दिशाहारा लड़का संभवत: महज मन में धमकते ताक़त को झोंकने की गरज से चढ़ान पर अपनी साइकिल के इंजन की उड़ान उड़ रहा है. खुले आसमान में एक बुढ़ाती चील अपना बिगड़ा सुर सेट कर रही है. एक गंवार ज़ाहिल कुत्ता है मुंह ऊपर किये चील के नीचे-नीचे दौड़ रहा है, मानो बुढ़इनी फलक से वैलेंटाइन का तोहफा फेंकनेवाली हो! तीन-चार छूटे हुए लावारिस सागवान के पेड़ हैं हैरत में सूखते कि पास-पड़ोस के सब कट गये फिर हमको किस मोहब्बत में छोड़ दिया? कहीं इसलिए तो नहीं छोड़ दिया कि आगे तिल-तिल का तूफ़ान जीना होगा, भारी भुगतान सीना होगा? लड़का इस चंहुओर की बेहाल हरियालियों से बेफिक्र, रॉड पर दायें-बायें धमकता- लरज़ता- उछलता उड़ा जा रहा है. होंठों पर ‘ओ मेरे शाहे खुबां, ओ मेरी जाने जनां, तुम मेरे पास होते हो कोई दूसरा नहीं होता’ नहीं है लेकिन मन में कुछ ऐसी ही शराब उमड़ी बरस रही है..
गांव के छोर और चढ़ान के ठोर पर जाने कहां से लड़की का आविर्भाव हुआ है. अंततोगत्वा अचकचाहट में साइकिली ठहराव हुआ है. अपने से घबराये लड़की-लड़का एकदम से बहककर ‘इमोशनल अत्याचार’ का कैलेंडर बांचने लगे हैं, पेश है एक अनकट सेलेक्शन:
- तुम यहां? किसी का वेटिन कर रही हो?
- ऊंहूं.. मेला देखने गयी थी!
- मेला तो तीन गांव उधर है..
- हम सोचे थे इधर है, इसी बास्ते.. इतना चढ़ाई चढ़े सब वेस्टेज हो गया!
- हूं.. अब क्या करोगी?
- अब घर से निकल ही गयी हूं तो कुछ देखकर ही लौटूं..
- इधर देखने को है क्या.. ऐसे ही फालतू थकोगी?..
- जो भी.. अब गलती हुई है तो सज़ा भी हमीं को भुगतना होगा.. ऐसे ही घर लौटूंगी तो मन को हर्ट करेगा..
- बुरा न मानो तो एक सजेसन बोलूं.. साइकिल पर आ जाओ, दोनों जने साथ-साथ देख लेंगे, कितना अच्छा लगेगा!
- क्या अच्छा लगेगा? ऐसा क्या देख लेंगे?
- पहले चढ़ोगी साइकिल पे तब न समझोगी?
- अरे, ऐसे ही साइकिल चढ़ जाऊं, इतनी बेसरम हूं? तुमको हम जाने कहां हैं.. भरोसा करने में हमको टाईम लगता है!
- ठीक है, आगे मत बैठो, पीछे कैरियर पर बैठोगी उसमें तो भरोसा कर सकती हो न?
- मालूम नहीं, दिलीप के संगे कैरियरे पर बैठे थे, गलती से जाने कब उसकी पीठ से मुंह टचा गया था, पूरा शाम हम लाज में कैसे तो सिकुड़े-सिकुड़े बैठे रहे..
- मेरे से मत टचाना, होंठ पर चुन्नी बांधके बैठना, कहां कहां का फालतू चिंना करती रहती हो?
- तुम पर भरोसा कर सकती हूं? रियल में? प्लीज़, बोलो ना?
- ऐसी बात का कोई जवाब होता है? या तो होता है या फिर नहीं होता है, भरोसा, नहीं?..
लड़का साइकिल के रॉड पर स्नेहिल हाथ फिराता है, लड़की का कोमल चेहरा देखता है, पीछे अटके हुए कुत्ते की बेकली देखता है. ऊपर आसमान में बुढ़इन चील अभी भी अपना खोया सुर खोज रही है..
कभी पास पहुंचकर नज़दीक से साबुत सिर-पैर
देखेंगे नहीं ऐसी बुढ़ायी पनचक्कियों की आवारा
हवा हूं. जाने कब किधर अचानक पीछे रह गये
खेतों की हरियालियां भरी-भरी मकई की बालियां.
ढलती रात का सूनसान भारी चद्दर कांधे गिराये
घड़ी भर ईनार पर सुस्ताये, हाय, बरगद के उलझे
लतरों में अपनी पहचान छिपाये, किसी भगोड़े भूत
की छाया हूं. ‘गाईड’ के एसडी बर्मन की मदहोश
माया हूं, होंठों पर आते-आते ओह, पहले ही ठहर
गयी, न देखे जा सके सपनों की काया हूं.
बालों में खोयी-खोयी सोयी चलती उंगलियां
कंघी की थपकियां, आंखों ने देखा नहीं है
देखेंगी अभी और कुछ देर बाद, एक महीन
कांटा गड़ा है नाखून के नीचे निकल आया है
ख़ून जाने किसकी शरारत होगी, मैं नहीं हूं.
बंटवार: आधुनिक लोककथा
कितने सारे तो. गिरे पड़े. कितना अच्छा होता लेकिन कहां हुआ की आह की भाप सोखते. तरतीब में गुंथने को अकारथ बिखरे. बेचैन. हदर-बदर भागते इधर-उधर किधर. बेचारे. शब्द. दानों के पीछे गिरी जातीं चिड़ियायें सदल-बल. फिर कभी जैसे दंगों में छूटे ओह, लावारिस चप्पल. हल्ला. बहुत सारा. बच्चे. बहुत सारे. हौंड़ा-हौंड़ी में हिलगते भागते. पहुंचते. एक बच्चा. नहीं पहुंचता. खोज होती खबर होती हेरा गया. राह तकती इंतज़ार में आंखों के गूमड़ फूटते लेकिन फिर नहीं आता. खोया हुआ. शब्द. खोये से सन्नद्ध सही-सही अपने को ज़ाहिर कर पाने में हारी रह गयी बात. जगमग सितारों की समूची भव्य रात और फिर सुहानी सुबह का साथ. हूकते से साज़ घिरे, भय में बेसाख़्ता चीख़ते कभी बेसुरे. किंतु आत्मा थ्रिर रहती. बेआवाज़. जैसे कामों की अबल-तबल की घनघोरी व्यस्तताओं में न हो पाता हो खुद से संवाद. आंखों तक पहुंचना छूट गयी हो किंतु मन में उठती हो कभी बिन बताये आयी सुर्ख़ लाल ताप. हंसते फिरते हों सारे-सारे दिन लेकिन हंसी न हो. रोते में रोते में सूख जाते हों हलक लेकिन फिर यह भी याद पड़ता न हो कब रोये थे आख़िरी बार. या गिरे थे जब? तब से यूं ही तो पड़े थे.
