बदले मौसम में चेहरे पर अचानक गिरे तमाचे की ठंडी झुरझुरी है, आंखें समझना चाहती हैं कि सब कैसे कितना कहां बदलता है, लेकिन कहीं भी तकने से डरी अपने ही भय में भरी, भारी मुंदी-मुंदी सोचतीं, देखने के वक़्त हर कदम कितना गिरी-गिरी हैं. उंगलियां डोलती हैं बेहयायी में और शर्मिंदा होती हैं, मानो भूखा बच्चा भूले से पड़ोस की रसोई घुसा आया है और बेमौक़ा अपनी भूख में शर्मिंदा है. त्वचा कहती है इस तरह हमारे ही आसरे भरो, हमें भरमाओ-भरभराओ नहीं, उठो, बेमुरव्वत बाज़ार फैला है दूर-दूर, मेरी ही तरह दिखेंगी दूसरी, किसी और के कंधे गिरो किसी और को फंसाओ, जाओ. दिल कहता है, दिल कहता है कहां है हम, ये भूरी-भूरी दीवारों पर धीमे-धीमे पसरता धुआं, यह किसका घर है, कौन पंजों में दबाये हमें भगाये लिये जा रहा है, ऐसी नर्म अकुलायी सांझ किस जनम का कौन दुश्मन है, आवारगी का ब्लूज़ गाये जा रहा है?
Dec 29, 2009
दिसम्बर की बीतती सांझ
बदले मौसम में चेहरे पर अचानक गिरे तमाचे की ठंडी झुरझुरी है, आंखें समझना चाहती हैं कि सब कैसे कितना कहां बदलता है, लेकिन कहीं भी तकने से डरी अपने ही भय में भरी, भारी मुंदी-मुंदी सोचतीं, देखने के वक़्त हर कदम कितना गिरी-गिरी हैं. उंगलियां डोलती हैं बेहयायी में और शर्मिंदा होती हैं, मानो भूखा बच्चा भूले से पड़ोस की रसोई घुसा आया है और बेमौक़ा अपनी भूख में शर्मिंदा है. त्वचा कहती है इस तरह हमारे ही आसरे भरो, हमें भरमाओ-भरभराओ नहीं, उठो, बेमुरव्वत बाज़ार फैला है दूर-दूर, मेरी ही तरह दिखेंगी दूसरी, किसी और के कंधे गिरो किसी और को फंसाओ, जाओ. दिल कहता है, दिल कहता है कहां है हम, ये भूरी-भूरी दीवारों पर धीमे-धीमे पसरता धुआं, यह किसका घर है, कौन पंजों में दबाये हमें भगाये लिये जा रहा है, ऐसी नर्म अकुलायी सांझ किस जनम का कौन दुश्मन है, आवारगी का ब्लूज़ गाये जा रहा है?
Dec 23, 2009
आ मेरे हमजोली आ, बरजोरीये आ!
क्रिसमस आ रहा है. आ क्या रहा है लगभग सिर पर खड़ा है (कुछ भेंट-सेंट लेकर नहीं आया है घंटा, बट दैट्स अनादर स्टोरी. बट दैट्स ऑल्सो फ़नी कि देयर इज़ ऑल्वेस वन अनादर स्टोरी, नहीं?). क्रिसमस निकलेगा नहीं कि बाबू नवका साल दांत चियारे, सवालों का झोला पीटते हुए सामने खड़े दीखेंगे. और कुछ लगभग उसी अनुपात में, मैं रोता, दीखूंगा. भागकर आंसू पोंछने चली आये ऐसी कोई कमउम्र लड़की ख़्यालों में आह भरकर उठती, बीच-बीच में गुज़रती मिलेगी, लेकिन सामने आकर, ठोस भौतिक सुख का सबब बने इस भौतिकता में दीखने से स्वयं को बचाती फिरेगी!कहने का मतलब, मतलब बने इस तरह लइकी नहीं आएगी. क्रिसमस ससुर और उनके यार, नवके बहार, हाथ झुलाते हाज़िर हुए जाएंगे. कोई बतानेवाला मिलेगा नहीं कि भई, ये नेमत- या आफ़त- आख़िर रहते कहां गायब हैं कि एक दिन धप्प से सामने हाज़िर हो जाते हैं? और आने की बेहया ज़िम्मेदारी से इसी कदर बंधे होते हैं तो अपने पीछे-पीछे एक बैंक लेकर आते? फटेहाल, लुटाहाल अनबैंकेबल बैंक ऑफ़ बिलासपुर ही होता, मगर बैंक तो होता? भीतर भारतीय विलास-समर्थ हिन्दुस्तानी करेंसी न होती तो भी हम बुरा न मानते, मोहब्बत से समझते, समझाइश देते कि इस चिरकुट देश में हज़ार चिरकुट दिक्कतें हैं, ठीक है, भई, चूल्हे पर उबलता रहे ये मुल्क, हमें आप ढाका या काठमांडू की तरफ़ ही ठेल दो, कबतक और किस-किससे शिकायत करते फिरें, अपना नया साल हम वहीं खेल लेंगे? उधर तक भी अगर इसी चिरकुट बमचक का नज़ारा रहा तो हम तो सियाह घाना के घनों की ओर भी निकल चलें, बस हमारे मलिन आयतन को नीचे बैंक का समझदार संबल मिलता चले, आं, ठीक फ़रमा रहे हैं न?
