कैसे हैं? अरे, नाक में कब फुंसी निकल आई कनपटी के पीछे फोड़ी पहले से थी ही वाले आप महाशय से नहीं पूछ रहा, आपके बाजू जो वो प्रसन्नचित्तता चेहरे पर चिपकाये कुर्सी में धंसे हैं, तब से देख रहा हूं हांफ रहे हैं सांस लेना मुहाल हो रहा है उन महाराज की खैरियत पूछ रहा हूं, क्या बोले? क्या? ज़रा जोर से बोलियेगा, महाराज, इस उम्र में अब ये कान भी, ससुरे, सब सुनवाते कहां हैं? जहां लगता है बात टेढ़ी जा रही है अपना बहिरपना गिनवाने लगते हैं! क्या बोले? आपसे नहीं, वो पीछे महंगी खरीदारी की घटिया सैंडिल और स्लीवलेस पहनी देवीजी से पूछ रहा हूं, कि महफ़िल में तब से हम हैं, बाल्मिकी से लेकर वॉल्तेयर, बॉदेलेयेर को क्वोट कर सकते हैं, ज़्यादा यही होगा कि छह में चार जगह ही गलत कोटेंगे, मगर तब भी हमारी काव्यमयी बहुमुखी प्रतिभा दीखेगी ही, और देवीजी हैं कि तब्बो इधर देखती और उधर देखती जाने महफ़िल में किसे ढूंढ़ रही हैं! हमारी मोहिनी बोवारी, कजरारी कारेनिना, किसे ढूंढ़ रही हो, सुंदरी?..
कंकड़बाग वाला वह बीहड़ मकान, महान, कैसा है? याद है गलियारे के अंधियारे कितने मार खाये दोपहारे हमने साथ-साथ लुडो खेलकर बिताये थे? आपके साथ नहीं खेले थे? आपका ही खून था लेकिन आप नहीं मौसेरी छोटी बहन थी बाद में कौनो इंडस्ट्रियल डिज़ाइनर को व्याहकर भिलाई स्टील सिटी चली गई थी? अच्छा ही किया था, हमारे साथ गई होती तो हम कंकड़बाग से निकालकर बीहड़बाग लाये होते और तीन साल में वह चिंहुकने लगती कि व्याह इज़ सच डेटेड एंड ऑब्सक्योर इंस्टिच्यूशन और बीहड़बाग में तीन मग से मुंह धोते रहने की जगह बैंकूवर गई होती तो कैसे बाथटब से सोती, और मुंह ही नहीं समुच्चे देह चमचम चमकाती, धोती! लेकिन देवीजी, बैंकूवर तो गई थी न? ओहोहो, आप गई थीं, मौसेरी छुटिया बेचारी वहीं भिलाई में भटकनी खेलती रह गई थी? ओहोहो, सो सैड.. लेकिन होता है ऐसा. कहां-कहां के टंटे में नहाकर फिर भी जनाना, मर्दाना, माथे पर रोज़ जीवन की लाल टिकुली साटते ही रहते हैं! यस, यस, दैट इज़ लाइफ़, जस्टली सेड. वही तो. वो पीछे नीली टाई डाले, धीमी-धीमी मुस्की काटते वो खुशमिजाज भाई साब बैठे हैं, बता रहे थे, क्या बता रहे थे, भाई साब, खुदी बोलिये न?..
देखिए, हमसे हिलग-हिलककर सुना रहे थे, अब खुद बोलने को बोल रहे हैं तो इन्हें लाज लग रहा है! क्या बोली थीं आपकी मिसेस, आप बोलियेगा कि हमीं महेंदर कूपर के राग में गा दें?..
रहने दीजिए. प्रायवेट मामला है, ऊपर से मिसेस का है, ज़रा ठहरकर बतायेंगे, बीस-बीस और तीस-तीस साल की शादी में तीन मर्तबे तो दाम्पत्य में ऐसे मौके बनते हैं कि साथ के साथी की बात से मन जुड़ा जाये, आदमी उसे फट से सार्वजनिक कर दे फिर शादी में बच्चे, लोनवाला घर और पता नहीं किस-किसकी देनदारियां बचेंगी, सहोदरता के सुहाने सीन्स की मार्मिकता कहां बचेगी?
ओ पीछे की सीटवाली चोट खायी हमदम, इतनी गुमसुम हैं, आप सुनाइए, किस बात का ग़म है? किसने दिल दुखा दिया, रोते में जगा दिया, हमसे न कहतीं वो दाईं ओर वाले महीन आवाज़ के हसीन खूंखार हैं उन्हीं से हाले-दिल कहा होता? हमारा जी हल्का किया होता? कह रही हैं वही कर रही हैं? नंबर लिया है एसएमएस कर रही हैं? अच्छा है फिर मैं खामख्वाह कसैला हो रहा हूं.. देखिए, देखिए, कैसे होंठों पर हंसी आई है! उनकी नहीं, भले आदमी, उनकी, उनकी!..
बंटवार: पतनशील साहित्य, ब्लॉगिंग
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बंटवार: टैबलेट टेल्स
बंटवार: अंतरंग, टेबलेट टेल्स
नील नदी कहां है? नीला रंग?.. टेलीविज़न पर हर किसी को पचास लाख और करोड़ जितवा देनेवाले शोज़ की तरह सब हमारी पहुंच में ही है, बस चार हाथ की दूरी पर बना रहता है हमारी पकड़ में नहीं आता. नौ मन तेल जुटता नहीं कि राधा नाच जाती, हालांकि मुगालते में सब होते कि राधा आसपास ही है और कभी भी नाचने लगेगी, राधा की जगह राखियां और सुगन्धित अंडरवीयरवाली दूसरी तारिकायें टीवी के परदों पर ठुमके लगातीं. कोई शिकायत करता सब गन्द मचा रखा है, मगर अपलक टीवी देखे जाता. बाकी शिकायत की चैतन्यता में न होते, मन थकान और आंखें उनींदेपन में भरी होतीं, सत्यनारायण की कथा की श्रद्धा की तरह, घर से बाहर ‘फिर पैसे कम पड़ गए!’ के झमेले और घर के भीतर टीवी की सुगन्धि-सहेलों में फंसे होते. खबर रहती नील नदी है, इसी दुनिया में कहीं है, जैसा नीला सामने की दीवार पर होता, मगर दिख नहीं पाता..
