Thursday, July 30, 2009

बेकली की शराब..

आंख खुलते ही कैसी तो बेकली मन में शराब घोलने लगती है. हाय-हाय करता तन अकुलाता बजने लगता है कि कहां, कैसे, क्‍या-क्‍या कर लिया जाये! देह की मार और ज़रूरतों की धार में पीटते हुए ख़याल उड़ते हैं कितना लिखने को पड़ा है वही लिख ही लिया जाये? लिखते हुए ही इस संसार में होने, और होकर कुछ भी उखाड़ न पाने के पापों का बोझ हर नहीं लेंगे, कम से कम बोझभरी कमर का बोझ ज़रा कमतर ही कर लेंगे? ओह रे, लिखाई, लिये चल संग ऊंचे कहीं चमकते पहाड़ों की ऊंचाई, आंख हरियर हो जाये वैसी कोई तराई, हाय ऐ लिखाई?

लिखने से समाज बदलता है ऐसा हमें मुगालता नहीं, लिखते-लिखते हमीं कहीं ज़रा सा बदल जायें वही हमारी आत्‍मा का शोभित लालता होगा, होगा? लिखने से कहां कुछ बदलता है, हम अदाबाजी की सीली परगतकामी बेहयाचामी आग सुलगाके सिसकारी छोड़ते हों, सिसकियों में तैरते समाज तक उसका धुआं भी पहुंचता है? फिर लिखने से बदल जाएगा की हम किसको गोली देते रहते हैं? खुद इतने वर्षों से ले रहे हैं यही सोचकर लाज नहीं आती? इतने करम करवाकर भी?

लिखते-लिखते पलेर्मो की सड़क पर स्‍थापत्‍य हो गए, लियोनार्दो शाशा ताउम्र सिसिलियन समाज की उंगली किये रहे, सिसली बदला? यही बदला कि साहित्‍य-समर, संस्‍कृति-निधि का सबसे चमकता मुकुट धारे एनाउदी प्रकाशन हुआ करती थी, उसे देश का सबसे बड़ा गुंडा अब देश के साथ-साथ उसे भी जेब में डाले घूम रहा है! तो यह तो हुई समाज में साहित्‍य की भूमिका! रूस में उन्‍नीसवीं सदी के पूर्वाद्ध से उत्तरायण तक कितने पोथे, मन-मणि के कैसे पुरायण लिख मारे गए, अभी तो जो दशा है एक अंधे को भी देखकर लाज आये, साठ साल पहले भी मान्‍वयर जोसेफ़ स्‍टालिन बेहयायी से डंका पीट रहे ही थे, “Novelists are forever trying to distance themselves from politics, but the novel itself closes in on politics. Novelists are so concerned with ‘man’s fate’ that they tend to lose sight of their own fate. Therein lies their tragedy.”

हिन्‍दी का कमरकसे साहित्‍यकार इस लिहाज से महाबरगदी राजनीतिक समझ की ऊंचाइयों की फुनगियां छूता रहता है. छूता क्‍या रहता है बरगदमाल गरदन में डारे मदहोश अश्‍लील परगतशील हिचकियां लेता रहता है. मैन्‍स फेट की अबीसीनिया-आरमेनिया तो दूर, साहित्यिक फेंट की बकबक वह कितनी भी करे उसके ऊपरी पेंट की खुरचन तक की उसे खबर नहीं होती! हां, अपना फेट आईने में चौबीसों घंटे चौकन्‍ना ज़रूर दीखता रहता है, और कहें तो कायदन वही दिखता है बाकी तो बकते रहने के पैदाइशी बकवासी संस्‍कार हैं, कान पर जनेऊ डालकर धोती से दूर गिराने की तरह- एक डेढ़ सौ का कुनबा होता है उसे रिझाने, और कुछ उसी तरह से एक दूसरे कुनबे को खौरियान- चिढ़ाने मुंह से झड़ते रहते हैं.

अमूर्त समाज तो क्‍या पड़ोस तक में हिन्‍दी का पाठक नहीं है यह क्रान्तिकंद साहित्‍यकार को नहीं दिखता. राजधानी में प्रकाशन धंधा है लेकिन बिकने को किताब की दुकानें नहीं हैं, उस मोर्चे पर वह मंदा क्‍या मूंग की दाल बराबर भी नहीं, साहित्‍य समाज के आंगन में केंद्र में बिछी किसी दरी की तरह नहीं, खटिये के नीचे किसी सीक्रेट सोसायटी की तरह छिपी चंदा काढ़ती और पर्चे बांटती रहती है इसकी तरफ गुरुगंदों का ध्‍यान नहीं जाता. माइक पर कहां बोल सकते हैं, जेब में कहीं से चार पैसे आयें तो उसे कैसी-कैसी कुशलताओं से कहां ठेल सकते हैं सारी चिंतायें कायदे से उसी में गोल-गोल घूमती रहती हैं लेकिन मुंह खुलते ही अम्‍मा का रटाया भ्रांति-कोरसगान शुरु हो जाता है, जैसे अभी एकदम अभी बीस कदम आगे क्रांतिद्वार पर पहुंचकर घंटा बजाने ही वाले हों, और उतना फरियाने के बाद तो फिर मज़े में लेटकर अपनी वही घिसी दाद खुजलवाने वाले हों ही!

लालित्‍य के यही रंग हैं, गंवार अक्षरदीक्षित अर्द्धशिक्षितों के यही ढंग हैं, फिर भी जाने क्‍यों है लिखने को अकुलाया रहता हूं, हिन्‍दी में ही लिखूंगा जानता हूं उसकी मुर्दनी में भक्क काला होने की जगह ललियाया रहता हूं?

Wednesday, July 29, 2009

पांच दीवारोंवाला घर..

यह तीसरी मर्तबा हुआ है कि जहां-जहां जिसको जिस प्रकार व मात्रा में रिझाना चाहिए था सोनल समझती रही सबको स्‍मार्टली निपटा चुकी है और पीछे, शुरुआती एक्‍साइटमेंट के बाद खबर आई कि उसकी हाईट से लड़केवालों को प्रॉबलम है. पहचान बनाने की गरज से साथ समय बिताने उसे लेकर मैक्‍डॉनल्‍ड में बैठा था और बात-बात पर जैसे अनजाने हो रहा है, उसका हाथ टच करता रहा था तब बास्‍टर्ड को मेरी हाईट से दिक्‍कत नहीं हो रही थी? तीसरी मर्तबा! गुस्‍से और चिढ़ में अंदर खौलती सोनल ने सोचा, जबकि एमएसडी में उसके साथ की तीन-चार लड़कियां अभी भी जॉब ढूंढ रही हैं वह ईयरली ढाई लाख का पैकेज पा रही है ऊपर से रंग भी उसका दबा हुआ नहीं, फिर भी! सेम स्‍टोरी थर्ड टाईम रिपीट हुई है, फोर्थ और फिफ्थ और सिक्‍स्‍थ टाईम भी रिज़ल्‍ट वही क्‍यों नहीं होगा? इट्स ऑल सो सिकेनिंग, सोचते हुए सोनल को पूरे तमाशे से घिन हुई लेकिन साथ ही इस बेइज़्ज़ती से बचने की कोई सूरत भी समझ नहीं आ रही थी. कुछ स्‍वाभिमानी लड़कियां होती हैं ऐसे ‘हादसों’ की तकलीफ और शर्म में कभी शादी नहीं करेंगी का मन ही मन जाप पढ़ने लगती हैं, मगर सोनल के मन में खुद को लेकर ऐसी कोई सेल्‍फ-पिटी नहीं थी, उसे मालूम था इंडिया में लड़कियों की एवरेज हाईट क्‍या होती है और एवरेज तो सोनल फिर किसी तरह से थी भी नहीं! सब देखेंगे शादी वह कितने ठाठ से करेगी, और उसके बाद बहुत-बहुत सारा सैक्‍स! इतना कि ग्रूम साहब थककर पानी मांगने लगें तब पूछेगी बच्‍चू से कि नहीं, नहीं, आप तो बड़े खुद को महाराणा प्रताप की औलाद समझते थे? इतना और कितना सैक्‍स होगा कितना मज़ा आएगा के ख़्याल से सोनल को अभी से सनसनी होने लगी, तीसरी मर्तबा रिजेक्‍ट हुई है का किस्‍सा थोड़े वक्त के लिए बैकग्राउंड में छिपकर धुंधला हो गया!

बीपी बढ़ने के बाद से सोनल की मां शाश्‍वती की देह से फुरती निकल गई है, हर चीज़ में कितना मन लगता था अब हर चीज़ काम लगती है. मंथर गति से रसोई के जंगले से बाहर देखते हुए शाश्‍वती बेटी के रिजेक्‍शन का नहीं सोच रही थी, जंगले के सामने नयी इमारत बन रही थी, कितना बन गई है और कहां-कितना धूप छेकेगी का अंदाज़ करती उदास हो रही थी कि अभी कुछ अरसा पहले तक तीन-चार बड़े-बड़े पेड़ थे कैसी हरियाली थी देखते-देखते सब उजड़ गया जैसे मेरी देह की ही त्‍वचा थी, कैसा सलोनापन था देखकर आंखों को कैसा सुख मिलता था और खड़ी-खड़ी एकदम से देखो, अब कैसी सीमेंट की दीवार जैसी हो गई हूं! गए महीने विश्‍वनाथ जी के यहां त्‍यौहार था, राजी मिली देखते ही कैसे चौंककर बोली थी, ‘दीदी, आप एकदम बदल गई हो!’ शाश्‍वती ने फीकी हंसी में जवाब दिया था, ‘अब बूढ़े हुए, भाई, जीवन भर कोई जीनत अमान थोड़े बने रहेंगे?’