लेकिन फलतुए की बहक है, पुराने अनुभव से कमोबेश अंदाज़ा है अपने झुलने में नवका साल गुलाबी बेगम की अदाओं में नौटंकी फैलाने चली आएगी, और पीछे-पीछे तो क्या, अपने से दस गांव की दूरी तक अपने साथ बैंक ऑफ़ बिलासपुर तो क्या, बैंक ऑफ़ तबाहधूर भी नहीं लाएगी! सस्ते संतरा के शरबत और तलत महमूद के सदाबहार गानों से ‘अब लगता नहीं जी उजड़े दयार में’ के फलकट इंतज़ाम खुदी करने होंगे.
यही तो अनूठे, अनोखे मौके होते हैं जब हमारी तरह का समझदार, मर्मधनी अंधा पाठक आगे लपककर बाबू अल्बेयर कामू और उनके अस्तित्वबर्बाद को लोप लेता है, या वहां भी घबराहट होने लगती है तो फिर, चार कदम आगे, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, जितेंदर और लीना चंदारवरकर वाले आदर्शपरात में सिर बोड़कर लता मंगेशकर के रहस्यवादी सवाल, ‘मैं आऊं? मैं आऊं? आ जाऊं?’ पर मोहब्बत रफ़ी की तरह हारकर फ़ैसला ले ही लेता है, ‘आ जाSS!’ (फिर स्वगत: देर तक नामुराद! बुदबुदाने से भी बाज न आयें बट देन, अगेन, दैट वुड बी अनादर स्टोरी..)
Dec 18, 2009
जै जमरुदपुर, जै ज्यूरिख़
नई बात नहीं हुई. यह अक्सर होता है. कि खोजने निकले थे पेंसिल, कलम लेकर घर आए. तो कौन पेंसिल खोजने निकले थे अब यह प्रासंगिक नहीं, किताब की शक्ल में जो कलम लेकर लौटे वह यह है. कुल बारह ग्राफ़िक कथाओं की इस किताब में स्वित्ज़रलैंड और हिन्दुस्तान दोनों तरफ़ के लोगों का काम है, थोड़ी मिली-जुली दुनिया है, एक स्विस सिपाही के दिल्ली में बिताये चन्द दिनों के अनुभव-लोक से आप बहरियाते हैं, तो ठीक बाद कोई बंगाली अपने यूरोपीय अनुभव को गाता मिलता है, मैंने पशोपेश में पैसे फंसाये थे, तो उस लिहाज़ से गरीबी को शर्मिन्दा करनेवाली खरीदारी नहीं साबित हुई. मज़ेदार फिर यह भी है कि बारह कहानियों में बारह अलग-अलग शैलियों से सामना पड़ता है, एक तरह की चिचरीकारी आपको माफ़िक न जमे तो दूसरी पसंद आने लगती है. निजी तौर पर में क्रिस्तोफ़ बादू और काती रिकेनबाख़ की लकीरों में उलझता रहा. आप भी थोड़ा उलझ आयें इसके लिए यह एक और लिंक चिपका रहा हूं, एक-दो चिचरीकृत्य आप देखें और उतना तो यहीं देख लें, दोनों नज़ारे दिल्ली के हैं..
साथ ही ब्लाफ्ट का एक ठेठ दक्खिनी काम भी उठाया, कभी पहले अपने यहां पोस्ट में चर्चा भी की थी, अप्पुपेन के 'मूनवर्ड' के बीसेक पन्नों से गुज़रते हुए सच कहूं, सचमुच निराशा हुई. बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी की जगह बात कहीं निकलती ही नहीं..
Dec 16, 2009
Dec 15, 2009
इतिहास-चक्कर, या व्हॉटेवर..
‘देह का सत्य-तत्व कहां बसता है, प्रभु? और अंधेरे वन में अंधेरी आंख, कैसे तकती है?’ कल्पना के जापानी मांगाओं में उलझे ऋषिपुत्र सुकुमार तपोधन विशाखकुसुम प्रश्न करें, व प्रश्नोपरांत लम्बी सांस लेने का अवकाश टटोल रहे ही हों, कि जो साक्को की ग्राफ़िक कथा ‘गोरात्ज़े’ की शांत घाटियों में एक बार फिर सर्ब सर्वनाशी हरमख़ोर मशीनी बंदूकों की बेशरम शोर कांपती तड़तड़ाहट गूंजने लगे, धुंधलके के बगूलों में ‘तड़-तड़-तड़-तड़..’ की तान छूटे, देर तक कहीं कुछ उखड़ता, दरकता, टूटता रहे. दूर तक.
राममनोहर लोहिया के जाति व इतिहास-चक्र से अनजान, अर्ल लवलेस ‘नमक’ के रास्ते अपनी जातीय पहचान के दिशाहारेपन में देश का बिगड़ा नसीब क्यों है कैसे है का नोट लेते उस बिखराव को संवारने निकलें, और आगे जाकर कहीं किन्हीं दूसरे धुंधलकों में खो जायें. भिलाई इस्पात कारख़ाने के बाहर चाय की गुमटी लगानेवाले किसी सीनियर, ‘ओल्डियर’ शंकर गुहा नियोगी समर्थक के हाईस्कूल फेलियर छोकरे रंजीत कुमटी के मुंह से बहुत बरसों बाद दक्षिण दिल्ली के बेर सराय क्षेत्र में अनमने सुनने को मिले, ‘बड़का लोकन से उलझके का होता है, मास्टर? लैफ़ का लंगी लगत है, इतिहास का काया-कलप कौनो थोड़े होता है?’
