Tuesday, December 1, 2009

दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!

अपने-अपने मन की अनूठे, अंगूठी के जादू में खोये जन, गन को इससे क्या फर्क़ पड़ता कि वह पुराने मखमल के टुकड़े में लपेटे क्लैरिनेट कुरियर को जानते थे, नहीं जानते थे? जानते थे तो कितना जानते थे और नहीं जानते थे तो क्यों नहीं जानते थे. हां, निकोलस यादव को पड़ता था, इसलिए कि बात जांच, उसके काम, जीवन की उसकी पहचान से जुड़ी थी. और मुंशी सियाबुर तइब अली से लेकर तपोधन महेश्शर राखाल की संगतों में निकोलस बेमौका, कहीं का तार कहीं जोड़, पूछने से कभी बाज नहीं आए कि जीवन ठीक-ठीक हमसे चाहती क्या है, तपोधन बाबू? या, ‘काम की राह सीधे चलते हुए एक दिन सत्य का साक्षात होगा, इसकी कभी आश्वस्ति बनेगी, मुंशी तइब साहेब?’

इस सत्य तक पहुंचने का अलबत्ता कोई सूराग नहीं कि निकोलस यादव को उसके प्रश्न के वाजिब उत्तर कभी मिले या नहीं, या अंततोगत्वा यही कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे बिहार और बंगाल के सूने मैदानों और उदास जंगलों में भटकते पथिक की अपनी रसधुनी खोज को यादववंशी निकोलस आखिरकार किसी मुकाम तक कभी पहुंचा सका या नहीं.

निकोलस का तीसरा बेटा जो ढेरों वर्ष अंकगणित में माथा फंसाये रखने के अनंतर अंतत: इंग्लिश कंपनी के बिजली विभाग में पंजाब में दूसरे दर्जे का अफ़सर नियुक्त हुआ और सारी उम्र तपेदिक की शिकायत और भय में रहने के बावजूद मौत जिसकी मेंहसाना, जिला- होशियारपुर के एक सब-स्टेशन की मरम्मत के दौरान बिजली के झटकों में उलझकर हुई; उसकी बड़ी बेटी की चौथी औलाद जो एक एंग्लो-इंडियन आया की मोहब्बत में सबकुछ दावं पर लगाकर हांगकांग (या शायद सिंगापुर) भाग गया था, खुदरा कपड़ों के धंधे में जिसने जो थोड़े पैसे कमाये, उसके कहीं दुगने से ज़्यादा शराब और मांदारिन बालाओं पर तबाह करके एक निहायत बेवक़ूफ़ और बरबाद मौत मरा; उसकी फूफीजाद बहन के पोते की इकलौती औलाद, इलियाद क्‍वेंतिन, जो क्यूबेक, कैनडा में इन दिनों लंबी बेरोज़गारी के बाद पिछले तीन महीनों से एक पब्लिक सर्विस कंपनी की वकीली करता पाया गया, उसके काग़ज़-पत्तरों में मास्टर, वीज़ा कार्ड और वोदाफ़ोन जैसी कंपनियों के अपनी सर्वविदित सार्वजनिक पहचान से अलग, पोर्नोग्राफिक सर्विसिंग से कमाई अकूत कमाई के ढेरों गुप्त आंकड़े हैं, लेकिन डेढ़ सौ पन्नों के उस बड़े फोटोकॉपीड और प्रिंटेड अंबार में कहीं एक जगह भी क्लैरिनेट-मैन का ज़ि‍क्र तक नहीं है. अंग्रेजी में जैसी की कहन है, दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!

हालांकि दूसरी ओर, आश्चर्यजनक रुप से महाराष्ट्र और दिल्ली की मैट्रोपॉलिटन ‘चमकाइयों’ से बाहर निकलते हुए मीडिया में मधुर भंडारकर ने ऐलान किया है कि कॉरपोरेशन, फ़ैशन और जेल के जंगले में झांकने के बाद अब उनका इरादा उड़ीसा की जंगलों की ओर कूच करने का है. मीडिया का एक धड़ा इसे माओवादियों में उपजी नई दिलचस्पी और हिंदी सिनेमा में नई संभावना के बतौर पेश कर रहा है, जबकि मीडिया का ही एक अन्य सनकी ग्रुप इसे क्लैरिनेट-मैन की मुख्य धारा में वापसी के सिने-शाहकार के क़यासी रंगों से रंगते थक नहीं रहा है. मालूम नहीं भोर का शुरुआती क्षण है, या बीच दोपहर भूख के अंदेशे की पहली चोट, अवचेतन में कहीं मैं एक दबी बुदबुदाहट सुनता हूं, ‘सच नहीं सपना होगा, और सपना होगा तो उसका ठीक मतलब क्या होगा?’

पंद्रहवी सदी के स्पेन में एक अबादेल ज़ोहराब मसूदी नाम के अध्येता हुए गए, ‘सभ्‍यताएं कैसे बाज़ार के रास्ते गईं’ विषय पर जनाब ज़ोहराब मसूदी ने चार महत्वुपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें अब लगभग सभी अप्राप्य हैं, एक बिगड़े पॉलिश अनुवाद की कुंजी के फुटनोट्स में अलबत्ता तीन जगह मसूदी का ज़ि‍क्र है, अंग्रेजी में अनुदित एक उद्धरण भी है, “a dream is a garden of devils, and all dreams in this world were dreamt long ago. Now they are simply interchanged with equally used and worn reality, just as coins are exchanged for promissory notes and vice versa, from hand to hand…”

मगर ताज़्ज़ुब की बात, क्लैरिनेट-मैन का ज़ि‍क्र यहां भी, कहीं एक बार भी, नहीं है!

(बाकी..)

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