- फिर क्या हुआ, बताओ ना? बांस की छड़ी पर कपड़े चढ़ा दिये गए हों-सी दुबली देहवाली सिंधु आठ-नौ वर्ष की होगी, चिंहुककर बोली.
- फिर क्या होता, बाहर बरसात होती रही, कहानी खतम!
सिंधु को दीदी का यह तरीका पसंद नहीं. इतने अच्छे से कहानी चल रही थी गांव के मेले में गरीब बच्चों का इतना अच्छा सीन था गोईंठे की धुएं में डूबी गुड़ की जलेबी खाने का सुख, दूसरे दिन मंदिर के बाहर बताशे और पंजीरी का प्रसाद. पंडितजी के कहने से सबपर रौब गांठने के लिए अंकित भैया ने उपवास का फैसला लिया था और दो ही घंटों में घर में बड़ीवाली काली कड़ाही में समोसा छन रहा था तो अपने फैसले पर पछताने भी लगे थे, झूठमूठ का उपवास किया था जभी कुएं में गिर गए थे, सूखा कुआं था जो बच गए लेकिन फिर भी पैर में काफी सारी चोट लगी थी, एक हिस्सा पूरी तरह छिला गया था. छिलाया था न, कितना, बहुत ज्यादा छिलाया था? बोलो न, दीदी, फिर? देखो, कैलेंडर पर सांस रोके छिपकिली भी कान लगाये हमारी कहानी सुन रही है और तुम अंकित भैया को कुआं में फंसा छोड़के भाग रही हो, क्यों?
- कहां भाग रही हूं यहीं तो हूं. तुझसे कहा न फिर बरसात होने लगी! इतना कहकर दीदी मुस्कराती रही सिंधु ने साफ़ देखा पंजे में किसका तो फोटो दबाये दीदी किसलिए मुस्करा रही है, और अच्छा है किसी का भी फोटो लेकर खुशी मिलती है तो खुश होती रहे लेकिन हमारी कहानी का गुड़-गोबर करने का दीदी को कोई हक़ नहीं है!
- इतनी गरमी है इलेक्ट्रिक भी नहीं है और तुम अलग से परेशान कर रही हो, क्यों ऐसे परेशान करती हो, दीदी?
चटाई पर गिरी दीदी ने सिंधु को छाती के करीब खींच लिया, इतना करीब कि दीदी की सांस सीधे-सीधे सिंधु को अपने चेहरे पर महसूस हो रहा था. सिंधु की बड़ी-बड़ी आंखों में अपनी आंखें गड़ाकर होंठ नचाती पता नहीं मन के अंदर कैसे खेल चला रही थी, दीदी फुसफुसाकर बोली- क्या-क्या बताऊंगी तुम्हें, तुम समझोगी? नहीं समझोगी, अभी बहुत छोटी हो.
सिंधु ने एकदम से बुरा मानकर जवाब दिया- लिपस्टिक लगाती हूं छोटी नहीं हूं, अब?
इतना नन्हीं सिंधु भी देख पा रही थी कि दीदी होंठ टेढ़ा किये मुस्कराती भले आंखों से उसको देख रही हों लेकिन मन में उनका ध्यान कहीं और है, पता नहीं किसके ध्यान में एक ठंडी सांस भरकर, सिंधु की पीठ पर अनमने उंगलियां फिराती बोली- अब और कुछ नहीं, बाहर बारिश हो रही है, बस.
सिंधु ने आंख नचाकर कहा- कहां बारिश हो रही है? इतनी गरमी है तुम भी किधर-किधर की कैसी बहकी बातें करती हो, दीदी?
कहानी में बारिश हो रही है, पगली, इतना कहकर दीदी ने लड़की से खुद को अलग किया, करवट फेरकर आंखें मूंद ली.
