Wednesday, December 23, 2009

आ मेरे हमजोली आ, बरजोरीये आ!

क्रि‍समस आ रहा है. आ क्‍या रहा है लगभग सिर पर खड़ा है (कुछ भेंट-सेंट लेकर नहीं आया है घंटा, बट दैट्स अनादर स्‍टोरी. बट दैट्स ऑल्‍सो फ़नी कि देयर इज़ ऑल्‍वेस वन अनादर स्‍टोरी, नहीं?). क्रि‍समस निकलेगा नहीं कि बाबू नवका साल दांत चियारे, सवालों का झोला पीटते हुए सामने खड़े दीखेंगे. और कुछ लगभग उसी अनुपात में, मैं रोता, दीखूंगा. भागकर आंसू पोंछने चली आये ऐसी कोई कमउम्र लड़की ख़्यालों में आह भरकर उठती, बीच-बीच में गुज़रती मिलेगी, लेकिन सामने आकर, ठोस भौतिक सुख का सबब बने इस भौतिकता में दीखने से स्‍वयं को बचाती फिरेगी!

कहने का मतलब, मतलब बने इस तरह लइकी नहीं आएगी. क्रि‍समस ससुर और उनके यार, नवके बहार, हाथ झुलाते हाज़ि‍र हुए जाएंगे. कोई बतानेवाला मिलेगा नहीं कि भई, ये नेमत- या आफ़त- आख़ि‍र रहते कहां गायब हैं कि एक दिन धप्‍प से सामने हाज़ि‍र हो जाते हैं? और आने की बेहया ज़िम्‍मेदारी से इसी कदर बंधे होते हैं तो अपने पीछे-पीछे एक बैंक लेकर आते? फटेहाल, लुटाहाल अनबैंकेबल बैंक ऑफ़ बिलासपुर ही होता, मगर बैंक तो होता? भीतर भारतीय विलास-समर्थ हिन्‍दुस्‍तानी करेंसी न होती तो भी हम बुरा न मानते, मोहब्‍बत से समझते, समझाइश देते कि इस चिरकुट देश में हज़ार चिरकुट दिक्‍कतें हैं, ठीक है, भई, चूल्‍हे पर उबलता रहे ये मुल्‍क, हमें आप ढाका या काठमांडू की तरफ़ ही ठेल दो, कबतक और किस-किससे शिकायत करते फिरें, अपना नया साल हम वहीं खेल लेंगे? उधर तक भी अगर इसी चिरकुट बमचक का नज़ारा रहा तो हम तो सियाह घाना के घनों की ओर भी निकल चलें, बस हमारे मलिन आयतन को नीचे बैंक का समझदार संबल मिलता चले, आं, ठीक फ़रमा रहे हैं न?

लेकिन फलतुए की बहक है, पुराने अनुभव से कमोबेश अंदाज़ा है अपने झुलने में नवका साल गुलाबी बेगम की अदाओं में नौटंकी फैलाने चली आएगी, और पीछे-पीछे तो क्‍या, अपने से दस गांव की दूरी तक अपने साथ बैंक ऑफ़ बिलासपुर तो क्‍या, बैंक ऑफ़ तबाहधूर भी नहीं लाएगी! सस्‍ते संतरा के शरबत और तलत महमूद के सदाबहार गानों से ‘अब लगता नहीं जी उजड़े दयार में’ के फलकट इंतज़ाम खुदी करने होंगे.

यही तो अनूठे, अनोखे मौके होते हैं जब हमारी तरह का समझदार, मर्मधनी अंधा पाठक आगे लपककर बाबू अल्‍बेयर कामू और उनके अस्तित्‍वबर्बाद को लोप लेता है, या वहां भी घबराहट होने लगती है तो फिर, चार कदम आगे, लक्ष्‍मीकांत-प्‍यारेलाल, जितेंदर और लीना चंदारवरकर वाले आदर्शपरात में सिर बोड़कर लता मंगेशकर के रहस्‍यवादी सवाल, ‘मैं आऊं? मैं आऊं? आ जाऊं?’ पर मोहब्‍बत रफ़ी की तरह हारकर फ़ैसला ले ही लेता है, ‘आ जाSS!’ (फिर स्‍वगत: देर तक नामुराद! बुदबुदाने से भी बाज न आयें बट देन, अगेन, दैट वुड बी अनादर स्‍टोरी..)

2 comments:

  1. जय हो। नया साल तो अब लगता है आये बिना मानेंगा नहीं। लेकिन आपकी बहुस्तरीय चिरकुट चिंतायें बार-बार सिर उठा ही तो रही हैं। मजे की बात है इनकी चिंता ही किसी को नहीं हैं। मौजा ही मौजा है सब कुछ।

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  2. गुरुवर एज यूजवल ग्रेट है !

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