‘कल्पित समुदाय’ के अमरीकी रचयिता बेनेडिक्ट एंडरसन अपने इरानी प्रकाशक से पूछें हमारी रचना का चीनी, कोरियाई अनुवाद आ गया, ठीक है, मगर मान्यवर, नेपाली और मणिपुरी में कब आएगा? कुनैन की कड़वाहट मुंह में लिए इंटरनेट की नाव पर सवार आगरा का हिन्दी प्रकाशक नवीनमोहन प्रामाणिक आंख मूंदे जाने कितनी सदी पीछे लेटे, एक ऊजबक दिखते भले अंगरेज से टकरा जाये, और टकाराते ही एकदम फैल जायें, ‘अच्छे अदम स्मिथ हो, खामखा हमारा पुश्तैनी प्रकाशन खा रहे हो, मथुरा में रहते तब देखता अर्थव्यवस्था देखते-देखते कितनी आसानी से कबिता भी बना रहे हो?’
Dec 14, 2009
कोई मतलब बचा है? अख़बारों का?..
अख़बारों का अब भी कोई मतलब है? मतलब दूसरी जगहों में शायद बचा हुआ हो, मगर हमारे देश में? या वह महती प्रगतिशील हिन्दी साहित्य की तरह है, प्रकाशकों और पैसा कमानेवालों के लिए है, छपकर सुखी हो जानेवालों के लिए भी है, लेकिन पढ़ाने और समाज को कहीं आगे पहुंचाने के लिए, है? मालूम नहीं, मगर सवाल है. वाज़िब सवाल है. आपके पास तैयार जवाब होगा, मेरी जेब में नहीं है. जवाब का 'ज' भी नहीं है. कहनेवाले कहेंगे ब्लॉगिंग की हलचलों को देखो, दीखेगा हिंदी कहीं से निकलकर कहीं पहुंच रही है, कुछ उत्साही क्रांतिधर्मी गदाधर कार्यकर्ता लपककर सामने आएंगे, कहेंगे ओ बटनधारी बदमाश, हिंदी चल नहीं रही, दौड़ रही है! (घर के बच्चों को हम अंग्रेजी स्कूलों में भेज रहे हैं उसका गोबर उछालकर यह सुहानी, दीवानी तस्वीर गंदा न करो!) ख़ैर, मैंने पहले ही कहा एक सवाल है, कुछों के पास इसका तैयार जवाब होगा, कुछों के पास टेम्परेरी, कुछों के पास कुछ नहीं भी होगा. जैसे मेरे पास नहीं है. कि अपने देश में अख़बारों का क्या मतलब है. ख़ास तौर पर हिन्दी अख़बारों का तो सचमुच, अगर आप अपनी बेटी के व्याह के लिए वर्गीकृत विज्ञापन न छपवा रहे हों, या राखी सावंत किसकी बांह से निकलकर किसकी बांह की तरफ़ बढ़ी का अपडेट लेने को न अकुला रहे हों? मतलब है? हिंदी ही क्यों, मालूम नहीं किसी भी अख़बार का कोई मतलब है या नहीं. मालूम नहीं. मैंने निजी तौर पर लगभग चार महीने हुए, जितने लिया करता था, सब अख़बार बंद करा दिये, मगर चूंकि आदमी आदत का मारा है, और एक वक़्त के बाद वही रुटिन पीटता रहे तो पकने लगता है, तो हम भी पकने लगे और दस दिन हुए, अख़बार दुबारा चालू कर लिया, लेकिन सच बतायें, इन दस दिनों में शायद ही दो 'अग्रलेख' और डेढ़ पृष्ठलेख पढ़े होंगे, तीस पन्नों को उलटने और शीर्षकों से गुज़रने तक में थकान होने लगती है, और हमेशा की तरह, सुबह के भूले शाम को पता नहीं किसके घर लौटे की तर्ज़ पर यह ख़्याल मन में घुमड़ने लगता ही है कि इस काली छपाई का सचमुच कोई मतलब है? सुचमुच?फिर दोहरा रहा हूं मालूम नहीं. जर्मनी में किन्हीं उत्साही सज्जन ने किसी दूसरे किस्म का गुबार निकाला है, अपने लिए उसका लिंक चेंप रहा हूं, कि बाद में पलटकर देखने आऊं कि भाई साहब को कहां, क्यों, कोई मतलब दिख गया..
हद है.
(अक्टूबर, 1945 नुरेमबर्ग मुकदमों की ख़बर पर आंख गड़ाये उत्साही जर्मन अख़बार-पढ़वैये, चित्र यूरोज़ीन से साभार)
Dec 12, 2009
ड्रॉपबाक्स
मज़ाक दरकिनार, ड्रॉपबॉक्स का आप भी फ़ायदा उठायें, मेरे ख़्याल में तो मस्त चीज़ है, मगर एक प्रकट दिक्कत यह है कि आपने पैसे अदा करके अगर ज्यादा जगह नहीं खरीदी है तो फिर दिक्कत है, दिक्कत इस शक्ल में है कि जितने लोग आपके संग फ़ाइल शेयर करेंगे, उनके पीसी में घिरी जगह आपके पीसी की भी अलोटेड जगह का घिराव बनती चलेगी और देखते-देखते आपका ड्रॉपबाक्स 'जगह कम है, गुरु!' की उदासी गाने लगेगा!