पत्‍नी चाय के लिए पूछने आई थी मुंह को मनोज कुमार की तरह दोनों हाथों मूंदे देवीप्रसाद ने सिर हिलाकर मना किया था, बीसेक मिनट बाद भी उसी मुद्रा में मुंह को हाथ से छेके संतप्‍त बैठे थे, और सोनल की चिंता में नहीं बैठे थे, न फिलहाल बेटे प्रसन्‍न का ख़्याल हो रहा था जिसके थोड़े समय से हर वक्त मुंह लटकाये रहने से वह आजिज आ गए थे, देवीप्रसाद की असल चिंता बाईं दाढ़ में दांत के भयानक दर्द से उठ रही थी जिसे पिछले कुछ वर्षों से वह नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे. दर्द अचानक कुछ इस तीव्रता से महसूस हो रही थी कि ऐसी लाचार बेचैनी देवीप्रसाद ने ऑफिस में कालरा के दिनोंवाले झमेलों और बाबू के हाईस्‍कूल वाले रिज़ल्‍ट के दौरान भी नहीं महसूस की थी. पत्‍नी से कहना चाहते थे कहते-कहते सिर्फ़ इसलिए रह गए कि उन्‍हें भय हुआ मुंह के दर्द का बयान करते हुए कहीं रुलाई न आ जाये! दोनों बच्‍चे घर में हैं और बच्‍चों के आगे इस तरह हास्‍यास्‍पद होने के ख़्याल से देवीप्रसाद को घबराहट हुई. हालांकि मुंह के अंदर का दर्द रह-रहकर जिस तरह ऊपर चढ़ता, जोर मार रहा था वह घबराहट कम यातनाकारी नहीं थी! बाल्‍कनी में कहीं से उड़ता एक स्‍वस्‍थ डील का कौवा आया, तेजी से इधर-उधर नज़र मारता उसी तेजी से गायब हो गया. देवीप्रसाद मुंह दाबे सर्द आह भरकर सोचने से बच नहीं पाये कि एक स्‍वस्‍थ कौवे के जीवन में आनंद है, अस्‍वस्‍थ आदमी के नहीं.

बाबू ऊर्फ़ प्रसन्‍न अपने कमरे में लेटा था और सोच रहा था. पिछले दो दिनों से वह घर से बाहर नहीं निकला था और पिछले दो दिनों से इसी तरह बिस्‍तरे पर लेटा सोच रहा था. किसी लड़की ने उसका दिल नहीं तोड़ दिया था, न दूसरी कोई बड़ी आपदा उसके जीवन में आई थी फिर भी घर से बाहर निकलकर दोस्‍तों के बीच जाकर बैठने की उसकी इच्‍छा नहीं हो रही थी. दोस्‍त पता नहीं अचानक क्‍यों फालतू और बेमतलब लग रहे थे. घर, पापा की बातें सबकुछ अटरली स्‍टुपिड लग रहा था. ऐसी साफ़ कोई वजह नहीं थी फिर भी पता नहीं क्‍यों हर चीज़ से नफ़रत हो रही थी. दिमाग में कहां-कहां के विचार आ रहे थे मगर ठीक-ठीक वह क्‍या सोच रहा है इसका प्रसन्‍न को भी अंदाज़ नहीं था.

सोनल, शाश्‍वती, देवीप्रसाद, प्रसन्‍न के साथ घर में एक पांचवी उपस्थिति भी थी. या ऐसा भी कह सकते हैं कि चारों उसी एक की अलग-अलग अभिव्‍यक्ति थे..

इस कमरे से उस कमरे, अन्‍यमनस्‍क, खोये-खोये घूमते, मगर नज़र किसी को न आ रहे, सत्‍वतत्‍व यह साक्षात ईश्‍वर थे! बाबू के कमरे में नाइके के स्‍नीकर्स और सैमसंग के टचफ़ोन पर निगाह जाते ही ईश्‍वर पता नहीं क्‍यों कुछ अनमने से हो गए, ईश्‍वरत्‍व अचानक बोझ की तरह लगा.

Tuesday, July 28, 2009

भाषा हमें नहीं जानती..

जिन्‍हें लगता है भाषा जानते हैं जानते होंगे, मैं नहीं जानता. लिखे में सांससधे बच्‍चे की दौड़ती रवानी हो, बात मचलती बहलती फिर किन-किन ऊंचाइयों तक पहुंचकर सजती मदहोश दीवानी हो पलटकर देखे तो ऐसी भरपूर नज़रों देखे कि आत्‍मा जुड़ा जाये ओह, पहचान उतनी जानी-पुरानी हो!

मगर क्‍या है मुगालते हैं, बनते, आह में चिटककर टूटते हैं, किन जतनों से इतनी दूर साथ आए शब्‍द छिटककर दायें-बायें छूटते हैं. फिर आयं-बायं जुगाड़ में कैसे तो जोड़ बनता है कि चार शब्‍द पीछे बेचारा कौमा पंख पटकती है क्‍या है, महाराज, कहां तक दौड़ाओगे कहीं हमें सटाओगे? इतने निकल गए, शब्‍द जल गए जाने कहां की कोमलताएं थीं उनकी संगत निकल गए हम तो कहीं हो ही नहीं रहे, अब? बुलाओगे, आऊं?

रवानी की टुटही रेल पर दिशाहारा मैं घबराया पुचकारता हूं तनिक ठहर जाओ छुटहे, यह टूटही संभाल लूं तो कहीं जोतता हूं, तुम्‍हें न्‍यौतता हूं!

कौमा को यकीन नहीं होता, गुस्‍से में आंख चढ़ाये मेरी साहित्यिकता के सात पुश्‍तों को मां-बहन में तौलता है, विराम खौरियाया मुंह से खखारने की जगह कहीं और से कराहता है क्‍या गुरु, इस तरह तो हम जनम-जनम के एसिडिक हुए, तुम्‍हारी मुहब्‍बत के भरोसे तो पूरे भांगधाम प्‍लैटोनिक हुए?

किस-किस को कितना जवाब दूं सच्‍चायी है भाषा की भेड़ों में जब मेड़ की ही पहचान नहीं तो विराम की पूण्‍य-पूर्णता की कहां होगी, रेल के धंसे डिब्‍बे की लतखोर बेहयायी में चिढ़ा चिचरियाता हूं क्‍यों अभी तो सवालिया हुए फिर भी शिकायत है? कौमा के पीछे नुक़्ता गोला दागना ताक रहा, उधर नज़र जायत है?

सच्‍ची, गुरु-गुरुवर प्रवीणगण चिरकुटढन्‍न ढोलकी ढुनढुनाते हैं विचार-अल्‍पना सजाते हैं, अपनराम खलिहा भुनभुनाते हैं भाषा भृकुटि बनाती है हमरी मुहब्‍बत का कजरा नहीं लगवाती!

एक कैसी तो गीली थकान में नहायी बेहया अलसभरी बरसात..

- फिर क्‍या हुआ, बताओ ना? बांस की छड़ी पर कपड़े चढ़ा दिये गए हों-सी दुबली देहवाली सिंधु आठ-नौ वर्ष की होगी, चिंहुककर बोली।

- फिर क्‍या होता, बाहर बरसात होती रही, कहानी खतम!

सिंधु को दीदी का यह तरीका पसंद नहीं। इतने अच्‍छे से कहानी चल रही थी गांव के मेले में गरीब बच्‍चों का इतना अच्‍छा सीन था- गोईंठे की धुएं में डूबी गुड़ की जलेबी खाने का सुख, दूसरे दिन मंदिर के बाहर बताशे और पंजीरी का प्रसाद। पंडितजी के कहने से सब पर रौब गांठने के लिए अंकित भैया ने उपवास का फैसला लिया था और दो ही घंटों में घर में बड़ीवाली काली कड़ाही में समोसा छन रहा था तो अपने फैसले पर पछताने भी लगे थे.. झूठमूठ का उपवास किया था जभी कुएं में गिर गए थे, सूखा कुआं था जो बच गए लेकिन फिर भी पैर में काफी सारी चोट लगी थी, एक हिस्‍सा पूरी तरह छिला गया था। छिलाया था न, कितना, बहुत ज्यादा छिलाया था? बोलो न, दीदी, फिर? देखो, कैलेंडर पर सांस रोके छिपकिली भी कान लगाये हमारी कहानी सुन रही है और तुम अंकित भैया को कुआं में फंसा छोड़के भाग रही हो, क्‍यों?

- कहां भाग रही हूं, यहीं तो हूं। तुझसे कहा न फिर बरसात होने लगी! इतना कहकर दीदी मुस्‍कराती रही सिंधु ने साफ़ देखा पंजे में किसका तो फोटो दबाये दीदी किसलिए मुस्‍करा रही है, और अच्‍छा है किसी का भी फोटो लेकर खुशी मिलती है तो खुश होती रहे लेकिन हमारी कहानी का गुड़-गोबर करने का दीदी को कोई हक़ नहीं है!

- इतनी गरमी है इलेक्‍ट्रि‍क भी नहीं है और तुम अलग से परेशान कर रही हो, क्‍यों ऐसे परेशान करती हो, दीदी?

चटाई पर गिरी दीदी ने सिंधु को छाती के करीब खींच लिया, इतना करीब कि दीदी की सांस सीधे-सीधे सिंधु के चेहरे पर इलेक्ट्रिक की तरह गिरने लगी। सिंधु की बड़ी-बड़ी आंखों में अपनी आंखें गड़ाकर होंठ नचाती पता नहीं मन के अंदर कैसे खेल चला रही थी, दीदी फुसफुसाकर बोली- क्‍या-क्‍या बताऊंगी तुम्‍हें, तुम समझोगी? नहीं समझोगी, अभी बहुत छोटी हो।

सिंधु ने एकदम से बुरा मानकर जवाब दिया- लिपस्‍टि‍क लगाती हूं छोटी नहीं हूं, अब?

इतना नन्‍हीं सिंधु भी देख पा रही थी कि दीदी होंठ टेढ़ा किये मुस्‍कराती भले आंखों से उसको देख रही हों लेकिन मन में उनका ध्‍यान कहीं और है, पता नहीं किसके ध्‍यान में एक ठंडी सांस भरकर, सिंधु की पीठ पर अनमने उंगलियां फिराती बोलीं- अब और कुछ नहीं, बाहर बारिश हो रही है, बस.

