Friday, April 17, 2009

इट्स नॉट रियली दैट इज़ी..

बहुत समय से पास पड़ी थी इतने वक़्त बाद अब जाकर तीसेक पन्‍नों से गुज़रा हूं और गुज़रते हुए सन्‍न हो रहा हूं कि अच्‍छी स्‍कॉलरशिप भी क्‍या कैसा सेंसुअस संधान है! आखिर सचमुच क्‍या खाकर, और क्‍या पीते हुए जेकॅब बरखार्ट ने किताब- ‘द सिविलज़ेशन ऑफ़ रेनेसां इन इटली- लिखी होगी? ओह, अच्‍छा सिरजनहार होने की क्‍या कलाकारी ऊंचाइयां हैं? क्‍या रॉबर्ट ऑल्‍टमैन इस भेद को जानते थे, और इस भेद को जेब में लिये-लिये फ़ि‍ल्‍में बनाते थे? या हमसे दलिद्दर कलाकौतुककार चम्‍मच-कांटा लिये ऑल्‍टमैन के छप्‍पनभोगी दावत में पहुंचकर इस कलाकारी रहस्‍यवाद का साक्षात करके हांफने लगते थे? आखिर कैसे संभव है कि ‘मैश’, ‘मैकेबे एंड मिसेज़ मिलर’, ‘3 वीमेन’, ‘पोपाइ’, ‘विंसेंट एंड थियो’, ‘द प्‍लेयर’, ‘शॉर्ट कट्स’ जैसी विविध, बहुआयामी, परतदार, पेंचदार फ़ि‍ल्‍में एक ही फ़ि‍ल्‍मकार ने बनायी हो? और ‘नैशविल’? नब्‍बे की शुरुआत में कभी देखी थी और कल रात फिर देखते हुए ऑल्‍टमैन को सुन रहा था- ‘आई एम इज़ी’, ओह, आर यू? ओह, व्‍हॉट अ स्‍टंट? व्‍हॉट व्‍हॉट व्‍हॉट एन आर्टिस्टिक फीट! ब्रावो, आल्‍टमैन. एंड ग्रात्‍ज़्ये सिन्‍योर बरखार्ट!

Tuesday, April 14, 2009

मिक्‍स्‍ड सिंगल्‍स..

पता नहीं कैसी भूख होती है मन में क्‍या हाहाकार होता है कि चढ़ता है एकदम बुखार, निकालकर खंगालने लगते हैं पुराने काग़ज़ किताब के बंडल, हड़बड़ाये फ़ोन पर पूछते हैं वह कौन तो किताब थी क्‍या जिरह थी, भाई? मित्र अचकचाया जवाब देता है वह सैलून में दाढ़ी बनवा रहा है, या बैंक से निकलकर गैराज जा रहा है, क्षमा चाहता है समझ नहीं पा रहा किस सिलसिले में किस जिरह की बात हो रही है, हाय-हाय में झुंझलाया मन इस सड़क और उस गली में खोजता गुम होता है जिसे पाकर जाने कैसे तो धूप की आग कम जायेगी कि मन की गुत्थियां नयी गांठों में अझुरायेगी, फिर अम्‍मां को कहने का मौका बनेगा कि मां सिर मत खाओ अभी, देख रही हो कैसे कहां अटका अड़ा हूं, धनबाद भइय्या सम्‍भाल लेंगे और चाचा की बीमारी को लेकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं, और मैं डॉक्‍टर के पास गया था वो वही कहते हैं कि समय से सोया करो वक़्त पर खाया, कौन नयी बात बतायी, लेकिन तुम चिन्‍ता मत करो, मां, इन दिनों सब ठीक है, और ईश्‍वर की दया रही तो रंजु भी बच्‍चों को लेकर घर लौट आयेगी, पिछली मर्तबा बात हुई थी तो हंसते हुए कह रही थी ताज्‍जुब नहीं करता कि वह अबतक पागल नहीं हुई? सचमुच तुम्‍हारी बहू बच्‍ची है मां, लेकिन मालूम नहीं दोस्‍त, बैंक के झमेलों का क्‍या किया जाये, जब से नौकरी गई है हरामियों ने नाक में दम कर दिया है, सोचता हूं सबकुछ छोड़कर कुछ दिनों के लिए पहाड़ भाग जाऊं, या कोई तो और वाजिब जगह कि कितने सारे सवाल हैं मन में कि कुछ थोड़ा तो समझ लेना चाहता हूं, कि झोले में कुछ कपड़े डाल चढ़ भी गया था रात की रेल में, फिर काफी समय अन्‍यमनस्‍क गुज़रा होगा एक भलेमानस दीखे, पूछा उनसे भाईसाहब जानते हैं यह रेल किधर जाती है? कुछ शर्माये भले आदमी ने जवाब दिया जानते होते तो रेल में क्‍यों होते, मैं बहुत अचकचाया पर तब कितनी तो देर हो चुकी थी, और सवाल चुकते कहां हैं रंजु, लेकिन हम कभी साथ बैठकर ठीक-ठीक से बात करेंगे और एक दिन सब अच्‍छा हो जायेगा, लू शुन और चेख़ोव की रचनाओं में न होता हो तो भी क्‍या, मैं तुमसे वादा करता हूं, हां!

