Saturday, December 5, 2009

सपने से बाहर

पहाड़ से उठे दिनों गिरी स्याही की तरह समय बीता जाता है. गिरी हुई दुनिया में लौमहर्षक फुंकार पर सवार एक सफ़ेद, साफ़ घोड़े के भागने के बिम्ब क्या होंगे का भोले मन मनन करता हूं, पिटे सामर्थ्य और समझ की फंसी रेल में थोड़ा अटकता, बिछलने से अब गिरा तब गिरा की बचावें बचता, तुम्हारी नेह की मोहब्बत में कभी बहका, ये गया वो गया की तर्ज़ कभी भागा सचमुच आगे भी निकलता हूं..

रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं, विवेक की भाषा के दुलार में चेंप रहा हूं, देखनेवाले एक नज़र मारकर फिर अपनी हारों, या स्वार्थों का, तबला बजाने- आत्‍मा की मरोड़ को पुचकारते- दिन की दौड़ का भूगोल सजाते कहीं से कहीं निकल जाएंगे, मतलब समाज कहीं नहीं जाएगा.

पंक्तियां 1982 में छपी ‘लोग भूल गए हैं’ की ‘फ़ायदा’ शीर्षक कविता से है.
इतिहास की व्याख्या करता हूं
हमदर्द सुनते हैं और अपनी उन्नति की सोचते रहते हैं
उस समय
उन्हें मतलब नहीं कि वक्त ने समाज के साथ क्या किया है
वे जानना चाहते हैं कि वक्त ने जो हालत की है समाज की
उसमें वे सबसे ज़्यादा क्या पा सकते हैं.

2 comments:

  1. यह कविता अभी कुछ दिनों पहले उनकी प्रतिनिधि कवितायेँ में पढ़ी है... पर इन दिनों आप भी कविता में रस लेते दिख रहे हैं सर...

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  2. समाज कितना तो चला गया है
    भले ही दिशाहीन चला तो है, गतिमान वस्तु हमेशा चलती है.

    अब समाज जो हे टायर तो है नहीं, कि कोई बालक उसे डंडा मरता हुआ ले दौड़े.

    हाँ लगाने वालों ने उस टायर को गाड़ी में लगाकर अपना-अपना फायदा ज़रूर उठा लिया है आराम से ज़िंदगी बसर करने के लिए.

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