बंटवार: मन की गांठ

(स्केच को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकियाकर अलग खिड़की में खोलें)
बंटवार: रॉटरिंग राग, स्केचिंग
लड़का क्या था सूखकर सूखी लकड़ी हो रहा था, जाने जिजीविषा की क्या बेहया ज़िद थी कि किसी यतीमखाने के फटी खुरचनों, तार-तार होती खाट की उरचनों पर गिरा होने की जगह अभीतक साबूत ज़मीन पर खड़ा था, और मज़ा यह कि ग़ुमनाम हवाओं की चंचलता की बनिस्बत मलिन मन की उमगताओं में डोल रहा था! बेडौल लड़की अडोल स्थिर और ग़मज़दा थी, मानो ऋतिक रौशन से शुरू हुई बात अंतत: राजपाल यादव की मंगनी पर आकर खत्म क्या होती, ऐन शादी के बखत बात खुली दुल्हे का दाहिना पैर पोलियो-पीड़ित है हवा में झूल रहा है, जबकि लड़की झूल नहीं रही, अडोल स्थिर खड़ी थी..
लड़का चंचल लतर हो रहा था, कांपती आवाज़ में मिमियाकर बोला- किस बात पे किस बात पे किस बात पे दुखी हो? ऐसा क्या हुआ क्या किया हमने, जवाब दो?
लड़की कुछ नहीं बोली, सूखे हलक से ज़रा-सी थूक हवा में उछाल अंगूठे से ज़मीन खुरचने की बेपरवाही ज़ाहिर करती रही. लड़का भीतर ही भीतर दिन का कौन वक्त था जब नहीं मचलता, फ़िलहाल बाहरी तौर पर भी अंदरूनी तहख़ानाय बेचैनियां खनकाता रहा.
- हर घड़ी तुम्हारी ही सोचता हूं.. दिन में तुम्हें चार-चार ख़त लिखता हूं.. आखिर और क्या चाहती हो?
लड़की ने लड़के को उन नज़रों से देखा सत्तर के दशक में सिनेमाहॉल के बाहर शरीफ़ घरों के बिगड़े बच्चे ब्लैक में टिकट का बेहूदा पैसा मांगनेवाले ब्लैकियों को जिन हिक़ारती नज़रों से देखा करते. देखती रही बोली कुछ नहीं.
- क्या है ऐसे क्यों देख रही हो? चमककर लड़के ने घबराया सवाल दागा.
- फिर कैसे देखूं तुम बात ही ऐसी बेवक़ूफ़ियों की करते हो?
- जाने क्या है मुझसे चाहती हो? इतना कुछ तो तुम्हारे लिए करता रहता हूं! फ़ोन के ज़माने में ख़त लिखता हूं, दिल निकालकर दे दूं फिर खुश रहोगी?, फिर वही चढ़ी हारी मिमयाहटें..
- उसका मैं क्या करूंगी?- लड़की बेरूखी से उसकी बात काटकर बोली, फिर वही उड़ी-उड़ी हिक़ारती नज़रों से उसे तकती रही, ज़रा ठहरकर बोली- तुम्हारा लिखना न लिखना सब बराबर है!
- मतलब? दिन में चार-चार लिखता हूं और तुम्हारे लिए उनका मतलब नहीं?
- उनमें मतलब जैसी कोई बात हो तब तो मतलब होगा! न मेरी सहेलियां समझ पाती हैं, न मुन्नू के भेजे में उनका मतलब घुसता है.. हारकर कल मैंने अम्मी के हाथ रख दिया कि किसी दोस्त की चिट्ठी है ज़रा पढ़कर समझा दो, बेचारी पांचेक मिनट तक उससे जूझती रही, फिर बोली जाने क्या जलेबीनुमा बातें लिखी हैं, हमारे तो घेला भर समझ नहीं आया!
लड़का सन्न अपनी मुहब्बत का इस क़दर बेदिल, बेरहम नुमायशी तमाशा सुनता रहा, लड़की बेधड़क बोला करती रही- क्या फ़ायदा ऐसे इज़हारे-मुहब्बत का जिसका इशारा हमारी सहेलियां तक न समझ सकें? अम्मी तक बुरा न मानें, फिर फ़ायदा क्या? रहने दो खुद को हलकान न करो दुखाओ मत, हमें ख़त न ही लिखा करो!
लड़का लतरों की तरह आंखें फाड़े बेवज़ा लहराता रहा, बेडौल लड़की अडोल अपनी जगा स्थिर बनी खुद को शहंशाहे-आशिको तक़लीफ़ कहनेवाले को नहीं जाने क्या था किस चीज़ को अपलक तकती रही..
बंटवार: अबरार और मंजरी, आधुनिक लोककथा, जुगलबंदी
बीता हुआ क्यों आता रहता है लौटकर? हवा के कमरे होते हैं जिनमें आकर गूंज जाती है फिर हवा की बीती आवाज़ें? क्यों आकर गूंजती हैं? फीके पड़ते नाख़ूनों को पढ़ता मन सोचता है यह क्या है हवाओं में जो बंधा-बंधा तैरता है गायब होता है फिर आता है वापस, एक बार आकर फिर पूरी तरह एकदम गुज़रता क्यों नहीं..
