Thursday, December 3, 2009

बहुत भूख लगनेवालों की कहानी..

गुम: पांच

बूढ़ी दिखी तो बोलती हुई ही दिखी. जाने संबलपुरिया बोल रही थी या गंजाम वाली ज़बान. जुसेप्पे‍ गौर से कभी उसे तो कभी धीमे-धीमे हमारे गिर्द इकट्ठा होती भीड़ को पढ़ता रहा, जबकि मेरे मन में बुढ़ि‍या के तंबाकू से एकदम काले पड़ गए दांत कहीं गड़कर फिर वहीं अटके रह गए थे, मैंने पास खड़े एक बीसेक वर्ष के लड़के के कंधे को उंगली छुआते उससे कटकिया उड़ि‍या में सवाल किया, ‘क्या है, लोग अभी तक तंबाकू से दांत मांजते हैं?’ जुसेप्पे ने टोककर मुझे चुप कराया और तंबाकू रंगे पोपले मुंह वाली बूढ़ी की बातें कोई हमें समझा सके इसके लिए हीरो होंडा भेजकर सात किलोमीटर दूर पड़ोस के गांव से मेडिकल के छात्र बिबेक परिड़ा को बुलवाने की व्‍यवस्‍था हुई.

विवेक कानों में एमपी थ्री का ईयर-फोन लगाये बाइक की पीछेवाली सीट से उतरा, जुसेप्पे को देखकर उत्साह में ‘जोसेफ सर, जोसेफ सर!’ पुकारता उसका एक सीनियर सिडनी में डॉक्टर हो गया है और बैंक से लोन की व्यवस्था हो गई तो वह भी ऑस्ट्रेलिया की ओर निकल जाएगा के किस्से सुनाने लगा, उसके बाद ‘इज़ ऑस्ट्रेलिया रियली भेरी रेशियल, सर?’ जैसे सवालों की चिंता. मैंने बच्चे को पुचकारकर उसे जुसेप्पे से अलग किया, उसके कंधे पर हाथ धरकर उसे खांटी कटकिया में समझाया, ‘बेटा, हमलोग बहुत दूर से आए हैं, बुढ़ि‍या क्लैरिनेट बजानेवाले की कहानी कितना और क्या जानती है, यह जानने आए हैं, तेरा गाना उसके बाद सुन लेंगे, इज़ दैट ऑल राइट?’

बिबेक को मेरी अंतरंगता रास नहीं आई, न अपनी जगह जाने किसी क्लैरिनेट बजानेवाले की कहानी में हमारी दिलचस्पी, लेकिन जुसेप्पे को मुस्कराकर सिर हिलाता देख उसने कुछ वही किया जैसा मैं उससे करने को कह रहा था, मतलब बूढ़ी की उखड़ी बातों को वह ध्या‍न से सुन रहा है की सस्ती एक्टिंग करने लगा.

कुछेक मिनट बाद बिबेक ने छोटे स्त‍र के जिम्मेदार सरकारी कर्मचारी की तरह हमें इत्तिला दी कि बुढ़ि‍या अपने दोनों बेटों से नाराज़ है. बड़ा कलकत्ते में अनाज की मंडी में किसी सेठ के यहां नौकरी करता है, छोटा कटक के किसी प्रिंटिंग प्रैस में है, शादी करने के बाद दोनों बदल गए हैं खाते-पीते नौकरीपेशा औलादों के रहते बुढ़ि‍या शिकायत कर रही है उसके पास तंबाकू खरीदने तक के पैसे नहीं रहते, भिखारियों से बदतर वह जीवन बसर कर रही है, क्या ईश्वर के यहां न्याय नहीं है?

मैंने ऊबकर एक सिगरेट जलायी, बूढ़ी के हाथ सौ के दो नोट रखे, विवेक से कहा उससे पूछे क्लैरिनेट बजानेवाले के बारे में क्या जानती है?

बिबेक ने बुढ़ि‍या के आगे मेरा सवाल दोहराया तो वह नोट करीने से संभालकर अपनी मैली साड़ी के किनारे गांठती एकदम एनिमेटेड होकर बात करने लगी.