***
चौबीस घंटे से ज्यादा हो रहा था बारिश की जो झड़ी लगी थी अभी भी उसके छूटने के आसार नहीं दिख रहे थे. ऐसी बरसातों में बाल्कनी में नॉर्मली एक नमी रहती है, सीधे देह पर छींटे नहीं पड़ते मगर अभी हाल यह था पानी के ऐसे झपास उड़ रहे थे, कि बैठना तो दूर वहां खड़े होना तक मुश्किल था. इतने दिनों बाद मन में उठते प्रोटेस्ट दबाकर शैलजा ने एक सिगरेट जलाया था, बाल्कनी में खड़ी अभी दो कश भी नहीं लिया होगा सिगरेट गीली हो गई. सोचा, चलो, अच्छा हुआ, डिवाईन सिग्नल है कि सिगरेट के मेरे दिन खत्म हुए. ज़िम्मेदारी के भाव से बेमन पेंटिंग का साज-सामान फैलाकर बैठी थी, बाल्कनी से भीतर लौटी तभी बिजली चली गई. पूरे घर में एकदम-से अंधेरा हो गया. उसी अंधेरे में किचन गई, पहले की बनाई कॉफ़ी गैस पर गर्म करने को चढ़ाया, फ़ोन लेकर दुबारा अंकित का नंबर ट्राई करने लगी. इस बार नंबर रिंग हो रहा था लेकिन रिसीव नहीं हुआ. शैलजा अपने छोटे भाई को जानती है, बुरा मानने का तुक नहीं था, फ़ोन बंद करके कप में कॉफ़ी ली, बैठक के अंधेरे में लौटकर सोच रही थी क्या करे, अंकित को एक बार और ट्राई करे या जब उसे फ़ुरसत बनेगी वही करेगा सोचकर उसके फ़ोन की राह तके.
छुटपन में इतना एक्साइटेबल रहता था अब चेहरे पर ऐसी मुर्दनी रहती है मानो पैलेस्टाइन में यूएन का एन्वॉय हो! दस मिनट की बातचीत में कुल चार वाक्य बोलेगा, और वह भी इस तरह बोलेगा मानो बोलने में पैसे खर्च हो रहे हों! नाराज़गी दिखाओ, कोंचकर पूछो कब सुधरोगे? तब भी अधिक से अधिक यही कि आई एम सॉरी, दीदी, बट बताने के लिए कुछ है नहीं, रियली.
कभी-कभी तो यह होता है कि अंकित के बारे में भी शैलजा को खबर दिव्या से लगती है. दिव्या, कलकत्ते के बंगालियों के बीच पली-बढ़ी अंकित की मुंहफट पंजाबन वाईफ. यह भी सरप्राइज़िंग है कि हर समय बक-बक बोलनेवाली दिव्या अंकित के साइलेंसेस कैसे टैकल करती है!
हवा के जोर में रसोई के अंदर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई. शैलजा खिड़की भेड़ने गई थी जभी उसे फ़ोन का बजना सुनाई दिया, भागी हुई आकर फ़ोन उठाया, ‘हैलो?’ पर दूसरी ओर से जवाब मिला,
‘कैसी हो, दीदी? मैं सिंधु बोल रही हूं.’ ***
इतने जोरों की बौछार थी कि ओसारे के सामनेवाले ढलान से लगी कच्ची सड़क तक दिखना बंद हो गई थी. बीच में नीम का एक पेड़ था वह भी अंदाज़े से ही कह सकते थे कि हां, वहां है, दीख नहीं रहा था. तीन-चार जगह तो खुद ओसारे में ऐसे थे जहां से भर्र-भर्र पानी बह रहा था, फिर भी हुड़दंगी बच्चे थे कि दामोदर चाचा की चौकी से लगे हुए तूफान फैलाये हुए थे. दामोदर चाचा भी अपने पागल ही हैं कीचड़सने पैरों की छाप काले, गंदे चौकी पर जमे हुए थे, और ऐसी गंदी जगह में हारमोनियम सजाकर बैठे थे!
अंकित था बिना सांस रोके एक कोने से छूटकर दौड़ता जाता, दूसरे छोर पर जाने किस ज़माने की एक जंगलगी साईकिल की ठठरी रखी थी उसे छूकर फिर बीच वाले खंभे का घेरा वैसे ही वहशीपने में घूमकर पूरा करता दौड़ा-दौड़ा वापस चाचा के आगे आकर खड़ा हो जाता कि अब बोलिए! और बदमाश ने चप्पल भी पता नहीं कब से निकालकर किधर फेंक रखा था. मैं चिल्लाना चाहती थी कि गिर पड़ोगे, मुंह फूट जाएगा, पिछले महीने फूटा था इतनी जल्दी भूल गए? लेकिन इतना सारा पागलपने का शोर मचाते अनजान लोगों के बीच क्या बोलती- जाने किस घर के बच्चे हैं सब, ज्यादा मजदूरी करनेवालों के ही होंगे, जब देखो दामोदर चाचा ऐसी ही उल्टी पलटनों में धंसे-फंसे रहते हैं! मैं सुबह से कह रही हूं आपसे एक बहुत अरजेंट इम्पोर्टेंट बात करनी है तो तब से राग छेड़े हुए हैं कि ज़रा सा हारमोनियम सेट कर लूं फिर तसल्ली से तुम्हारी बात सुनेंगे!