बंटवार: hinglish podcasting, podcasting, पॉडकास्टिंग, पॉडकास्ट
‘स्पैन’ पलटने के बाद ‘एल नुवोबो मोंदो’ के पन्ने पलटता हूं. कल ही दफ़्तर में आ गयी थीं लेकिन देख सकने की फ़ुरसत नहीं बनी (यही दिखता रहा कि मेरे नाम विदेशी पत्रिकाओं के आने से कैसे सोढी एंड पार्टी की आंतें जलती हैं! जलती है दुनिया जलती रहे, आंखें अपनी मलती रहे?), अब फ़ुरसत बनी है तो उसकी अच्छी तस्वीरों व प्रचारात्मक सामग्री में पता नहीं मन क्यों नहीं लग पा रहा. दिल्ली हिन्दी अकादमी से फ़ोन आ सकता था लेकिन नहीं आया है. राजौरी गार्डन के लालजी पंडित कह रहे थे विशेष काव्यपाठ का आयोजन करेंगे किंतु कहां कर रहे हैं? साहित्य-रत्नाकर वाले भी चुप हैं. साहित्य अकादमी तो मुझे जैसे भूल ही गयी है! फिर मैं किसके लिए लिख रहा हूं?
जनम-जनम का साथ है निभाने को कितने जनम लिये? तुम मुझे कभी भूला न पाओगे, ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना. कहीं दीप जले कहीं दिल. कभी तन्हाइयों में हमारी याद आयेगी. दिल के झरोखों में मुझको बिठाकर यादों की अपनी दुल्हन बनाकर रखोगे तुम दिल के पास, मत होऊं तेरी जां उदास? मेरे दुख अब तेरे तेरे सुख अब मेरे, मेरे ये दो नैना चांद और सूरज तेरे? गुमनाम है कोई बदनाम है कोई लेकिन काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं! वो चांद सा रौशन चेहरा ये झील सी नीली आंखें तारीफ़ करूं क्या उसकी जिसने मुझे बनाया! तुम अगर साथ देने का वादा करो, मैं कहीं कवि न बन जाऊं तेरे प्यार में ओ कविता?
ओह. ना कोई उमंग है ना कोई तरंग है मेरी ज़िंदगी है क्या कटी पतंग है! साहित्य अकादेमी मुझे फ़ोन नहीं कर सकती? या हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर ही सही? श्री फणिधर हर कहीं पहुंचने का एयर-फेयर पाते हैं, और मुझे ज़रा-ज़रा से शराब तक का मोहताज़ रहना पड़ता है, इस दुनिया में कहीं न्याय है? सुरेंद्र मोहन पाठक तक का अंग्रेजी में अनुवाद छप गया जबकि मेरे पास अब तक किसी फ्रेंच प्रकाशक का पत्र पहुंचा है न ऊंची राशि का कोई चेक. नीची राशि का भी नहीं पहुंचा! फिर मैं किसके लिए लिखता हूं?
शायद फ्रेंच में मेरे अनुवादों के छपने के बाद अंग्रेजी पढ़नेवाली बड़ी दुनिया में मैं छा जाऊं? कोई होता मेरा अपना हम जिसको अपना कह लेते यारो. तित्तली उड़ी उड़ के चली फूल ने कहा आजा मेरे पास तित्तली कहे मैं चली आकाश? ज़िंदगी कैसी है पहेली कभी ये हंसाये कभी ये रुलाये (मेरे संदर्भ में ज़्यादा तो रुलाती ही क्यों रहती है? ज़िन्दगी तेरा ऐतबार ना रहा?). आपसे हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया. ना जा मेरे हमदम. बहारो फूल बरसाओ तेरा मेहबूब आया है!
लेकिन फ़ोन नहीं आ रहा. लालजी पंडित का भी नहीं. दुनिया ओ दुनिया तेरा जवाब नहीं. सचमुच मैं किसके लिए लिखता हूं?
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी
सोचते हुए माथा धुनने की इच्छा होती है कि आखिर क्या है जीवन का तार पकड़ में क्यों नहीं आता, आयेगा तो किस तरह आयेगा? खिड़की पर खड़े होकर बाहर देखते हुए वह पकड़ में चला आयेगा, या बाहर से खिड़की के भीतर झांकने पर वह स्वयं को प्रकट करने लगेगा, वह क्या तरीका होगा जिससे जीवन के तार को जीत लूंगा? या कम से कम ऐसी पहचान हो जायेगी कि उसकी गुत्थियों का कुछ सिरा मेरे हाथ लगेगा? सोचता हूं और फिर तालू पर सूखेपन की अनुभूति होती है, सदियों का सूखापन, जैसे इस प्यास का इलाज नहीं!
लिखता हूं लिखता हूं लिखे चला जाता हूं फिर जिस बिंदु पर ठहरता हूं वह क्या जगह होती है और उसके आगे जो स्पष्ट नहीं दीख रहा होता है वे कैसे, किन रास्तों के इंगित होते हैं? फिर सोचते हुए लगता है कि इस उलझन की सरल, जटिल जैसी भी समीक्षा करूं, वह स्वयं को एक भोली उम्मीद में भुलाये रखने, एक नशीले झांसे से अलग कुछ है हो सकेगा? क्या यह अधबीच लेखन ठहरा बिंदु नये पाठों, सन्दर्भों को जांचते हुए फिर वहां से शुरू करो आगे चलो का महज़ इशारा भर होगा? किंतु इसका स्पष्ट मतलब यह कैसे नहीं होगा कि आगे का लिखा पढ़े पाठ के प्रभावी छायाओं के असर में तब खुद को लिखवा नहीं रहा होगा? क्या यह लेखन साथ पढ़े जा रहे पाठ की संगत का घटिया ‘डबल’ मात्र न होगा? ओह, अधबीच अटके लेखन के आगे की अवचेतना के झीने परदों के गुंठनों को सलझाना क्या एक आंतरिक, मर्मांतक अंतहीन युद्ध का आयोजन नहीं? ऐसा युद्ध जिसमें साथी और दुश्मन की पहचान लगभग, लगभग असंभव हुई जायेगी बनी रहेगी?