लड़की हदसकर सवाल करती, सच बताओ, मुझे जानते हो? लड़का घबराकर जवाब देता, रोज़ तो मिलते हैं फिर ऐसा सवाल क्यों? लड़की हारकर कहती मेरे शरीर से मिलते हो, मुझसे मिले कभी? शरीर से परे लड़की से मिलने का सवाल ऐसे सकतेवाला जंजाल होता जैसे टिकमगढ़ से गुज़रती रेल की सवारियों को घेरकर बताया जाना कि टिकमगढ़ दीख रहा है, लेकिन भूखमरी झेलती महज पैंतालिस की उम्र में बुढ़ा रही शांति बाई है समइ में अनाज मिलाकर किसी तरह ग्यारह बच्चों के परिवार को जिलाये रखने की कोशिश कर रही है, पड़ोस का वह भहराया बड़ा गांव और उसके तंगहाल बाशिंदे दीखते हैं? कुछ दिनों पहले एनडीटीवी 24X7 में राधिका बोर्डिया दिखी थी, उत्तर प्रदेश का क्या तो वह सूखा ग्रस्त जिला था, हां, हरदोई था, देहात में भीतर घूमते हुए घरों का हालचाल ले रही थीं, ज़्यादातर घरों में औरतें थीं और अपना हाल कुछ बता पायें इसके पहले ही आंखों से पानी बहने लगता था, कातर रोने लगती थीं, कि बहिनी, बड़ भुखौटी है, खाने भर को अन्न नहीं, कहां जायें, का करें? टीवी पर, उस थोड़े से समय के लिए, वह दुखियारी औरतें दीख रही थीं, टीवी के बाहर वह ठीक बाजू में होती हैं, मन पर काला चश्मा न भी चढ़ा हो, भारी अंधकार जमा होता है, आंखें कुछ भी देखने से इंकार करती रहती हैं.
‘एन इवनिंग इन पैरिस’ और ‘लव इन टोकियो’ देखा होगा, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क तब भी थे, और आज जहां हैं वहीं थे लेकिन तब ‘अराधना’ और ‘आन मिलो सजना’ के राजेश खन्ना को नहीं दिख रहे थे, दार्जीलिंग की छोटी पटरी पर जीप में हाथ डोलाते खुद को बहकाते अपने सपनों की रानी दिख रही थी, उन संकरी पहाड़ी सड़कों पर गोरखा संसार का अंतरंग बाज़ार कैसा दीखता होता, उसे देखने का होश न रहा होगा. ‘सीता और गीता’ ही नहीं, धर्मेंद्र की बीसियों फ़िल्में होंगी विलेनी का सकल अवतार शेट्टी के गंजेपने में ही दिखता, और एक बार उस गंजेपन को फोड़ उसपर चोट की लाल लकीर खींच चुकने के उपरान्त दुनिया में शांति लौट आती, दर्शकगन निश्चिंत अपनी चिरकुटइयों में फाजिल-नाजिल होने लौट आते. विशाल भारद्वाज की फ़िल्म की दूसरी जो भी खामियां हों, अच्छाई उस अकुलाहटभरे मिजाज को पकड़ने में है जिसमें कहीं कोई चैन से नहीं, नशे में टुन्न बेवड़ा तक नहीं, और ‘विलेनी’ इसमें और उसमें केंद्रित होने की जगह सब कहीं, चहुंओर-वारी है, चरित्रों के अपने होने से ज़्यादा उनपर भारी है, लोग कुछ इस हद तक कमीन हो गए हैं कि कमीनापन हमारे समय की लोरी हो गई है!
नील नदी कहां है, दिखती है? कभी मणिपुर घूमने जाएंगे, उसके मर्मांतक विहंगम का साक्षात करेंगे? कि यूं ही हमारे देश का होगा हम उस मणिपुर के कभी न होंगे?..
फीकी नीलाइयों में रंगा अलसाया आसमान दिखेगा. रेल की पटरियों पर बहका, पीठ पर भारी स्कूली बस्ता ढोता एक बच्चा दिखेगा; घर से भागा हुआ नहीं, खुद के अपने पहचाने भूगोलों में खुद को खारिज करता, लड़खड़ाते पैर दौड़े चले जाएंगे, देखेगा वह दौड़ रहा है, अचानक उससे कहीं ज़्यादा स्फूर्ति से एक हरा मेंढक होगा, फुदककर पटरी छलांग जाएगा, बच्चे की आंखे अचरज में फटी रह जाएंगी, अलबत्ता उस अचरज को वह ठीक-ठीक पढ़ नहीं पाएगा, वैसे ही जैसे हम बच्चे को, रेल और मेंढक को अपने उनींदे हारिलपन में देखते हुए भी देख नहीं पाएंगे..
बंटवार: देश, मन की गांठ, हमारा समय
डियर एस, डियर देवनागरी में ही सही लेकिन भाव अंग्रेजी वाले दे रहा हूं सो मानकर चलता हूं इस मर्तबा मेरे लिखे (और ओह, कैसे तो मिठास में कह गए) मेरे डियर-बुलावों से तुम्हें तक़लीफ़ न होगी. नहीं होगी न? वैसे नहीं ही होगी इसकी क्यों गारंटी है, बैंक में रखे पैसों तक की आजकल आश्वस्ति नहीं फिर एक अदद डियर-डॉलर मन में संतुष्टि का करेंट पैदा कर जाये इसीकी क्यों हो? फिर जैसा यह बेवफ़ा वक़्त है गारंटियों-वॉरंटियों का क्या कहीं भी कभी भी बिविल्डर करती चलती हैं, हज्जाम समाज है खुद को बिल्लू-बारबर बुलाये जाने को बारबैरिक मानता रुस गया ही था, इतने सारे डियर पिपुल हैं फट से भृकुटि खिंच जाती है कि डियर क्यों बुलाये, ‘डियरेस्ट’ नहीं बुला सकते थे? इससे भी फर्क कहां पड़ता है कि देवनागरी में रोमन सजा रहे थे, या रोमन में हिन्दी का धंधा चला रहे थे. सचमुच सोचनेवाली बात है, एस, सरोबरवाली, ऐसे मनुहारमय हिन्दी (एंड अदर) धरोहरवाली, कि कम्यूनिकेशन में कंगाली कहां रह जाती है? मन में ऐसे-ऐसे जाने कैसे-कैसे करताल बजते रहते हैं, मगर तुम्हारे मनुहारमय आंगन में एक ताली तक की आवाज़ पैदा नहीं कर पाती, घड़ियाली में होल छूटा कहां रह जाता है?..
कुछ दिनों के लिए घर गया था, बाबूजी से हिन्दी का भोजपुरी में तर्ज़ुमा करके उन्हें बताया उनके बारे में कितना सोचता रहता हूं, वह भोजपुरी को भदेस में फींचते बोलते रहे हमारे सोचने से उनके घर में घंटा कभी फर्क कहां पड़ा है. बाद में मैं हिन्दी आलोचना की तर्ज़ पर विचार करता रहा कि लो, भाषा के अड़ियल टट्टू फिर आड़े आये, संवाद फिर समस्या हो गई. फिर, हिन्दी आलोचना की तर्ज़ पर ही, मैंने स्वयं से विमर्श करके स्वयं को संतुष्ट कर लिया कि मैंने सवालिया संसार की चतुर्दिक पहचान करके उसे मन की पत्रिका में उतार लिया है, बाबूजी जैसा सुधि-पाठक उसे ग्रैस्प नहीं कर पा रहा तो वह उसके इलेजेटिमेट, इल्लिटिरेट एजुकेशनल धरोहर के कुकृत्य होंगे, उसे उपकृत करने का दाय मुझ अकेले का कहां, उसकी सर्वसमाज ही धाय हो..
