Thursday, December 3, 2009

भागना..

धूप की अझुराई चोटी में रात की बारात के तीन अनजाने फूल
और अपना दीवाना मन गूंथ निकल भागना, दोस्तं,
भागती रहना, भागती भागती.

चीन की दीवारें होंगी, रात की गहरी सियाह ख़ूंखारें
न समझ आनेवाली, किसी अनजाने देश किसी पराये सपने
से उधार लिया हो जैसे दीखेंगी बीच-बीच कभी चमक का जगमग गिराती बहारें
पैर जवाब देते होंगे, सिर चकराता आकर हाथ में गिरता-गिरता होगा
होंठों की पपड़ि‍यां सूख-सूख अंतर्मन के धन को बेमतलब बनातीं
मन के बारह मन के बोरों पर गिरी आती होंगी
पहचानी पुकारें पीछे छूटी पुकारती, कभी तसल्ली़
और चैन का आश्वासन देती कभी धमकियों के चोट में
हुंकारती होंगी, मुड़कर पलट-बंसी बजाना नहीं, मदन
सांझ की लम्बी सलेटी उबासियों पर दौड़ता
निकल गया एक लड़का, दूर तक पसर गया लाल साड़ी का किनारा
और एक दिल तोड़ देनेवाली ठुमरी की तान की मानिंद दौड़े
दौड़ना, दूर बहुत बहुत दूर निकल जाना, दोस्‍त

कविता के पोस्टर के सारे हरफ घुल जायें
घुलते जायें, फिर तब भी दीखता रहे
भागते दीखे थे तुम, दर्द में ज़र्द, ओफ़्फ़, लेकिन
नज़रों में कैसे तो खुद को सजाते, मुस्कराते.

6 comments:

  1. गुरुवर आज मूड कुछ दूसरा है

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  2. हालांकि आपने कविता नहीं कहा है अपनी पोस्ट को ......पर इसे कविता कहने की अनुमति चाहते हुए कहूँगा कि बहुत अच्छी कविता...

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  3. sach he, achhe blog aksar mushkil se milte he, usake liye to bahut kathin hota he jo blog bhraman jyada nahi karta, is vajah se bhi ki aakhir dil ko chhu jaye esa koi lekhan milta kyo nahi, kuchh he jo rozmaryaa pathan paathan yogy ban gaye aour bas ab to unhe hi padhhtaa hu, magar mitra ese he jo achhe blog ka link de dete he..so isi kadi me aapke blog par pahuchaa aour sach poochhiye aanand aa gayaa../ abhi puri tarah padhhna he, ab padhhtaa rahunga..\

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  4. धूप की अझुराई चोटी में रात की बारात के तीन अनजाने फूल
    और अपना दीवाना मन गूंथ निकल भागना,

    कितनी सुन्दर बुनावट है... जो लिखा है उसकी कल्पना कर पाना, उसकी आत्मा तक पहुँच पाना विस्मित करता है... धूपकी अझुराई चोटी का विम्ब, पहले नहीं मिली कहीं धूप यूँ...

    जो संगीत है कविता में, उसने इस भागने को महिमंडित कर दिया है...
    बहुत सुन्दर!

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