(ऊपर लू शुन का एक वुडकट)

Monday, April 13, 2009

द इंटिमेट एनेमी..

पतली सी किताब है. कुल एक सौ तेरह पृष्‍ठ. द इंटिमेट एनेमी. साथ में एक सब-हेडिंग है लॉस एंड रिकवरी ऑफ़ सेल्‍फ अंडर कलोनियलिज़्म. तो यह पतली बुनावट दो निबन्‍धों में विभाजित है, सतही और स्‍थूल रूप में कहें तो पहला निबन्‍ध उस ‘खोये व्‍यक्तित्‍व’ की फांसों में उतरता है, दूसरा निबन्‍ध उसकी पुनर्प्राप्ति को रेखांकित करता है. पंद्रहेक साल हुए होंगे जब पहली मर्तबा किसी मित्र के सुझाव पर किताब पढ़ी थी, तब पढ़कर क्‍या महसूस हुआ था इसकी कोई स्‍मृति भी नहीं (यह आदमी की चिरकुटई का साक्षात प्रमाण है- कम से कम मेरी चिरकुटई का तो है ही- कि किसी को बीस वर्ष पहले तीन सौ रुपये दिये थे या कॉलेज से भगाकर किस लड़की को कम्‍पनी बाग सिनेमा दिखलाने ले गए थे वह याद रहता है किताब की गहराइयां भूल जाती हैं!). कुछ महीने हुए अभय बाबू उससे गुज़रते दिखे तो हमें फिर एक बार पुराने का ध्‍यान आया, हमने कहा निपटा लो तो एक नज़र हम भी मारते हैं. और ठीक-ठाक अंतराल के बाद नज़र मारना जब शुरू किया है तो बड़ी तेज़ी से एक पन्‍ने से दूसरे में जाते हुए अशीष नंदी की वृहत्‍तर सामाजिक, बौद्धिक कल्‍चरल कंपास, उसमें गुंफित महीन रेशों की सूक्ष्‍म, मार्मिक विवेचनाओं से लगातार दंग होता चल रहा हूं. जिस टैक्‍ट और अंडरस्‍टैंडिंग से नंदी 1830 के पहले व उसके अनंतर अंग्रेज औपनिवेशिक मानसिकता का चित्रण करते हैं, माइकल मधूसुदन दत्‍त, राममोहन राय, दयानंद सरस्‍वती, विवेकानन्‍द, ईश्‍वरचंद्र विद्यासागर, किपलिंग, ऑरवेल, ऑस्‍कर वाइल्‍ड के जीवन, कृतित्‍व और वैचारिक यात्राओं की पड़ताल करते हैं, मैस्‍कुलिन दंभ से भरे अंग्रेज शासन के प्रतिकार में गांधी के ‘नारीगत’ औज़ारों की ताकत के भारी असरकारी नतीजों की व्‍याख्‍या करते हैं, सभी में गागर में सागर वाले इंटेलेक्‍चुअल रिगर के मोहक विचारस्‍केप्‍स हैं!

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस ने 1983 में किताब छापी थी, पेपरबैक 1988 में आया, और 2008 तक चौबीस इम्‍प्रेशंस छप चुके हैं, ज़ाहिर है अभी भी लोग लगातार उस किताब को खोज और खरीद रहे हैं. इसी के साथ एक बार फिर इसका दु:खद अहसास भी होता है कि शोभा दे को खोज-खोजकर छापनेवाले हिंदी प्रकाशकों को द इंटिमेट एनेमी जैसे किताबरत्‍न को छापने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई (होती या होगी?).

वर्डप्रैस पर किताब की एक बेसिक समीक्षा है दिलचस्‍पी रखनेवाले अगर एक नज़र मारना चाहें..