भाड़ में जाओ आप, मैं क्या इतनी फालतू हूं कि आपके पीछे भाग-भागकर मन की बात बताऊंगी? जाओ, मैं बताती ही नहीं! (लेकिन मान लो, इन केस, तभी दामोदर चाचा ने कहा होता ठीक है, बोलो, तो जो बोलना था, मैं बोल पाती? हिम्मत होती मेरे अंदर?). ऊफ़्फ़, ये बच्चे इतना शोर क्यों कर रहे हैं? बारिश की वज़ह से भरे दिन इतना गाढ़ा अंधेरा हो गया है लगता है ग्रहण लगा है और उससे घबराने की जगह ये हल्ला कर रहे हैं. दामोदर चाचा की मौज़ूदगी है इसीलिए बर्दाश्त कर रही हूं नहीं फिर एक-एक को ऐसी डांट पिलाकर खदेड़ती कि दुबारा इस घर की तरफ कभी पैर भी नहीं धरते!
मैं दावे के साथ कहती हूं इनमें एक भी बच्चा ऐसा नहीं होगा जो स्कूल जाता हो (वैसे अभी तो अंकित तक को देखकर यही लग रहा था कि स्कूल से उसका दूर-दूर का नाता नहीं!). एक चिमरख नीली गंजी पहने नंगा बच्चा था पागलों की तरह मुंह बाये जानवरों जैसी आवाज़ निकाल रहा था तो एक दूसरा शैतान पता नहीं कहां से चुरायी दो रंगों की अलग-अलग चप्पल पहने था ओसारे से लगे कीचड़ के पानी को फुटबाल की तरह उड़ा रहा था, और मैं दामोदर चाचा के आसरे थी कि आखिरकार साल के ज्यादा वक्त गांव में वह रहते हैं, सबको पहचानते हैं, बच्चों को बरजेंगे तो वो बारिश, बच्चे सबसे लापरवाह आराम से हारमोनियम की ठेपियों पर हाथ फेरते अपनी ही राग में खोये थे, थोड़ी-थोड़ी देर में बच्चों के शोर के ऊपर चिल्लाकर आवाज़ लगाते
इसके बाद अब कौनवाला गाना सुनना है, बोलो?ऐसी भयानक बरसात में कोई गाना सुन सकता है? कहां-कहां के इतने बच्चे नहीं होते तो मैं चाचा की खबर लेती कि आप भी क्या-क्या अगड़म-बगड़म बोलते रहते हैं, क्यों बोलते हैं, मिस्टर? लेकिन अभी पेटी पर इधर-उधर हाथ मारकर दोबारा वो फिर बोले मैं अनमन करके पटाई, छत से पानी का भरर-भरर बहना देखती रही. इतने तेज बरस रही है कब तक बरसेगी? और यहां सब पता नहीं कैसे पागल हैं कि किसी को डर भी नहीं लग रहा! रातभर ऐसे ही बरसता रहा फिर? सुबह से ही बिजली गायब है, होती तो कोई धुला चादर खोज मुंह तक तान दसानी वाली किताब खत्म कर लेती लेकिन इतने घंटे हो गए बिजली नहीं आई कब आयेगी ये भी मालूम नहीं उसको लेकर परेशान नहीं, इनका कोई गाना क्यों नहीं सुन रहा दामोदर चाचा इसका गाना गा रहे हैं, ऐसे आदमी का भी कोई जवाब है भला?
समूचे हुड़दंग को जैसे चाचा हैंडल कर रहे हैं, सच्ची में चाचा की ऐसी लापरवाही मुझे एकदम अच्छी नहीं लगती! अभी मेरी तरफ देखकर कुछ पूछे भी तो शर्तिया मैं उनकी बात का जवाब नहीं दूंगी!
