Dec 29, 2009

दिसम्‍बर की बीतती सांझ

बदले मौसम में चेहरे पर अचानक गिरे तमाचे की ठंडी झुरझुरी है, आंखें समझना चाहती हैं कि सब कैसे कितना कहां बदलता है, लेकिन कहीं भी तकने से डरी अपने ही भय में भरी, भारी मुंदी-मुंदी सोचतीं, देखने के वक़्त हर कदम कितना गिरी-गिरी हैं. उंगलियां डोलती हैं बेहयायी में और शर्मिंदा होती हैं, मानो भूखा बच्‍चा भूले से पड़ोस की रसोई घुसा आया है और बेमौक़ा अपनी भूख में शर्मिंदा है. त्‍वचा कहती है इस तरह हमारे ही आसरे भरो, हमें भरमाओ-भरभराओ नहीं, उठो, बेमुरव्‍वत बाज़ार फैला है दूर-दूर, मेरी ही तरह दिखेंगी दूसरी, किसी और के कंधे गिरो किसी और को फंसाओ, जाओ. दिल कहता है, दिल कहता है कहां है हम, ये भूरी-भूरी दीवारों पर धीमे-धीमे पसरता धुआं, यह किसका घर है, कौन पंजों में दबाये हमें भगाये लिये जा रहा है, ऐसी नर्म अकुलायी सांझ किस जनम का कौन दुश्‍मन है, आवारगी का ब्‍लूज़ गाये जा रहा है?