कभी सोचता हूं जीवन में ‘विचार’ को ऐसी प्रमुखता देना ही कला के सहज, स्पॉनटेनियस उद्गम के रास्ते सबसे बड़ी बाधा है. ‘विचारमुक्त’ होकर संभवत: रचनात्मकता के मैं नये मुकाम पहचान पाऊं, स्वयं को नयी चेतनता की नीली झील में उमगता रौशन देख पाऊं? बुद्ध का सहज, सरस ‘द एंड ऑफ़ सफरिंग’ की निस्सीम शांति की चरमावस्था? दिक़्क़त है बुद्ध का गहरे क्या मैंने अगंभीर अध्ययन भी नहीं किया (ओह, इतने वर्षों ज्ञान के कैसे कुसंगों में उलझा रहा मैं?). धर्मशाला में बिताये तीन महीनों बौद्धों के बीच मैं केरल में अरब व्यापार की चर्चाओं में उलझा रहा था? क्या करता रहा था धर्मशाला में? मनुष्य की स्मृति ऐन नाज़ुक मौक़ों पर उसे क्यों धोखा देती चलती आती जाती लौटती फिर चली जाती है? किंतु यह भी सत्य है कि धर्म मेरे जीवन का अपेक्षाकृत कमज़ोर तत्व रहा है. बचपन में माता के संग कसौली में बिताये वर्ष ऐसी यादों से भरे पड़े हैं (माता कहतीं धर्म से तू इतना अछूता क्यों रहता है, पुष्पांक, कहीं मेरी ममता के प्रकाश में धब्बे तो नहीं रह गये?). विमलजी भी मेरी धार्मिक निस्संगता के प्रसंगों पर स्तब्ध रहा करते..
किंतु ‘विचार’, ‘चिंतन’ से स्वतंत्र लेखन में आस्था व जुड़ाव को बांधे रखा जा सकेगा? क्या वह नये आंतरिक स्खलन, एक नयी उश्रृंखल व्यर्थकारी उद्यमशीलता बनकर न रह जायेगी? सोचता हूं कितना प्रीतिकर होता जो बुद्ध के सत्संग में इन प्रश्नों की गहरी, बौद्धिक समीक्षा हो सकती! पिरिंदी, दसकानसोंदाली, त्राक्ष्वी, तोमास्सो सब ही मेरी तरह मुश्किल क्षणों में बुद्ध सत्संग की ऐसी ही करुण कामना करते रहे हैं (किंतु क्या मेरा साहित्य उन ऊंचाइयों को छू सका है? ‘तद्बल’ और ‘वियोगवाणी’ का श्रद्धापर्व उस अनुरागी मनोहारिता के कहीं भी निकट पहुंच सका है?).
किंतु असल प्रसंग तो अशेष रहता ही है कि जीवन के तार पकड़ में क्यों नहीं आते..
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी
सांवली रुपाली की तीन तुकबंदियां.. क्षमा करें इन्हें कविता मानने से पतनशील संपादक मंडल गुरेज करेगा..
10 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये
तुम्हारी यादों में
रेगिस्तान के प्यासे को जैसे गांव का कुंआ याद आता है
लुटे व्यापारी को याद आयेगी ईश्वर की फिंकी, फाड़ी तस्वीर
जब सारे मेले चुक लेंगे जब रात अंधेरी काली गाढ़ी होगी
आऊंगी तुम्हारी यादों में खोयी टिमटिमाती एक लक़ीर।
अन्तर की चाहना
खिंच लो खिंच आऊंगी, भूला दो भुल जाऊंगी
सब कहीं हूं सुबह की ओस भोर का सपना हूं
अन्तर की चाहना में पुकारोगे मिलूंगी हर पल
रोकर गुज़ारोगे हैरान देखूंगी, हसूंगी, उड़ जाऊंगी।
मेरा ठिकाना
नाम मत पूछना, नाम में कभी बंधी नहीं
काम मत पूछना, काम नहीं समझोगे कभी
पढ़ सको तो मेरी आंखें पढ़ना वही नाम है
मेरा आंगन मेरी दुनिया सारे ठिकाने वहीं हैं
जहां दिखती वहां होती नहीं जहां हूं वहां मुझे
सुनने संवारने पहचानने कभी तुम आये कहां।
(निरुपमा दी के लिए..)
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी
मैत्रेयी गार्गी की कलम से..
सेवा में,
संपादक मंडल,
पतनशील साहित्य
केंद्रीय कार्यालय, धनखार
नमस्ते, लाल सलाम एटसेट्रा! पंकजजी आजू-बाजू बैठें हों तो कृपया उन्हें मेरा हैलो कहिये (अभी तक पतनशील में ही हैं न? नहीं, सोच रही थी मंदी के इस दौर में क्या मालूम कहीं पतनशील मैनेजमेंट ने उन्हें भी.. ? या पतन से थककर पंकजजी ने स्वयं विचार-स्थान बदल लिया हो? लेकिन उनकी उम्र में पहुंचकर फिर कहां आदमी इतनी फेरबदल के लायक बचता है!) ! एनीवे, मैं अपने ख़त के असल पॉयंट पर आती हूं. आज सुबह दफ़्तर पहुंचते ही चैट पर खंडितजी से एक निहायत सीरियस इश्यू पर आर्ग्यू कर रही थी (द करेंट पोलित ब्यूरो डिबेट इन द एनसीपी हम सबके लिए ग्रेट सबक है, एंड आई थिंक वी ऑल शुड लर्न फ़्रॉम ईट!) कि फ़ोन पर पवनजी घन्न-घन्न करने लगे, मैंने सोचा वही युज़ूअल चिट-चैट होगा एंड आई इग्नोर्ड ईट, वैसे भी आई हैव लॉस्ट इन्टरेस्ट इन पवनजी, ही हार्डली हैज़ एनीथिंग वर्थवाइल टू से फॉर लास्ट सो मेनी ईयर्स, सो आई वॉज़ हैविंग दिज़ इंटरेस्टिंग आर्ग्यूमेंट विद खंडितजी, बट दैट ईडियट- पवनजी- फ़ोन की घंटी बजाये रहा तो हारकर मैंने आनसर किया कि आई नो यू हैव बीन टू काबुल, व्हॉट एल्स यू वॉंट टू टेल मी? ऑफ़्टर ए लॉंग पॉज़ ईडियट ने पूछा इफ आई हैव सीन द करेंट नंबर ऑफं पतनशील, और जैसाकि है मेरे साथ मैंने कैज़ुअली आनसर किया कि नो, आई हैव नॉट, आई डोंट रीड पतनशील एंड देयर काइंड ऑफ़ लिटरेचर, आई नेवर हैव, एंड यू नो ऑल दिज़, माई लव, टेल मी व्हाट इज़ इट दैट यू आर बॉदरिंग मी फॉर?