हालांकि मैंने किसी से कहा नहीं है और रसोई का काम देखने जो ग्वालिन संगीता आती है जिस तरह से चाचा की मौजूदगी में मुझे देख-देखकर मुस्कराती रहती है मुझे डर लगता है कि संगीता कोई उल्टा-सीधा मजाक न कर दे, अंदर ही अंदर खौलती भी रहती हूं कि बद्तमीज क्यों इस तरह मुस्कराती है, मैं क्या इसकी दोस्त-सहेली हूं? लेकिन फिर वो गाना है ना, ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी’ की याद करके मन मारे चुप बनी रहती हूं, क्या फायदा है ऐसी औरत से मुंह लगने का क्योंकि सच्चायी तो है ही कि दामोदर चाचा से मुझे मन ही मन प्यार है. और ये भी सच्चायी है कि मैं कभी बातऊंगी नहीं. चाचा को भी नहीं. क्या फायदा. इंगलिश की मैम को उनके हस्बैंड जो रोज़ बाइक पर स्कूल की गेट तक उनको छोड़ने आते थे और सुतपा उनको देखकर जिस तरह अपना होश खो बैठी थी और उनके बारे में बात करने भर से उसकी आंख गीली हो जाती या जिस तरह से उसे इंगलिश मैम से नफरत हो गई थी इतने सारे झमेले में उलझने का क्या तुक है. सारे स्पोर्ट्स खेलती थी फिर क्या हालत हो गई सुतपा की, मैं तो स्पोर्ट्स खेलती भी नहीं, न मेरे शरीर में उसकी जितनी ताक़त है, और वैसे भी मुझे चोट लगने से बहुत डर लगता है. फिर दामोदर चाचा को मैं कितना जानती हूं? वही मुझे कितना जानते हैं? जानने की दिलचस्पी रखते तो हर समय आसपास बच्चों की इतनी भीड़ बनाकर रखते? कोई जरूरत होती है तो अंकित का नाम लेकर आवाज़ लगाते हैं जैसे मैं घर में हूं ही नहीं!
मैं ही बुद्धू हूं दीदी और मम्मी के साथ चौधरी जी के पक्के मकान में रहने की जगह अंकित का ख्याल रखने के बहाने इस टूटे मकान में अपनी बेइज़्ज़ती करवाने चली आई, जबकि किसी को यहां मेरी रत्तीभर भी परवाह नहीं! ओह, सोच-सोचकर कितनी शर्म लग रही है. मेरी जगह सुतपा होती तो भागकर इसी वक्त ओसारे के बाहर झमझम बरसते पानी में खड़ी हो जाती और तबतक खड़ी रहती जबतक हारकर दामोदर चाचा उसे आकर अपनी बड़ी-बड़ी छाती में छिपा नहीं लेते.. ! लेकिन यही तो दिक्कत है मैं सुतपा नहीं, मुझमें इस भूरे गंदे पानी में जाकर खड़े होने तक की हिम्मत नहीं!
क्यों बरस रहा है इतना पानी? सामने का सब धुंधला-धुंधला. कुछ भी नज़र नहीं आ रहा. थोड़ी देर में ये होगा कि ऊधम करते ये बच्चे भी नजर नहीं आयेंगे!
- अंकित! अंकित! कम हियर,
तुम यहां आ रहे हो या नहीं? लेकिन अंकित पर मेरे गुस्से का कोई असर नहीं, वह नीली गंजी वाले नंगे बच्चे की गरदन में हाथ डाले आंख फाड़े उसे कुछ दिखा रहा है. हारमोनियम को एक ओर सरकाकर दामोदर चाचा एक दूसरे बच्चे से अपने कंधे की मालिश करवा रहे हैं, और मेरी तरफ उन्होंने एक बार भी नहीं देखा है!
अंकित के पीछे मैं सच्ची अच्छी उल्लू बनी. जरूरत क्या थी इधर आने की? क्या मैं मौलीश्री से भी बड़ी ईडियट हूं? चौधरी जी वाले मकान में होती तो जी भरके चैन से अपनी बेवकूफी पर रोती लेकिन यहां तो रोने की भी जगह नहीं!
मुझसे उम्र में कोई एक-दो साल छोटी होगी, काली-भुजंग लड़की. छपछप नंगे पैर जाने धुंधलके में कहां से दौड़ती आई, पैरों में चप्पल नहीं, इतनी बड़ी हो गई अभीतक फ्रॉक पहने थी वह भी जानो कब का फटा हुआ, और अंदर शमीज़ तक नहीं कि जो नहीं दिखना चाहिए सबके आगे छाती से चिपकाये उसका बैंड बजाती! मैं एकदम घबरा गई कि कैसी बद्तमीज है भागी चली आ रही है, और तो सब बच्चे हैं मगर ऐसी हालत में दामोदर चाचा ने इसे ऐसे देख लिया तो? और कुछ यही सब सोचकर तेजी से भागी उधर गई, उसके रास्ते में अड़ी खड़ी रही कि कौन हो किससे मिलना है? चलो, चलो!
वह भी बेवकूफ मुझ अनजानी, शहरवाली को एकदम से सामने पाकर सहमी वहीं बारिश में भीगती खड़ी रही (ये नहीं कि बेशरम भागकर कहीं और चली जाये!) तबतक बच्चों ने हल्ला किया या खुद चाचा की निगाह गई और इसके पहले कि वो कुछ बोलें मैंने ही उनको खबरदार किया कि पता नहीं कहां से भागी आ रही है पैर में इतना कीचड़ है?