Thursday, April 9, 2009

गुलफाम किधर मारे गये.. उर्फ पंचलैट

ज़ि‍न्‍दगी की भागमभाग में कब मौका मिलता है कि तसल्‍ली से बैठकर उन सवालों का जवाब पा लें जिनकी रौशनी में फिर आत्‍मा का पेट्रोमैक्‍स दप्-दप् जगमगाता जले! कहीं बड़ी फौजदारी हो गई हो या ग़बन के गंभीर मामले ने सांस लेना दूभर किया हो सो भी नहीं, लघुकाया मायाओं की हाय-हाय में कुओं में गिरते-ऊपरियाते रहते हैं. सासजी सीढ़ि‍यों पर गिर गईं, पत्‍नी के पैर में फोड़ी निकल आयी है, बेटी की गणित की किताब के कोने चूहे ने कुतर डाले हैं.. कभी-कभी घबराहट में मन प्रश्‍न करता है यही है जीवन? इतना सा? इन्‍हीं के पीछे भागते-भागते पीठ पर आकर कोई ‘इति’ का साईन साट जायेगा? जीवन के अड़तीस साल इसी तरह इस मकान से उस इमारत, रिक्‍शे से निकलकर रेल से उतरकर बस और यहां सीढ़ि‍यां चढ़ उस दरवाज़े की घंटी बजाते, अस्‍पताल और कचहरी के पिछवाड़े बाज़ार से मछली खरीदते गुज़र गये, न पत्‍नी का हाथ हाथ में लेकर कहीं सुदूर समुंदर किनारे टहल की, न कभी किसी दोस्‍त को छाती से भींचकर यही कहा कि तू चिंता मत कर, यार, मैं तेरे लिए जान दे दूंगा!

नहीं कहा. न कभी पत्‍नी ने ही शिकायत की. चुपचाप मुंह सिये जीवन जीती रही. जैसे उसके हिस्‍से इतना ही जीवन जीना लिखा हो की असल खेल से पहले एक फिल्‍म डिविज़न वाली डॉक्‍यूमेंटरी देखकर तैयार होकर फेरे लिये थे!

कभी सोचता हूं वो कौन लोग हैं जो टैक्सियों में भरी हुई पेटियां लदवाकर एयरपोर्ट जानेवाली सड़कों पर जाते दिखते हैं. किन अजाने-अनोखे गंतव्‍यों पर जाते होंगे, कैसे साफ़-धुले होटलों में देर रात तक जाने क्‍या-क्‍या अच्‍छी बातें करते क्‍या-क्‍या अच्‍छा कुछ खाते दुनिया को कैसी चमकती आंखों देखते होंगे? और फिर चैन की भरपूर नींद के बाद दूसरी सुबह उठते होंगे तो दुनिया कैसी तो सुहानी जगह लगती होगी? तलुए के नीचे हंसुये का हत्‍था दाबे कटहल काटती पत्‍नी के ख़याल से मेरा मन गिर जाता है. मैं चाहता हूं कटहल से जूझने की जगह वह मेरी गीली कल्‍पनाओं की नम फुहार में आकर ज़रा देर को खड़ी भर हो जाये, बस. लेकिन कहिये तो मैं आपको लिखकर दे दूं कि मेरी पत्‍नी ऐसा कभी करेगी ही नहीं! ज्‍यादा से ज्‍यादा चौंककर मुंह गिराये मेरी ओर ऐसे इशारों में देखेगी मानो मैं ऐसी बातें सिर्फ उसे दुखी करने के लिए सोच रहा हूं! मेरे नाराज़ होने पर रसोई के सामने के दो फुट के छोटे बरामदे से भागकर सोनेवाले कमरे में जाकर अंदर से दरवाज़ा भेड़ लेगी, और रात को इस और उस बात के बीच कहे बिना रह नहीं पायेगी कि इसमें उसका क्‍या कसूर कि मेरी किस्‍मत में उस जैसी पत्‍नी लिखी थी!

कौन जानता है शायद पत्‍नी सचमुच सच कहती हो. फाहियान, ह्वेनसांग या अल बेरुनी की तरह शायद कहीं से निकलकर कहीं जाना मेरे नसीब में न लिखा हो? शायद डॉक्‍टर के यहां अपने पेट का रोना लेकर जाने से ध्‍यान बंटाने के लिए मैं फालतू की इन ऊल-जुलूल के ख़यालों में फंसा बैठा होऊं?

अब देखिये, डॉक्‍टर के यहां जाने की बात याद आते ही मन कैसे तो कड़वा हो गया, लेकिन शायद अपनी बारी का इंतज़ार करते वहां थोड़ी सोचने की फुरसत बने? वर्ना ज़ि‍न्‍दगी की भागमभाग में अब सचमुच कब, कहां मौका मिलता है कि तसल्‍ली से बैठकर उन सवालों का जवाब पा लें जिनकी रौशनी में आत्‍मा का पेट्रोमैक्‍स दप्-दप् जलने लगे, नहीं?