इसका समाधान, जितना मुझे अपने अज्ञान में अभीतक समझ आया, वह यह है कि जो भी फ़ाइल शेयरिंग में आपको अपने ड्रॉपबाक्स के फ़ोल्डर में मिली, उसे तड़ से अपने पीसी में अन्यत्र कहीं कॉपी करके चिपका लें, और ड्रॉपबाक्स के वेबसाइट के अपने अकाउंट वाले मेनु से उस कॉपी हो चुके फॉल्डर को 'अनशेयर' करके घेरी हुई जगह को खाली कर दें, इस तरह आप अपने पीसी में ही जगह नहीं खाली कर रहे होंगे, जिस भले आदमी से आपको फ़ाइल प्राप्त हुई है उसके पीसी में भी जगह को राहत की सांस भरने देंगे, अदरवाइस फ़ाइल भेजनेवाले के लिए संभव ही न होगा कि वह ज़््यादा वक़्त तक (शायद समूचे एक दिन तक भी?) एक फ़ाइल ड्रॉपबाक्स के वेबसाइट पर शेयर करने को छोड़ सके.
आई कुछ बात समझ में? अरे, खाली घुघूती का लिखना ही समझ आता है? हद है.
Dec 11, 2009
Dec 10, 2009
हरमख़ोर रात कब, कहां?..



गरीब की लड़की का जी जुड़ा जाये जितना माथे पर चूते तेल की मानिंद ढलान पर ढिलमिलाती, बिछलती चली जाती साइकिल की रपटन-सी ज़िंदगी में इतनी सारी दोस्तियां बनती हैं, कितनी सारी? कैसी हंसियों की हांक बनती है, सूने दोपहर के अंधेरे, दिल में चाकू के चार फांक? दीवारें फंदवाती है अमरुदें चुरवाती, कांख में तीन नोटबुक दाबे बेटिकट पसेंजर रेल के सफ़र में लालबहादुर शास्त्री की भावुकता गवाती है, ‘अम्मां, तुमको बहुत दु:ख दिये, लेकिन अब सुधर जायेंगे’ की बेलय-तानहीन, बेबस प्राणहीन ग़ज़ल, गूंजाती? हाय-हाय की सारंगी पर सायं-सायं का तबला दौड़ाते, भगते-भाग आते जीवन में दोस्तियों का दादरा जामुन के पेड़ में छन कटहल के कोयों में उतरता है, गुड़ के झाग और फगुए की आग में हुमसता चीख़ता ज़िंदगी में दोस्तियां बनती हैं कितनी सारी, इतनी सारी?
मगर ऐसा कब कोई मिलता है, दोस्ती, छनकर जाड़े की सुबह खिड़की पर धूप के टुकड़े की तरह थम जाये? जिसके आगे समूचे आत्मा के जंगखाये रेजगारी की थैली उलटकर धर दें, पलटन अपनी पलटा जाये, कि बाबू, यही मामलाए-माल है, चाहे बाराती जितने हों, अब आगे का हिसाब करो, हमको हमारे सायों से निकालो बाहर, आज इस क़यामत की हरमख़ोर रात घिसकर साफ़ करो?
Dec 8, 2009
उदासी..

गुमसुम, ग़ायब रहती है, महीनों ख़बर नहीं होती कहां भागी, या हुआ, सारे सम्बन्ध खत्म कर लिए? के ख़्यालों में दबे, पुराने दु:खों की तरह लगभग भूल-भुला जाती है, और जीवन अनजानी हवाओं व सड़कों पर पहचानी आदतों के बासी रुमाल में लिपटा किसी उडूपी रेस्तरां में दोपहर के सस्ते खाने और बझे हुए हैं के बेमतलब बहानों में बीतता चलता है, तभी एकदम दीखती है सामने की खाली कुर्सी पर, फीकी मुस्कान का एक बेग़ाना गाना फुसफुसाती, थाली के निवालों में अटकी उंगलियों की कंपकंपाहट पढ़ती, आत्मा के अभेद उजाड़ों को कैसे, कितनी जल्दी बेमतलब किये जाती.
ठीक है वह सब फिर, मगर बात जो है वह यह कि उदासी के पास कहने को ख़ास कुछ नहीं होता, थोड़ा जो कहती बहकी-बहकी बोलती है, फिर देर तक चुप रहती, चुपचाप तकती है. रिश्तों के चुक चुकने के दरमियान की जो अस्पष्ट तनावभरी ख़ामोशियां होती हैं, कुछ वैसे में ही खिंची-खिंची ख़ामोश बींधती रहती है. उंगलियों के पोर ऐंठने लगते हैं, धुंधलके की दीवानगी में कभी किसी क्षण खड़े गिर पड़ेंगे के एहसास में हारकर मन दोहराता है, ऐसा क्या है यहां, क्या लेने आती हो? उजाड़ की इतनी बड़ी दुनिया है किसी और ठिकाने क्यों नहीं जातीं?
लातखाया ग़रीब उधारी की शरम भूल जाता है की तरह बेहया बटुये से सस्ती लिपस्टिक निकालकर रसहीन होंठ सजाती है, हाथ से हाथ सटाकर बताती है, एक बार दिल जुड़ने के बाद मोहब्बत पूरी उम्र कहां जाती है..
Dec 7, 2009
हलफनामा..