फिर जाकर पवनजी से मुझे पतनशील में छप रही डायरी श्रृंखला व निरुपमाजी (या अनुपमाजी? आई एम ऑल्वेज़ कंन्फ़्यूज़्ड बाई हर नेम, बट व्हॉई बॉदर इन द फ़र्स्ट प्लेस? सारे जीवन बुर्ज़ूआ साहित्य के सिवा निरुपमाजी (या अनुपमाजी?) ने लिखा क्या है?) के शबाना व आलोकिनी दी के गोपन जीवनभेदों को सार्वजनिक तौर पर गंदा करने के कांड की ख़बर हुई, और मैं सच कहूं आपलोगों से (प्लीज़, डोंट फॉरगेट टू से माई हैलो टू पंकजजी! वी हैव हैड सच अ नाइस टाईम टुगेदर इन माइसोर इन लेट सेवेंटीज़, ओह, व्हॉट अ ग्लोरियस रोमैंटिक टाईम इट वॉज़!) मैं सन्न हो गयी. नॉट फॉर व्हाटेवर क्रैप दैट निरुपमाजी वॉज सेइंग, ऑर इंटेंटेड, बट कि पतनशील ऐसी सामग्री अपने यहां छाप रही है?
पतनशील में वाईडर सोशल इश्यूज़ और वीमेंस कन्सर्न पर डिसकशन की एक लंबी परंपरा रही है, हाऊ कुड यू गाइस डेवियेट फ़्रॉम सच अ ग्लोरियस ट्रेडिशन? निरुपमाजी (या अनुपमाजी?) जानती क्या हैं शबाना या आलोकिनी दी के बारे में? शी हैड द बॉल्स टू क्वोट फ़्रॉम वियेना मेनिफैस्टो, एंड ड्रैग पुवर मार्ता टू पुल ऑफ़ हर पैथेटिक आर्ग्यूमेंट? जिसका सिर-पैर वैसे भी आजतक किसी को समझ नहीं आया? वॉज़ शी क्रूनिंग इन फेवर ऑफ़ लेस्बियन्स ऑर व्हॉट? मुझे आज भी यह बात पज़ल करती है कि हैदराबाद में लड़कियों ने निरुपमाजी की (वैचारिक नहीं) फिजिकल मरम्मत क्यों नहीं की! प्लीज़, मार्ता साबातिनी पर एक लम्बा लेख पतनशील में छपे अब इसका स्ट्रॉंग रीज़न बनता है, इन दिनों एंड फैब में गौहाटी कॉन्फ़रेंस को लेकर मैं बहुत व्यस्त हूं, बट डोंट वरी, मैं समय निकालूंगी! बट अगेन, दिस होल इश्यू ऑफ़ शबाना एंड आलोकिनी दी आल्सो नीड्स ए वैलिड, क्लियरर, लॉंगर क्लैरिफिकेशन, पतनशील ने चिंतनशील महिलाओं के खेमे को बेवज़ह एक उलझन के गड्ढे में लाकर छोड़ दिया है, और अब यह आपलोगों की रेस्पॉंसिबिलिटी बनती है कि इस टंटे से उज्ज्वल, उद्यमशील महिला बहिनों को बाहर निकालें? कांट यू गाइस टेक माई ओल्ड राइटिंग ऑन बुर्ज़ूआ डिजेनेरेशन एंड मेक यूअर नोट्स एंड इमिडियेटली पब्लिश इट इन पतनशील?
मैं परसों रोमानिया के लिए निकल रही हूं जहां सिख साहित्य के डेवोशनल एसपेक्ट पर मुझे एक बत्तीस पेज़ का पेपर पढ़ना है, जिसका अभी रफ़ ड्राफ्ट तक तैयार नहीं है, फिर देयर इज़ अ कोर्ट हियरिंग अबाउट माई इनवैलिड डाइवोर्स इन द लेट आफ़्टरनून (मी एंड मिलिंदजी आर टुगेदर अगेन, आपलोगों तक हैपी न्यूज़ पहुंची या नहीं? डोंट वरी, पता नहीं था तो अब चल गया! वन ऑफ़ दिज़ डेज़ आई एम गोइंग टू थ्रो अ बिग पार्टी टू सेलिब्रेट अवर ओल्ड लव!).
यूअर्स ट्रूली,
(लेखिका स्वयं को द ट्रू आइडोलॉजिकल इनहैरिटर ऑफ़ आलोकिनी दी बताती हैं, ’दैनिक दुर्दिन’ और ‘माछेर झोल’ में इनके सुलगते लेख बिला नागा पढ़े जा सकते हैं).
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी, हिंदी
ए मैसमैराइज़िंग रिवीलेशन बाई फ़ाम तेरिब्ब्ल ऑफ़ नुवेल लेतरातूर दे हिंदी..
कल लालमदन ने सवाल किया और मैं तब से विस्मृत हूं, चमत्कृत हूं, इन फैक्ट भयाक्रांत हूं, क्योंकि अचानक लगता है एक छोटी बच्ची को (? छोटी? बच्ची? अधेड़ावस्था को पीछे छोड़ने के इतने वर्षों बाद अब भी स्वयं को छोटी बच्ची पुकारने की भोली ज़िद क्या एक व्यर्थिल, बेमतलब का दुराचार नहीं? ओह, ऐसे व्यर्थ के केंचुलों से किस दिन मैं पूर्णरूपेण स्वतंत्र हो सकूंगी? किंतु इस देश में स्त्री का पूर्णरूपेण स्वतंत्र होना कभी संभव होगा? शबाना और आलोकिनी दीदी के जीवन को व्यर्थ विगलित होते मैंने स्वयं अपनी आंखों नहीं देखा? सारा जीवन ये ज्ञान विदुषियां इस मुग़ालते में रहीं कि वे अपने समय, व समाज से स्वतंत्र हैं, और फिर उनका कैसा दुर्दांत, कष्टकारी अंत हुआ? आत्मा के तल से निकलते उन दर्दसने, मर्मभरे चीखों को मैं कभी भूल सकूंगी?