चाचा ने मालिश करते बच्चे का हाथ थामे जवाब दिया, ‘आने दो, आने दो, मन्नन हमारी होनेवाली वाईफ है!’ फिर बच्चों की हेंहें के बीच चाचा ने चुहल में लड़की से सवाल किया,
‘हमसे व्याह करेगी न, मन्नन?’ और वह बेशरम दांत निपोरे भागी-भागी उसी नंगे बेहयायी में चाचा के आगे जाकर खड़ी हो गई. और दामोदर चाचा वापस पेटी पर हाथ फिराते उसकी आंखों में आंख गड़ाये सवाल किये,
‘हमारी बेगम कौनवाला गज़ल सुनेंगी?’ मेरी सचमुच इच्छा हो रही थी इस नंगे प्रहसन से आंखें फेरकर झमझम बरसात में जाकर खड़ी हो जाऊं और तबतक खड़ी रहूं जबतक मुझे निमोनिया न हो जाये..
***
उम्र में शैलजा से दस वर्ष छोटी सिंधु एक वक़्त था अपने सैकड़ों सवालों की झोली लिये दीदी के पीछे-पीछे घूमा करती, हर बीसवें मिनट आंखें फाड़े सवाल करती- और उसी क्षण वाजिब जवाब न मिले तो टप्-टप् उसकी आंख से आंसू गिरने लगते थे! पता नहीं गांव के एक चाचा था उन्होंने, या किसने पगली का नाम दिया था, सब सिंधु को उसी नाम से पुकारते, और लड़की को कोई ऐतराज़ न होता, लेकिन वह कोई बात पूछे उसका जवाब न दो, एकदम कुप्पे-सा मुंह फैलाकर एक कोने बैठ जाती थी!
पिछली बार बात हुई थी तो पता चला था वकीलों के किसी ग्रुप के साथ कोई सेमीनार अटेंड करने श्रीनगर गई है, ‘कैसी हो?’ के जवाब में थोड़ी देर गुमसुम रहने के बाद बोली थी, ‘तुम्हारा अच्छा है, दीदी, इसमें से निकलकर उसमें मन लगाती रहती हो, एक ऐसा कोई पर्टिकुलर सेंटर नहीं है, हमने अपने लिए सेंटर तय किया, उसीको संभालने में होश उड़े रहते हैं! मिलूंगी तो सब डिटेल्स बताऊंगी!’
नैचुरली, उसके बाद से सिंधु-दर्शन नहीं हुआ. सरकार और किन-किनके खिलाफ़ इतने सारे केसेज़ दायर कर रखे हैं लड़की ने कभी-कभी उसे देखकर लगता है अदालत आने-जाने के लिए वह इस दुनिया में आई है. बीच में कभी पता चला अंकित से उसकी बातचीत बंद है, शैलजा ने भाई से दरियाफ़्त की तो पता चला इसने कुछ उल्टा-सीधा उपदेश दिया था, सिंधु सीरियसली उसका बुरा माने बैठी है. ‘तुम जानती हो, दीदी, वह हमेशा की स्टुपिड है. बेमतलब इतने झमेले पाल रखे हैं, इसी उम्र में बूढ़ी हो रही है,
शी इज़ जस्ट वेस्टिंग हर लाईफ, सच्चाई तो मैं किसी के भी मुंह पर कहूंगा!’
ऐसे बातों का क्या जवाब है? बैंकों के लिए चौदह-चौदह घंटे की खटाई करके अंकित ने अपनी लाईफ वेस्ट नहीं की है? खुद शैलजा हमेशा से इतना रेस्टलेस रही, वही अपने जीवन का क्या कर पाई?
थोड़ा-थोड़ा शायद हम सभी वेस्टेड लाइव्स हैं. सिंधु कम से कम उसे सिर्फ़ अपने पीछे तो होम नहीं कर रही..
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ससुर अपनी पुरानी कार में शैलजा को हैदराबाद का बाहरी हिस्सा घुमाने लाए हैं. खेतों के बीच रह-रहकर जैसे मकान दिख रहे हैं उनके अंदर गरीबी होगी ही लेकिन इतनी दूर से शैलजा के अपने बचपन के गाजीपुर के देहातों से यह दुनिया कितना अलग लगती है. बचपन में छुट्टियां गांव में बीतता, शैलजा को याद नहीं वहां आमतौर पर कभी किसी बच्चे के पैर में चप्पल देखा हो, जबकि इधर की तरफ, पहले भी नीलकांतन के साथ जब कभी घूमना हुआ है.. लेकिन इतने वर्ष भी तो हुए, दुनिया सबकहीं कितना बदल गई है. शैलजा बचपन के जिन बच्चों को याद करती दिमाग में बिम्ब बुनती है क्या मालूम उन देहातों के बच्चे आज किस तरह का पैर लेकर खुले में दौड़ते हों? कितने वर्ष हुए शैलजा को अपने बचपन के उन देहातों में झांके हुए? सोचकर ही शैलजा का मन भारी होता है..