Wednesday, April 8, 2009

एक्‍सपेरीमेंटल..

एक्‍स. पेरी. पेरिफ़ेरल? पेरिलीयस? व्‍हाई एक्‍स? एक्‍स व्‍हाई क्‍यों नहीं? इसलिए कि “x” के पीछे “y” को जगह देना पहले के बने-बनाये नियम के सहूलियती खांचे में खड़ा होना होगा? अरे, खांचे के तत्‍वों को आगे-पीछे कर देना क्‍या दूसरे तरीके की सहूलियत नहीं होगी? हो सकती है. शायद. माइट बी. बट देन इट विल बी एक्‍सपेरिमेंटल. स्‍ट्रेंज लॉजिक दॉ. पेरी, नो, वेरी एक्‍स्‍ट्रीम. Xxxtremmme! नाऊ हैप्‍पी? Xappy!

देयर इज़ समथिंग रॉंग समव्‍ह्येर. समथिंग इज़ अमिस. व्‍हॉट, व्‍हॉट, एक्‍स फैक्‍टर? पेरीमच पॉसिबल. वेल, वी ऑल नो एक्‍स इज़ ऑलवेज़ द क्रूशल कनेक्‍शन. दॉ इट माइट बी ‘एक्‍स’ सो व्‍हॉट! निक हार्नबी की ‘हाई फिडेलिटी’ के इतने पता नहीं कितने पेज़ेस (इन फैक्‍ट 323 पेज़ेस) एक्‍सों का हिसाब-किताब समझने की कसरत ही तो है? ओह एक्‍स. देन फिर आह, एक्‍स. वेरी फ़न्‍नी. ऑर, पेरी पनी. पैरी पैणा नहीं. दैट वुड बी गिविंग इन टू टू मच. Xxxtremme in submissiveness. लेट एक्‍सेज़ स्‍टे एज़ एक्‍स. नथिंग लेस, नॉर मोर. इट्स यूअर दिल दैट मांगे मोर, नॉट एक्‍सेज़ हू आर आस्किंग एनीथिंग, आर दे? नो, दे आर नॉट. ओह, पेरीमेंटल! ऑर जस्‍ट मेंटल?

Monday, April 6, 2009

टू इज़ टू मेनी..

जर्मनी का कोई छोटा शहर. छोटे शहर के दो छूटे हुए बेरोज़ग़ार. एक सूखे बांस की तरह उजड़ा-उखड़ा, दूसरा गराज के पिछाड़े जाने किस ज़माने से भूल गये पुराने मॉडल के वॉल्‍क्‍सवागन की तर्ज़ पर तानपूरे का तूंबा. बेबात की हंसते, बेबात माचिस की तीली जलाते, बेबात टॉयलेट के कटोरे के सामने जाकर खड़े हो जाते, बेबात लड़की घूरने लगते; और बेबात की सारी बातें जब चुक जातीं तो हारकर फिर बीयर पीने लगते, और फिर तबतक पीते रहते जबतक सारी बातें बेमतलब न हो जातीं और किसी से बेमतलब झगड़ा करके उसका सिर फोड़ देना या अपनी फुड़वा लेने में कोई फर्क़ न रह जाता.

गली के मोड़ पर फलों का ठेला लगानेवाले बुज़ुर्ग शेवकेत लंबी सांस लेकर बुदबुदाये- बेरोज़गारी आदमी को जहां न पहुंचा दे!

फार्मिंग टूल्‍स की दूकान के काउंटर पर बैठनेवाली मार्ता ज़ुवोलोव्‍स्‍की चिढ़कर बोली- मुफ्त की रोटी तोड़ने की लत लग जानेवाले हाथों से कभी लट्ठे नहीं कटते!

सुबह ग्यारह बजे दबे-दबे सिरदर्द के साथ उठने और फिर उन्‍हीं मुड़े-तुड़े ट्रैकसूट में पचासेक मिनट बाद तोल्‍क के बार पहुंचने के बाद अभी दोपहर तीन बजे तक बांस बीयर की सात बोतलें खाली कर चुका था, मगर अंतर की प्‍यास बुझ नहीं रही थी. तूंबा ने अचानक चौंककर तोल्‍क को इत्ति‍ला किया कि उन्‍हें बीयर पिला-पिलाकर एक दिन वह अमीर हो जायेगा. तोल्‍क ने मुर्दा आवाज़ में जवाब दिया कि आजकल रुमानिया के जिप्सियों को भी बीयर पिलाकर कोई अमीर नहीं हो सकता! काउंटर पर की खाली बोतलें हटाते हुए फिर उसने सोचकर जवाब दिया कि आजकल सिर्फ़ बैंक की नौकरियों में लगे लोग अमीर हो सकते हैं!

