Monday, December 14, 2009

कोई मतलब बचा है? अख़बारों का?..

अख़बारों का अब भी कोई मतलब है? मतलब दूसरी जगहों में शायद बचा हुआ हो, मगर हमारे देश में? या वह महती प्रगतिशील हिन्‍दी साहित्‍य की तरह है, प्रकाशकों और पैसा कमानेवालों के लिए है, छपकर सुखी हो जानेवालों के लिए भी है, लेकिन पढ़ाने और समाज को कहीं आगे पहुंचाने के लिए, है? मालूम नहीं, मगर सवाल है. वाज़ि‍ब सवाल है. आपके पास तैयार जवाब होगा, मेरी जेब में नहीं है. जवाब का 'ज' भी नहीं है. कहनेवाले कहेंगे ब्‍लॉगिंग की हलचलों को देखो, दीखेगा हिंदी कहीं से निकलकर कहीं पहुंच रही है, कुछ उत्‍साही क्रांतिधर्मी गदाधर कार्यकर्ता लपककर सामने आएंगे, कहेंगे ओ बटनधारी बदमाश, हिंदी चल नहीं रही, दौड़ रही है! (घर के बच्‍चों को हम अंग्रेजी स्‍कूलों में भेज रहे हैं उसका गोबर उछालकर यह सुहानी, दीवानी तस्‍वीर गंदा न करो!) ख़ैर, मैंने पहले ही कहा एक सवाल है, कुछों के पास इसका तैयार जवाब होगा, कुछों के पास टेम्‍परेरी, कुछों के पास कुछ नहीं भी होगा. जैसे मेरे पास नहीं है. कि अपने देश में अख़बारों का क्‍या मतलब है. ख़ास तौर पर हिन्‍दी अख़बारों का तो सचमुच, अगर आप अपनी बेटी के व्‍याह के लिए वर्गीकृत विज्ञापन न छपवा रहे हों, या राखी सावंत किसकी बांह से निकलकर किसकी बांह की तरफ़ बढ़ी का अपडेट लेने को न अकुला रहे हों? मतलब है? हिंदी ही क्‍यों, मालूम नहीं किसी भी अख़बार का कोई मतलब है या नहीं. मालूम नहीं. मैंने निजी तौर पर लगभग चार महीने हुए, जितने लिया करता था, सब अख़बार बंद करा दिये, मगर चूंकि आदमी आदत का मारा है, और एक वक़्त के बाद वही रुटिन पीटता रहे तो पकने लगता है, तो हम भी पकने लगे और दस दिन हुए, अख़बार दुबारा चालू कर लिया, लेकिन सच बतायें, इन दस दिनों में शायद ही दो 'अग्रलेख' और डेढ़ पृष्‍ठलेख पढ़े होंगे, तीस पन्‍नों को उलटने और शीर्षकों से गुज़रने तक में थकान होने लगती है, और हमेशा की तरह, सुबह के भूले शाम को पता नहीं किसके घर लौटे की तर्ज़ पर यह ख़्याल मन में घुमड़ने लगता ही है कि इस काली छपाई का सचमुच कोई मतलब है? सुचमुच?

फिर दोहरा रहा हूं मालूम नहीं. जर्मनी में किन्‍हीं उत्‍साही सज्‍जन ने किसी दूसरे किस्‍म का गुबार निकाला है, अपने लिए उसका लिंक चेंप रहा हूं, कि बाद में पलटकर देखने आऊं कि भाई साहब को कहां, क्‍यों, कोई मतलब दिख गया..

हद है.

(अक्‍टूबर, 1945 नुरेमबर्ग मुकदमों की ख़बर पर आंख गड़ाये उत्‍साही जर्मन अख़बार-पढ़वैये, चित्र यूरोज़ीन से साभार)

10 comments:

  1. बात विचारणीय है....आज सही मे अखबार का कोई मतलब नजर नही आता....हर अखबार पर किसी ना किसी का अधिकार है....जो उसे अपनी मर्जी से हांक रहा है...

    ReplyDelete
  2. बड़ा लम्बा लेख है ऊ वाला और ससुर अंग्रेजी में है। दम निकल जाई भैया बांचैं मां ही। समझने में अऊर लफ़ड़ा। लेकिन अगर कभी बांच लिये तो बता जरूर देंगे।

    आपके लेखन के अंदाज जम रहे हैं। अच्छे लग रहे हैं। सच्ची!!!