सिंधु ने आंख नचाकर कहा- कहां बारिश हो रही है? इतनी गरमी है तुम भी किधर-किधर की कैसी बहकी बातें करती हो, दीदी?

कहानी में बारिश हो रही है, पगली, इतना कहकर दीदी ने लड़की से खुद को अलग किया, करवट फेरकर आंखें मूंद लीं।

***

चौबीस घंटे से ज्यादा हो रहा था बारिश की जो झड़ी लगी थी अभी भी उसके छूटने के आसार नहीं दिख रहे थे. ऐसी बरसातों में बाल्‍कनी में नॉर्मली एक नमी रहती है, सीधे देह पर छींटे नहीं पड़ते मगर अभी हाल यह था पानी के ऐसे झपास उड़ रहे थे, कि बैठना तो दूर वहां खड़े होना तक मुश्किल था. इतने दिनों बाद मन में उठते प्रतिवादों को दबाकर शैलजा ने एक सिगरेट जलाया था, बाल्‍कनी में खड़ी अभी दो कश भी नहीं ली होगी कि सिगरेट गीली हो गई। सोचा, चलो, अच्‍छा हुआ, डिवाईन सिग्‍नल है कि मेरे सिगरेट के दिन खत्‍म हुए। ज़ि‍म्‍मेदारी के भाव से बेमन पेंटिंग का साज-सामान फैलाकर बैठी थी, बाल्‍कनी से भीतर लौटी तभी बिजली चली गई। पूरे घर में एकदम-से अंधेरा हो गया। उसी अंधेरे में किचन गई, पहले की बनाई कॉफ़ी गैस पर गर्म करने को चढ़ाया, फ़ोन लेकर दुबारा अंकित का नंबर ट्राई करने लगी। इस बार नंबर रिंग हो रहा था लेकिन रिसीव नहीं हुआ। शैलजा अपने छोटे भाई को जानती है, बुरा मानने का तुक नहीं था, फ़ोन बंद करके कप में कॉफ़ी ली, बैठक के अंधेरे में लौटकर सोच रही थी क्‍या करे, अंकित को एक बार और ट्राई करे या जब उसे फ़ुरसत बनेगी वही करेगा, सोचकर उसके फ़ोन की राह तकती बैठे।

छुटपन में इतना एक्‍साइटेबल रहता था अब चेहरे पर ऐसी मुर्दनी रहती है मानो पैलेस्‍टाइन में यूएन का एन्‍वॉय हो! दस मिनट की बातचीत में कुल चार वाक्‍य बोलेगा, और वह भी इस तरह बोलेगा मानो बोलने में पैसे खर्च होते हों! नाराज़गी दिखाओ, कोंचकर पूछो कब सुधरोगे? तब भी अधिक से अधिक यही कि आई एम सॉरी, दीदी, बट बताने के लिए कुछ है नहीं, रियली।

कभी-कभी तो यह होता है कि अंकित के बारे में भी शैलजा को खबर दिव्‍या से लगती है। दिव्‍या, कलकत्ते के बंगालियों के बीच पली-बढ़ी अंकित की मुंहफट पंजाबन वाईफ। यह भी सरप्राइज़िंग है कि हर समय बक-बक बोलनेवाली दिव्‍या, अंकित के साइलेंसेस कैसे टैकल करती है!

हवा के जोर में रसोई के अंदर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। शैलजा खिड़की भेड़ने गई थी जभी उसे फ़ोन का बजना सुनाई दिया, भागी हुई आकर फ़ोन उठाया, ‘हैलो?’ दूसरी ओर से जवाब मिला, ‘कैसी हो, दीदी? मैं सिंधु बोल रही हूं.’

***

इतने जोरों की बौछार थी कि ओसारे के सामनेवाले ढलान से लगी कच्‍ची सड़क तक दिखना बंद हो गई थी। बीच में नीम का एक पेड़ था वह भी अंदाज़े से ही कह सकते थे कि हां, वहां है, दीख नहीं रहा था। तीन-चार जगह तो खुद ओसारे में ऐसे थे जहां से भर्र-भर्र पानी बह रहा था, फिर भी हुड़दंगी बच्‍चे थे कि दामोदर चाचा की चौकी से लगे हुए बरसात के अंधेरे में शोर का तूफान उठाये हुए थे। दामोदर चाचा भी अपने पागल ही हैं कीचड़-सने पैरों की की टप् कभी इधर कभी उधर गिराते, जाने कब के करियाये, गंदे चौकी पर पसरे, हारमोनियम सजाये बैठे हुए थे!

अंकित था बिना सांस रोके एक कोने से छूटकर दौड़ता जाता, दूसरे छोर पर जाने किस ज़माने की एक जंग-लगी साईकिल की ठठरी रखी थी, उसे छूकर फिर बीच वाले खंभे का घेरा वैसे ही वहशीपने में घूमकर पूरा करता दौड़ा-दौड़ा वापस चाचा के आगे आकर खड़ा हो जाता कि अब बोलिए!

और बदमाश ने चप्‍पल भी पता नहीं कब से निकालकर किधर फेंक रखा था। मैं चिल्‍लाना चाहती थी कि गिर पड़ोगे, मुंह फूट जाएगा, पिछले महीने फूटा था इतनी जल्‍दी भूल गए? लेकिन इतना हलकट शोर उठाये, अनजान लोगों के बीच क्‍या बोलती- जाने किस घर के बच्‍चे हैं सब, ज्यादा मजदूरी करनेवालों के ही होंगे, जब देखो दामोदर चाचा ऐसी ही अगड़म-बगड़म पलटनों की संगत में धंसे-फंसे रहते हैं! मैं सुबह से कह रही हूं आपसे एक बहुत अरजेंट इम्‍पोर्टेंट बात करनी है, तो तब से राग छेड़े हुए हैं कि ज़रा सा हारमोनियम सेट कर लूं फिर तसल्‍ली से तुम्‍हारी बात सुनेंगे!

भाड़ में जाओ आप, मैं क्‍या इतनी फालतू हूं कि आपके पीछे भाग-भागकर आती रहूंगी.. मन की बताने? जाओ, मेरे मुंह से अब कुछ निकलेगा ही नहीं! (लेकिन मान लो, इन केस, तभी दामोदर चाचा ने कहा होता, ठीक है, बोलो, जो बोलना था, मैं बोल पाती? हिम्‍मत होती मेरे अंदर?)। उफ़्फ़, ये बच्‍चे इतना शोर क्‍यों कर रहे हैं? बारिश की वज़ह से भरे दिन इतना गाढ़ा अंधेरा हो गया है लगता है ग्रहण लगा है और उससे खौफ़ खाने की जगह ये हल्‍ला कर रहे हैं। दामोदर चाचा की मौज़ूदगी है इसीलिए बर्दाश्‍त कर रही हूं नहीं फिर एक-एक को ऐसी डांट पिलाकर खदेड़ती कि दुबारा इस घर की तरफ कभी पैर भी नहीं धरते!

मैं दावे के साथ कहती हूं इनमें एक भी बच्‍चा ऐसा नहीं होगा जो स्‍कूल जाता हो (वैसे अभी तो अंकित तक को देखकर यही लग रहा था कि स्‍कूल से उसका दूर-दूर का नाता नहीं!). एक चिमरख नीली गंजी पहने नंगा बच्‍चा था, पागलों की तरह मुंह बाये जानवरों जैसी आवाज़ निकाल रहा था तो एक दूसरा शैतान पता नहीं कहां से चुरायी दो रंगों की अलग-अलग चप्‍पलों में गोड़ डाले, कीचड़ के पानी को फुटबाल की तरह उड़ा रहा था, और मैं दामोदर चाचा के आसरे थी कि आखिरकार साल के ज्यादा वक्‍त गांव में रहते हैं, सबको पहचानते हैं, बच्‍चों को बरजेंगे तो वो बारिश, बच्‍चे सबसे लापरवाह आराम से हारमोनियम की ठेपियों पर हाथ फेरते अपनी ही राग में खोये थे, थोड़ी-थोड़ी देर में बच्‍चों के शोर के ऊपर चिल्‍लाकर आवाज़ लगाते इसके बाद अब कौनवाला गाना सुनना है, बोलो?

ऐसी भयानक बरसात में कोई गाना सुन सकता है? मैं तो नहीं ही सुन सकती! इतनी तान छेड़े रहते हैं, कभी मुझसे कहा कि यह ख़ास तुम्‍हारे लिए है, सुनाऊंगा, सुनोगी?..

कहां-कहां के इतने बच्‍चे नहीं होते तो मैं चाचा की ज़रूर खबर लेती कि आप भी क्‍या-क्‍या अगड़म-बगड़म बोलते रहते हैं, क्‍यों बोलते हैं, मिस्‍टर? लेकिन अभी पेटी पर इधर-उधर हाथ मारकर दुबारा फिर वही बोले तो मैं अन-मन करके पटाई, छत से पानी का भरर-भरर बहना देखती रही। इतने तेज बरस रही है कब तक बरसेगी? रातभर ऐसे ही बरसता रहा, फिर? सुबह से ही बिजली गायब है, होती तो कोई धुला चादर खोज मुंह तक तान दसानी वाला उपन्‍यास खत्‍म कर लेती, लेकिन इतने घंटे हो गए बिजली नहीं आई, कब आयेगी ये भी मालूम नहीं। उसको लेकर घबराहट नहीं हो रही, गुनगुनाहट सूझ रही है, ऐसे आदमी का भी कोई जवाब है भला?

बच्‍चों का पूरा हुड़दंग चाचा जैसे हैंडल कर रहे हैं, सच्‍ची में चाचा की ऐसी लापरवाही मुझे एकदम अच्‍छी नहीं लगती! अभी मेरी तरफ देखकर कुछ पूछें भी तो मैं शर्तिया उनकी बात का जवाब नहीं दूंगी! खुद देख लेंगे कि मैं उनकी तरफ देख भी नहीं रही!