एस, धरोहरवाली, डियर-डेयरिंग, बाबूजी के पीछे-पीछे तुम्हारे साथ ही दिक़्क़त होती है ऐसा थोड़े होता है चांपा जंक्शन से लेकर चंबोली तक कहां भाषा के तार जुड़ पाते हैं? तुम्हारे साथ यह भी दिक़्क़त है फिर कि तुम अपना ही यकीन नहीं करतीं, फिर हमारे कहे का- भले ही वह उज़बेकी, इस्पाहानी या जापानी में ही क्यों न कहा गया हो- कहां से करोगी? खिड़की को सात ज़बानों में लिखूं (la fenêtre, the window, la ventana, el-taka, la janela, das fenster, la finestra) तब भी आखिर में शिकायत करने और आह भरने से रह कहां पाओगी कि ‘जंगले का जादू’ और ‘झरोखे की झांक’ का ज़िक्र क्यों नहीं किया.. या ‘ये खिड़की जो बंद रहती है’ का गाना भी भूले रहे?
तुम पढ़ना भूली हो यही नहीं है, हम भी लिखना भूल गए हैं, लिखने को रोज़ एक सीधी रचना रच सकते हैं जो हम सबों के चौपाया होने और हमारे खुरों के पालतूपने की कहानी कहती हो, मगर, एस, धरोहरवाली, तुम फिर तब यह शिकायत करती खुद को लिखती पाओगी कि मैं लीक की गलीच लिख रहा हूं, पहाड़-पलीत-पुनित सिरज पतनशील प्रकाश में कहीं कोई आकाश नहीं छू पा रहा..
डियर-डेयरिंग, एस, धरोहरवाली, प्लीज़, लेट बी ऑन माई देवनागर-रोमन सबवे, यू स्टिक टू यूअर स्टिकी, स्टीली गुलगोझर प्रेमधन खंजन-नयन, आई वोंट बी कमिंग एंड सुबुकोइंग अलोंग विद् यू, इज़ंट दैट मोर दैन एनफ़ विदाउट आस्किंग?..
बंटवार: पतनशील साहित्य, ब्लॉगिंग
कुछ नहीं लिखने का मन कर रहा है. दरअसल मन ठहरा-अटका हुआ है (भटका नहीं है, भटका तो समय है, और उसके मन को बहुत सारे खटके हैं, लेकिन फिर वह अलग कहानी है). अभी जो स्थिति है वह कुछ नहीं लिखने की है. कुछ. नहीं. लिखने. की. इस लिखे को देख रहा हूं और समझने की कोशिश कर रहा हूं यह मुझसे कहने की क्या कोशिश कर रही है. कुछ कह भी रही है, या नहीं भी कह रही है तो उस नहीं में कह दिये जाने के कैसे इशारे छिपे हैं, कि बस फ़ॉर्म का कमीनापन छिपा है.. सोचने बैठो तो कैसे सनसनीख़ेज सवाल हैं, और कुछ नहीं है दिमाग़ की बहक भर है तय कर लो तो ससुर, फिर सचमुच चिरई-पाद से ज़्यादा कुछ नहीं..
है कि नहीं? है? वेल, आइ माइट बी स्टेपिंग ऑन सटल ससपीशंस, एंड ऑल ऑव इट माइ ओन, तो बेहतर है मैं फाजिल ज़बान सिये रखूं.. हलर-बलर बोल देने के बाद राज़ खुलता है हलर-बलर ही बोल रहे थे! क्यों बोलते रहते हैं? कुछ नहीं नहीं बोलते रह सकते?
लेकिन फिर यह भी तो बात रहती ही है कि कुछ नहीं का क्या? कहां तक कुछ है और कहां के बाद कुछ नहीं? जीवन का हिसाब-किताब कैसे सरियाया और फरियाया जाए? या हारकर कुछ नहीं को कुछ-कुछ कैसे बनाया जाए?
आप भी पता नहीं किस कोने खड़े जाने कौन-सा दांत खोद रहे होंगे, किस कुछ नहीं के फेर में पिर गए.. छोड़िये, जाने दीजिए, हटाइए, मैंने शुरू में ही कहा कुछ.. नहीं.. लिखने.. का मन कर रहा है. दरअसल मन.. कुछ.. नहीं.. कर.. रहा..
बंटवार: ब्लॉगिंग
‘उत््तम, सुचित्रा, देबानंद, बोइदा रेमान, आर तार पोर?’
‘तार पोर का बच्चल आछे केकरा खबर हव्वै, नन्दी? हम बुड़बक लोक, हमसे रोमान-पुराण के एइ रोकोम संगीन जिग्गासा के कवनो परिणाम होई?’
काली-सफेद वह क्या फ़िल्म थी जिसमें नायिका अंदर के कमरे परदे की ओट में सिहरती नायक जो किसी कैरेक्टर आर्टिस्ट से कह रहा होता लेकिन सुन रही नायिका ही होती कि कैसे नायक हमेशा के लिए शहर छोड़कर जा रहा होता, और इस एक वाक्य को सुनते ही कैसे तो कांपते, चढ़ते पार्श्व-संगीत के बीच अचानक एक शूल-सी उठती और नायिका की छाती में धंस, परदे का किनारा मुट्ठी में भींचे उसकी आंखें मूंद देती. भक्-भक् धुआं छोड़ती एक इंजन दूर कहीं एक सीटी की गहरी सिसकारी छोड़ती, और फिर बाद में रह-रहकर जब कभी खिड़की के गर्द चढ़े सलाखों पर फड़फड़ाते फुलकारी के छींट के परदे के पार दूर पुलिया पर हुमकारती एक रेल गुज़रती, नायिका दनाक् बंदूक की गोली-सी जाने कितनी आहों पर सवार नज़रों को उन सलाखों तक लिये जाती और सलिल चौधुरी के संगीत पर जमी वहां कितनी-कितनी देरतक थर-थर कांपती रहती..
‘केंपे-केंपे दाड़िये थेके जाबार पोर नायिकार जीबोन की रोकोम चोले? मोनेर भाबना केमन पोरिचालित हॅय, तनेर सोंगीत केमन ओनुदित हॅय, कखSनो बिचार कोरेछो? बुझते पारेछो?’
कमालिस्तान की अलसायी दोपहर बिजली के भारी केबलों के बीच जाने किन गांठों में उलझी वहीदा दाढ़ियों की गुत्थी के पीछे ढंके उस भोले फणीश्वर से कुछ कहना चाहती थी, फिर लगा अजनबी गांव का आदमी जाने क्या का क्या समझ बैठे, मन की बात मन ही दाबे हैदराबाद के उस पुराने पहचाने चेहरे को ढूंढती रही जिस मुनीर के साथ कभी हाईस्कूल से लौटते हुए कबाब खाया था, चारमीनार के गिर्द रिक्शे के चक्कर लगाती रही थी, तुम्हें अपनी नायिका याद है, मुनीर?
‘आमि आर छोबि-सिलेमा देखी ना, आमार भीषोन राग हॅय.. ना हले अश्रु बोये चले..’
‘आइ हेट टीयर्स! किस फ़िल्म में कहा था राजेश खन्ना ने, याद है?’
‘ऊंहू, धर्मेंद्र ने मीना कुमारी से ‘फूल और पत्थर’ में कहा था मालती, तुम इन लोगों को नहीं पहचानतीं.. या ऐसा ही कुछ?’
‘नहीं, तुम बोलो तुम्हें ‘यक़ीन’ अच्छी लगी थी या ‘फूल और पत्थर’? ‘प्रतिज्ञा’ बेटर थी या ‘मेरा गांव मेरा देश’?’