हां, भोर उनींदे सपना-न्यूज़ में
ख़बर आई है, झूठ नहीं, खांटी
सैकड़ा प्रतिशत सच है, एकदम
रिबन-चोटी की लम्बी रस्सियां
झूल, डकैती करने ही चढ़ा था
बच्चों की खिलौना-रेलगाड़ी में
फिर ग़लती हुई जाने, या कि
पुरानी यादों के प्रेत होंगे
जागे के सपने में दीखे
प्लास्टिक के खेत होंगे
बहका, आंख मूंदे किसी पगलोल
बुढ़िया की लोरी सुनने लगा
हारा, आदत का मारा तीन कविता
में जीवन की पहेली और आदर्श
के पंचांग बूझने लगा, डोले-डोले
ऊंघने लगा, यहीं हुई कि जाने
शुरुआत से ही ग़लती के
सिलसिले थे, इतने में तो मामला
पेरु से निकलकर पेराम्बूंर पहुंच
चुका, इतने में तो हरामख़ोर
हमसे चौदह दर्जा होशियार बच्चे
लुटे डकैत की आंख में धूल फेंक
फेर किये, हमको घेर लिये
धड़ाम-धड़ाम बैलून का बम फोड़े
बेरहम डकैत को वहीं ढेर किये.
Dec 6, 2009
एक सरल सिंप्लिसिटी के उलझाव..
एक सूखे बालों वाला कभी हंसमुख बच्चा रहा होगा, अब बीमार कैशोर्य का भोपाल गैसपीड़ितों के वृत्तचित्र का स्थिर, अस्वस्थ-चित्र हो रहा था, दरवाज़े की रेलिंग से बाहर को झूलता जाने किसे बता रहा था कि तेज़ हवा उसके रुखे बालों में क्यों किसी तरह का बयार जनमाने में असमर्थ होगी.
घुटनों पर दोनों हाथ बांधे जुसेप्पे ने पीदमोंते वाली पहाड़ी ज़बान में मुझसे गुज़ारिश की, ‘इससे बोल अंदर चला आये, किसी से टकराकर, कटकर गिर पड़ा तो इसकी मां किसके पास जाकर रोएगी?’
मैंने चीख़कर लड़के को बंग्ला में डांटा, ‘अबे, तुझे सेवन-अप जमता है या स्प्राइट?’
लड़के ने एक उड़ती नज़र मुझे घूरा, कहा नहीं लेकिन बांग्ला में पर्याय होता तो बिना कहे मुंह में वह ‘घंटा!’ ही बुदबुदा रहा होता, फिर चुपचाप एक सीट के कोने बैठकर पि़डली की दाद और नाक खोदता, टाइमपास करने लगा.
कोचिंग से फ़ुरसत बनते ही जैसे पंद्रह साल के बच्चे पड़ोस की कटरिना कैफ से मोहब्बत करने लगते हैं, दोपहर के टेलीविज़न प्रोग्रामों से बाहर आकर कस्बे की गृहस्वामिनियां सांझ को औलादीन की शिक्षा की चिंता, कुछ वैसे ही लड़के के रुखे संसार से अपने को बाहर निकालकर मैंने जुसेप्पे से शिकायत की, ‘क्या ज़रुरत थी खामख़ा इस क्लैरिनेट-कुसंग में उलझने की, अच्छा-खासा अपनी अलसाहटों में उल्टा जैज़ के कुछ सपने देख रहा होता, या साठ के दशक की किसी हंगैरियन फ़िल्म में अपने, ‘अपनों’ को देख रहा होता?’ फिर चिढ़कर मैंने ठेठ भोजपुरी में उलाहना दिया, ‘इट्स ऑल शीयर टाइम वेस्ट, व्हॉट वी आर डुइंग इन दिज़ गॉड-फॉरसेकेन पैसेंजर ट्रेन? जिसका न कोई पास्ट है ना फ्यूचर, जिसकी अदद एक बत्ती तक सलामत नहीं?’
जुसेप्पे ने दुर्गापुर के रास्तें में खरीदी होगी तो मैंने देखी नहीं थी, अभी देखा कि वह डिब्बी खोल, उसमें कानी उंगली बोर, नाक में ‘नसनी’ सूंघ एक बार फिर अस्तित्ववादी रहस्यवाद के हवाले हो गया, फुसफुसाकर मुझसे बोला, ‘व्हाई कांट यू सी कि यही जैज़ है जिसे हर वक़्त तुम अपने दिमाग़ में बजता सुनते हो? हेडेन का व्योला, डिज़ी का ट्रंपेट, ड्यूक का पियानो, सब यहीं है, यू जस्टु हैव टू फ़ील इट!’
‘बकवास मत करो, दोस्त, आयम रियली गेटिंग वरीड,’ मैंने थककर आंखों को दोनों पंजों से ढक लिये जैसे फेबर एंड फेबर की अपनी लेखों की किताब ‘इमोशन पिक्चर्स’ के कवर पर विम वेंडर्स ने ढंका हुआ है.
(बाकी..)
Dec 5, 2009
सपने से बाहर
रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं, विवेक की भाषा के दुलार में चेंप रहा हूं, देखनेवाले एक नज़र मारकर फिर अपनी हारों, या स्वार्थों का, तबला बजाने- आत्मा की मरोड़ को पुचकारते- दिन की दौड़ का भूगोल सजाते कहीं से कहीं निकल जाएंगे, मतलब समाज कहीं नहीं जाएगा.
पंक्तियां 1982 में छपी ‘लोग भूल गए हैं’ की ‘फ़ायदा’ शीर्षक कविता से है.
इतिहास की व्याख्या करता हूं
हमदर्द सुनते हैं और अपनी उन्नति की सोचते रहते हैं
उस समय
उन्हें मतलब नहीं कि वक्त ने समाज के साथ क्या किया है
वे जानना चाहते हैं कि वक्त ने जो हालत की है समाज की
उसमें वे सबसे ज़्यादा क्या पा सकते हैं.
Dec 4, 2009
फिर भाषा..