बार में तोल्‍क का हाथ बंटानेवाली और ऊब से घबराकर उसे बीच-बीच में अपना शरीर सौंपनेवाली जोवान्‍ना के दिमाग में जाने कहां से खुराफात सूझी कि उसने तूंबे को छेड़ते हुए सवाल किया- तू आजकल कुछ ज़्यादा ही फैल रहा है, कहीं का गड़ा ख़ज़ाना हाथ लगा है, बात क्‍या है, मेरे सनम?

तूंबे ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद लापरवाही से जवाब दिया- लास्‍ट टाईम उधारी की कार से हम शहर के बाहर सैर पर गये थे.. खेतों के किनारे एक लड़की ने मुझे दिल दे दिया था.

- ओह, जोवान्‍ना चौंकने का नाटक करती बोली- उसने तुम्‍हें दिल दे दिया इसलिए तुम मोटे होने लगे?

तूंबे ने अपने भारी देह को अपने भारी पैरों पर प्रतीकात्‍मक रूप से ज़रा इधर-उधर करते हुए अपनी खीझ ज़ाहिर की- तुम्‍हें तो कुछ समझाने की कोशिश करना ही बेकार है! लड़की ने कहा था मुझसे मिलने आयेगी. आयेगी तो स्‍वाभाविक है मेरे यहां मेहमान बनकर रहेगी, मेरा खाना खायेगी! यही वज़ह है कुछ दिनों से मैं दो लोगों का खाना खाकर खर्चे का अंदाज़ लेने की कोशिश कर रहा हूं..

जोवान्‍ना भकुवायी तूंबे का चेहरा तकती रही, तूंबे ने चिढ़कर मुंह फेर लिया- एनीवे, मैंने तय कर लिया है उसे मेरे यहां आने की ज़रूरत नहीं!

तोल्‍क ने हंसते हुए मज़ाक किया- क्‍यों? अपने गद्दे पर लड़की लेटी देखने की अब तबीयत नहीं?

तूंबा ने उदास होकर कहा- नहीं, मैंने हिसाब लगाकर देख लिया है, दो लोगों के खाने का खर्चा उठाने की मेरी हैसियत नहीं.

इतनी देर से मुंह में मक्खन डाले बांस ने इतनी देर बाद मुंह खोला- वेल, सोचने बैठो तो बात समझ आयेगी व्‍हाई देयर आर टाईम्‍स वेन टू इज़ टू मेनी!

इसके बाद बीयर की नयी खेप का ऑर्डर लेकर अंदर गयी जोवान्‍ना ने आईने में अपनी शकल देखी और पता नहीं किसे खारिज करते हुए मुंह बिचका लिया.

(ऊपर अमरीकन पेंटर एडवर्ड हॉपर की पेंटिंग, संडे, 1926)

Thursday, April 2, 2009

बिनासबुद्धि‍ छोहारालाल का बिनासचिंतन!

रहते-रहते मन कहां-कहां तो उड़ा जाता है. अभी हफ़्ता भर भी नहीं हुआ ऐसे लेखकीय उड़ाव-अलावों की हुमसते हुए हमने चर्चा की थी. उसके बाद पतनसील, भविस्‍स व अतीतसील मन और जाने कहां-कहां उड़ आया होगा, नहीं? माने जैसे कल स्‍वभाव की चर्चा की थी, तो स्‍वाभाविक है मन का स्‍वभाव उड़ना है, ससुर उड़ता फिरा ही होगा. मगर चूंकि मन है, और उससे ऊपर हमारा है तो ऐसा कैसे हो कि अपने स्‍वभाव के बंधाव में ही बहता फिरे? दुपहरिया में किसी भरियल पेड़ के नीचे मुंह पर गमछा डाले लेटे आंख मींच ले, और रात के अंधारे तानजीयर्स और इस्‍तांबुल के उजियारे उड़ ले? न, ऐन बखत दग़ा दे जाता है निरमोही, और हम हैं हारे हुए बटोही की तर्ज़ पर खुद को ओपी लय्यर की आवाज़ में गाता पाते हैं- ‘चैन से हमको कभी बेसरम तूने जीने ना दिया!’