ओह, ईश्वर न करे दुश्मनों का भी ऐसा अंत हो! सोचकर राहत होती है कि मैं ऐसी निर्बंध, आज़ाद नहीं, राजीव मेरी पीठ पीछे खड़े रहते हैं कि कभी गिरती मिलूं तो वह संभाल लें! ओह, कितना शुक्रगुज़ार हूं मैं राजीव का, मेरे जीवन में राजीव का संबल न होता तो कैसे अंधेरों में भटक रही होती मैं? लेकिन यह कहना तर्कसंगत होगा कि अब नहीं भटक रही? स्त्री के सवाल, उसपर केंद्रित समूचे साहित्य की दिशा में एक भोला भटकाव नहीं? पिछली बार ममताजी से मिलने पर उनके आगे भी मैंने यही बात रखी थी कि रवींद्रों के अभाव में हम अपनी विभुतियों को कहां दिशा दे सकते हैं, कैसे दे सकते हैं? ममताजी वॉज़ सो इम्प्रेस्ड बाई माई ऑब्ज़र्वेशन, शी इमिडियेटली आस्क्ड व्हॉई डोंट आई स्टार्ट राइटिंग इन इंग्लिश? इट विल गेट मी ए वाइडर ऑडियेंस एंड सोसायटी के साथ एक ज़्यादा मीनिंगफुल संवाद संभव होगा? मैंने स्माइल करके कहा था लेट मी थिंक ओवर इट, बट थैंक्स इन लोड्स, एनीवेज़, ममताजी, फॉर यूअर कन्सर्न! कितना खुश थी मैं उस शाम- कि ममताजी का मुझमें इतना फ़ेथ है, एंड शी सो स्पॉनटेनियसली अलाउड मी टू बीकम पॉर्ट ऑफ़ हर इनर कॉटरी! लेकिन इस उम्र में अब अंग्रेजी में शुरू करना, आई रियली डोंट नो? नल्ली हैज़ फिनिश्ड हाई स्कूल, एंड देन, आई एम ऑल्वेज़ रनिंग आफ़्टर राजीव, एंड ही इज़ ऑल्वेज़ सो बिज़ी दैट वी हार्डली हैव एनी प्रॉपर टाईम टुगेदर, ऐसे माहौल में मैं खाक़ एनिथिंग वर्थवाइल अंग्रेजी में शुरू कर सकूंगी! समटाइम्स आई फील सो वर्थलेस एंड वेस्टेड, विल आई एवर हैव एनी प्रॉपर ग्रिप ऑन माई लाइफ़? हैव एनी वर्थवाइल राइटिंग? राजीव, विल यू टेक मी आउट ऑफ़ दिस मेस, माई लव? प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़?)..
कांट फैदम हाऊ कैन आई गेट डिस्ट्रैक्टेड सो इज़ीली? लालमदनजी से शुरू करके देखो, मैं बनारस, बीकानेर कहां-कहां निकल गयी! सच्ची में एक छोटी बच्ची ही तो हूं व्हाटेवर अदर्स कॉल मी, ऑर प्रेज़्यूम! बट आई रियली फेल्ट सो वल्नरेबल इन फ्रंट ऑफ़ लालमोहनजी’ज़ क्वेश्चन. यही लगता रहा मानो किसी छोटी बच्ची, ओके, आई विल स्टॉप बिहेविंग लाइक अ लिटिल गर्ल (बट आंट आई वन?), या होम साइंस की स्टूडेंट के हाथ आईआईएम का परचा थमाकर कहा जाये कि चल, जवाब दे! कहां से क्या जवाब देगी बेचारी, लालमदनजी? आप ही क्यों नहीं जवाब देते किसके लिए लिखते हैं? बट लालमदनजी इज़ वन रियल स्मार्ट एलेक, फट बोलेंगे मैं ‘लोकतंत्र के फूल’ के लिए लिखता हूं, या ‘मशाल’ के लिए लिखता हूं, दैन देयर इज़ हिज़ ‘चिंगारी’ ऑल्सो! लालमदनजी की फिक्स्ड ऑडियेंस है, फिक्स्ड इश्यूज़ हैं, बट व्हेयर डू आई स्टैंड? नवम्बर हैदराबाद कॉन्फ़रेंस में भी आई फ़ेल्ट लाइक अ फ़ूल, साऊथ की लड़कियां वर सो आर्टिकुलेट अबाउट व्हाटेवर दे वर अप टू, लेकिन माइक पर मेरे बोलने का जब मौका आया, मैंने कांपते-कांपते मार्ता साबातिनी की वियेना मेनिफेस्टो का फ़र्स्ट पैरा क्वोट किया, एंड द सदर्न बिचेज़ स्टार्टेड टू मेक सच अ ह्यूज रैकेट, दैट आई कांट टेल, एंड दिज़ इज़ नॉट द प्लेस, ऑर ऑकेज़न.. और राजीव, मैंने तुमसे कहा था बी देयर इन हैदराबाद, आई विल नीड यू, लेकिन तुम कहां थे? तुम पीपुल्स गैदरिंग के लिए हवाना गये थे! और मैं शर्म के पिट में गिरी जार-जार कितना तो रोती रही थी! व्हॉट अ फेलियर माई लाइफ, एंड राइटिंग हैव बीन!
किसके लिए लिखती हूं? टू टेल ऑनेस्टली, आई डोंट हैव अ क्ल्यू. शायद ‘यथासंभव’ और ‘नया सूर्योदय’ के लिए? लिखती हूं?..
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी, हिंदी
29 दिसम्बर, 2008, प्रयाग.
