Wednesday, December 2, 2009

छुक छुक छुक छुक..

कालीबाड़ी की भीतर की गलियों में जाने इसाइयों के किस पंथ की एक पुरानी, ललहर, साहबों की बंगलानुमा इमारत है, होंठों के ऊपर एक भूरा, भारी मस्सा और हल्के उग आये मूंछों की सजावट वाली एक बूढ़ी नन से जुसेप्पे जिरह कर रहा है, मैं गांजे की टुनक में उनींदा मिशन-पुस्तककालय के पुराने जिल्दों के बीच की अनकैटालॉग्ड शोधपत्रों को पलट रहा हूं; एक शीर्षक पर नज़र जाती है: “सत्रहवीं सदी के प्रथमार्द्ध में भारत में पुर्तगाली उद्यम से नीलाहाट के सामाजिक जीवन में आए बदलाव”, सस्ते स्कूली नोटबुक के कागज़ पर सात-आठ पृष्ठों की एक हस्तलिखित दूसरी रपट का शीर्षक है- “ईश्व‍रीय अंधश्रद्धा और पैरासीटामोल पर अगाध विश्वास दोनों ही हमारे लिए बराबर रुप से नुकसानदेह हैं.”

हाइनरिश हाइनस्त्रास, बर्लिन में 1889 का मैनुफैक्चर्ड एक घिसा हुआ पुराना ग्लोब है, उस पर धीमे-धीमे उंगलियां फेरते हुए, और एक अच्छी नक्काशी का बनारस में बना पीतल का पानदान है, इसे क्यों न उड़ा लिया जाए के मीठे अरमान से जूझता बुदबुदाता हूं, ‘मेरी जान जा रही है, स्वीटहार्ट, लेट्स गेट आउट ऑफ़ हियर!’

पूरी रात रेल का सफर, गैस-बत्तियों की रौशनी को बुझा देने के बाद के तेलियर अंधेरों की महक, झपकियों में आती नींद और खिड़की के बाहर सरसराये ताड़ के पत्तों की महीन हवादार आवाज़ से अगले ही क्षण उचट भी जाती नींद..

अंधेरे में आंख मलता, उंगलियों से टटोलता घुटना पाकर मैं चौंकता हूं किसका घुटना है, कैसा समय है? अतीत का बिसराया कोई क्षण, या भविष्य की खूंटियों पर टंगे किसी भगोड़े, कातर-राग के बिम्ब?

जिस दशक अमरीका में पहली मर्तबा मोटर उद्योग की ज़रुरतों के मद्दे-नज़र सड़कों के निमार्ण में नाटकीय निवेशों की सरकारी मंज़ूरी हुई, ठीक उसीके गिर्द जब श्री महावीरजी प्रसादजी द्वि‍वेदीजी ने अस्वस्‍थता में हिन्दूसभा के एक प्रांतीय अधिवेशन की अध्यक्षता में असमर्थता जताई थी, ठीक उसी दौरान जब हंगरी के तिरपन-वर्षीय इस्तवान मांदेलस्ताम, जो पिछले नौ वर्षों से एक छोटे ग्रांट की आस लगाये बैठे रहते और हर वर्ष उससे महरूम होकर कुछ जल्दी और ज़्यादा बूढ़े हो रहे थे, अंतत: इस बार पैसों की मंज़ूरी से आश्वस्त अपनी बेथलेहम की यात्रा का सुखद समाचार अपनी तीसरी और सबसे दुलारी बेटी मार्गारिता वॉन बांदेवाउन को देने उस बेकरी की ओर भाग रहे थे जहां वह चार घंटों की पार्ट-टाइम मजदूरी करती थी और अपने पिता से बेतरह स्नेह रखती बशर्ते वह बेथलेहम के सफर की पागल सनक से बाहर आ जायें और सबका जीना दूभर न करें..

ख़ैर, कहने का मतलब बेटी की मोहब्बत और संभावित सुख के उत्साह में दौड़कर सड़क पार करता इस्तवान मांदेलस्ताम ने जर्मन घड़ी के व्यापारी की टमटम के नीचे आकर अपनी जान भले बचा ली, अपने बायें पैर से हाथ हमेशा के लिए धो लिया. यह वही दिन था जब नेपाल की तलहटी में गोरखपुर के रास्ते धीमाल नामके गांव में, बाढ़ की चपेट में, कुल एक दिन में इकसठ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, ठीक इसी दिन दांतेवाड़ा के एक फ़कीर ने हवा में अनुपस्थित, मगर अपनी नज़रों में दिख रहे, मखमली कोमलता में लिपटे संगीत को पहचान लेने और उड़ीसा के मयूरभंज में एक पोपले मुंहवाली बुढ़ि‍या के नज़दीक ‘वह’ कहीं पाया जाएगा का सूराग दिया था.

रातभर रेल के सफर के तीन दिन बाद, जून की गर्म दोपहर मयूरभंज की इस और उस, जाने किन-किन गांवों की खाक छानते हुए मैं और जुसेप्पे एक वहशी दीवानेपन में पोपले मुंहवाली उस बुढ़ि‍या की खोज में लगे रहे जो हमें हमारे क्लैरिनेट के संगीत तक पहुंचने का रास्ता बताती, और अंतत: दिन ढलते-ढलते वह मिल ही गई..

(बाकी..)

गुम के पहले के बाकी टुकड़ों का लिंक: एक, दो, तीन.

1 comment:

  1. अज़दक की अजगरी/अजबयात्रा में कम से कम एक बुढ़िया मिली

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