रहते-रहते सोचते हैं कि उड़ गया है, फिर थोड़ा बखत गुज़र जाता है और देखते हैं कि कहां उड़ा है, हम सोच रहे थे उड़ा है मगर ई मऊग तो खूंटी से उड़के जाके खिड़किये पर बैठा है! और वो भी पड़ोस का नहीं, खुद ससुर अपने ही खिड़किये पर? हद है. रहते-रहते लेसकर काहे ऐसे करता है? मन? या मानवरतन जहानाबाद के जतन बिकासलाल? माने मां-बाप, आजा-आजी, नन्‍हकू और नगेसर कुछ सोचके न नाम दिये होंगे जी? कि माथा पर बिकासमुकुट पहिरा रहे हैं तो लरिका आगा का तरफ देखेगा, ‘मुर-मुर के ना देख’ वाला अंदाज़ में- मुरकु और तिलकुट खाने की जगह- चिरकुट सवाल नहीं पूछेगा! मगर आजकल आईना तक में भरोसा करना है मुश्‍कि‍ल है, फिर आदमी औलाद में भरोसा करेगा जी? बिकास नाम दे देने से कौनो गारंटी है कि वो बिकासेमान होगा? गड़हा और खदान नहीं? सोचते हैं तो सोचते हुए मन में पता नहीं कहां-कहां का जमा हुआ अवसाद सब उमड़ने लगता है. मन का भाव उमग-उमगकर कहता है हमको लिक्‍खो, हमको लिक्‍खो, लेकिन लिक्‍खेवाला हाथ है कि सरम में दरकने लगता है! सब कसूर बिकास का अबिकासी भाबबोध का है. हमारे तो अंग-अंग में ऐसा रोस फूट रहा है कि लरिका सामने पड़ जाये तो उसका नाम बदलकर बिनासलाल कर दें! नहीं, नहीं, जोकिन में नहीं बोल रहे हैं, जकीन नहीं हो तो आप खुदे देख लीजिये बिनासबुद्धि‍ छोहारालाल का गोर में कुल्‍हारी और हाथ का कलम में कोदाली मारेवाला बिनासचिंतन!

ऐसे माहौल में आपे बताइये आदमी ऑरिजनल लेखन कर सकता हे? डुप्‍लीकेटो?

उंगलीमार

कल टेढ़े-टेढ़े सकल पदारथ सोचता रहा, शायद अच्‍छा नहीं सोचता रहा. कुत्‍ते, बच्‍चे, आदमी की इस फनेल से निकालकर उस बकेट में रसायन फेंटते रहना कुत्‍ते का क्‍या, आदमी का भी भला नहीं करता (फिर बच्‍चे के लिए तो वह आनंदातिरेक भला क्‍या होगा, उसके नाक और आंख में उंगली डालने के बराबर है). आढ़त पर बैठनेवाले को हिंदी प्रकाशक की कुर्सी पर बिठालना और पत्रकार से आरती उतरवाना पतित ही सही, मगर विचार करने की कैसी अगरबत्‍तीशीलता है? और अगर है भी तो उसमें मगर ही मगर हैं, शील उसका बड़ा ही संदिग्‍ध है. कहने का मतलब बुरा है. और बुरा को बुरा कहा ही जाना चाहिये. पूरे मुल्‍क की कहीं और उंगली डली हुई है और मैं आंख और नाक में अच्‍छा न सोच पाने की उंगलियां डालता रहा? जबकि वहां से निकालकर उंग‍ली कहीं और ले जाने की ज़रूरत थी? है! रात की ग़लती सुबह सुधारने की घड़ी आन खड़ी है तो देखिये, अब सूझ नहीं रहा कि इस उंगली ससुर को डालें किधर! माने चुनावी परिदृश्‍य में एकदम बाहुबलियों वाली विचारधन्‍यता वाला मामला हो गया है, नहीं? कि बाबू राजू यादव, या पप्‍पू पराक्रमी पर चुनाव न लड़ पाने की विवशता बन जाये तो मैदान में लाड़ से श्रीमती फुलवारीजी फुलकुमारीजी को उतार लावें. वोटर ससुर अरबराया रहता है ही, घबराकर फूलमंत उंगली बैलॅट बक्‍से में फंसायेगा ही!

