Tuesday, December 8, 2009

उदासी..

गुमसुम, ग़ायब रहती है, महीनों ख़बर नहीं होती कहां भागी, या हुआ, सारे सम्‍बन्‍ध खत्‍म कर लिए? के ख़्यालों में दबे, पुराने दु:खों की तरह लगभग भूल-भुला जाती है, और जीवन अनजानी हवाओं व सड़कों पर पहचानी आदतों के बासी रुमाल में लिपटा किसी उडूपी रेस्‍तरां में दोपहर के सस्‍ते खाने और बझे हुए हैं के बेमतलब बहानों में बीतता चलता है, तभी एकदम दीखती है सामने की खाली कुर्सी पर, फीकी मुस्‍कान का एक बेग़ाना गाना फुसफुसाती, थाली के निवालों में अटकी उंगलियों की कंपकंपाहट पढ़ती, आत्‍मा के अभेद उजाड़ों को कैसे, कितनी जल्‍दी बेमतलब किये जाती.

ठीक है वह सब फिर, मगर बात जो है वह यह कि उदासी के पास कहने को ख़ास कुछ नहीं होता, थोड़ा जो कहती बहकी-बहकी बोलती है, फिर देर तक चुप रहती, चुपचाप तकती है. रिश्‍तों के चुक चुकने के दरमियान की जो अस्‍पष्‍ट तनावभरी ख़ामोशियां होती हैं, कुछ वैसे में ही खिंची-खिंची ख़ामोश बींधती रहती है. उंगलियों के पोर ऐंठने लगते हैं, धुंधलके की दीवानगी में कभी किसी क्षण खड़े गिर पड़ेंगे के एहसास में हारकर मन दोहराता है, ऐसा क्‍या है यहां, क्‍या लेने आती हो? उजाड़ की इतनी बड़ी दुनिया है किसी और ठिकाने क्‍यों नहीं जातीं?

लातखाया ग़रीब उधारी की शरम भूल जाता है की तरह बेहया बटुये से सस्‍ती लिपस्टिक निकालकर रसहीन होंठ सजाती है, हाथ से हाथ सटाकर बताती है, एक बार दिल जुड़ने के बाद मोहब्‍बत पूरी उम्र कहां जाती है..

12 comments:

  1. उदासी तो सिर्फ उदासी है..........

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  2. लात खाई आत्मा के उजाड़ों को भेदती सस्ती लिपिस्टिक की हरियाली !

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  3. अद्भुत....इस मूड में आप शबाब पर होते हो.....

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  4. बेहतरीन शब्द चित्र---
    हेमन्त कुमार

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  5. उदासी भी शब्दों में सज कर सुंदर हो जाती है!

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  6. बाकी सब ठीक, पर उदासी अगर सिर्फ काली की शक्ल में है, तो अधूरी है. उजली उदासी नहीं दिखी अब तक?

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  7. @सपनदर्शी,
    जो आंखें हैं वह देख रही है, ऐसा क्‍यों लगा सिर्फ़ दीख ही रही है? दिख तो उदासी रही है, और वह न काली है न सफ़ेद..

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  8. कैसे खेलते है आप ? कही ठहरते ही नहीं...

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  9. @सागर सुकुमार,
    कहां खेलता हूं, उतनी जगह और ज़मीन कहां है? हां, रहते-रहते घबराकर ज़रुर है कि बोलने लगता हूं, लेकिन फिर यह भी है ही कि तब लोग सफ़ेद में काली और काले में सफ़ेद भी तो देखने लगते हैं?

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  10. ऐसा क्‍या है यहां, क्‍या लेने आती हो? उजाड़ की इतनी बड़ी दुनिया है किसी और ठिकाने क्‍यों नहीं जातीं?

    हृदय से निकले शब्दों में इतना पॉवर होता है, कि वे बाँध ही लेते हैं हर पढने वाले को अपने आप से, ये सीधे अपने गंतव्य तक पहुँचते शब्द रोक लेते हैं हमें अपनी आशीषों की छाँव में!

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