लिख ली. अंतत:. अबतक की अपनी सबसे लम्बतम (किम्बा ‘लम्बीतम’?) कविता! ओह. सोचकर चकित हूं. विगत कई दिन हुए सोचकर चकित होता था इच्छाशक्ति के चरम मंजाव पर भी यह संभव न होगा. न लिखी जा सकेगी. लेकिन लिखते-लिखते अंततोगत्वा लिख ही ली गयी. कैसा तो विरल अनुरागी रागात्मक रचनात्मक क्षण! अर्से बाद ऐसा हुआ. कि गहरे अंतर्द्वंद्व के तनावबद्ध शब्द ऐसे सरस शब्दबंध में सहजभाव निसृत हुए, होते गये. मन में लगता है मानो दस झरने बह रहे हों. अंत:प्रातंर में माधुर्य-सुरभि का कोई दिव्यप्रकाश दिप्-दिप् जल रहा हो! इच्छा हुई पृष्ठ में डोलती स्त्री के गंदले नयन पट स्नेहरत्न उन्नत अपने चुंबनपुष्पों से ढंक दूं! जानता हूं कविताविमुख स्त्री उसकी अधिकारिणी नहीं, किंतु मनमादल पर तीव्र श्रृंगारदल दोल-वादन कर रहे हैं, उनका क्या? ओह, क्या जल्दी ही मैं अपने समय का मेघदूत लिख रहा होऊंगा? उत्साह का इतना अतिरेक संभवत: न्यायसंगत नहीं. अपने समय का लिखूं इसके पहले उचित नहीं कि कालिदास के समय का पढ़ लूं पहले? किंतु मेघदूत पढ़ना क्या सचमुच ज़रूरी होगा?
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समझ नहीं पा रहा अपनी लम्बतम (या ‘लम्बीतम’?) ‘नया साहित्य’ को प्रेषित करूं कि ‘नया सूर्योदय’? दोनों ही ग्लानिपूर्ण म्लान साहित्येतर राजनीतिक विवादों का केंद्र. मेरी कविता के प्रति वहां न्याय हो सकेगा? सोचता हूं मित्र सत्यव्रत नारू की राय लूं, फिर पुन: यह भी सोचता हूं मित्र सत्यव्रत नारू की राय क्या होगी. कहेंगे अभी कविता हुई नहीं, शिल्प में इसे और बांधो, मांजो. याकि कविता पर विष्णु खरे, किम्बा कुंवर नारायण के प्रभाव की छायायें हैं! नहीं, तत्क्षण मित्र सत्यव्रत नारू की राय लेने की इच्छा राय लेने के पहले ही मृत्युप्राप्त होती है. कविता को खत्म हुए तीन घंटे हो चुके हैं और वह कहां भेजी जायेगी का प्रश्न अभी भी अनिश्चित है की बात सोचते हुए मन में भय के काले, घनेरे बादल फैल रहे हैं!
05 जनवरी, 2009, इलाहाबाद.
नववर्ष मंगलतम! रचनात्मकता के गहरे रागात्मक चुंबकीय एंद्रीकता की नम अंतरंग आत्मीय क्षणों के अनंतर बहुत दिनों बाद घर से बाहर निकलना संभव हुआ. ओह, समाजानुराग के कैसे ताज़ा हवा के झोंके. कभी-कभी? पुष्पवंदन व ताजवंतजी से मुलाक़ात हुई. पुष्पवंदन भी इन दिनों लम्बी कविताओं को लेकर पिले पड़े हैं, मैंने किंचित प्रभावोत्कारी मद में लरजते इशारा किया ‘निशांत’ का नया अंक आने दो, गुरुवर, फिर अपन लम्बी कविताओं पर चर्चा करेंगे! पुष्पवंदन का चेहरा फक्क. मैं इलायची की चाय की चुस्कियों में महकता, लम्बवत लताओं सा लहकता रहा..
ताजवंतजी भारी ज्ञानी पुरुष. उनके आगे मुंह खोलते भय होता है. किंतु पुरानी आदत है मुंह खोले बिना रहा भी नहीं जाता. इन दिनों ताजवंतजी आदि-तमिल साहित्य की भक्ति में गहरे डूबे हुए. मैंने किंचित आश्चर्य दर्शाते कहा, बाबा, साहित्य में इतना पीछे लौटकर चीज़ों को देखना क्या उचित है? वह भी तमिल साहित्य? क्या साहित्यिक कार्यव्यापार भविष्य इंगन-दिर्ग्दर्शन नहीं? ताजवंतजी भड़क गये, मैंने कहा शांत हों, गदाधारी गुरुवर! संक्षिप्त-सी मुलाकात में मन खिन्न हो गया. कैसे-कैसे क्षुद्रमना, खिन्नधनी लोगों से अपना साहित्य भरा पड़ा है? अपना ही क्यों, संभवत: तमिल साहित्य भी इन्हीं गंदगियों में लिप्त हो? जेब में अपनी लम्बतम (या ‘लम्बीतम’?) कविता लिये गया था लेकिन ताजवंतजी के संकुचित लघुकाय संकीर्ण संसार में उसे प्रकाशित करने की इच्छा पर मानो वज्राघात हुआ. कविता जेब में ही रही. मन में मौनवीणा का मौनरागम बजता रहा.
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इंदु ने पत्र लिखकर जानना चाहा है क्या बिंदु से भी मेरे वैसे ही गहरे, आत्मीय, रागात्मक संबंध हैं जैसे चंद महीनों पूर्व इंदु के प्रति होने की मैंने सघन घोषणाएं की थीं? (वैसे मेरे लिए खबर है, कब की थी, भई? ओह, यह क्लांतकन्यायें कैसे-कैसे तो कल्पना प्रांजल विहानों में विहगती रहती हैं, यथार्थतल पर लायी जाते ही कैसे तो अलबल बकने लगती हैं?) इंदु को तत्काल पत्र लिखकर सूचित किया, प्रिये इंदु, तुम मेरे जीवन का पूर्वप्रांतर हो, हमेशा रहोगी. जबकि बिंदु का कहां कोई प्रांत है, वह तो सदा-सदा की देशनिकाला है, नहीं है? (किंतु क्या किसी देशनिकाला को स्नेह-शरणागत होने का हक़ नहीं? यह मैंने इंदु से नहीं, बिंदु को अलग पत्र लिखकर स्नेह-सूचित किया..