हालांकि मैंने किसी से कहा नहीं है, और रसोई का काम देखने जो ग्‍वालिन संगीता आती है, जिस तरह से चाचा की मौजूदगी में मुझे देख-देखकर मुस्‍कराती रहती है, मुझे डर लगता है बदमाश किसी दिन कोई उल्‍टा-सीधा मजाक न छेड़ दे, अंदर ही अंदर खौलती भी रहती हूं कि बद्तमीज क्‍यों इस तरह मुस्‍कराती है, मैं क्‍या इसकी दोस्‍त-सहेली हूं? लेकिन फिर वो गाना है ना, ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी’ की याद करके मन मारे चुप बनी रहती हूं, क्‍या फायदा है ऐसी औरत से मुंह लगाने का, क्‍योंकि सच्‍चायी तो है ही कि दामोदर चाचा से मुझे मन ही मन प्‍यार है. (ओह, क्‍या ज़रुरत थी बताने की? नहीं बताकर मुझको बुखार चढ़ रहा था? ठीक है, अब बोल दिये तो बोल दिये, लेकिन यह भी तो सच्‍चायी है कि दामोदर चाचा को कभी बताऊंगी नहीं। किसी सूरत में नहीं!) वैसे भी क्‍या फ़ायदा। इंगलिश की मैम को उनके हस्‍बैंड रोज़ बाइक पर स्‍कूल की गेट तक जो उनको छोड़ने आते थे और सुतपा उनको देखकर जिस तरह अपना होश खो बैठी थी और उनके बारे में बात करने भर से उसकी आंख गीली हो जाती या जिस तरह से उसे इंगलिश मैम से नफ़रत हो गई थी, वैसे, उन सारे झमेलों में मेरे भी उलझने का क्‍या तुक है। सारे स्‍पोर्ट्स खेलती थी फिर भी क्‍या हालत हो गई सुतपा की, मैं तो स्‍पोर्ट्स खेलती भी नहीं, न मेरे शरीर में उसकी जितनी ताक़त है, और वैसे भी चोट लगने से मुझे बहुत डर लगता है। फिर दामोदर चाचा को मैं कितना जानती हूं? वही मुझे कितना जानते हैं? जानने की दिलचस्‍पी रखते तो हर समय आसपास बच्‍चों की इतनी भीड़ बनाकर रखते? कोई जरूरत होती है तो अंकित का नाम लेकर आवाज़ लगाते हैं, जैसे मैं घर में हूं ही नहीं!

मैं ही बुद्धू हूं। दीदी और मम्‍मी के साथ चौधरी जी के पक्‍के मकान में रहने की जगह अंकित का ख्याल रखने के बहाने, इस टुटहे मकान में अपनी बेइज़्ज़ती कराने चली आई, जबकि किसी को यहां मेरी रत्ती-भर भी परवाह नहीं! ओह, सोच-सोचकर कितनी शर्म लगती है। मेरी जगह सुतपा होती तो भागकर इसी वक्त ओसारे के बाहर झमझम बरसते पानी में खड़ी हो जाती, और तबतक खड़ी रहती जबतक हारकर दामोदर चाचा उसे आकर अपनी बड़ी-बड़ी छाती में छिपा नहीं लेते.. ! लेकिन यही तो दिक्कत है कि मैं सुतपा नहीं, मुझमें इस भूरे गंदे पानी में जाकर खड़े होने, खुद को गंदा कर लेने की हिम्‍मत नहीं!

मगर क्‍यों बरस रहा है इतना पानी? सामने का सब धुंधला-धुंधला। कुछ भी नज़र नहीं आ रहा। थोड़ी देर में ये होगा कि ऊधम करते ये बच्‍चे भी नजर नहीं आयेंगे!

- अंकित! अंकित! कम हियर, तुम यहां आ रहे हो या नहीं?

लेकिन अंकित पर मेरे गुस्‍से का कोई असर नहीं, वह नीली गंजी वाले नंगे बच्‍चे की गरदन में हाथ डाले, आंख फाड़े उसे कुछ दिखा रहा है। हारमोनियम को एक ओर सरकाकर दामोदर चाचा एक दूसरे बच्‍चे से अपने कंधे की मालिश करवा रहे हैं, और मेरी तरफ उन्‍होंने एक बार भी नहीं देखा है!

अंकित के पीछे मैं सच्‍ची अच्‍छा उल्‍लू बनी। जरूरत क्‍या थी इधर आने की? क्‍या मैं मौलीश्री से भी बड़ी ईडियट हूं? चौधरी जी वाले मकान में होती तो जी भरके चैन से अपनी बेवकूफी पर रोती, लेकिन यहां तो छुपकर रोने भर की भी जगह नहीं!

मुझसे उम्र में कोई एक-दो साल छोटी होगी, काली-भुजंग लड़की। छप-छप नंगे पैर जाने धुंधलके में कहां से प्रकट हुई, दौड़ती आई, पैरों में चप्‍पल नहीं, इतनी बड़ी हो गई अभी तक फ्रॉक पहने थी, वह भी जानो कब का फटा हुआ, और अंदर शमीज़ तक नहीं कि जो नहीं दिखना चाहिए सबके आगे छाती से चिपकाये, उसका बैंड बजाती! मैं एकदम घबरा गई कि कैसी बद्तमीज है भागी चली आ रही है, और तो सब बच्‍चे हैं मगर ऐसी हालत में दामोदर चाचा ने इसे इस हालत देख लिया तो? और कुछ यही सब सोचकर तेजी से भागी उधर गई, उसके रास्‍ते में अड़ी-खड़ी रही कि कौन हो किससे मिलना है? चलो, चलो, जाओ वापस!

वह भी बेवकूफ मुझ अनजानी, शहरवाली को एकदम से सामने पाकर सहमी वहीं बारिश में भीगती खड़ी रही (ये नहीं कि बेशरम भागकर कहीं और चली जाये!) तब तक बच्‍चों ने हल्‍ला किया, या खुद चाचा की निगाह गई, और इसके पहले कि वो कुछ बोलें मैंने ही उनको ख़बरदार किया कि पता नहीं कहां से भागी आ रही है, पैर में इतना कीचड़ है?

चाचा ने मालिश करते बच्‍चे का हाथ थामे जवाब दिया, ‘आने दो, आने दो, मन्‍नन हमारी होनेवाली वाईफ है!’ फिर बच्‍चों की हेंहें के बीच चाचा ने चुहल में लड़की से सवाल किया, ‘हमसे व्‍याह करेगी न, मन्‍नन?’

और वह बेशरम दांत निपोरे, भागी-भागी उसी नंगे बेहयायी में, चाचा के आगे जाकर खड़ी हो गई। और दामोदर चाचा वापस पेटी पर हाथ फिराते उसकी आंखों में आंख गड़ाये सवाल किये, ‘हमारी बेगम कौनवाला गज़ल सुनेंगी?’

मेरी सचमुच इच्‍छा हो रही थी इस नंगे प्रहसन से आंखें फेर कर झमझम बरसात में जाकर खड़ी हो जाऊं और तब तक खड़ी रहूं जबतक मुझे निमोनिया न हो जाये..

***

उम्र में शैलजा से दस वर्ष छोटी सिंधु एक वक़्त था अपने सैकड़ों सवालों की झोली लिये दीदी के पीछे-पीछे घूमा करती, हर बीसवें मिनट आंखें फाड़े सवाल करती- और उसी क्षण वाजिब जवाब न मिले तो टप्-टप् उसकी आंख से आंसू गिरने लगते थे! पता नहीं गांव के एक चाचा थे, उन्‍होंने, या किसने पगली का नाम दिया था, सब सिंधु को उसी नाम से पुकारते, और लड़की को कोई ऐतराज़ न होता, लेकिन वह कोई बात पूछे उसका जवाब न दो, एकदम कुप्‍पे-सा मुंह फैलाकर एक कोने बैठ जाती थी!

पिछली बार बात हुई थी तो पता चला था वकीलों के किसी ग्रुप के साथ कोई सेमीनार अटेंड करने श्रीनगर गई है, ‘कैसी हो?’ के जवाब में थोड़ी देर गुमसुम रहने के बाद बोली थी, ‘तुम्‍हारा अच्‍छा है, दीदी, इसमें से निकलकर उसमें मन लगाती रहती हो, एक ऐसा कोई पर्टिकुलर सेंटर नहीं है, हमने अपने लिए सेंटर तय किया, उसी को संभालने में होश उड़े रहते हैं! मिलूंगी तो सब डिटेल्‍स बताऊंगी!’

नैचुरली, उसके बाद फिर सिंधु-दर्शन नहीं हुआ। सरकार और किन-किन के खिलाफ़ इतने सारे केसेज़ दायर कर रखे हैं लड़की ने, कभी-कभी उसे देखकर लगता है अदालतों में सिर फोड़ने के लिए ही वह इस दुनिया में आई है। बीच में कभी पता चला अंकित से उसकी बातचीत बंद है, शैलजा ने भाई से दरियाफ़्त की तो खबर हुई इसने कुछ उल्‍टा-सीधा उपदेश दिया था, जिसका सिंधु सीरियसली बुरा माने बैठी है। ‘तुम जानती हो, दीदी, वह हमेशा की स्‍टुपिड है. बेमतलब कितने झमेले पाल रखे हैं, इसी उम्र में बूढ़ी हो रही है, शी इज़ जस्‍ट वेस्टिंग हर लाईफ, सच्‍चाई तो मैं किसी के भी मुंह पर कहूंगा!’

ऐसी बातों का क्‍या जवाब है? बैंकों के लिए चौदह-चौदह घंटे की खटाई करके अंकित ने अपनी लाईफ वेस्‍ट नहीं की है? खुद शैलजा हमेशा से इतना रेस्‍टलेस रही, वही अपने जीवन का क्‍या कर पाई? थोड़ा-थोड़ा शायद हम सभी वेस्‍टेड लाइव्‍स हैं. सिंधु कम से कम उसे सिर्फ़ अपने पीछे तो वेस्‍ट नहीं कर रही..