‘रवैल साहब की फ़िल्म थी, शायद आशापूर्णा देवी का उपन्यास था, ‘संघर्ष’- दिलीप कुमार, बलराज शाहनी, जयंत, संजीव कुमार सब थे उसमें, मुझे उसकी याद है!’
‘और सुनील दत्त ने वो एक फ़िल्म बनाई थी, रेगिस्तान में शूट किया था, गूंगा नौजवान अमिताभ, ‘रेशमा और शेरा’, उसकी नहीं?’
‘रेगिस्तान में ही केए अब्बास ने भी जलाल आगा को लेकर एक फ़िल्म बनाई थी, ‘दो बूंद पानी’, जयदेव का म्यूजिक था.. फिर गौरकिशोर घोष का उपन्यास था, ‘सगीना’, फ़िल्म वैसी अच्छी नहीं थी, लेकिन याद है..’
‘नायिकार जीबोन किन्तु? मोटामोटी आमादेर सोबाइयेर जीबोन किन्तु?..’
‘ओ गो नन्दी, कइसन तS सोहाना मौसम है, अऊर तूमि कहंवा-कहंवा का यादी का पेटारा खोल रही हो, काहे ला खोल रही हो, नन्दी?’
आज फिर बारिश होगी. इन दिनों रोज़ ही हो रही है. पानी के थपेड़ों में खूब सारी उदासी बरसती रहती है, फिर भी अच्छा लगता है.
'आच्छा लागे केनो बलो तो गो नोन्दोलाल?'
बंटवार: अबरार और मंजरी
बरसाती नीमअंधियारों के वे फैले-फैले दिन जब समय की थाह न लगती हो, दिन में रात और रात में दिन कैसी तो पानी के रंगों सी घुली-मिलती हो, पेटी पर कुहनी टिकाये बैठा बारहवीं सदी का जैसे कोई सधा शब्दसिद्ध सेठ हो, आदमी बतियाता है फ़ोन पर जाने कहां-कहां की कैसी बहक बकता रहता है. अलबत्ता आंखें उसकी, स्वायत्त- अपने में ही भीतर कहीं खोयी हुईं- अपलक उलझी ताकती रहती हैं, डैटा-प्रोसेसिंग किये चलती हैं, खटर-खट स्नैपशॉट्स खिंचते चलते हैं शहर के नक़्शे में गुमनाम, चटख रंगों में दमकते जीवंतता की सूनसान ज़िन्दगियों के भीषण तैलचित्र. चलता रहता है उसिना चावल के बासी भात-सा दिन का मेहराया, घबराया कारोबार.
लगे हुए मैदानी घास के बरसाती हरियाये को बिसराये टूटी सड़क पर ताज़ा सज आयी घास की जाने कैसी मुहब्बत में धंसी बुद्धू भुअरायी नन्हीं एक बकरी अचानक के उठे शोरील बगूलों में बदहवास कुलांचे मारती है, रेतभरा डोलता कोई नशीला ट्रक है, बचपन के नशे में अजबजायी बेचारी बकरी अल्ला-मियां को याद किये बिना कैसे तो अपनी जान बचाती है. बेचारी कब तक बुद्धूघने बचपने में मग़रूर नाचती फिरेगी, जल्दी ही जीवन दनदनाया सिर आकर नाचेगा फिर बकरी बबुनी किस नशे में राहत का खैर-कत्था मनायेगी?
आंखों पर हाथ डाले, आत्मा को नंगी हथेली संभाले आदमी उस भरे हरे के बाहर के कुहरिल अंधारों में उतरता है, अंतर्मन के तलघर में तस्कर बिम्बों का कोई व्यभिचारी बाज़ार है, अजब-गजब जींसों की लहरदार पुकार है, ओह, जगर-मगर जंगखार स्टेडियम में एकदम बलवा छूटा हो की तरह भहराये अरर-बरर शब्द गिरे आते हैं, कराहते चार वाक्य कि कंधा छिला, चौदह रोते कि घुटना फूटा है, सजगता की अपनी सस्ती फटी फड़फड़ाती छतरी ताने आदमी दायें हिलता कभी बायें तकता, क्या देखता कहां तलक देखता?..
बिन दीवारों का कोई बहुत बड़ा कांजीहाऊस दीखता. उससे सटा एक और. फिर और और और, न खत्म होता एक अंतहीन सिलसिला. कीचभरी पगडंडी के उस पार जाने किसकी ज़मीन है कौन देश है एक दबी आवाज़ उठती एक हमारी तरफ़ भी है, और इसका भी कहीं से कहीं तक अंत नहीं, दोस्त.. मटियाये धोती में प्राइमरी के मास्टर प्रसाद सर दीखते, हकबकाये हल्ला मचाये कि सूरन अगोरते सतपुतिया कीन रहे थे कहां भटक गए, कैसा कांटा है, बच्चा, किधर अझुरा दिया हमें?
आदमी उनींदा फुसफुस बुदबुदाएगा अफ़्रीका, आह, कितने सारे संसारों घुमा दिया हमें..
बंटवार: मुक्त गद्य के गल्प
संकरी एकदम सीध में चली गई उठान-ढलानभरी सड़क पर चुमकी कुछ आगे जाकर ठहर गई है, पलटकर मुझे तिक्त नज़रों से देखती बंग्ला में सवाल करती है, ‘हुआ क्या तुम्हें? देह में जान नहीं?’
चुमकी क्यों खुद मैंने भी यह सवाल किया होता तो स्वयं को क्या जवाब देता? कुछ नहीं, यूं ही मुंह ही मुंह कुछ बुदबुदाता, यंत्रवत पैर खींचता चुमकी से आ जुड़ता और हम एक ओर पीले फूलों से भरे झींगा के बागान और दूसरी ओर जंगली अमरी के झाड़ों के बीच टूटी-अधबीच कभी भी कच्ची, रेतीली हुई सड़क पर चुपचाप धीमे कदमों आगे चलते चले जाते.. नहीं, चुमकी?
लंबे इंतज़ार और बीसियों मनौतियों के बाद हुआ फुआ का इकलौता बेटा सतेंदर छुटपन में अपनी मांग के पूरी न होने पर इसी तरह सबसे छूटकर पीछे घिसट-घिसटकर चला करता. फुआ हारकर खौलती चिल्लातीं, ‘तू नीमन से आवतारS कि तहरा के उठा के हियें नाला में दहा दीं?’ नाले में बहाये जाने की धमकी में जाने भय के कैसे गांठ छिपे होते कि छह साल का सतेंदर बोकार फाड़कर रोता एकदम घबराया हुआ फुआ की ओर भागा आता और फिर चुन-चुनकर, उसी रुदनभरे फुत्कार में, ऐसी-ऐसी गालियों से फुआ को नवाजता कि अम्मां तक के कान गर्म हो जाते, फुआ की ओर थककर देखती साहा आंटी नि:श्वास छोड़तीं, ‘आच्छा प्रोभु तुमको बोरदान दिया किन्तु, ना की?’
चुमकी के नज़दीक पहुंचने पर मैंने पूछा, ‘बचपन में मेरी फुआ का बेटा सबसे पीछे-पीछे चला करता था, सतेन्दर, उसकी याद है?’