थोड़ी देर बाद बिबेक ने टूटी-फूटी अंग्रेजी, और उससे भी खराब हिंदी में जो बताया उसका लब्बोलुबाब था: बाजा बजानेवाले को एक नहीं बुढ़ि‍या ने बीसियों मर्तबा देखा था. दिखने में बहुत हद तक वह मुझ सा ही दिखता था, सिगरेट भी मेरी ही तरह जल्दी-जल्दी पीता. जब बाजा नहीं बजाता तो सिगरेट पीता होता, या फिर अपनी राह जाते लोगों को छेंककर उनसे सवाल करता कि वह इस पर क्या सोचते हैं और उस पर क्या. क्या इतने छोटे जीवन में चैन से कुछ वर्ष गुज़ार सकें, हमें इतने तक का अधिकार नहीं जैसी बेमतलब बातें. फिर बच्चों के लिए गांव में एक अच्छा स्कूल होना चाहिए जैसी बहकी योजना के पीछे वह चरवाही और मजूरी में लगे गरीब किसानों को दिक् करता रहता. बीच-बीच में कुछ दिनों के लिए गायब हो जाता और लौटता तो हंसते हुए दरवाज़े से अंदर आकर चिरौरी करता, ‘काकी, घर में जो भी रांधना है खिलाओ, बड़ी भूख लगी है!’

फिर उसके सूराग में पीछे पुलिस आने लगी, शिकायत होने लगी कि बिगड़े तत्वों को अपने यहां शरण देकर बूढ़ी गांव गंदा कर रही है. बुढ़ि‍या घबराकर कुछ महीनों के लिए अपनी बिधवा ननद के गांव चली गई, उसके बाद से ‘बाजा-बजैया’ को फिर कभी देखा नहीं. मालूम नहीं कहीं और चला गया, पुलिस धरकर लिये गई, क्‍या हुआ. लोग एक बार चले जाते हैं उसके बाद कभी उनका पता चलता है भला?

गांव के शिक्षित बुजूर्ग नंदी बाबू हैं. कभी कटक में वकालत किया था, तीन कमरों वाला एक मकान अभी भी शहर में है, वकालत की कमाई से ही खरीदा था, लेकिन मातृभूमि का मोह होगा, ज़्यादा वक़्त अब गांव में ही रहते हैं, पान का एक ताज़ा बीड़ा मुंह में दाबकर अपने दालान में पंचायत की खटिया खींचकर फैलकर बैठते हुए बोले, ‘बु‍ढ़ि‍या की बातों को गंभीरता से मत लीजिएगा, वह चोट्टी है, कुछ नहीं जानती. हमारा गांव नेक और अच्छाम है, कोई बाजा-टाजा बजानेवाला यहां क्योंह गड़बड़ी फैलाने आएगा? और हम किसी हरामी को अपनी मातृभूमि में घुसने देंगे?’

वकील साहब के घर पर हमारे लिए चाय और नमकीन का इंतज़ाम हुआ था, प्लास्टिक की नई नीलकमल कुर्सी में फंसे जुसेप्पे ने अभी चाय का पहला घूंट भरा भी नहीं था कि नंदी बाबू उत्साह में छूटकर पूछे, ‘ये सब फालतू की गप्प छोड़ि‍ये, मिस्टर, बताइये, आपके डॉलर का आजकल भाव क्या चल रहा है?’

जुसेप्पे ने चाय एक ओर बगल में टिकाकर मासूमियत से जवाब दिया, ‘मालूम नहीं, डॉलर क्या, अपन युआन की सेहत से भी एकदम अनभिज्ञ हैं. और अपनी यह चाय आप रहने दीजिए, कहीं से हंड़ि‍या-सड़ि‍या पिलवाइये, थोड़ा मिज़ाज़ तर हो, क्यों ?’

यह ‘क्यों’ जुसेप्पे ने मेरी तरफ देखकर कहा था, मैं जवाब देने की जगह नंदी बाबू के चेहरे का उड़ा रंग देखता रहा, मगर ज़्यादा देखने की ज़रूरत न हुई क्योंकि इसी बीच जुसेप्पे ने जेब से एक घिसा हुआ माउथऑरगन निकालकर बजाने लगा था, और इधर-उधर की जनता, नंदी बाबू के रसूख और ठेलुआहट को नज़रअंदाज़ करती बड़े चाव से बाजा सुनने भी लगी थी.

(बाकी..)

2 comments:

  1. पढ़ रहे हैं महाराज बहाव में..जारी रहिये.

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  2. "वह चोट्टी है, ठेलुआहट, हंड़ि‍या-सड़ि‍या
    हँसते -हँसते पेट दुःख गए ... खैर ...

    यहाँ कुछ कहने को नहीं फुरता है...


    यही कारण है की हम आपको ब्लॉग पर का फणीश्वर नाथ रेणु बुलाते हैं...

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