***

ससुर अपनी पुरानी कार में शैलजा को हैदराबाद का बाहरी हिस्‍सा घुमाने लाए हैं। खेतों के बीच रह-रहकर जैसे मकान दिख रहे हैं, उनके अंदर गरीबी होगी ही, लेकिन इतनी दूर से शैलजा के अपने बचपन के गाजीपुर के देहातों से यह दुनिया कितना अलग लगती है। बचपन में छुट्टि‍यां गांव में बीततीं, शैलजा को याद नहीं वहां आमतौर पर कभी किसी बच्‍चे के पैर में चप्‍पल देखा हो, जबकि इधर की तरफ, पहले भी नीलकांतन के साथ जब कभी घूमना हुआ है.. लेकिन इतने वर्ष भी तो हुए, दुनिया सब कहीं कितना बदल गई है. शैलजा बचपन के जिन बच्‍चों को याद करती दिमाग में बिम्‍ब बुनती है क्‍या मालूम उन देहातों के बच्‍चे आज किस तरह का पैर लेकर दुनिया के खुले में दौड़ते हों? कितने वर्ष हुए शैलजा को अपने बचपन के उन देहातों में झांके हुए? सोचते ही शैलजा का मन भारी होता है..

नीलकांतन की मां बीमार है, नीलकांतन स्‍वयं तत्‍काल नहीं आ सकता था सो आगे-आगे शैलजा को भेजा है, पिछले चार दिनों से पुराने हैदराबाद की मुस्लिम-बहुल बस्‍ती में नीलकांतन के पिता के नये घर में शैलजा रह रही है, नर्स से ज्यादा मेहमान बनकर रह रही है। नीलकांतन के बुज़ुर्ग सज्‍जन पिता बार-बार कोंचकर टोह लेते रहते हैं कि बाहर की बहू को उनके यहां कोई कमी तो नहीं खल रही! कमी खलती भी हो तो ऐसे सज्‍जन ससुर को मुस्‍कराकर आश्‍वस्‍त करने की जगह कोई शिकायत गिनायेगी ऐसा शैलजा सोच भी नहीं सकती। उसे शिकायत है भी नहीं। सासजी के लिए भी नहीं। अभी तो बीमार हैं, जब नहीं थीं तब भी अकेले शैलजा की संगत में चुप ही रहती थीं। और शैलजा सवाल न करे तो घंटों चुप रह सकती थीं, मानो हारकर सारे हथियार डाल दिये हों कि परदेस की, उत्‍तर की, बहू थाहना उनके बस की बात नहीं!

इधर-उधर की हल्‍की, मज़ाकिया बातें करके शैलजा सास के साथ शायद सहजता का मैत्री-भाव बना सकती थी, लेकिन सास की चुप्पियों में अपना जोड़कर वह भी चुप ही बनी रहती है, चुप्‍पी के मैत्री-भाव से उसे एतराज़ नहीं। फ़ोन पर किसी से कहना ही हुआ तो शैलजा हमेशा यही कहती है नीलकांतन के पैरेण्‍ट्स के घर आई हूं, ससुराल आई हूं कहना उसे स्‍वाभाविक नहीं लगता। परदेसी बहू समझी जाने से उसे गुरेज नहीं, बिलॉंग करना फ़ील करने के लिए ऐसे सतही समाधानों का लॉजिक शैलजा के माथे फिट नहीं होता। फिर वही क्‍यों, कौन है जो बाहरी नहीं? शैलजा से दसेक साल छोटी बहन सिंधु को छुटपन में सब पगली कहकर बुलाते थे मगर ऐसी पागल निकलेगी कि किसी विस्‍थापित कश्‍मीरी से व्‍याह करेगी, कौन जानता था। समय और ज़रूरत के हिसाब से वह कहीं भी बिलॉंग करती है और उतना ही हर कहीं आउटसाइडर भी महसूस करती है!

खुद नीलकांतन के पिता पैतृक ज़मीन के नज़दीक मैंगलोर में कहीं सेटल होना चाहते थे, वर्कआउट नहीं हुआ, इतने वर्षों से रहते हुए अब हैदराबाद को ही अपना शहर मान लिया है, यहां बाहरी नहीं? पड़ोस की कोई औरत तेलुगु में कुछ देर तक लगातार बात करती रहे तो नीलकांतन की मां के चेहरे पर थकान बनने लगती है, इतनी मृदुभाषी हैं, सौम्‍य हैं, पर अजनबीयत की थकान छिपा नहीं पातीं, वह इस दुनिया में परदेसी नहीं? पता नहीं कहां-कहां के बचपनों में बढ़े, फैले दुनिया में अब सब कहीं सब कोई विस्‍थापन में है, बाहरी है. परदेसी है, दैट इज़ द बिग ट्रूथ ऑफ़ अवर टाईम!

पिछली मर्तबे छोटे भाई अंकित की फैमिली के साथ दार्जीलिंग की टहल करने गई थी, दिव्‍या को पता नहीं क्‍या बात हुई, किसी क्षण टोककर पांच साल के बेटे ने सवाल किया, ‘नेपाली हमारी लैंग्‍वेज है, ममा? हमारी मदर-टंग क्‍या है, ममा?’

आंख फैलाकर दिव्‍या ने शैलजा की तरफ देखा था, फिर वैसे ही आंखें फाड़े बेटे को देखती बोली थी, ‘ये तेरी मदर है,’ और फिर लम्‍बा-सा जीभ दिखाकर, ‘और ये उसकी टंग! आई समझ में बात?’

***

वह शायद पहला साल था जब शैलजा घर से दूर दिल्‍ली हॉस्‍टल में अकेली रह रही थी, बरसात का ही महीना होगा पहली मर्तबा घर लौटी थी, शाम को पापा चाय पीते झींक रहे थे, यहां कौन खराबी थी कि पढ़ाई करने दिल्‍ली गई, तुमलोगों के बारे में सोचकर कितनी चिंता होती है तुमलोगों को कभी समझ नहीं आएगा! मम्‍मी इशारों में मुझे आश्‍वस्‍त कर रही थी कि पापा के अंदर तकलीफ है, उसको ज़ाहिर कर रहे हैं, बुरा मानने, दुखी होने की बात नहीं.

मैं दु:खी थी भी नहीं, दो महीने सबसे दूर रहकर वापस घर लौटकर, पापा को कन्‍संर्ड देखकर मैं सेंटीमेंटल ही हो रही थी, कि तभी भागी-भागी घबरायी, बुक्‍का फाड़े रोती सिंधु आई, पता चला पड़ोस के छत पर दूसरे बच्‍चों के साथ अंकित भागा-दौड़ी कर रहा था, कभी पैर फिसल गया, छत से गिर पड़ा है।

अंकित का टूटा पैर देखकर मम्‍मी ने राहत की सांस ली थी, लेकिन सिंधु का सदमा ऐसा था कि उसका हिचक-हिचककर रोना नहीं थम रहा था, आजिज आकर मम्‍मी ने कहा था, ‘तू चुप करती है कि चार हाथ ऊपर से मैं लगाऊं?

मम्‍मी को मना करके शैलजा ने खींचकर सिंधु को अपने में भींच लिया था. उसके बाद भी लड़की जाने कब तक रोती रही थी, हिचकियों में रहते-रहते उसके मुंह से फूटता रहता, ‘अंकित भैया छत से गिरे हैं, मुझको बहुत दर्द हो रहा है, दीदी!

***

इस बार भी यह पिछले तीन दिनों से था कि लगातार मुसलाधार बरस रहा था. दीवार, कपड़े, हवा, रौशनी लगता सब कहीं गीलापन छितरकर पसर गया हो जैसे। नीलकांतन रात भर प्रैस में फंसे रहे, भोर में लौटे तो देखकर हैरानी हुई कि शैलजा इतनी सुबह उठी हुई है. पूछने पर पता चला वह सोई ही नहीं, जगी रात भर पानी का बरसना सुन रही थी।

धीरे-धीरे सुबह के फैलते उजाले में बालकनी के गीलेपन में खड़ी शैलजा थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोली- मुझे लगता है आपके जीवन में जितनी भी चीज़ें होती हैं, जितने भी लोगों से आप मिलते हैं जिनका आपके जीवन में महत्‍व है, उन सभी इंटरऐक्‍शंस में आपके अंदर कहीं कुछ है जो खत्‍म हो जाता है.. या फिर एकदम नई चीज़ पैदा होती है!

रातभर बरसात सुनती रही थी जैसा पति से शैलजा ने कहा था, सच नहीं कहा था, बीच में कभी रेनुआर की ‘द रिवर’ देखती रही थी, उसी के अकूत मानवीयता में अभी तक मन उलझा, उमड़ रहा था.

***

तब की बात है जिस साल हर चीज़ मुझमें घबराहट पैदा करती, हर फ़ैसले में लगता जैसे गलती कर रही हूं, सब कुछ भूलकर कोई पार्टी थी जिसमें तीन-चार पैग की बेसुधी में, अनजाने लोगों के बीच आर्ट पर मैं कुछ ऊटपटांग बक रही होऊंगी, जभी जाने कहां से खोजता-पूछता, अपने गिर्द जो मैंने एक क़ि‍ला-सा खड़ा कर लिया था, उस घेरे को लांघता, उड़े-उड़े बाल और तक़लीफ़ में नहायी, भरी-भरी भारी आंखे लिये नीलकांतन एकदम-से मुझ पर चढ़े आये कि बात करनी है। नशे में थी लेकिन इतना होश था कि गुस्‍से में उफनते उनको परे धकेलकर मैंने कहा था, गो अवे, डिस्‍सापीयर, आई डोंट वॉंट टू सी यू। एवर!

चार-पांच दिनों बाद हेमंत का फ़ोन आया कि कांतन हॉस्पिटलाइज्ड हैं, एक बार मैं उसे देख क्‍यों नहीं आती। मैंने चिढ़कर जवाब दिया था हेमंत, बकवास मत करो, मुझे कांतन या किसी से मतलब नहीं है, मेरे अपने झमेले ही बहुत हैं, प्‍लीज़ लीव मी अलोन!