    ReplyDelete
  3. स्टार टीवी पर एक ठो बिगयापन आता है जिसमें नये नये आये अखबार को दुकानदार टीवी की झाड पोंछ के लिये इस्तेंमाल करता है । पूछने पर कहता है कि ये तो कल की खबर है, आज की खबर तो इधर टीवी में है।
    लेकिन सोचता हूँ कि टीवी में भी तो खबर के नाम पर वही है राखी सावंत, बडका बॉस अउर सैफवा की करीनवा......बस.......इहै सब है।
    बाकी तो लापतागंज की तर्ज पर कहें तो अखबारी वाले सब बिज्जी हैं, जरा ध्यान से देखा जाय तो पता चल जायगा कि कितना बिज्जी है :)

    ReplyDelete
  4. ओ बटनधारी बदमाश, हिंदी चल नहीं रही, दौड़ रही है!

    :)

    वैसे मतलब काहे नहीं है जी अखबार का? यात्रा करना बिल्कुले छोड़ दिये हो क्या? चप्पल काहे में लपेट के धरियेगा कपड़ों के बीच वी आई पी सूटकेस में?? बताईये बताईये..

    चलो, न जाओ कहीं घूमने फिरने..घर में ही गतियाये किताबें पढ़ते रहिये तो आले में बिना अखबार बिछाये किताबें सजाईयेगा? बताईये-कौनो आल्टरनेट है.. और फिर उ वाली किताब पर तो जिल्द भी इसी से न चढ़ाते हैं कि भूरा पन्ना खरीद के लाते हैं??

    हमारे गांव की वो गुमटी वाला तो इसी की पूँगी बना कर चना/चबेना बेचता है..काहे गरीब के पेट का ख्याल भी नहीं आया..


    छोटा मुन्ना घर में हों तब तो मानिये इसके बगैर गुजारा ही न हो...केतन डायपर घर में खराब करेगा वो गवैंठी शहरी...

    ReplyDelete
  5. शुक्रिया... बहुत अच्चा प्रश्न... उतना ही बढ़िया लिंक... प्रिंट आउट ले जा रहा हूँ पढ़ कर बताऊंगा

    ReplyDelete
  6. हद करते हैं! सुबह बढ़िया प्रेसर डेवलप होने का और संडास में टाइम पास करने का कोई दूसरा सस्ता उपाय है का? वैसे विकल्प आप बता ही देंगे - नेट इनेबल्ड टॉयलेट का, ये तो हमका भी मालूम है. पर थोड़ा खर्चीला नहीं है?

    ReplyDelete
  7. मतलब तो है ही. स्टील फैक्ट्री चलाने वाले भंवर बाबू के लिए तो मतलब है ही. ईस्टील फैक्ट्री के साथ-साथ अखबार भी चला रहे हैं ताकि तथाकथित गौरमेंट को स्क्वीज कर सकें...ऊपर से हिंदी का अखबार? आई हो बाबा...शंकर पार्वती छाप बीड़ी बनाने वाले भगवतीप्रसाद मातागुलाम, पोस्ट-थाना सुरियावां जिला भदोही के लिए मतलब है ही. उनका विज्ञापन कहाँ छपेगा? राजा छाप खैनी कहाँ लौकेगी? और कोलकाता में होने वाले सत्संग में भजन (?) गाने वाले के मशहूर गायक श्याम जालान का विज्ञापन? ऊ कहाँ छपेगा? भोलानाथ केशरवानी ऑफ़ केशरवानी जर्दा भण्डार, सहसों जिला इलाहबाद? ऊ कहाँ जायेंगे? और सोपारीलाल शर्मा के चाह दूकान पर आज का संस्करण न रहेगा तो नगर की हलचल गाँव वालों को कैसे पता चलेगी?

    उदाहरण तो और हैं. बाकी, कमेन्ट बड़ा हो जाएगा. कहने का मतलब यह कि अगर एक सवाल का जवाब इतना बड़ा होगा तो पब्लिक सब हँसते हुए कहेगा कि; "इतना लम्बा जवाब ठेल रहा है, मतलब कुछ तो है जिसे एक्सप्लेन नहीं कर पा रहा है."

    मतलब हिंदी अखबारों का मतलब.....

    ReplyDelete
  8. अरे? अऊर फिर ऊरे? देखिए, सीकुमार कभी बहकाई, पीर-घेराई में सच्‍चो केतना सच्‍ची बात बोल जाते हैं. जिय, बाबू.

    ReplyDelete
  9. समीर भाई ने अखबार के इतने उपयोग बता दिये कि बस... कई लोगो को तो सुबह के अखबार के बिना ... जाने दीजिये ..पढ़ने मे अब का धरा है ..।

    ReplyDelete