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Dec 18, 2009

जै जमरुदपुर, जै ज्‍यूरिख़

नई बात नहीं हुई. यह अक्‍सर होता है. कि खोजने निकले थे पेंसिल, कलम लेकर घर आए. तो कौन पेंसिल खोजने निकले थे अब यह प्रासंगिक नहीं, किताब की शक्‍ल में जो कलम लेकर लौटे वह यह है. कुल बारह ग्राफ़ि‍क कथाओं की इस किताब में स्वित्ज़रलैंड और हिन्‍दुस्‍तान दोनों तरफ़ के लोगों का काम है, थोड़ी मिली-जुली दुनिया है, एक स्विस सिपाही के दिल्‍ली में बिताये चन्‍द दिनों के अनुभव-लोक से आप बहरियाते हैं, तो ठीक बाद कोई बंगाली अपने यूरोपीय अनुभव को गाता मिलता है, मैंने पशोपेश में पैसे फंसाये थे, तो उस लिहाज़ से गरीबी को शर्मिन्‍दा करनेवाली खरीदारी नहीं साबित हुई. मज़ेदार फिर यह भी है कि बारह कहानियों में बारह अलग-अलग शैलियों से सामना पड़ता है, एक तरह की चिचरीकारी आपको माफ़ि‍क न जमे तो दूसरी पसंद आने लगती है. निजी तौर पर में क्रिस्‍तोफ़ बादू और काती रिकेनबाख़ की लकीरों में उलझता रहा. आप भी थोड़ा उलझ आयें इसके लिए यह एक और लिंक चिपका रहा हूं, एक-दो चिचरीकृत्‍य आप देखें और उतना तो यहीं देख लें, दोनों नज़ारे दिल्‍ली के हैं..


साथ ही ब्‍लाफ्ट का एक ठेठ दक्खिनी काम भी उठाया, कभी पहले अपने यहां पोस्‍ट में चर्चा भी की थी, अप्‍पुपेन के 'मूनवर्ड' के बीसेक पन्‍नों से गुज़रते हुए सच कहूं, सचमुच निराशा हुई. बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी की जगह बात कहीं निकलती ही नहीं..

4 कमेंट:

अजित वडनेरकर said...

आपने जो भी घुमक्कड़ी की है, सार्थक ही की है। मुझे तो ऐसा ही लगता है। राहुलजी भी यही कहते थे और आज के ज़माने का राहुलबाबा भी अपनी घुमक्कड़ी से फायदे में ही रहेगा।

बहरहाल, एक ठो अनयूजुअल काम आप और कर डालिये। कुछ कुछ ऐसा लिखते रहिए जिसके साथ आपके स्कैच भी रहें और दक्षिण ध्रुवीय पक्षी पर फिदा प्रकाशन समूह जैसा कोई इसे छापे।

Pratyaksha said...

क्रिस्तोफ बादू ज़्यादा पसंद आये (प्लीज़ींग विज़ुअल्स,ग्राफिक में आँखों को सुकून मिले भले ही कंटेंट ग्रिम स्थितियाँ दिखाये ) वैसे कुलभूषण और स्टॉकली का मिलन अलग अलग रंगों ..जैसी चीज़ एक किताब में इतने लोगों के बिना भी की जा सकती है ..प्व्यांट टू बी नोटेड ..फ्यूचर रेफरेंस के लिये

Pratyaksha said...

दूसरे लिंक में काती रिकनबाख़ भी रंगीन हैं ..शानदार

अनूप शुक्ल said...

जो लिंक दिये हैं वे कभी लगता ही नहीं कभी बांच पायेंगे। अजित वडनेरकर की सलाह मौजूं है।