मुझमें हेमंत से इतना पूछने की भी हिम्‍मत नहीं थी क्‍या दवा पी ली है, खा लिया है, हुआ क्‍या है? आई वॉज़ जस्‍ट नॉट बॉदर्ड। अफॉर्ड नहीं कर सकती थी। बस, हर चीज़ से नफ़रत हो गई थी और कुछ भी नहीं सोचने के एक सेक्‍लुडेड स्‍पेस में उनींदे डोलते हुए सिर्फ़ इतना चाहती कि हर कोई मुझे अकेला छोड़ दे। अपने भुलावों से हारकर फिर कभी यह लगता कि खुद मैं ही ज़हर खा लूं कि कांतन को अपनी बेवक़ूफियों का सबक मिले. मेरे मर जाने की कीमत पर शायद फिर पापा को भी यह बात समझ आये कि उनकी मर्जी से शादी करके वह समझते रहे मैं सुखी रहूंगी, और मैं बार-बार उन्‍हें आंखों से बताती रही कि नहीं, पापा, नहीं रहूंगी, अब देख लेंगे, जान जायेंगे कि उनकी बड़ी बेटी सुख में नहीं थी!

लेकिन अपनी बात सही ज़ाहिर करने की गरज से ज़हर खा सकूं, मुझमें इतनी हिम्‍मत भी नहीं थी। पापा के एकदम भौंचक रह जाने और मम्‍मी के लाख पैर पटकने के बावज़ूद सिंधु ने घर में कह दिया था एक कश्‍मीरी लड़के के साथ घूम रही है और उसकी ज़िंदगी का कोई ठिकाना नहीं, लेकिन शादी वह उसी से करेगी; मैं आठ वर्षों से एक शराफ़त निबाह रही थी और ज़रूरत के सारे मौकों पर ज़रूरत भर का मुस्‍कराने का काम भी करती, सिंधु की तरह कभी मेरा मुंह खुलेगा, ऐसे मेरे संस्‍कार नहीं थे।

महीने भर बाद एक्‍सप्रैस की एक लड़की से खबर मिली सबकुछ पैरेंट्स ने तय किया है, किसी मैंगलोरियन लड़की से कांतन की शादी हो रही है। मैंने जवाब दिया, गुड फॉर हिम, और गुस्‍से में फ़ोन रख दिया था। उसके बाद सारे दिन पागल-पागल बनी रही कि क्‍या करूं किससे बात करूं, जब लगातार यही सब सोचते सांस लेना एकदम मुश्किल हो गया तो भागकर घर चली आई।

घर पर भी ऊपर छतवाले कमरे में सबसे छिपकर अपना संताप समझना चाहती थी, अकेले, पता चला पैरों में इन दिनों ज्यादा सूजन रहती है, गांव से इलाज करवाने दामोदर चाचा आए हैं, साथ में उनका बेटा है, छतवाले कमरे में उनको टिकाया गया है, उनके सामने जाने से बचते हुए सिंधु के हाथ से चाय लेकर पीते हुए मैंने उसके बालों की तारीफ़ की। सिंधु की शादी तब तक नहीं हुई थी, अंकित भी उन दिनों वहीं था। रात में अकेले में घबरायी आवाज़ में मुझसे फुसफुसाकर पूछा था, ‘क्‍या बात है, दीदी, तुम कुछ ज्यादा ही खुश दिख रही हो? क्‍या छुपा रही हो?’

मैं कुछ देर तक खोयी-खोयी उसे देखती रही थी फिर जवाब दिया था, ‘तुम ईडियट हो, तुम क्‍या समझोगे?’ उसके बाद झर्र-झर्र मेरी आंख से आंसू गिरने लगे थे। आवाज़ हुई होगी पता नहीं कब सिंधु भी उठकर भाई-बहन के पास चली आई थी। और उस पागलपने और बेहोशी के रोने-गाने में आगे कैसे क्‍या करें का असल फ़ैसला मैंने नहीं, मेरी रानी गुड़ि‍या सिंधु ने ही लिया था कि कांतन तीन साल मुझसे छोटा है तो क्‍या फर्क़ पड़ता है, पापा नाराज़ होकर घर में तोड़-फोड़ मचायेंगे उसका भी क्‍या, मैटर करने वाली रियल चीज़ है, कांतन नहीं, मैं कांतन से कितना प्‍यार करती हूं!

ओह, उस दिन की याद से, सिंधु के चेहरे पर जो निष्‍पाप भाव थे, उसकी मेमरी में मन कैसी तो मीठी तड़प से आज, अभी तक, भर उठता है!

बहन-भाई को मैं कोई जवाब नहीं दे सकी थी, चुपचाप रोती रही थी, बस.

***

Monday, July 27, 2009

मो यान का लहसुन-गान..

मो यान का लहसुन-गान (कि गाथा? लहसुन-पुरान?) कभी खत्‍म होगी? किताब खरीदने की तारीख देख रहा हूं मई, 2006, पढ़ने की तारीख याद करता हूं तो याद आता है तीन बार यान की सवारी की थी, मो की मोहब्‍बत की पानी में उतरा था, लेकिन शायद अभी तीन दिन पहले जैसे एक सहृदय आत्‍मा ने स्‍मरण कराया था एक जंगल है यान की आंखों में जहां मैं राह भूल जाता हूं? शायद होगा, क्‍योंकि किताब में न रम पाने की वह वज़ह तो नहीं ही है जैसा एक दूसरे क्रूरहृदय स्‍मरण कराना चाहते हैं. क्‍या होता क्‍या है कि लेखक को चाहते हुए भी कभी-कभी हम किताब में ठीक से रम नहीं पाते? केन्‍या के थ्‍योंगो की ‘पेटल्‍स ऑव ब्‍लड’ है कुछ महीने हुए उसके आसपास घूम रहा हूं लेकिन कितनी जल्‍दी उस मेले से बाहर आ पाऊंगा कहना मुश्किल है. जबकि थ्‍योंगो का चित्रित संसार उनके चरित्रों की दुविधा उसके परिवेश के सवाल ऐसी दुनिया है वह अफ्रीका है जिसके बारे में भयानक तौर पर अनजान हूं, गहरी जिज्ञासा है बावज़ूद उसके डोंगी अटक-अटक कर आगे बढ़ रही है, क्‍या है ये? किताब में रमने के ये अक्‍वायर्ड पश्चिमी संस्‍कार हैं जो पहचानी बुनावटों से अलग किसी भी नये, अगढ़ अनुभव-लोकों को अलजेबरा का मुश्किल इक्‍वेशन बना देते हैं? पाठन और पढ़वैये का फिर यह वाजिब लोकतंत्र कैसे हुआ, और नहीं हुआ तो ऐसे सेलेक्‍टेड लोकतंत्र को लात लगाने के तरीके क्‍या होंगे?

Friday, July 24, 2009

टेस्‍टीमनी ऑफ़ द थर्ड पर्सन..

“किताब से पहले किताब का विचार होगा, विचार का केंद्र क्‍या होगा?”
- एनॉनिमस, मैं


रात के सूनसान दिन के हड़रम-बड़रम सभी समयों आदमी दांत में धंसे रेशे की तरह लौट-लौटकर खोजता होगा. वह अप्रकट, अव्‍यक्‍त निधि, अमूर्त्त सांगितीक सुरबहार पहुंच में रहती पकड़ में नहीं आती होगी, जैसे कांजीहाउस में कैद जानवर जानता होता है दीवारों पर सिर मार रहा है निकलने का रास्‍ता यहीं-कहीं है मगर दरवाज़े तक डोलता चला आता है दरवाज़े की डील थाह नहीं पाता. अपनी आकुलता में सुस्थिर होकर आदमी फिर यह भी सोचता होगा खोजने का यह तरीका ठीक नहीं- पैसे के पीछे हाय-हाय करके दौड़नेवाले के हाथ कभी आया है पैसा? या लड़की के पीछे माय-माय करके दौड़नेवाले के? डेढ़ साल का बच्‍चा हदबद में कहां दौड़ता है जहां है वहीं उस क्षण को बाकी सब क्षणों से काट काव्‍यपूर्ण-संपूर्ण कर लेता है, जो देखते हैं देख सकते हैं कितना रहस्‍यभरा, रचनाहरा है. आदमी कैच कैच करता है लेकिन फिर ढलान पर भागती साइकिल की रौ में कनपटी पर लौ बाले रहता है, खिचड़ी बाल चिनकते रहते हैं आदमी फुसफुसाकर खुद से कंपल्सिव न्‍यूरौटिक ज़ि‍रह किये रहता है कहां है कैसे पकड़ क्‍यों नहीं आती मैं खोज रहा हूं खोज रहा हूं बेदम देखता हूं हाथ कैसे नहीं आएगी?

कितने सारे कौमा, विस्‍मयबोधक चिन्‍ह कातरता में सवालिया चिरौरी करते हैं यह क्‍या ढब है, कौन मुलुक के नागरिक हो, भाई, हमें अनदेखा, एकनॉलेज नहीं करते, ज़बान दुरुस्‍त करो भाषा व्‍यवस्थित करो, कसाई? आदमी चोटखायी उड़ती नज़र उन्‍हें देखता है फिर अपनी खोज का बक्सा खंगालने लगता है- यूरोप के पीछे-पीछे दूसरे मुल्‍कों में भी जब जानर इन्‍वेंट हुआ था बहुत सारे देश ‘नेशन-बिल्डिंग’ की प्रक्रिया में थे, उपन्‍यास उस महती अभियान का कार्टोग्राफ़र, ड्रीम-ऑर्गनाइज़र की भूमिका में था, राष्‍ट्रीयता और राष्‍ट्र-निर्माण की सरल इकहरी सहूलियतों से विछिन्‍न आज के उलझे समय में जब इकलौता जेनुइन कमिटमेंट सोशल नहीं सेल्फ-एनहांसमेंट है क्‍या होगा किताब के केंद्र में, सोचो, सोचो? सोचो, सोचन शर्मा, सोचो, मेजर सलमान?

