Thursday, December 10, 2009

हरमख़ोर रात कब, कहां?..


गरीब की लड़की का जी जुड़ा जाये जितना माथे पर चूते तेल की मानिंद ढलान पर ढिलमिलाती, बिछलती चली जाती साइकिल की रपटन-सी ज़िंदगी में इतनी सारी दोस्तियां बनती हैं, कितनी सारी? कैसी हंसियों की हांक बनती है, सूने दोपहर के अंधेरे, दिल में चाकू के चार फांक? दीवारें फंदवाती है अमरुदें चुरवाती, कांख में तीन नोटबुक दाबे बेटिकट पसेंजर रेल के सफ़र में लालबहादुर शास्‍त्री की भावुकता गवाती है, ‘अम्‍मां, तुमको बहुत दु:ख दिये, लेकिन अब सुधर जायेंगे’ की बेलय-तानहीन, बेबस प्राणहीन ग़ज़ल, गूंजाती? हाय-हाय की सारंगी पर सायं-सायं का तबला दौड़ाते, भगते-भाग  आते जीवन में दोस्तियों का दादरा जामुन के पेड़ में छन कटहल के कोयों में उतरता है, गुड़ के झाग और फगुए की आग में हुमसता चीख़ता ज़िंदगी में दोस्तियां बनती हैं कितनी सारी, इतनी सारी?

मगर ऐसा कब कोई मिलता है, दोस्‍ती, छनकर जाड़े की सुबह खिड़की पर धूप के टुकड़े की तरह थम जाये? जिसके आगे समूचे आत्‍मा के जंगखाये रेजगारी की थैली उलटकर धर दें, पलटन अपनी पलटा जाये, कि बाबू, यही मामलाए-माल है, चाहे बाराती जितने हों, अब आगे का हिसाब करो, हमको हमारे सायों से निकालो बाहर, आज इस क़यामत की हरमख़ोर रात घिसकर साफ़ करो?

4 comments:

  1. kadambani me kaal chintan aayaa kartaa thaa, aaj bhi aata hoga.kintu yah mera pasandida rahaa kartaa tha, aapko padhhne ke baad mujhe kaalchintan ki yaad ho aai, haalanki dono me kaafi antar he kintu ji sheli ko aapne thaama he yaa jo aapki sheli he vo kaalchintan se milati julati si lagi...behatreen...///

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  2. आज इस क़यामत की हरमख़ोर रात घिसकर साफ़ करो?...

    बेहतर...
    यहां कविता और गद्य दोनों का मज़ा आता है...

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