नीलकांतन की मां बीमार है, नीलकांतन स्वयं तत्काल नहीं आ सकता था सो आगे-आगे शैलजा को भेजा है, पिछले चार दिनों से पुराने हैदराबाद की मुस्लिम-बहुल बस्ती में नीलकांतन के पिता के नये घर में शैलजा रह रही है, नर्स से ज्यादा मेहमान बनकर रह रही है. नीलकांतन के बुज़ुर्ग सज्जन पिता बार-बार कोंचकर टोह लेते रहते हैं कि बाहर की बहू को उनके यहां कोई कमी तो नहीं खल रही! कमी खलती भी हो तो ऐसे सज्जन ससुर को मुस्कराकर जवाब देने की जगह कभी कम्प्लेन करेगी ऐसा शैलजा सोच भी नहीं सकती. कम्प्लेन, कैसा भी, सासजी के लिए भी नहीं. अभी तो बीमार हैं जब नहीं थीं तब भी अकेले शैलजा की संगत में चुप ही रहती थीं. और शैलजा सवाल न करे तो घंटों चुप रह सकती थीं, मानो हारकर सारे हथियार डाल दिये हैं कि बाहर की उत्तरी बहू थाहना उनके बस का नहीं!
इधर-उधर की हल्की, मज़ाकिया बातें करके शैलजा सास के साथ शायद सहजता का मैत्रीभाव बना सकती थी, लेकिन सास की चुप्पियों में अपना जोड़कर वह भी चुप ही बनी रहती है, चुप्पी के मैत्रीभाव से उसे एतराज़ नहीं. फ़ोन पर किसी से कहना ही हुआ तो शैलजा हमेशा यही कहती है नीलकांतन के पैरेण्ट्स के घर आई हूं, ससुराल आई हूं कहना उसे स्वाभाविक नहीं लगता. बाहर की बहू समझी जाने से उसे गुरेज नहीं, बिलॉंग करना फ़ील करने के लिए ऐसे सतही समाधानों का लॉजिक शैलजा के माथे फिट नहीं होता. फिर वही क्यों, कौन है जो बाहरी नहीं? शैलजा से दसेक साल छोटी बहन सिंधु को छुटपन में सब पगली कहकर बुलाते थे मगर ऐसी पागल निकलेगी कि किसी विस्थापित कश्मीरी से व्याह करेगी कौन जानता था. समय और ज़रूरत के हिसाब से वह कहीं भी बिलॉंग करती है और हर कहीं आउटसाइडर महसूस करती है!
खुद नीलकांतन के पिता पैतृक ज़मीन के नज़दीक मैंगलोर में कहीं सेटल होना चाहते थे, वर्कआउट नहीं हुआ, इतने वर्षों से रहते हुए अब हैदराबाद को ही अपना शहर मान लिया है, यहां बाहरी नहीं? पड़ोस की कोई औरत तेलुगु में कुछ देरतक लगातार बात करती रहे तो नीलकांतन की मां के चेहरे पर थकान बनने लगती है, इतनी मृदुभाषी हैं सौम्य हैं पर अजनबीयत की थकान छिपा नहीं पातीं
वह इस दुनिया में बाहरी नहीं? पता नहीं कहां-कहां के बचपनों में बढ़े, फैले दुनिया में अब सबकहीं
सबकोई विस्थापन में है, बाहरी है. दैट इज़ द बिग ट्रूथ ऑफ़ अवर टाईम!पिछली मर्तबे छोटे भाई अंकित की फैमिली के साथ दार्जीलिंग की टहल करने गई थी, दिव्या को पता नहीं क्या बात हुई किसी क्षण टोककर पांच साल के बेटे ने सवाल किया, ‘नेपाली हमारी लैंग्वेज है, ममा?
क्या-क्या हमारी मदर-टंग है, ममा?’ आंख फैलाकर दिव्या ने शैलजा की तरफ देखा था फिर वैसे ही आंखें फाड़े बेटे को देखती बोली थी, ‘ये तेरी मदर है,’ और फिर लम्बा-सा जीभ दिखाकर, ‘और ये उसकी टंग! आई समझ में बात?’