एक बच्‍चे की आंख कैसे देखेगी इस अजायब, लौमहर्षक लैंडस्‍केप को? मेमरीज़ ऑफ़ अंडरडेवलपमेंट की याद होगी उसे, या पेन्‍नाक की तरह हेमॅक में डोलता अकुलाया बुदबुदायेगा वो, “the imagination starved of memories works furiously at recomposing life from sketches.”?

क्रिकेट, राजनीति, सिनेमा, न्‍यूज़ चैनल, लव पैनल्‍स, अख़बार, इश्‍तेहार, घर के भीतर बाहर का संसार ही नहीं प्रगतिशील पैम्फलेट भी, सब इस अभागे लैंडस्‍केप को इकहरी धंधापुर्सी के कन्विनियेंस-स्‍टोर की सहूलियतभरी दुहाई में लगे हैं किताब भी दौड़कर स्‍वयं समीचीन प्रगतिशील व्‍हॉटेवर अदरवाइस बकवास, बेमतलब अश्‍लील अर्थहीन मेले का हिस्‍सा हो जाए? जिस समय-समाज-तबके का गाना गाये वह अदरवाइस खुद अपनी पहचान में विछिन्‍न, नयी पहचानों से जूझती नयी मान्‍यतायें, नयी राष्‍ट्रीयताएं ओढ़ती नये पानियों में बूड़ती-उतराती अपने से दो और दस हाथ कर रही हो उस साक्षर अर्द्धशिक्षित के बीच कौन किताब घूमेगी और घूमेगी भी तो प्रगतिशीलता का क्‍या कबार लेगी? सहूलियत के सरस सरल सपने देखेगी और सहूलियत का विजय-पर्व पुरस्‍कार पायेगी समाजहारी शॉर्टकट में खुद का पीठ थपथपायेगी? आदमी ने सैकड़ों मर्तबा देखी है वहां लेकिन वह नहीं है जिसे वह खोज रहा है..

एक सड़क सेक्‍टर सात से निकलती आसनसोल रेल स्‍टेशन के शंटिंग यार्ड के बाजू से निकलेगी फिर वहीं ठहर जाएगी, या मौज में अदन से होती अर्जेंटिना तक के सैर में सपरायेगी- कैसे-कैसे भेद सामने लाएगी? बंध की मीनार की ऊंचाइयां किन आकाशों तक पसरेगी, खोलेगी कितनी, कैसी खिड़कियां खोलेगी? बच्‍चा पूछेगा मेरे पैर में ये कैसा जूता इस चमड़े की कहानी क्‍या है, पापा? पापा, व्‍हॉट इज़ द रियल स्‍टोरी ऑफ़ द वे बैक होम, ऑर फॉर दैट मैटर, अ वे इन द वर्ल्‍ड?

रात के सूनसान दिन के हड़रम-बड़रम सभी समयों आदमी दांत में धंसे रेशे की तरह लौट-लौटकर खोजता होगा.

Sunday, July 19, 2009

ब्‍लू..

फ्रेंच डाक्‍टर, लेखक, दार्शनिक आनरी लाबोरित ने कहीं लिखा है ऐसे वक़्तों में ज़ि‍न्‍दा रहने और सपना देख सकने का इकलौता रास्‍ता यही है कि आदमी पलायन करे. मोटी-पतली किसी भी गली से 'निकल' ले. डाकसाहब ऐसे हल्‍के नहीं कि ऐसी हल्‍की बात करें, मगर कर रहे हैं. लोग करते हैं करना पड़ता है, ज़मीन पर खड़ा आदमी एकदम पेड़ पर चढ़ जाता है, आखिर 'आन्‍ना कारेनिना' के पहले भाग की पहली पंक्ति भी है 'vengeance is mine', अब सोचिये लंबी सुफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बाबा तॉल्‍सताय दयानंद ने शुरुआत ही कैसे गीली चाबुकवाली की, ही मस्‍ट हैव हैड हिज़ रिज़न्‍स. पट्रिसिया हाइस्मिथ 'द टैलेंटेड मिस्‍टर रिप्‍ले' में समझाइश देती हैं, 'if you wanted to be cheerful, or melancholic, or wistful, or thoughtful, or courteous, you simply had to act those things with every gesture.'

इसीलिए ऐसे ही नहीं कहता कि देयर आर मोमेंट्स व्‍हेन द मैन इनसाइड मी फील्‍स सिंपली स्‍पीचलेस..

Friday, July 17, 2009

पुरानी, बिगड़ी आदतें..











अपनी छुटपन वाली उम्र में (इससे यह मतलब कतई न निकाला जाये कि अब बड़प्‍पन वाले में दाखिला ले लिये हैं!) हम 'स्‍क्रीन' और 'पिक्‍चर-पोस्‍ट' से काट-काटकर फ़ि‍ल्‍मी कतरनें बटोरा करते थे (मैं बच्‍चादार बाप नहीं, सोचकर सशोपंज में हूं पता नहीं छुटपन वाली उम्र के बच्‍चे आज क्‍या बटोरते हैं. ईश्‍वर न करे कैंची की जगह छुरी लेकर बटोर-कामना करते हों?), उसके बाद हसरत रहने लगी लड़की न भी हो कम से कम लड़कियों के प्रेमपत्र ही हों, दूसरों को ही लिखे हों हम बस उन्‍हें स्‍टोर सकें, कैटालागिंग हमारे हाथ से हो! उसके बाद एक दौर आया हम तो मैट्रिक के आसपास ही डोलते रहे मगर साथ के यार-दोस्‍त थे देखता सब बड़ी जिम्‍मेदारी से मार्कशीट बटोर रहे हैं. तो बटोर के ये अलग-अलग दौर रहे, बाद में जाकर आमतौर पर अब यह सब कहीं हो गया कि प्रेम का तो क्‍या पूछना सारे प्रेमपत्र तक जाने कहां घुस गए, जिधर देखो, यार लोग इकलौती चीज़ जो बटोर-सहोर रहे हैं वह बैंक का काग़ज़-पत्तर है..

चूंकि मेरे पास बैंक की चांदनी तो क्‍या चिथड़े भी नहीं तो मन मारकर किताबों के कवर सहेज रहा हूं. कवर दूसरों के ही हैं हमारी तरह आपकी भी आदतें पुरानी, पहले से बिगड़ी हों तो कवर-चुराव की एक जगह यह रही..

पत्‍थर हैं शब्‍द कहां है?..

पत्‍थर दर पत्‍थर जुड़ती मीनार खड़ी होती की तर्ज पर शब्‍द गोड़ते, गांठते किताब तैयार हो जाती लेकिन किताब है कि बार-बार खुद को बचा ले जाती है. पथरीले पहाड़ पर खड़ा हूं और मानो पत्‍थर पकड़ में न आते दबी आवाज़ में उपहास करते हों- हमें साधोगे, ऐसा, रियली? लेकिन पहले ज़रा ये बताओ, हमें पहचानते हो?

वही हमेशा का संशय जो सुर-समय-समाज में कहीं का नहीं रखता फिर आत्‍मा पर चील की तरह आकर बैठ जाता है कि पथरीले पहाड़ पर खड़ा हूं शब्‍दों को नहीं पहचानता? समाजभागा शब्‍दवन में ज़ि‍न्‍दगी बीत रही है शब्‍दों को बिना पिये आखिर क्‍या खाकर नहीं पहचान पाता? फ़ि‍ल्‍म नहीं बनी की कहानियों की कई फ़ि‍ल्‍में हैं जो न केवल बनकर खत्‍म हुईं, कलात्‍मक उजास के चौड़े मैदान, लम्‍बे मुकाम बुनती आगे निकल गईं, किताब नहीं लिखी की कहानी के उजाड़ के रेगिस्‍तान को फिर मैं कैसे पार क्‍यों नहीं पाता?

जहां खड़ा हूं मीनार नहीं है आड़े-तिरछे किसी तरह जोड़कर लगाये पत्‍थर की दीवार है एक पहाड़ी घर की गरीबी है एक घिसे हुए कूकर में कोयले की गंधभरा बासी राजमा है स्‍टील की थाली में प्‍याज़ के टुकड़े मोटा चावल है प्‍लास्टिक के टूटे मग्‍गे पानी है एक कातर बीमार मां की घबराहट है एक गुस्‍से में थरथराते किशोर बच्‍चे की मदहोशी है जो थाली को पैरों से ठेल पथरीली दीवार से दूर सामने पहाड़ों के अनंत की ओर यह कहता दौड़ गया है कि इस घर से नफ़रत है उसे! इन पहाड़ों से..

जीवन कल नहीं था न कल होगा, जो है आज अभी इसी क्षण में जीवन है और उसे जैसे उथले, गहरे अर्थों में हम भरते हैं साधकर कहीं हांके लिये चलते हैं वही हमारी जीवनकथा बनती है, मगर शब्‍द? कल नहीं थे, न कल होंगे, आज अभी इसी क्षण में उनका रहस्‍यलोक मैं भेद लूंगा, कैसे उन्‍हें छेद लूंगा? जीवन हिन्‍दी साहित्‍य की तरह सरल, सुगम, सहज परिभाषित प्रगतिशील और प्रगतिविमुख नहीं, कि शेल्‍फ पर नागर रहते हैं फिर गुलशन नन्‍दा की फ़ि‍ल्‍म का गाना मन में सुहाना बना रहता है दुकान में धरने की हिम्‍मन नहीं बनती; जैसे कॉन्‍डोम घर में रहता है दीखता नहीं, दीवार के कैलेण्‍डर पर गणेशजी निर्विकार चेहरा लिये सर्वहितकारी, सर्वसिधारी लोकोपकारी मुद्रा में डोलते दिखते हैं. होशियार, सोशली हूनरमंद सहज साहित्‍यपंथ परगत-पगडंडी पर निकल जाता है पीछे छूटे पत्‍थरों पर गीले पेटीकोट में औरत चीखती माथा पटकती है- अब मुझमें तेरा दिल नहीं लगता, हरामी, अब तुझे मैं सुंदर नहीं लगती, बोल? स्‍वत्‍व उन चीखों में कौंधता रहता है भोथरा साहित्‍य आंखबंद बना रहता है समय-समाज शब्‍दबद्ध करना नहीं जानता..