‘मुझे किसी की याद नहीं’, चुमकी के साथ ऐसा होता है, रहते-रहते एकदम उदासीन हो जाती, उसी अन्यमनस्कता से बोली, ‘मुझे यह भी याद नहीं कि दस वर्ष पहले मैं खुद कैसी दीखती थी. तुम्हें याद है?’
‘मुझे?’ मैंने चौंककर चुमकी को देखा. वह भी मुझे देख रही थी लेकिन मैं जानता था मेरी तरफ देख रही है, लेकिन मुझे देखेगी नहीं.
वैसे ही जैसे चुमकी जानती थी कारमेल कॉन्वेंट स्कूल से बीएसए की हल्की साइकिल पर लौटते हुए, एक लय में आगे की तरफ कंधा झुकाये, सबों को इंद्राणी हालदार के तीखे नैन-नक़्श दीखते, मैं हमेशा हैरत से उसके पैरों को तकता.
चोटों से घायल होकर लाल-नीली दवाइयों, पट्टियों को रोज़ पैरों पर चढ़वाने का मैं भी पुराना ढीठ था, लेकिन चुमकी के पैरों पर के गहरे, गाढ़े काले निशानों के सामने मैं भी एकदम सुन्न हो जाता. इतनी-कितनी कहां से चोटें बटोरती रही है चुमकी कि जिसके सामने मेरा आवारापन भी इतना कमतर व हास्यास्पद है? मेरे देखने में कुछ ऐसी बेहया जुगुप्सा होगी जभी चुमकी ने जाने कितनी मर्तबा मेरे चेहरे को हाथ से ठेलकर मुझे परे धकेला है, ‘देखता क्या है रे बुद्धू, बोल ना?’
मैंने हंसते हुए चुमकी को जवाब दिया, ‘मुझे याद है दोपहर स्कूल के बाद कोई पूछता हुआ हमारे गेट के बाहर स्कूटर से उतरा था कि इंद्राणी यहीं रहती है? मैं चबूतरे पर पीछे बैठा ड्राइंग कर रहा था या किसी और काज में बझा था, मैंने जवाब नहीं दिया था, मुन्नी या मंजू कोई आगे आके बोली थीं यहां तो कोई इंद्राणी नहीं..’
‘फिर?’ धीमी आवाज़ में चुमकी ने इतना भर ही कहा. मुझे उलाहना देकर डांट सकती थी कि बदमाश, तुम तो फट् से आगे जाकर बोले होते! लेकिन नहीं, चुमकी आत्मीयता का कोई ऐसा दावा मेरे साथ साझा करना नहीं चाहती थी. बुदबुदाहट में सिर्फ़ एक ‘फिर?’ भर ही पूछा.
‘फिर क्या, उस नौजवान के हाथ में कागज का एक नोट था, उसे उलटते-पुलटते उसने कहा लेकिन पता तो यहीं का दिया था, इंद्राणी यहां नहीं रहती? तब तक रसोई में परदे की ओट से मां ने देखा होगा, वह साड़ी पर हाथ पोंछती बाहर चली आई, इंद्राणी हालदार तो? यहां नहीं, वो बगलवाले क्वार्टर में रहती है.’
बगलवाले क्वार्टर के गेट पर अपने को खोजनेवाले से मिलने अंदर से भागी-भागी चुमकी आई हो, ऐसा नहीं हुआ था, बाहर घबरायी हालदार आंटी आई थीं, चिढ़ और झुंझलाहट में नौजवान को गेट पर ही रोके-रोके जवाब दिया था, ‘ना, यहां कोई इंद्राणी नहीं रहती! आर कखोनो इधर जिगेस करते आसो ना!’
चुमकी चुप वैसी ही गुमसुम बनी रही, मानो उसकी नहीं, मैं उसे किसी और की कहानी सुना रहा होऊं.
बाद में मंजू ने हालदार आंटी को मां से फुसफुसाकर कहते सुना था कि बहन जी, दुबारा कभी कोई जिगेस करने आये तो आप बोलो नहीं इंद्राणी किधर रहती है करके..
बीच कोर्स कॉलेज से बाहर निकालकर चुमकी ऊर्फ़ इंद्राणी हालदार उसके दो महीनों बाद ही गुपचुप बरौनी इंडियन ऑयल के किसी ट्रेनी अफ़सर के संग व्याह दी गई थी!
उसके बाद कितने साल बीत गए, नहीं, चुमकी? कितने साल बीते?
झींगे के पौधों पर बीच-बीच में सजे कैसे तो प्यारे पीले-पीले फूल. कुछ आगे जाकर बागान पीछे रह जाएगा, पीले फूलों की दृश्यावलियां चुक जाएंगी. एक बिंदु पर आकर जीवन का सबकुछ कहीं न कहीं इसी तरह तो चुकता रहता है, नहीं चुकता रहता? तुमसे ज़्यादा इस बात को कौन समझेगा, चुमकी?
लेकिन उठान-ढलानभरे संकरी सड़क की सीध के आखिर में जहां मैं पहुंचा हूं इस, या किसी बात को समझने के लिए चुमकी मौज़ूद नहीं, आपस में ठंसे-धंसे और अब लगभग खंडहर हो रहे पुराने चीप-टाइप क्वार्टरों की बस्ती है, वहां मैं दीपंकर बेहेरा को खोजता पहुंचा हूं. जो थोड़ा-बहुत गांजा पीकर बहकने की लयकारी कौशल मुझे प्राप्त है कह सकते हैं दीपंकर बेहेरा की बदौलत है. हाईस्कूल में वह मुझसे एक साल सीनियर था, जीवन को अपने ऐंठ के बल पर जीने के स्कूल में तो हमारा मुकाबला ही संभव न होता, तीन-चार क्वार्टर छोड़कर उसके पड़ोस में गेट पर सूती की लाल साड़ी में एक गोद और दूसरी साड़ी के ओट में बच्ची लिए एक बेढब, फैली हुई औरत दिखी, दांत खोदती मुझे खबर किया, ‘दीपंकर को अब खोजके क्या. वो गया. दो साल पहले. लीवर कैंसर.’
इसके पहले कि अभी मैं दीपंकर की खबर पचाऊं, सूती की लाल साड़ीवाली साड़ी के पीछे डोलती बच्ची को सामने खींचकर बंग्ला में बोली, ‘भुले गेयेछो? आमायो चीनते पारो ना?’
‘के? मामुनि?’ संकोच और शर्म में डूबी हुई जाने कैसे मेरे हलक से आवाज़ बाहर आई. कनपटी पर कहां-कहां सफेद होते बालों को कान के पीछे दबाती औरत मुस्कराकर मेरा चौंककर देखना देखती रही, ‘सेई तो, एबारे बुझेछो..’
