Tuesday, December 29, 2009

दिसम्‍बर की बीतती सांझ

बदले मौसम में चेहरे पर अचानक गिरे तमाचे की ठंडी झुरझुरी है, आंखें समझना चाहती हैं कि सब कैसे कितना कहां बदलता है, लेकिन कहीं भी तकने से डरी अपने ही भय में भरी, भारी मुंदी-मुंदी सोचतीं, देखने के वक़्त हर कदम कितना गिरी-गिरी हैं. उंगलियां डोलती हैं बेहयायी में और शर्मिंदा होती हैं, मानो भूखा बच्‍चा भूले से पड़ोस की रसोई घुसा आया है और बेमौक़ा अपनी भूख में शर्मिंदा है. त्‍वचा कहती है इस तरह हमारे ही आसरे भरो, हमें भरमाओ-भरभराओ नहीं, उठो, बेमुरव्‍वत बाज़ार फैला है दूर-दूर, मेरी ही तरह दिखेंगी दूसरी, किसी और के कंधे गिरो किसी और को फंसाओ, जाओ. दिल कहता है, दिल कहता है कहां है हम, ये भूरी-भूरी दीवारों पर धीमे-धीमे पसरता धुआं, यह किसका घर है, कौन पंजों में दबाये हमें भगाये लिये जा रहा है, ऐसी नर्म अकुलायी सांझ किस जनम का कौन दुश्‍मन है, आवारगी का ब्‍लूज़ गाये जा रहा है?

5 comments:

  1. ठंडा तमाचा

    भरमाओ- भरभराओ नहीं
    आवारगी का ब्लूज।

    नए जमाने का साहित्य है यह। पढ़ कर सुकूँ मिला। अक्षर और शब्द अभी समर्थ हैं, उनकी ताजगी खत्म नहीं हुई।

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  2. आवारगी का ब्लूज...

    आपकी कलम-आपको नमन!!


    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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  3. आवारगी का ब्लूज़... सुन्दर पोस्ट... दिल की बात

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  4. आप बेमिसाल है सर जी..!!!

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  5. अवारगी के ब्लाउज। शरद चंद्र, राहुल, मजाज और आप कंजड़ थे, ये नवीन चिरकुट और आप महान हैं। इन टिप्पनीकार उर्फ कंपूटर ओनरों की ऐसी कम तैसी।

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