लेकिन फिर उसकी एक सामाजिकता होगी
जिसमें चार लतीफ़े और नौ कुंजियां होंगी
पंडों का पंचांग, क्षेत्रीय सरकारों, अख़बारों
की विज्ञप्तियां होंगी, गांव की सड़क पर रात
आठ के बाद का सूनसान, अपने को कवि
बताते किसी सिरफिरे का करुण-रुदन, एकांतिक
आख्यान होगा, बड़ी दुनियाओं की मौज़ूदगी का
एक गंवई उन्वान होगा, बहरे कभी रात सारी
जगे रहे अपनी धुन में घने रहे तो सुन लेंगे
भाषा की हारमोनियम पर कितना लंबा
मर्सिया-गान हुआ, संभावनाओं नहायी
हंसती-दौड़ती बच्ची थी, ओह, देखते-देखते
किस आसानी, अपने ही आंगन अवसान हुआ.
सिर्फ़ एकवचन के सपनों में दीखता बारिश
के बाद का धुला, खुला चमकता मैदान होगा.
भाषा के तो वास्तविकता में अदरवाइस
फोड़ी होगी, गड़ेगी गड़ती रहेगी, कपड़ों
की गिनकर दो जोड़ी, चेहरे पर अकाल
की गरीबी दुर्निवार, सजीले सुहानों में
श्यामवर्ण की कठुवाई मार, फक्क हंस
देने की बेहया नासमझी, बेज़रुरत शऊर
पैरों पौन तीन रुपये के आलता का
सिगरेट की डिब्बी में धरे पान के बीड़ा
का घटिया सिंगार होगा, शोहदे हंसते
चलेंगे, जैसे आंखमूंदे पंडे बकते
जब-तब उपवास करेगी, भाषा बारह बार
व्याही जाएगी, कोख भरा है भर जाएगा
का शास्त्री जी आशीर्वाद देंगे, आंख मूंदे देते रहेंगे
आशीर्वाद की सरकारी नाव पर फिर जर्मनी
और सुरिनाम जाएंगे, पूरी-नाम और डॉलर
का ईनाम जीमेंगे, बुनिया के पत्तल पर दांत चियारे
राम और बलराम का मशहूर वीडियो बनेगा, इस
दरमियान घर के अत्याचार औ’ पड़ोस के व्यभिचार
में भाषा तीन बच्चे जनेगी, दो अभागी श्यामवर्ण
बेटियां होंगी, एक मुंहजोर बेटा होगा, गली में नून
की दुकान पर नून होगा तेल खरीदने के पैसे न होंगे
हिंदी में अंग्रेजी स्कूल का हिज्जों की गलतियों
से गंजा इश्ते्हार होगा, चीनी सेलफ़ोन पर
’आप आए बहार आई’ की चीख़ती अश्लीलता होगी.
Dec 3, 2009
बहुत भूख लगनेवालों की कहानी..
बूढ़ी दिखी तो बोलती हुई ही दिखी. जाने संबलपुरिया बोल रही थी या गंजाम वाली ज़बान. जुसेप्पे गौर से कभी उसे तो कभी धीमे-धीमे हमारे गिर्द इकट्ठा होती भीड़ को पढ़ता रहा, जबकि मेरे मन में बुढ़िया के तंबाकू से एकदम काले पड़ गए दांत कहीं गड़कर फिर वहीं अटके रह गए थे, मैंने पास खड़े एक बीसेक वर्ष के लड़के के कंधे को उंगली छुआते उससे कटकिया उड़िया में सवाल किया, ‘क्या है, लोग अभी तक तंबाकू से दांत मांजते हैं?’ जुसेप्पे ने टोककर मुझे चुप कराया और तंबाकू रंगे पोपले मुंह वाली बूढ़ी की बातें कोई हमें समझा सके इसके लिए हीरो होंडा भेजकर सात किलोमीटर दूर पड़ोस के गांव से मेडिकल के छात्र बिबेक परिड़ा को बुलवाने की व्यवस्था हुई.विवेक कानों में एमपी थ्री का ईयर-फोन लगाये बाइक की पीछेवाली सीट से उतरा, जुसेप्पे को देखकर उत्साह में ‘जोसेफ सर, जोसेफ सर!’ पुकारता उसका एक सीनियर सिडनी में डॉक्टर हो गया है और बैंक से लोन की व्यवस्था हो गई तो वह भी ऑस्ट्रेलिया की ओर निकल जाएगा के किस्से सुनाने लगा, उसके बाद ‘इज़ ऑस्ट्रेलिया रियली भेरी रेशियल, सर?’ जैसे सवालों की चिंता. मैंने बच्चे को पुचकारकर उसे जुसेप्पे से अलग किया, उसके कंधे पर हाथ धरकर उसे खांटी कटकिया में समझाया, ‘बेटा, हमलोग बहुत दूर से आए हैं, बुढ़िया क्लैरिनेट बजानेवाले की कहानी कितना और क्या जानती है, यह जानने आए हैं, तेरा गाना उसके बाद सुन लेंगे, इज़ दैट ऑल राइट?’
बिबेक को मेरी अंतरंगता रास नहीं आई, न अपनी जगह जाने किसी क्लैरिनेट बजानेवाले की कहानी में हमारी दिलचस्पी, लेकिन जुसेप्पे को मुस्कराकर सिर हिलाता देख उसने कुछ वही किया जैसा मैं उससे करने को कह रहा था, मतलब बूढ़ी की उखड़ी बातों को वह ध्यान से सुन रहा है की सस्ती एक्टिंग करने लगा.