छह और सात साल की यही मामुनि थी जो मेरे साइकिल के कैरियर के दोनों ओर अपने पतले-पतले पैर बांधे, सीट के रिंग को मुट्ठियों में भींचे छुटपन की सुनहली संझाओं में पड़ोस की सड़कों पर लहरदार चक्करों के अनूठे सुख के लिए बदहवाश मेरे पीछे भागा करती. कभी-कभी इस पागलपन से दौड़ती कि उससे छोटी, पांच साल की मुनमुन को अपनी दीदी को इस तरह दौड़ते देखने से भय होता. हाथ में किताब लिये गेट और घर के दरवाज़े के बीच टहल कर रही चुमकी भी दौड़ती गेट तक आती और चीखती मुझपर बरसती, ‘तोमार माथा खाराब ना की, देबू? सेइ मेये टा पोड़बे जे?’
वो लचीली कोमल शाख मामुनि सामने खड़ी थी और मैं उसे नहीं पहचान सका था! इस बेमतलबपने, ऐसी अनासक्त उदासीनता का मैं क्या जवाब सोचूं? मेरे तमाम बेहयायी के बावजूद भी संभव है?..
मगर गर्मी की छुट्टियों की कितनी तो सूनसान दोपहरों में आम के पेड़ों के झुरमुट में झूले पर डोलती- अपने महज होने में सुखी- चुमकी को बिना आपस की किसी बातचीत के चुपचाप देरों-देर निरखता मैं मन ही मन सोचता, अकुलाता नाचता फिरता कि यह झोला टूट पड़े, यह चुमकी गिर पड़े- अपने उन गुप्त संगीन अपराधों की, इतने-इतने वर्षों बाद भी चुमकी ने कोई सज़ा सुनाई हो, मुझे अपने लिए कभी इतना महत्वपूर्ण बनने कहां दिया? कभी दिया, चुमकी?
गेट के लोहे में पैर फंसाये मामुनि चहकती बताती है, ‘तुमियो बुड़ो होये गेछो किन्तु?’
मैं सिर नवाये चुपचाप मामुनि का फ़ैसला स्वीकारता हूं. तुम जहां कहीं हो देख रही हो, चुमकी?
बंटवार: आधुनिक लोककथा

एक नयी किताब, ग्राफ़िक-गल्प की बाज़ार में और आई है, फिगर ऑफ़ स्पीच है, अभी आई नहीं है, अगले महीने के आखिर तक आएगी. एनीवेज़, अफ़सोस हमने नहीं बनायी है, उन्तीस वर्षीय बंगालोरु बसित अप्पुपेन ऊर्फ़ जॉर्ज माथेन हैं, उनकी सजायी है.. और पहली मर्तबा है, छपवंता अपने सुरिंदर मोहन फाटक को अंग्रेजी में ब्लास्टानेवाला चेन्नई का प्रकाशन ब्लाफ्ट है..
ख़बर है बाबू जॉर्ज माथेन फेसबुक के रस्ते ही प्रकाशक के दरवाज़े तक पहुंच गए, उनकी ग्राफ़िकी का नमूना तो चीख़-चीख़कर अपने छप सकने की संभावना का ऐलान करता ही है, जबकि हमारी ग्राफित्ती सब जो हैं, मन में इतना सारा हैं बाहर आने के नाम पर पता नहीं किन-किन बहानों के पीछे अटकी रहती हैं.. याकि हम ही हैं जाने कहां छिटके रहते हैं.. पता नहीं बहुत हर्ष नहीं है लेकिन लग रहा है अभी और बहुत समय तक भटकेंगे?.. तसल्ली के लिए इतना ही कह सकते हैं कि एक यह है, इसके लिए भी बहुत दिनों से भटक रहे थे, अब हाथ आ गई है! ब्लाफ़्ट के ब्लास्ट को आने में अभी देर है, सितम्बर के आखिर तक आएगी, मगर अक्टूबर के बीच तक तो फिर अंग्रेजी में अनुदित होकर अपने होनहार दुलरऊ अदबकुंवर की किताब "मासूमियत का महखाबख़ाना" भी बाज़ार में चली आएगी! देखिए, ज़रा उसके कवर की सजावट देखिए.. खिलते हैं गुल जहां जैसा नहीं लग रहा है? ख़ैर, नहीं लग रहा है तो आपके नाक में दिक्कत होगी क्योंकि हम तक तो महक आ रही है.
अलबत्ता यह दीगर बात है पता नहीं कहां कन्फ़्यूज़न हो जा रहा है, बाज़ार का दुलार हम तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है!?
बंटवार: किताबी दुनिया, ग्राफ़िक स्टोरी


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बंटवार: चिचरीकारी, टैबलेट टेल्स, स्केचिंग

"सोच-सोचकर जान निकलती रहती है, क्यों निकलती रहती है? सुबह की अजान में भी जैसे कोई सूना-अकेलापन हो, तुम पीछे खड़े बातें करते हो और मुझे ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं से ख़ामोशी घेरे बना रही हो, क्यों लगता है? ये इतने ख़्याल, इतनी पंक्तियां दौड़ती-भागती रहती हैं, हमेशा तुम्हीं से बात हो रही हो, सो भी नहीं, फिर ये इतने सारे सिलसिले कहां-किधर निकलते हैं?.. वो अभी-अभी नीला रंग देखा तुमने? नहीं देखा? यानी फिर सब मेरे मन के वहम हैं.."
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बंटवार: चिचरीकारी, टैबलेट टेल्स, स्केचिंग

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यह फुरहुरी, चुरमुरी ख़ास विमल की मनचली और अपनी सर्दी की बेकली के लिए..
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काले, धुंधलकों में यह ख़ास टुपुर, डिम्पल और गुड्डा के लिए..
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बंटवार: चिचरीकारी, टैबलेट टेल्स, स्केचिंग
जबकि आज मौसम बेईमान है भी नहीं, फिर भी जाने क्यों है कि मन जलोटा, छनौटामय तुम चंदन हम पानी जैसा लग रहा है. उसमें भी, ससुर, बीच-बीच में फिर चंदन उड़ जाता है और पानी-पानी की ही अनुभूति रह जाती है, क्यों? और यह ऐसा इसलिए भी नहीं कि खुद से चिढ़े हुए रवीश ने गोबर-गणेशत्व की मीमांसा कर ली है उसके धुंधले असर में हैं, या बनारस के भइय्या ने संगीत-मोहिनी के चरणों में हमारी रूना के मुहब्बत और लायलपुरीजी की कल्पना के नारियल फोड़ दिये हैं उसके घुंघराले झमेले हैं, फिर क्या है कि मन ऐसा उड़ा-उड़ा किंचित-कंपायमान-सा हुआ जाता है? कहीं इसलिए तो नहीं कि दो दिनों में शहर से बाहर निकल रहा हूं, लेकिन वियेना, बूदापेस्त, पारी पहुंचने की बजाये घरपल्ली की तरफ जा रहा हूं.. इसीलिए घबरा रहा हूं?
ईमानदारी से कहूं सुबह से न नारियल के छिलके उतारे हैं, और न ही उलझे, अपने कोमलकांत केश संवारे हैं, बेहयायी से मन साधे सुर थामने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन कंठ है उसी बेहयायी से सुरअभागा हुआ जाता है..
घरपल्ली की रहते-रहते आदमी दिल्ली नहीं हो आ सकता? दिल्ली हमेशा दूर अस्त ही रहेगा? या फिर सीगल की दूकान और कॉलेज स्ट्रीट की भटकान में कोलकाता ही? फिर पता नहीं है क्या है यह भी सोचता हूं धर्मशाला ही हो आऊं? धर्म न सही चेहरे पर दुशाला की नयी-ताज़ी महक ही पाऊं?
