Sunday, December 6, 2009

एक सरल सिंप्लिसिटी के उलझाव..

गुम: छह

झामतला-बेनाडिनी के बीच की कोई पैसेंजर रेल थी, दुलुक-दुलुक की चाल ऐसे चल रही थी मानो कोई मंज़ि‍ल हो भी तो उस तक पहुंचने के लिए अनंत तक का समय हो. मुझे एक इंडोनेशियाई लोकगीत (जिसने कीरगीज़ गांवों की भी कभी भटकी, भूली घुमाई की हो) गुनगुनाता छोड़, जुसेप्पे डिब्बे के मलिन चेहरे और सस्ती छपाई की बांग्ला विज्ञापनों की चिप्पियों में दैहिक ताक़त और आत्मा की समृद्धि पाने के आसान नुस्खों की ‘बीटवीन द लाइन्स’ का समाजशास्त्र सुलटाता रहा.

एक सूखे बालों वाला कभी हंसमुख बच्चा रहा होगा, अब बीमार कैशोर्य का भोपाल गैसपीड़ि‍तों के वृत्‍तचित्र का स्थिर, अस्वस्थ-चित्र हो रहा था, दरवाज़े की रेलिंग से बाहर को झूलता जाने किसे बता रहा था कि तेज़ हवा उसके रुखे बालों में क्यों किसी तरह का बयार जनमाने में असमर्थ होगी.

घुटनों पर दोनों हाथ बांधे जुसेप्पे ने पीदमोंते वाली पहाड़ी ज़बान में मुझसे गुज़ारिश की, ‘इससे बोल अंदर चला आये, किसी से टकराकर, कटकर गिर पड़ा तो इसकी मां किसके पास जाकर रोएगी?’

मैंने चीख़कर लड़के को बंग्ला में डांटा, ‘अबे, तुझे सेवन-अप जमता है या स्प्राइट?’

लड़के ने एक उड़ती नज़र मुझे घूरा, कहा नहीं लेकिन बांग्ला में पर्याय होता तो बिना कहे मुंह में वह ‘घंटा!’ ही बुदबुदा रहा होता, फिर चुपचाप एक सीट के कोने बैठकर पि़डली की दाद और नाक खोदता, टाइमपास करने लगा.

कोचिंग से फ़ुरसत बनते ही जैसे पंद्रह साल के बच्चे पड़ोस की कटरिना कैफ से मोहब्बत करने लगते हैं, दोपहर के टेलीविज़न प्रोग्रामों से बाहर आकर कस्बे की गृहस्वामिनियां सांझ को औलादीन की शिक्षा की चिंता, कुछ वैसे ही लड़के के रुखे संसार से अपने को बाहर निकालकर मैंने जुसेप्पे से शिकायत की, ‘क्या ज़रुरत थी खामख़ा इस क्लैरि‍नेट-कुसंग में उलझने की, अच्छा-खासा अपनी अलसाहटों में उल्टा जैज़ के कुछ सपने देख रहा होता, या साठ के दशक की किसी हंगैरियन फ़ि‍ल्म में अपने, ‘अपनों’ को देख रहा होता?’ फिर चिढ़कर मैंने ठेठ भोजपुरी में उलाहना दिया, ‘इट्स ऑल शीयर टाइम वेस्ट, व्हॉट वी आर डुइंग इन दिज़ गॉड-फॉरसेकेन पैसेंजर ट्रेन? जिसका न कोई पास्ट है ना फ्यूचर, जिसकी अदद एक बत्ती तक सलामत नहीं?’

जुसेप्पे ने दुर्गापुर के रास्तें में खरीदी होगी तो मैंने देखी नहीं थी, अभी देखा कि वह डिब्बी खोल, उसमें कानी उंगली बोर, नाक में ‘नसनी’ सूंघ एक बार फिर अस्तित्ववादी रहस्यवाद के हवाले हो गया, फुसफुसाकर मुझसे बोला, ‘व्हाई कांट यू सी कि यही जैज़ है जिसे हर वक़्त तुम अपने दिमाग़ में बजता सुनते हो? हेडेन का व्योला, डिज़ी का ट्रंपेट, ड्यूक का पियानो, सब यहीं है, यू जस्टु हैव टू फ़ील इट!

‘बकवास मत करो, दोस्त, आयम रियली गेटिंग वरीड,’ मैंने थककर आंखों को दोनों पंजों से ढक लिये जैसे फेबर एंड फेबर की अपनी लेखों की किताब ‘इमोशन पिक्चर्स’ के कवर पर विम वेंडर्स ने ढंका हुआ है.

(बाकी..)

2 comments:

  1. आपकी साहित्यिक गुत्थियों में कभी हम उलझे तो कभी सुलझे नज़र आते हैं. वैसे इस लेख में ब्यौरा अच्छा दिया है, तमाम बातें कह दीं

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  2. क्या कहें? भोजपुरी अंग्रेजी , बंगला में घंटा! ट्यूशन के बाद कैटरीना कैफ़!

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