कहां से आई है कहां जायेगी यह कौन सड़क है जहां खड़ा हूं. झोले में इवान सेर्ग्‍येविच तुर्ग्‍येनेव का ‘स्‍केचेज़ फ्रॉम अ हंटर्स एलबम’, ‘होम ऑफ़ द जेंट्री’ होगी तो फिलिप लारकिन की कवितायें और लोस्‍सा की ‘डेथ इन द आंदेज़’ भी होगी और इससे बेपरवाह होगी कि जीवन से कितना लबालब हैं, घंटे से अगर प्रगतिशील नहीं हैं!

बदसूरत सुदर्शन हंसता हुआ जांघ खुजाकर कहेगा सब गुटका छाप हैं, गुरु, जीवन है न साहित्‍य, खाली प्रगतिशीलता है स्‍साली, और इतना बास छोड़ती है कि आदमी जांघ की जगह नाक खुजाने लगे!

मैं हंसना चाहूंगा हंसी पकड़ नहीं आयेगी, मुर्दा फुसफुस में बुदबुदाऊंगा सब सही है, बेटा, स्‍वतंत्रता चाहनेवाले नैतिकता का ठेका अपने पास रखना चाहते हैं, इतिहास की विसंगतियों पर भारी पोथे हैं पर अपनी किताब कहां है? उसकी पहचान पायेंगे? शब्‍द- उसका संधान पायेंगे?

Saturday, July 11, 2009

तुम जो आये नहीं..

क्‍या था सपना था? कैसे चुपके से कब चला आया और आया तो इतनी देर पीछे ख़बर हुई? सिर को हाथों में लेकर अब क्‍या आना था आया और जाते में भी मर्जी पूछकर कहां गया. कैसी तो अंदर से आह छूटती है. हाथ की चीज़ उंगलियों से फिसलकर फ़र्श पर गिरती है तब ख़्याल आता है टूटा नहीं है शीशे का गिलास नहीं था. जो टूटा उसे सहेजने से रह गए. गिनने का ही मौका दे देता कि बाद में याद करके खुशी होती कि गिने थे सपने इतने थे! मगर कहां.. लुकास मूदीस्‍सॉन की पहली फ़ि‍ल्‍म ‘शो मी लव’ की तर्ज़ पर आदमी नाराज़ होकर गाने लगे ‘शो मी सपने’? फिर शो करेंगे? और करेंगे तब क्‍या गारंटी है कि नाराज़ होकर उनसे जिरह न करने लगें कि नहीं आते हो मत आया करो अब तो लगभग आदत-सी हो गई है फिर कैसे चले आये, भाई? क्‍यों चले आये सपने? तुम बहुरुपिये का कोई क्‍या करे अपनी जगह जीवन को नहीं भेज सकते थे? मगर वह शैतान पाजी डरपोक कहां आये जाने कहां-कहां छिपा फिरता है..

कहां छिपा रहता है? जीवन? बैंक के दरवाज़े पर अचानक मन कैसा कातर हो गया था नाउम्‍मीदी के कैसे घनेरे अंधेरे घिर गए थे इसीलिए कि जीवन कहीं बैंक के अंदर लुका था मेरी संगत की शर्मिन्‍दगी में मुकर रहा था? बारिश में धंसी फंसी बस के बाजू कराहते ईश्‍वर दिखें तो टूटी हवाई चप्‍पल फटकारता पूछूं प्रभु, क्‍या दिलदारी की एक भगोड़े से हमारी यारी की?

मगर ईश्‍वर बाजू, बस की छत क्‍या सपनों की सेंघ में भी न दिखें किसी लिसराये छाते की छांह में कभी भूले अपना पहचाना स्‍वत्‍व दीखे तो देखकर दांतों में करकराहट हो सचमुच देखा? खुद को ही देखा या फिर सपना था? लेकिन कब आया कहां आया दोनों ही मैं और सपना?

Tuesday, July 7, 2009

सुखकथा: एक घिसा परिवार प्रेमपत्र..

बच्‍ची आदमी के सिर पर झूल रही थी. जिस भयानक लयकारी में झूल रही थी संभव था किसी भी क्षण छिटककर फ़र्श पर गिरती मुंह फूट जाता. इसी आशंका में औरत का मुंह कलेजे में आया, बरजती बच्‍ची की ओर लपकी थी कि आदमी ने हाथ उठाकर बीच में रोक लिया, ‘खुद तो झूलती नहीं अब बच्‍ची को भी रोक दोगी?’

औरत एक बार हैरानी से पति को देखी, फिर लगातार हैरान होने से बचने की गरज अंदर के कमरे चली गई. आदमी को देख-देखकर लगातार क्‍यों हैरान होती रहती है सोचकर औरत एक बार फिर खुद पर हैरान हुई. अच्‍छा नहीं होता आदमी को देखना बंद करे आईने में खुद को तकती हैरान हो?

बच्‍ची आदमी के सिर पर झूल रही थी. और आदमी खुश था. असुविधा में था लेकिन खुश था. अलबत्ता मासूमियत में इच्‍छा थी कि दिमाग़ का सोचना लड़की के झूलने की तरह निर्बाध गति चलता रहे लेकिन मचलती बच्‍ची के फैलाव में कभी बाल खिंच जाते, कनपटी के पास किसी नस का तनाव हो जाता, अपने को संभालती सोच फिर बहक जाती. आदमी फिर एक बार जतन करके खुद को तैयार करता कि दिमाग़ फ़ोकस हो, मन में इतिहास, अर्थ, समय का एक सहजसूत्र बने और शैलेन्द्र के ‘हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा’ की तर्ज़ पर रहस्‍यों के मन में भेदभरे तारे फूटने लगें! लेकिन सिर पर बच्‍ची थी और इसके पहले कि बनते, तारों को तितर-बितर करने लगती..

‘पापा, घूमने चलो न?’

बच्‍ची के साथ आदमी घूमने निकलता तो स्‍वयं को चिंगेज़ खान नेपोलियन बोनापार्ट समझता, जीभ पर लवंगलता का स्‍वाद और आत्‍मा में सौ सूरजमुखी खिल उठते, एक उम्र के ठहरे हुए मेह माथे पर बरसने होने के समूचे लय में थिरकने लगते. लेकिन अभी हाथ में काम था माथे में अनुत्तरित सवाल ढेरों चिन्‍तायें थीं, बायें हाथ से बच्‍ची को हवा में संभालते और दायें से सामने दिखती पंक्तियों पर पेंसिल से निशान बनाते बच्‍ची को जवाब दिया, ‘बाद में घूमेंगे, अभी काम कर रहे हैं, बच्‍ची!’

‘आप खाली किताब पढ़ते रहते हो!’ बच्‍ची तुनककर बुरा मान गई, ‘आप इतना किताब क्‍यों पढ़ते हो, पापा?’

अचानक जाने क्‍या खोजती बच्‍ची की मां वापस कमरे में लौट आई और एक बार फिर बच्‍ची और उसके बाप को देखकर हैरान हो रही थी. आदमी की नज़र औरत पर पड़ी तो उसने सिर नवाकर बच्‍ची का जवाब दिया, ‘आदमी जीवन को नहीं पढ़ पाता तो किताब पढ़ने लगता है. सोचता है किताब पढ़ते-पढ़ते एक दिन जीवन को पढ़ने लगेगा.’

‘तू नीचे आती है कि मैं आकर पढ़ाऊं तुझे?’

मां के गुस्‍से का बच्‍ची ने एक ऊबभरी नज़र से आकलन किया, आदमी के कंधे पर पैर फंसाये उसके गोद में गिरी आई, फिर गाल में उंगली धंसाकर हैरानी से आदमी से सवाल किया, ‘तुम जीवन को पढ़ नहीं पाते? सच्‍ची, पापा? मम्‍मी पढ़ पाती हैं इसीलिए किताब नहीं पढ़ती?’

आदमी ने बच्‍ची के नाक से नाक सटाकर उन सभी काली किताबों की सोचने से स्‍वयं को बचा लिया जिनके बारे में वह अबतक अनजान है, जो दुनिया के जाने किन-किन कोनों में दबी होंगी, जाने किन हालातों-प्रक्रियाओं में संभव हुई होंगी, और जिनके बाबत एक इस निहायत अर्द्धशिक्षित, अपंग संक्षिप्‍त जीवन में शायद वह हमेशा अनजान रहे?

‘जीवन क्‍या है, पापा? और किताब?’ बच्‍ची ने सुलझे एक्‍टर की तरह आंखें चौड़ी कीं और फटी-फटी आंखों पिता को तकती रही. आदमी काली किताब का लेखक होता तो लिखता: “…the measure of a book is not its ability to solve the literary and structural problems set forth in it but the greatness and importance of the questions the author is addressing and the degree to which he gives himself over to this task, however hopeless.” फ़ि‍लहाल बच्‍ची का पिता औरत का आदमी था सो उमगकर बच्‍ची को छाती से भींचे औरत को जवाब दिया, ‘हम बाद में घूमने जायेंगे, जीवन को पढ़ने जायेंगे, नहीं बच्‍ची?’

‘और मम्‍मी नहीं जायेगी? पढ़ने?’ औरत को घूरती बच्‍ची हैरान होकर बोली.

‘नहीं, मम्‍मी को पढ़के नोबल पुरस्‍कार नहीं जीतना है!’ तमककर औरत चाहती थी सामने से किताब खींचकर आदमी के गोद में गिर पड़े, गुस्‍से में सुलगती उसके गाल काटकर बोले, ‘तुमसे इतनी नफ़रत करती हूं तुम समझते क्‍यों नहीं? क्‍यों नहीं समझते, बोलो?’

लेकिन बोलती नहीं क्‍योंकि जानती थी आदमी दुलार से उसके बाल चूमता बुदबुदायेगा, ‘बच्‍ची कैसे समझेगी कि किताब और जीवन अलग नहीं है, जैसे एक समूची किताब एक समूचा जीवन है, नहीं?

Wednesday, July 1, 2009

काला पानी..



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