कुछेक मिनट बाद बिबेक ने छोटे स्तर के जिम्मेदार सरकारी कर्मचारी की तरह हमें इत्तिला दी कि बुढ़िया अपने दोनों बेटों से नाराज़ है. बड़ा कलकत्ते में अनाज की मंडी में किसी सेठ के यहां नौकरी करता है, छोटा कटक के किसी प्रिंटिंग प्रैस में है, शादी करने के बाद दोनों बदल गए हैं खाते-पीते नौकरीपेशा औलादों के रहते बुढ़िया शिकायत कर रही है उसके पास तंबाकू खरीदने तक के पैसे नहीं रहते, भिखारियों से बदतर वह जीवन बसर कर रही है, क्या ईश्वर के यहां न्याय नहीं है?
मैंने ऊबकर एक सिगरेट जलायी, बूढ़ी के हाथ सौ के दो नोट रखे, विवेक से कहा उससे पूछे क्लैरिनेट बजानेवाले के बारे में क्या जानती है?
बिबेक ने बुढ़िया के आगे मेरा सवाल दोहराया तो वह नोट करीने से संभालकर अपनी मैली साड़ी के किनारे गांठती एकदम एनिमेटेड होकर बात करने लगी.
थोड़ी देर बाद बिबेक ने टूटी-फूटी अंग्रेजी, और उससे भी खराब हिंदी में जो बताया उसका लब्बोलुबाब था: बाजा बजानेवाले को एक नहीं बुढ़िया ने बीसियों मर्तबा देखा था. दिखने में बहुत हद तक वह मुझ सा ही दिखता था, सिगरेट भी मेरी ही तरह जल्दी-जल्दी पीता. जब बाजा नहीं बजाता तो सिगरेट पीता होता, या फिर अपनी राह जाते लोगों को छेंककर उनसे सवाल करता कि वह इस पर क्या सोचते हैं और उस पर क्या. क्या इतने छोटे जीवन में चैन से कुछ वर्ष गुज़ार सकें, हमें इतने तक का अधिकार नहीं जैसी बेमतलब बातें. फिर बच्चों के लिए गांव में एक अच्छा स्कूल होना चाहिए जैसी बहकी योजना के पीछे वह चरवाही और मजूरी में लगे गरीब किसानों को दिक् करता रहता. बीच-बीच में कुछ दिनों के लिए गायब हो जाता और लौटता तो हंसते हुए दरवाज़े से अंदर आकर चिरौरी करता, ‘काकी, घर में जो भी रांधना है खिलाओ, बड़ी भूख लगी है!’
फिर उसके सूराग में पीछे पुलिस आने लगी, शिकायत होने लगी कि बिगड़े तत्वों को अपने यहां शरण देकर बूढ़ी गांव गंदा कर रही है. बुढ़िया घबराकर कुछ महीनों के लिए अपनी बिधवा ननद के गांव चली गई, उसके बाद से ‘बाजा-बजैया’ को फिर कभी देखा नहीं. मालूम नहीं कहीं और चला गया, पुलिस धरकर लिये गई, क्या हुआ. लोग एक बार चले जाते हैं उसके बाद कभी उनका पता चलता है भला?
गांव के शिक्षित बुजूर्ग नंदी बाबू हैं. कभी कटक में वकालत किया था, तीन कमरों वाला एक मकान अभी भी शहर में है, वकालत की कमाई से ही खरीदा था, लेकिन मातृभूमि का मोह होगा, ज़्यादा वक़्त अब गांव में ही रहते हैं, पान का एक ताज़ा बीड़ा मुंह में दाबकर अपने दालान में पंचायत की खटिया खींचकर फैलकर बैठते हुए बोले, ‘बुढ़िया की बातों को गंभीरता से मत लीजिएगा, वह चोट्टी है, कुछ नहीं जानती. हमारा गांव नेक और अच्छाम है, कोई बाजा-टाजा बजानेवाला यहां क्योंह गड़बड़ी फैलाने आएगा? और हम किसी हरामी को अपनी मातृभूमि में घुसने देंगे?’
वकील साहब के घर पर हमारे लिए चाय और नमकीन का इंतज़ाम हुआ था, प्लास्टिक की नई नीलकमल कुर्सी में फंसे जुसेप्पे ने अभी चाय का पहला घूंट भरा भी नहीं था कि नंदी बाबू उत्साह में छूटकर पूछे, ‘ये सब फालतू की गप्प छोड़िये, मिस्टर, बताइये, आपके डॉलर का आजकल भाव क्या चल रहा है?’
जुसेप्पे ने चाय एक ओर बगल में टिकाकर मासूमियत से जवाब दिया, ‘मालूम नहीं, डॉलर क्या, अपन युआन की सेहत से भी एकदम अनभिज्ञ हैं. और अपनी यह चाय आप रहने दीजिए, कहीं से हंड़िया-सड़िया पिलवाइये, थोड़ा मिज़ाज़ तर हो, क्यों ?’
यह ‘क्यों’ जुसेप्पे ने मेरी तरफ देखकर कहा था, मैं जवाब देने की जगह नंदी बाबू के चेहरे का उड़ा रंग देखता रहा, मगर ज़्यादा देखने की ज़रूरत न हुई क्योंकि इसी बीच जुसेप्पे ने जेब से एक घिसा हुआ माउथऑरगन निकालकर बजाने लगा था, और इधर-उधर की जनता, नंदी बाबू के रसूख और ठेलुआहट को नज़रअंदाज़ करती बड़े चाव से बाजा सुनने भी लगी थी.
(बाकी..)
भागना..
और अपना दीवाना मन गूंथ निकल भागना, दोस्तं,
भागती रहना, भागती भागती.