***
वह शायद पहला साल था जब शैलजा घर से दूर दिल्ली हॉस्टल में अकेली रह रही थी, बरसात का ही महीना होगा पहली मर्तबा घर लौटी थी, शाम को पापा चाय पीते झींक रहे थे यहां कौन खराबी थी कि पढ़ाई करने दिल्ली गई, तुमलोगों के बारे में सोचकर कितनी चिंता होती है तुमलोगों को कभी समझ नहीं आएगा! मम्मी इशारों में मुझे आश्वस्त कर रही थी कि पापा के अंदर तकलीफ है उसको ज़ाहिर कर रहे हैं, उसमें नाराज़ होने की बात नहीं.
मैं नाराज़ थी भी नहीं, दो महीने सबसे दूर रहकर वापस घर लौटके पापा को कन्संर्ड देखकर मैं सेंटीमेंटल ही हो रही थी, कि तभी भागी-भागी घबरायी, बुक्का फाड़े रोती सिंधु आई, पता चला पड़ोस के छत पर दूसरे बच्चों के साथ अंकित भागा-दौड़ी कर रहा था, कभी पैर फिसल गया, छत से गिर पड़ा है.
अंकित का टूटा पैर देखकर मम्मी ने राहत की सांस ली थी लेकिन सिंधु का सदमा ऐसा था कि उसका हिचक-हिचककर रोना नहीं थम रहा था, आजिज आकर मम्मी ने कहा था, ‘तू चुप करती है कि चार हाथ ऊपर से मैं लगाऊं?
मम्मी को मना करके शैलजा ने खींचकर सिंधु को अपने में भींच लिया था. उसके बाद भी लड़की जाने कबतक रोती रही थी, हिचकियों में रहते-रहते उसके मुंह से फूटता रहता, ‘अंकित भैया छत से गिरे हैं,
मुझको बहुत दर्द हो रहा है, दीदी!’
***
इस बार भी यह पिछले तीन दिनों से था कि लगातार मुसलाधार बरस रहा था. दीवार, कपड़े, हवा, रौशनी लगता सब कहीं गीलापन छितरकर पसर गया हो जैसे. नीलकांतन रात भर प्रैस में फंसा रहा भोर में घर लौटा तो देखकर हैरानी हुई कि शैलजा इतनी सुबह उठी हुई है. पूछने पर पता चला वह रात सोई ही नहीं, जगी रात भर पानी का बरसना सुन रही थी.
धीरे-धीरे सुबह के फैलते उजाले में बालकनी के गीलेपन में खड़ी शैलजा थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोली- मुझे लगता है आपके जीवन में जितनी भी चीज़ें होती हैं, जितने भी लोगों से आप मिलते हैं जिनका आपके जीवन में महत्व है उन सभी इंटरऐक्शंस में आपके अंदर कहीं कुछ है जो खत्म हो जाता है.. या फिर एकदम नई चीज़ पैदा होती है!
रातभर बरसात सुनती रही थी जैसा पति से शैलजा ने कहा था, सच नहीं कहा था, बीच में कभी
रेनुआर की ‘
द रिवर’ देखती रही थी, उसीके अकूत मानवीयता में अभीतक मन उलझा, उमड़ रहा था.
***
तब की बात है जिस साल हर चीज़ मुझमें घबराहट पैदा करती, हर फ़ैसले में लगता जैसे गलती कर रही हूं, सबकुछ भूलकर कोई पार्टी थी जिसमें तीन-चार पैग की बेसुधी में अनजाने लोगों के बीच आर्ट पर मैं कुछ ऊटपटांग बक रही होऊंगी जभी जाने कहां से खोजता-पूछता, अपने गिर्द जो मैंने एक क़िला-सा खड़ा कर लिया था उस घेरे को लांघता, उड़े-उड़े बाल और तक़लीफ़ में नहायी भरी-भरी भारी आंखे लिये नीलकांतन एकदम-से मुझपर चला आया कि बात करनी है. नशे में थी लेकिन इतना होश था कि गुस्से में उफनते उसे परे धकेलकर मैंने कहा था गो अवे, डिस्सापीयर, आई डोंट वॉंट टू सी यू. एवर!
चार-पांच दिनों बाद हेमंत का फ़ोन आया कि कांतन हॉस्पिटलाइज्ड है, एक बार मैं उसे देख क्यों नहीं आती. मैंने चिढ़कर जवाब दिया था हेमंत, बकवास मत करो, मुझे कांतन या किसी से मतलब नहीं है, मेरे अपने झमेले ही बहुत हैं, प्लीज़ लीव मी अलोन!