बंटवार: ब्लॉगिंग
रात के अन्हारे कहंवा-कहंवा त् टहले को निकल लिये. मने बेचैनी थी (कब नहीं होती?) मगर माथा खाली था, हाथ में लोहावाला एगो पुरनका बाल्टी था गोड़े चुराईल चटाकी..
कहीं कौनो खटका हुआ अंतर की आवाज एक देवाली से उठके दुसरका ले टकराये होगा, फुआ चदरा हटाके हुंकारी- को है? केहर जाता है?
हमसे आगे-आगे तीन कदम पर हमदम, हमरा जो संगीन सितम चल रहा था, फुसफुसाके बोलीस- जानता है किधर जाता है?
अन्हारे गोड़ फैलाते गए, जवाब नहीं दिये.
आत्मा आंख का नोक पे लाके रंजू राय सवाल की थी- बाद को तुम पीछे हट गये और हमरी हंसी उड़ी, तब?
लड़ाई का मैदान में संघातिक तीर, भाला, बरछी सब ताने हुए था, रंजू राय अकेले खड़ी थी, हम सात गो कपड़ा का नकाब मुंह पर बांधे थे, कहंवा-कौन जबाब देते?
बिदेसी भासा प्रकासन गृह, पेइचिंग में छन रुंग सन अस्सी में कहानी छपवाके सवाल की थी, अर्ल लवलेस फेबर एंड फेबर का पन्ना में सन छेयानबे में नून का दाम पूछे, हम अन्हारा में हाथ मारते रहे, जबाब दिये?
काठा का बीड़ी सोलगाके खुदी से जिरहबाजी करते रहे कि मरदे, एतना आन्हारा काहे है? टहल का रस्ता कवन ओर है?
फुसफुस का फूल-पाता सब झरता रहा, धुंधलका का धुआं छोड़ता रहा, जबाब कहंवा था?
बंटवार: भोजपुरी आधुनिक
कुछ दिन हुए नितिन और मैंने साथ माथा लगाया था हाथ फंसाया था, प्रत्यक्षा के निहोरे से यह ग्राफ़िक गल्प प्रतिलिपि के ठौरे तक पहुंची थी, नितिन लजाता रहा था अलबत्ता मैं बेहयायी से माने बैठा था कि पता नहीं कौन, कहां के प्रकाशक होंगे, अमरावती के नहीं तो अमरीकन ही होंगे- मुझसे द रबाईज़ कैट और डेविड बोरिंग लिखवाये बिना मानेंगे नहीं! प्रकाशक की मनौव्वल काम न करेगी तो हमें रिझाने प्रकाशक की बेटी स्कारलेट जोहानसन के गेटअप में आयेगी..
ख़ैर, तो एक बार इससे फिर ज़ाहिर हुआ प्रकाशक पैसे की उड़ान उड़ते हैं कल्पना के पर नहीं चीन्हते, ठीक-ठीक न बेटी का सुर समझ पाते हैं, न जिसके प्रेम-सुरा में बेटी के बहके कदम लड़खड़ा रहे हों, उसका कद सुलझा पाते हैं. बहुत ही दुख की बात है. दूसरी दुख की बात है समीर लाल से संवेदी-पुरुष भी हिन्दी ब्लॉगों में सघन मानवीय ऊष्मा की प्रतिमूर्ति बने रहते हैं, लेकिन प्रतिलिपि तक जाकर भी कमेंट छोड़ आयें उसकी कल्पना नहीं लड़ा पाते. तो कुछ यही सब वज़ह रही होगी, हारकर, अज़दक पर चार लोग और देखेंगे के मोह में, गिरिराज से माफ़ी मांगते हुए, दुबारा ब्लॉग पर चेंप रहा हूं.
पढ़ने में असुविधा हो तो हर फ्रेम को क्लिकियाकर कृपया नयी खिड़की में खोलकर देखें..
फिर भी दिक़्क़त होती ही हो तो नज़र मारने को प्रतिलिपि की बड़-बड़ छपाई है ही..






बंटवार: graphic story, ग्राफ़िक गल्प, रॉटरिंग राग, साहित्यिक झोला
ऐसा नहीं है कि पिछले दिनों सिर्फ़ सार्वजनिक जीवन ही है जहां ह्रास के नये उन्मेषों में हम उन्नयित-उन्ननियत-सा प्रतीत करते रहे हैं (कृपया देखें: गीता दीवान वर्मा, या फिर देखें और देखते रहें: तेज और पाल), निजी जीवन का मादक-वन भी है जिसकी उपस्थिति हममें उलझे, अनूठे मूर्छा का संचार करती रही है (कृपया देखें: पतन समग्र). मुर्दनी-मदन के ऐसे ही मादक थपेड़े रहे होंगे जिसके स्मरण में उल्फगांग अमेदियस जैसे रचनाकारों ने ‘कोसी फान तुत्ते’ की रचना की होगी, बाबू न शाह तीस वर्षों से थियेटर फोड़ रहे हैं, जबकि बाबू प्रकुसि हैं एक भी नारियल न फोड़ने के बावज़ूद कुछ फूटे-फूटे-से रहते हैं, कुछ इसीलिए, हाथ कंगन को आरसी क्या जैसे मुहावरे की तह में जाने, और कांटे की बात उगलवाने की गरज से हमने प्रकुसि को उनकी कल्पना के चेकोस्लोवाकिया में घेरा, स्वयं से घिरे हुए वह पहले से थे ही, हमारे बीच हुए औपन्यासिक विमर्श के ग्राफ़िक एक्सप्टर्स..
सवाल- उम्र के इस गिरते उठान पर आकर खुद को कैसे देख रहे हैं, प्रकुसि?
जैसाकि स्वाभाविक था, हमेशा की तरह प्रकुसि प्रैस से नाराज़ थे, नया एंगल बस यह था कि अड़तालीस साल की लंबी अवधि गुज़र जाने के बाद अभी खुद तक से भी नाराज़गी थी, उसी सुर में भावुकता से, रोने की बजाय उन्होंने गाते हुए सवाल का जवाब दिया- इन्हीं उम्रों ने लीना दुपट्टा मेरा.. (फिर थोड़ा कल्पना में यूरोप से घूमकर लौटते हुए) चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया.. होहोहो, खोया-खोया चांद, खुला आसमान, रात के हमसफ़र थकके घर को चले?
इन पंक्तियों का लेखक ज़माना हुआ शैलेंद्र क्या, रघुवीर सहाय तक को निरखना भूल चुका था, ऊबे हुए दु:ख में उबासी लेते सवाल किया- वर्षों हुए कवि ने ऐलान किया था, ‘शहर अब भी संभावना है’, कालांतर मतलब इतने काल के अंतर पर आप क्या कहोगे?
प्रकुसि का चिढ़ा हुआ जवाब- कभी मैंने कहा कवि हूं? जिनने कहा आप उनने से ही जाकर जवाब क्यों नहीं लेते? (फिर क्षण के कालांतर में विचार-मदन होते हुए) फ़िलहाल तो ‘मैं अब भी संभावना हूं’ की असंगतता से ही जूझता रहता हूं!