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी, हिंदी
कुछ दिन हुए लिख नहीं पा रहा. ख़ैर, फिर कुछ दिन होंगे लिख पाने लगूंगा. सभी बड़े लेखकों के साथ होता है. वह क्या तो पुर्तगाली या पता नहीं कहां का लेखक था नोबेल पाते-पाते रह गया था, लेकिन हाथ का ठहरा-ठहरा कलम उनासी वर्षों तक चलता रहा. उसके बाद उसकी मौत हो गयी तो लाजिमी है लिखना अटक गया. उस पुर्तगाली या जहां कहीं का भी वह नामवर लेखक था ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे. मेरी आत्मा को भी दे क्योंकि रहते-रहते सोचकर कब्जवाली चढ़ी-चढ़ी-सी खासी झुंझलाहट होने लगती है कि क्या वजह है लिख क्यों नहीं पा रहा. मकान-मालिक ने घर खाली करने का नोटिस नहीं दिया न जिस मकान में साले साहब ने हमारी पूंजी लगायी हुई है (साठ परसेंट हमारा है, तैंतीस साले जी का, बाकी के सात परसेंट पूजनीय सास- अबे, कहां की पूजनीय, हरामखोर खड़ूस बुढ़िया कहीं की!- के) उसके बिल्डर के पैसों के साथ फरार होने के अंदेशे हैं, फिर जगजीवन प्रकाशन की संवेदनप्रभा मालकिन ऊषाजी अबभी मेरे मेंहदी रंगे बालों पर इसरार से इत्र छिड़कती हैं, और मेरे किसी जिगरी यार ने अभी तक तो मेरी किसी लंबी कहानी का प्लॉट उड़ाकर ‘संभव’ या ‘यथासंभव’ में अपने नाम से छपवाया नहीं है. फिर क्या वजह है कि मैं लिख नहीं पा रहा?
क्या मेरे अंतर की ईर्ष्या है जो मुझे लिखने से रोक रही है? बलराज की कहानियों का सुनते हैं हंगरी के किसी गुमनाम से प्रकाशन में अनुवाद छप रहा है, या बलविंदर की ताज़ा कवितायें एक अवांगार्द मणिपुरी एंथॅलॉजी में आ रही हैं, क्या बिरादरी में हमपेशा साथियों को यह अचानक मिल रही सफलता मेरे रूद्ध लेखन व अवसाद का मूल है? क्या मैं उम्र के वसंतों को पीछे छोड़ने के साथ इस कदर छिछला, आत्मकेंद्रित होता जा रहा हूं? क्या मैं किसी भी दिन यह भूल सकता हूं कि बलराज (और किन्हीं सीमित अर्थों में बलविंदर भी) मेरी बदनामियों व बदगमनों में मेरा सबसे करीबी यार रहा है? सब्जीमंडी वाले मकान और चोरकलान गली वाली घटिया नौकरी के बावजूद मैं आज, अभी तक अगर लेखक बना हुआ हूं तो उसके पीछे एक और सिर्फ़ एक शख़्स जिम्मेदार है, मेरा अपना बलराज (और किन्हीं सीमित अर्थों में बलविंदर) ?
यह सच है कि मेरी मशहूर लंबी कविता ‘ओ मेरी नाक़ामियां तू छोड़ आना मुझे उस गांव जिसके नमक का स्वाद जानने से मेरा अजन्मा बच्चा रह गया’ का अनुवाद गुजराती में तब हुआ था जब बलराज को लोग हंगरी क्या हरियाणा तक में नहीं जानते थे (अब भी जानते हैं इसकी काफी आशंका है) ! गुजरात के रास्ते बंबई के उपनगर गोरेगांव पूर्व में भी मेरा एक संक्षिप्त नागरिक अभिनंदन हुआ था, मेरे हाथों तीन सौ रुपयों का एक पोस्ट डेटेड चेक व एक सस्ते शॉल की अर्पणा हुई थी (क्षमा करें, जानता हूं वाजिब शब्द नहीं लिख रहा, लेकिन अर्पणा से अलग फिलहाल कोई अन्य शब्द सूझ नहीं रहा. अर्पणा तक ही लिख पा रहा हूं यह अपने में महत्तम अचीवमेंट नहीं?). गुजरात की उस ऐतिहासिक यात्रा से वापस शहर लौटकर खबर हुई कि मेरी गैरहाज़िरी में बलराज ने यहां-वहां, कहां-कहां मेरे कवि-कल्पना, काव्य-रचना व मार्मिक साहित्यउत्सों का गंदा मज़ाक बनाकर रखा हुआ है, मेरे व मेरे साहित्य के खिलाफ़ कैसी बेहूदी गॉसिप-मॉंगरिंग करता रहा है (और सिर्फ़ बलराज ही नहीं, किन्हीं सीमित अर्थों में बलविंदर भी!). हम काफी महीनों तक एक-दूसरे के संपर्क में आने से बचते रहे. वस्तुत: बचता बलराज ही रहा था, मेरे मोर्चे पर महज ख़ामोशी थी. क्योंकि इस समूचे आततायी, आतंककारी, एंटी-लिटरेरी प्रसंग का मुझपर ऐसा गहरा सदमा पहुंचा था कि महीनों न मैं ऊषाजी के प्रति मन में कोई विशेष मनोभाव अथवा प्रेम जेनरेट कर सका, न किसी भी तरह का साहित्य उत्पादित कर सकने में समर्थ हुआ. शोक व सन्नता के वे गहरे, भीषण दिन थे..
लेकिन यह सब बहुत पहले की बातें हैं. इधर कुछ दिन हुए मैं लिख नहीं पा रहा, क्यों नहीं लिख पा रहा हूं? राजस्थान की एक मशहूर कवियत्री(?) कह गयी हैं (या कवियत्री गुजरात की हैं, कोई साहित्यिक षोडशी कृपया इस पर शोध करेगी?): “संतों, मारो कलम हेराणो हो, संतो, मेरो कलम हेराणो ।” मेरा तो कलम भी नहीं खोया, हमेशा का पेंसिलधारी ठहरा, फिर क्यों नहीं लिख पा रहा? संतो, कुछ बको भाई?..
बंटवार: पतनशील साहित्य, लेखकों की चुरायी डायरी, हिंदी

