अगर आप जिग्या‍सा करेन, क्वेश्चेन पुट करेन तोमाय कोथाय पावा जाबे, नोयोनमोहोन? बाड़ी थाको तो तुमि? तो आप क्या सोचते हामारा पास कोनो स्ट्रेट आनसार आछे की? नेइ. सेइ तो आमादेर सोबार लाइफेर बिग क्वेश्चन. केउ जाने ना कोथाय बास आमादेर! रियल वी, बुझेछेन तो?’

पुनकी नेतराम को कुच्छो नहीं ‘बोझाता’. घोषाल बाबू के पान, तंबाकू और सुराही में ठंडे पानी के इंतज़ाम और साहब लोगों के चमकते जूतों और मेमिन जान के सजीले छातों के गोपनीय लोक में मुंडी फोडते रहने से जब उसे फ़ुरसत मिलती है, वह दूसरे गुमाश्तों की संगत में गोटी खेलने की जगह अपने परिचित प्रश्नलोक में लौट आता है और फिर अकल भिड़ाये भेद फोड़ने की कोशिश में जुटा रहता है कि आखिर वह कैसा फर्क़ है कि गिलहरी बराबर ज़रा सी नौकरी में घोषाल बाबू के चेहरे की रंगत उड़ी रहती है, जबकि बड़के लाट प्रिंसेप साहब सारा दिन टकसाल में माथा फोड़े के बाद भागे-भागे सोसैटी आते हैं, और पहुंचते ही पोथी-पतरों में खुद को ढांप लेते हैं और समूचे चेहरे पर, मनोहर किरिया, ‘खिलन’ खिली रहती है!

तीस-बत्तीस पन्नों की खुद की तैयार की रिपोर्ट पर नज़र फिराते निकोलस यादव के चेहरे पर ऐसे हिकारती भाव बनते हैं मानो इस उम्र में वह किस लड़कपन में समय खराब कर रहे हैं, थोड़ी देर तक होंठ भींचे रहने के बाद बुझी हुई पाइप वह मुंह में फंसाकर बुदबुदाते हैं, ‘इट्स ऑल नानसेंस, एक अर्द्धविक्षिप्त वृद्ध भिक्खु की सेवा में अजामिलकुसुम आश्रम, गोपेश्वर में एक लंबे अंतराल पर ‘वह’ देखा गया था, इस बात की कोई तस्दीक नहीं किसने देखा था, और जब देखा था तब क्या क्लैरिनेट मैन वॉज़ प्लेइंग हिज़ क्लैरिनेट? नहीं, यहां उसका उत्तर नहीं. इस तरह से यह जांच कहीं नहीं जा रही, हम कहीं नहीं जा रहे. डैम इट, यादव!

जुसेप्पे, चुप है. मेरे नहीं टोहने पर वह कुछ नहीं कहता. कलकत्ते में सारे दिन की आवारागर्दी के बाद अपने लिनेन का घिसा जैकेट उतारकर एक कुर्सी की पीठ पर फेंक, कैनवस के गंदे जूतों को लिये-दिये जाने किस ज़माने के पुराने पलंग पर चित्त ढेर हो जाता है, अंतत: मेरी ख़ामोशी तोड़कर सवाल करने पर कि प्रिंसेप की डायरी मिली? के जवाब में मुस्कराकर इंकार में सिर हिलाता है. मैं चिढ़कर, पूरी कोशिश से अपना गुस्सा दबाये फिर, पूछता हूं, ‘तो सारे दिन इसी नहीं मिला की खोज में लगे रहे?’

जुसेप्पे कनपटी को हाथ का सहारा देकर उठंगा लेटता है, शरारत से मुस्कंराता है, ‘मैं कुछ और पीछे लौट गया था, विलियम जोन्स और चार्ल्स विल्किंस की कहानियों की टोह में निकल गया था. नहीं, तुम हल्ला मचाने से पहले मेरी बात सुनो, सुन रहे हो? समय क्या है? उसे कितना भी पीछे खींचो, वहां जाकर भी यही दिखता है कि समय के बड़े फलक का वह कितना लघुतम बिंदु है, समझ रहे हो?

मोतीहाराना से ग्यारह वर्ष की कन्या, सोनाबिनी, जो नयनमोहन घोषाल के यहां आई थी, यह उसका दूसरा व्याह था. पहले व्याह के वक्त उसकी उम्र आठ वर्ष थी, और जिससे हुई थी इसके पहले कि वह उसे देख पाती, अभागा बाढ़ की नदी में नाव पलटने से काल-कवलित हो गया था. स्वयं से उम्र में तिगुने नयनमोहन को देखने की कन्या में कैसी कामना थी, इसका उत्तर देना भी कुछ उतना ही मुश्किल है जितना यह जानना कि नयनमोहन घोषाल स्वयं क्लैरिनेट-मैन को कितना जानते थे, जानते थे? सचमुच?

(बाकी..)

3 comments:

  1. एक ठो बहकबिहारी बाबू नयनमोहन घोषाल तो हमहीं हैं . बालापने में अलखनिरंजन बोल-बाल कर कौनो मठ-मंदिर से चिपक गए होते तो काहे दू टके की गिलहरी माफ़िक नौकरी अउर टिटिहरी मार्का काम में लाखों का सावन जाया होता .

    किन्तु बास्तबिकता तो एही है जौन आप दू चोख से देख रहे हैं . हमरे लिलार मा तौ ससुरा कौनौ ’नौका डूबी’ का जोग-संजोग भी नहीं है .

    ReplyDelete
  2. "समय क्या है? उसे कितना भी पीछे खींचो, वहां जाकर भी यही दिखता है कि समय के बड़े फलक का वह कितना लघुतम बिंदु है, समझ रहे हो?"

    ReplyDelete
  3. बाबू नयनमोहन घोषाल जैसा केतना पब्लिक है जो क्लैरिनेट-मैन को देखा नहीं है. पहचानता नहीं है. कोशिश करते-करते खुदे का पहचान भूल गया है. निकोलस यादव भी न जाने कितने हैं और पुनकी नेतराम से त रोजै भेंटाते हैं. समय का बिंदू पकड़े खड़े हैं. सबकुछ ओही बिंदू से नापना पड़ता है न.

    ReplyDelete