देखिये, सुभो-सुभो लतखोरी की लवंगलता अदा, मैं फिर इधर-उधर उंगली घूमा रहा हूं, जहां नहीं ले जाना चाहिये, उसे लिये जा रहा हूं. दिक्‍कत क्‍या है? नहीं, नहीं, सच्‍चो में? और ऐसा भी नहीं है कि मैंने नशा किया है? भांग होली के दिन पी थी, मगर तब भी पेट झरने लगा था नशा कहां चढ़ा था? मेरे साथ यूं भी पुरानी बीमारी है. ओल्‍ड मॉंक की बोतल खोलके बैठो तो मैं विवेकानंद बोलने लगता हूं, और खरबूजे का पौन गिलास रस पीते ही पता नहीं कहां तो बहकने और कैसी-कैसी बकने लगता हूं. व्‍हाई? ऐसी वकृता सीखी कहां से है? उन लड़कियों से जिनके कान में फुसफुसा के कहिये कि हे प्रेयसी, पहाड़कुमारी, तुम्‍हें एक ठो प्रेमपत्र अर्पित करना चाहता हूं तो चमककर पहाड़कुमारी उबलने लगती हैं कि रे हरामख़ोर, तेरी हिम्‍मत कैसे हुई, छिछोरे, हमसे ऐसा भद्दा मज़ाक करने की? तेरा नाक नोंच लूंगी, मुंह में जलती लुकाठी डाल दूंगी एटसेट्रा-एटसेट्रा. आप ऊबकर बोलते हैं कि ठीक है, धन्‍यकुमारी, पड़ी रहो अपने पहाड़ पर, नहीं लिखेंगे प्रेमपत्र. तो हरहराकर फिर नाक और मुंह नोंचने पर उतारू होने लगती हैं कि तेरी मज़ाल कैसे हुई रे हरामी कि हमको उलझाकर अब प्रेम दर्शाने से मुंह बचा रहा है?

बड़ी दिक्‍कत है. सच्‍ची में. है क्‍यों के सारे सूत्र भारतीय दर्शन की तरह अमूर्तन में सकुचाये खड़े हैं. उंगली आंख के आगे इधर-उधर नाच रही है लेकिन तय करना मुश्किल हो रहा है कि इसे लेकर जायें किधर. पिछले तीन दिनों से मुंबई में जैसी गरमी पड़ रही है क्‍या उसीकी आंख में डाल दें? कि घबराकर अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दें? लेकिन फिर आप कहेंगे अबे, बच्‍चे की तरह बिहेव करना बंद करो. मैं कहूंगा दीवार पर दौड़ते हुए जब कुत्‍ते की तरह उदबिलाव हो रहा था तब यह लाड़-दुलार दिखाना नहीं सूझा था? इस पर जानता हूं आप अपनी उंगली हिलाने लगेंगे. बाहर निकालकर न भी हिलायें जेब में तो घुमायेंगे ही. बट दैट इज़ हाऊ इट इज़. द होल कंट्री इज़ टर्निंग इनटू सम सॉर्ट ऑर अदर ऑफ़ सम उंगलीमार!

Wednesday, April 1, 2009

किसकी जय हो? और भय, वो किसकी हो?..

आठ-दस महीने के बच्‍चे की आंख के आगे रंगीन खिलौने हिलाइये, बच्‍चे की आंखें चमकने लगेंगी. पेट के बल लेटा हो ज़मीन पर हाथ दाब उचककर बैठने की कोशिश करेगा. दांत चियारे चुटकी बजाइये, देखियेगा, बच्‍चे के चेहरे पर हंसी नाचने लगेगी. बच्‍चे का स्‍वभाव है. उसी तरह जैसे बच्‍चा आपकी आंख में या नाक में उंगली ठेले और जवाब में आप हेंहें करने लगें, वह आपका स्‍वभाव होगा. कुत्‍ते को लात लगाइये, वह केंकें करता चार कदम भागा हुआ जायेगा, फिर आपकी दिशा में पलटकर इंसानी समझ में प्रकटत: भौंकता दीखेगा, जबकि वास्‍तविकता में कुत्‍ता-ज़बान में आपके परिवार के अंतरंग सदस्‍यों से अपने अंतरंग संबंधों की गालियों की भाषा में घोषणा कर रहा होगा! ख़ैर, कुत्‍ता कुत्‍ता है, स्‍वाभाविक है कुत्‍ता-स्‍वभाव से बंधा होगा. हम सभी अपने स्‍वभावों से बंधे होते हैं. मगर ऐसा नहीं कि इस नियम के अपवाद नहीं होते, रेयर होते हैं लेकिन होते हैं. आप बहुत अभागे हों तो भी आपके जीवन में ऐसा मौका आता ही है कि आप एक बच्‍चे को कुत्‍ता, कुत्‍ते को इंसान और आदमी को पिल्‍ले की तरह बर्ताव करता देखें. आपकी किस्‍मत अच्‍छी रही, और आदमी की खराब तो आप बेचारे आदमी को बच्‍चे की तरह आचरण करता भी देख सकते हैं! इट्स ऑल मैटर ऑफ़..