अंदर कहीं गहरे दर्द होगा, या शायद दांत का ही था, जूझते हुए अ-कवि ने आगे जवाब दिया- ‘Oh, one more again.. I wonder if this is life, or living hell?’
लक्षण पुराने जितने भी हों, सुहाने नहीं थे. प्रकुसि सिसकारियां भरते रहे, इन पंक्तियों के लेखक ने सीटी बजायी और हवा में ऐसे गायब हुआ जैसे सार्वजनिक जीवन से इन दिनों जिम्मेदारी गायब हुई है..
बंटवार: कंटीले कोट, मन की गांठ
“सिर्फ़ मेरी आत्मा ही नहीं, पूरी दुनिया नीचे गई है. एक वो दौर था, कोई और जन्म था, जब मैं अपनी सांसों से कवितायें लिखती थी. अब तो खबर लिखती हूं, लोग कविता समझकर पढ़ते हैं.”
-- दूसरी बार पंजाब दारजी शिरोमणि सम्मान मिलने पर वरिष्ठ कवियत्री अमृत कौर.
“Who said filmmaking had anything to do with art? Isn’t it more about wearing nice clothes and taking girls to bed in shady make-up vans?”
-- Ramos Pareiras, retired Cine-Guild Member and veteran Junior Artist.
“I know my writing is not going to make even a lizard fart, but that’s what I learnt in my youth, and that is what that will take me to my grave.”
-- Gustáv Kǐs, unemployed anarchist from the old quarters of Berlin.
“हिम्मत है मेरी आंखों में देखकर मुझसे बात करो?”
-- भूतपूर्व प्रेमी की ओर से अंतरंगता खत्म होने पर इंदौर जल निगम में तृतीय श्रेणी की कर्मचारी सुचित्रा किरकिरे, दबे हुए रोश के किन्हीं सुलगते क्षण में.
“What are they talking? Who are these people?”
-- Revathi Rao, reacting to a Hindi writer’s speech during a National Linguistic Conference in Masulipattam.
“I just wanted to make something of my life. Even a poor sod from a poor village of Orissa got a right to make something of his life, hasn’t he? Fine, I cheated from office, stole from people, but tell me honestly, what other choices I had?”
-- Bisram Bhuian, suspended IAS officer responding to judicial probe into his exorbitant extra income.
बंटवार: कंटीले कोट, पतनशील साहित्य
प्रेरणा कहां से आती है? प्रेरणा को दिखता नहीं उसके इतना आते रहने को मैं टेढ़े खड़ा-खड़ा संभालता रहूं, उतना मेरे जीवन में जगह नहीं है? इस हरामख़ोर बरजोर माचिस की डिब्बीमयी जीवन में अपने को टिकाने भर तक की बाज मर्तबा जगह नहीं निकलती? फिर भी प्रेरणा है जैसे फ्रायड को कभी पढ़ा नहीं, युंग के सपनों में झांका नहीं, मुंह उठाये चली आती है.. क्यों चली आती हो, बंबई में जगह का ऐसा खंजर मंजर है, बाहर पता नहीं कहां लेकिन कहीं तो खुले हरियाये हरियाले होंगे, जाओ वहीं, दिल लगाओ, अबे, हमपे चढ़ी क्यों आती हो, ओह? आं? एक मिनट, अब यह कौन हैं? लो, यह भी हाथ हिलाते आंख नचाते चले आये, अबे?..
अब यह दर्द भी कहां से चला आता है? (हमारे पास कवि ने कहा है आता है दबे पांव के लोक-लाज की मर्यादा में भी नहीं आता, धम्म्-धम्म् गोड़ बजाते हमारा समूचा स्वत्व हिलाने पहुंच जाते हैं. एक मित्र को कुछ लिखा मेल किया था वह देखकर अवाक हैं, मेरे पास दर्द पहुंचता है मेरी सारी सवाकता धरी रह जाती है) इस तरह से कैसे चला आता है दर्द? चले आने का उसे हक़ है? लेकिन पहले ज़रा प्रेरणा को फरियाते चलें..
हां, तो प्रेरणा सीढ़ियों पर खड़ी है और सन्न है. जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि अच्छे-भले आदमी की हंसी जेब में धरी रह जाती है और सन्न होने के सिवा चारा नहीं बचता; फिर प्रेरणा जिस तरह मेरे यहां पलीत हो रही है बे-चारीपने में सन्नभाव उसकी उपस्थिति का लगभग स्थायीभाव हुआ जाता है. अभी भी जो सीढ़ियों पर खड़ी है उसी सन्नभाव में ही खड़ी है, आंखें फटी-फटी, चेहरे पर वही पहचाना ‘यू टू, ब्रूटस?’ वाला एक्सप्रेशन, ‘तुम्हें मालूम हैं यहां कितने हैं मुझसे बात करने तक को तरसते हैं? और तुम, इग्नोमॉनियस, नीच, कहते हो मेरे पास जगह नहीं हैं, दिल में प्यार नहीं है? एनी पॉसिबल साथ का संसार नहीं है? जैसा देश है और एक से एक जैसे नमूनों से रोज़ पेश आना पड़ता है आई हैव हैड माई शेयर ऑफ़ सफरिंग, लेकिन इतना गिरा आदमी, ऐसी पिटी नीचता तो पहली बार देख रही हूं? डोंट यू हैव एनी शेम?’
प्रेरणा के पीछे सीढ़ियों से प्रतीक्षा सखी कामना के संग गुज़र रही थी, दोनों की चिरकुट चुहलता को बहकी अनमने नज़रों से पीता-पोंछता मैंने थकी आवाज़ में अपना घिसा जवाब दुहराया, ‘आई हैव लॉट ऑफ़ हर्ट, डोंट नो अबाऊट शेम, सॉरी प्रे.’
जैसे इतनी देर से कर-करके अभी थकी नहीं है, प्रेरणा फिर से सन्नता वाली एक्टिंग कर रही है (अमरीकावाले सारे माल अपने यहां चले ही आते हैं फिर इतनी खराब एक्टिंग कहां से आती है?), मैं जवाब देने की हालत में नहीं, जहां-जहां दर्द है उसे सहलाता धन्य हो रहा हूं. थोड़ा गहरे जाकर महसूसने पर लगता है मित्रलोग जो बात-बात पर अवाक होते रहते हैं, संगत के ग़लत असर में कहीं मैं भी बिगड़ने न लगूं.. ?
बट, दर्द जो आकर बैठ गया है, ठीक है ऐसी ही नियति थी, लेकिन सवाल बना रहता ही है कि आखिर ये प्रेरणा कहां से चली आती है? इतना सारा दरवाज़े पर खड़ा करके सुनवाया है मैंने फिर भी बेहया आती रहती है.. ?
व्हाई लाईफ़ विल ऑल्वेज़ बी अ स्ट्रेंज बिज़नेस जिसपर मेरा हैंडल नहीं होगा.. माने साइकिल किसी तरह डोलती चलती होगी, बट हैंडल-विहीन, दैट सीम्स प्रिटी स्ट्रेंज, इज़ंट इट?
बंटवार: पतनशील साहित्य, ब्लॉगिंग