मुझमें हेमंत से इतना पूछने की भी हिम्मत नहीं थी क्या दवा पी ली है खा लिया है, हुआ क्या है? आई वॉज़ जस्ट नॉट बॉदर्ड. अफॉर्ड नहीं कर सकती थी. बस, हर चीज़ से नफ़रत हो गई थी और कुछ भी नहीं सोचने के एक सेक्लुडेड स्पेस में उनींदे डोलते हुए सिर्फ़ इतना चाहती कि हर कोई मुझे अकेला छोड़ दे. अपने भुलावों से हारकर फिर कभी यह लगता कि खुद मैं ही ज़हर खा लूं कि कांतन को उसकी बेवक़ूफियों का सबक मिले. मेरे मर जाने की कीमत पर शायद फिर पापा को भी यह बात समझ आये कि उनकी मर्जी से शादी करके वह समझते रहे मैं सुखी रहूंगी, और मैं बार-बार उन्हें आंखों से बताती रही कि नहीं, पापा, नहीं रहूंगी, अब देख लेंगे, जान जायेंगे कि उनकी बड़ी बेटी सुख में नहीं थी!
लेकिन अपनी बात ज़ाहिर करने की गरज से ज़हर खा सकूं, मुझमें इतनी हिम्मत भी नहीं थी. पापा के एकदम भौंचक रह जाने और मम्मी के लाख पैर पटकने के बावज़ूद सिंधु ने घर में कह दिया था एक कश्मीरी लड़के के साथ घूम रही है और उसकी ज़िंदगी का कोई ठिकाना नहीं लेकिन उसी से शादी करेगी, मैं आठ वर्षों से एक शराफ़त निबाह रही थी और ज़रूरत के सारे मौकों पर ज़रूरत भर का मुस्कराने का काम भी करती, सिंधु की तरह कभी मेरा मुंह खुलेगा ऐसे मेरे संस्कार नहीं थे.
महीने भर बाद एक्सप्रैस की एक लड़की से खबर मिली सबकुछ पैरेंट्स ने तय किया है, किसी मैंगलोरियन लड़की से कांतन की शादी हो रही है. मैंने जवाब दिया, गुड फॉर हिम, और गुस्से में फ़ोन रख दिया था. उसके बाद सारे दिन पागल-पागल बनी रही कि क्या करूं किससे बात करूं, जब लगातार यही सब सोचते सांस लेना एकदम मुश्किल हो गया तो भागकर घर चली आई.
घर पर भी ऊपर छतवाले कमरे में सबसे छिपकर अपना संताप समझना चाहती थी, अकेले, पता चला पैरों में इन दिनों ज्यादा सूजन रहती है, गांव से इलाज करवाने दामोदर चाचा आए हैं, साथ में उनका बेटा है, छतवाले कमरे में उनको टिकाया गया है, उनके सामने जाने से बचते हुए सिंधु के हाथ से चाय लेकर पीते हुए मैंने उसके बालों की तारीफ़ की. सिंधु की शादी तब तक नहीं हुई थी, अंकित भी उन दिनों वहीं था. रात में अकेले में घबरायी आवाज़ में मुझसे फुसफुसाकर पूछा था, ‘क्या बात है, दीदी, तुम कुछ ज्यादा ही खुश दिख रही हो? क्या छुपा रही हो?’
मैं कुछ देर तक खोयी-खोयी उसे देखती रही थी फिर जवाब दिया था,
‘तुम ईडियट हो, तुम क्या समझोगे?’ उसके बाद झर्र-झर्र मेरी आंख से आंसू गिरने लगे थे. आवाज़ हुई होगी पता नहीं कब सिंधु भी उठकर भाई-बहन के पास चली आई थी. और उस पागलपने और बेहोशी के रोने-गाने में आगे कैसे क्या करें का असल फ़ैसला मैंने नहीं, मेरी रानी गुड़िया सिंधु ने ही लिया था कि कांतन तीन साल मुझसे छोटा है तो क्या फर्क़ पड़ता है, पापा नाराज़ होकर घर में तोड़फोड़ मचायेंगे उसका भी क्या, मैटर करने वाली रियल चीज़ है कांतन नहीं, मैं कांतन से कितना प्यार करती हूं!
ओह, उस दिन की याद से, सिंधु के चेहरे पर जो निष्पाप भाव थे उसकी मेमरी में मन कैसी तो मीठी तड़प से आज, अभीतक, भर उठता है!
बहन-भाई को मैं कोई जवाब नहीं दे सकी थी, चुपचाप रोती रही थी, बस.
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