इन फ़ैक्‍ट द क्रक्‍स ऑफ़ द मैटर इज़ कि आज सुबह से मैं सोच की पता नहीं क्‍यों ऐसी टेढ़ी राहों पर चल रहा हूं. जबकि सारा दिन गुज़र चुकने के अनंतर अबतक मुझे सीधी राह पर आ जाना चाहिये था, लेकिन सीधी क्‍या, मैं टेढ़े पर भी ठीक-ठीक सीधा नहीं संभल या चल पा रहा हूं! इट्स नॉट हेल्‍दी. नीदर प्राकृतिक. व्‍हॉट सॉर्ट ऑफ़ स्‍वभाव आई गॉट, नो, रियली? वेल, आई अम ऑलरेडी फ़ीलिंग लाइक सम लॉस्‍ट कुत्‍ता, जो लगातार इस दुविधा से गुज़र रहा है कि केंकें गा रहा है या भौंकाइयों में उछल रहा है!

लेकिन सचमुच, मेरे ऐसे हास्‍यास्‍पद आचरण की क्‍या सफ़ाई हो सकती है? माथे पर आम चुनाव है और समूचे देश में कौन कम चिरकुट है के प्रश्‍न पर राष्‍ट्रीय भटकाव है की आशंकाओं में मैं दहलकर घबरा गया हूं? या माथे पर लाल टोपी धरे मुन्‍ना भाई मीडिया को संबोधित कर रहे थे, या मीडिया तरुण वरुण की बेहूदगी को न जानने की इच्‍छा रखनेवाले देश को ज़बरदस्‍ती सुनवाये जा रही थी, इसलिए हलबल होता रहा हूं? कि पाकिस्‍तान में होनहार बेरोज़ग़ार बच्‍चे कितनी आसानी से अफ़ग़ानिस्‍तानी मॉडल के रास्‍ते अफ़ीम, मजहब और थोड़े से पैसों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, मुल्‍क को जवा सकते हैं, भई किसलिए?

एक सीधा साधु स्‍वभाव होता है, हिंदी प्रकाशकों का तो होता ही है, कि किताब का नाम आग का दरिया हो तो कवर को चमचमाते शोलों से भर दो, चांद चाहिये का नाम हो तो कवर पर एकदम ऊपर चांद टांक दो. इससे ज़ाहिर होता है दुनिया जितनी सीधी है वैसी ही सीधाइयों में हिंदी प्रकाशन (लुप्‍तप्राय की तर्ज़ पर) दीप्‍तप्राय है. इससे ज्यादा आप उसे दीपक दिखायें तो चांसेस हैं उस दुनिया में सचमुच आग लग जाये, और आढ़त पर बैठनेवाले प्रकाशक की कुर्सी पर जा बैठें और प्रकाशक जो है सरकारी बाबुओं के कमीशनदार एजेंट में बदल जाये? ऐसी परिघटना पारंपरिक सामाजिक व साहित्यिक स्‍वभाव के लिहाज़ से अच्‍छे लक्षण नहीं होंगे, क्‍योंकि लेखक भी फिर धर्मशाला जाकर लिखने की जगह किसी अधर्मशाला की चाकरी में अपने को निखारता होगा. अब इससे उसका निजी कुछ भला भले होता हो, साहित्‍य, इन जेनरल, समाज में कहीं कुछ कबारती न होगी.

यह सब अच्‍छे लक्षण नहीं हैं. रियली. इन सब परिघटनाओं से ऐसा नहीं होगा कि सारा समाज आगे की राह पर सीधे चलने की जगह पता नहीं किन अंधेरों में टेढ़े शीर्षासनों पर स्‍वयं को सेटिया रहा होगा? बजाजी अख़बार चला रहे होंगे, रिपोर्टर इलाकों में भटकते धूल फांकने की जगह एसी कमरों में भजन गा रहे होंगे? तेल और फ़ोन बेचनेवाले फ़ि‍ल्‍म बना रहे होंगे और जो कैमरे के पीछे खड़े होकर फ़ि‍ल्‍म बनाना चाहते हैं वो पीसी के आगे बेमतलब की लाइनें सजा रहे होंगे?

संझीयायी सांझ से अब गहन है यह अंधकारा वाला माहौल सज रहा है, और आप क्‍या, मैं खुद देख पा रहा हूं कि वकृता जा नहीं पा रही, भौंकना संभाल में नहीं आ रहा, एज़ आई सेड अर्लियर, इट्स नॉट हेल्‍दी. नॉर प्राकृतिक. आई जस्‍ट होप दैट वी ऑल डोंट स्‍टार्ट हाउलिंग इन कोरस, अबे, हम इतने गये-गुज़रे कुत्‍ते होंगे? नो, ना?