चीन की दीवारें होंगी, रात की गहरी सियाह ख़ूंखारें
न समझ आनेवाली, किसी अनजाने देश किसी पराये सपने
से उधार लिया हो जैसे दीखेंगी बीच-बीच कभी चमक का जगमग गिराती बहारें
पैर जवाब देते होंगे, सिर चकराता आकर हाथ में गिरता-गिरता होगा
होंठों की पपड़ियां सूख-सूख अंतर्मन के धन को बेमतलब बनातीं
मन के बारह मन के बोरों पर गिरी आती होंगी
पहचानी पुकारें पीछे छूटी पुकारती, कभी तसल्ली़
और चैन का आश्वासन देती कभी धमकियों के चोट में
हुंकारती होंगी, मुड़कर पलट-बंसी बजाना नहीं, मदन
सांझ की लम्बी सलेटी उबासियों पर दौड़ता
निकल गया एक लड़का, दूर तक पसर गया लाल साड़ी का किनारा
और एक दिल तोड़ देनेवाली ठुमरी की तान की मानिंद दौड़े
दौड़ना, दूर बहुत बहुत दूर निकल जाना, दोस्त
कविता के पोस्टर के सारे हरफ घुल जायें
घुलते जायें, फिर तब भी दीखता रहे
भागते दीखे थे तुम, दर्द में ज़र्द, ओफ़्फ़, लेकिन
नज़रों में कैसे तो खुद को सजाते, मुस्कराते.
Dec 2, 2009
छुक छुक छुक छुक..
कालीबाड़ी की भीतर की गलियों में जाने इसाइयों के किस पंथ की एक पुरानी, ललहर, साहबों की बंगलानुमा इमारत है, होंठों के ऊपर एक भूरा, भारी मस्सा और हल्के उग आये मूंछों की सजावट वाली एक बूढ़ी नन से जुसेप्पे जिरह कर रहा है, मैं गांजे की टुनक में उनींदा मिशन-पुस्तककालय के पुराने जिल्दों के बीच की अनकैटालॉग्ड शोधपत्रों को पलट रहा हूं; एक शीर्षक पर नज़र जाती है: “सत्रहवीं सदी के प्रथमार्द्ध में भारत में पुर्तगाली उद्यम से नीलाहाट के सामाजिक जीवन में आए बदलाव”, सस्ते स्कूली नोटबुक के कागज़ पर सात-आठ पृष्ठों की एक हस्तलिखित दूसरी रपट का शीर्षक है- “ईश्वरीय अंधश्रद्धा और पैरासीटामोल पर अगाध विश्वास दोनों ही हमारे लिए बराबर रुप से नुकसानदेह हैं.”हाइनरिश हाइनस्त्रास, बर्लिन में 1889 का मैनुफैक्चर्ड एक घिसा हुआ पुराना ग्लोब है, उस पर धीमे-धीमे उंगलियां फेरते हुए, और एक अच्छी नक्काशी का बनारस में बना पीतल का पानदान है, इसे क्यों न उड़ा लिया जाए के मीठे अरमान से जूझता बुदबुदाता हूं, ‘मेरी जान जा रही है, स्वीटहार्ट, लेट्स गेट आउट ऑफ़ हियर!’
पूरी रात रेल का सफर, गैस-बत्तियों की रौशनी को बुझा देने के बाद के तेलियर अंधेरों की महक, झपकियों में आती नींद और खिड़की के बाहर सरसराये ताड़ के पत्तों की महीन हवादार आवाज़ से अगले ही क्षण उचट भी जाती नींद..
अंधेरे में आंख मलता, उंगलियों से टटोलता घुटना पाकर मैं चौंकता हूं किसका घुटना है, कैसा समय है? अतीत का बिसराया कोई क्षण, या भविष्य की खूंटियों पर टंगे किसी भगोड़े, कातर-राग के बिम्ब?
जिस दशक अमरीका में पहली मर्तबा मोटर उद्योग की ज़रुरतों के मद्दे-नज़र सड़कों के निमार्ण में नाटकीय निवेशों की सरकारी मंज़ूरी हुई, ठीक उसीके गिर्द जब श्री महावीरजी प्रसादजी द्विवेदीजी ने अस्वस्थता में हिन्दूसभा के एक प्रांतीय अधिवेशन की अध्यक्षता में असमर्थता जताई थी, ठीक उसी दौरान जब हंगरी के तिरपन-वर्षीय इस्तवान मांदेलस्ताम, जो पिछले नौ वर्षों से एक छोटे ग्रांट की आस लगाये बैठे रहते और हर वर्ष उससे महरूम होकर कुछ जल्दी और ज़्यादा बूढ़े हो रहे थे, अंतत: इस बार पैसों की मंज़ूरी से आश्वस्त अपनी बेथलेहम की यात्रा का सुखद समाचार अपनी तीसरी और सबसे दुलारी बेटी मार्गारिता वॉन बांदेवाउन को देने उस बेकरी की ओर भाग रहे थे जहां वह चार घंटों की पार्ट-टाइम मजदूरी करती थी और अपने पिता से बेतरह स्नेह रखती बशर्ते वह बेथलेहम के सफर की पागल सनक से बाहर आ जायें और सबका जीना दूभर न करें..
ख़ैर, कहने का मतलब बेटी की मोहब्बत और संभावित सुख के उत्साह में दौड़कर सड़क पार करता इस्तवान मांदेलस्ताम ने जर्मन घड़ी के व्यापारी की टमटम के नीचे आकर अपनी जान भले बचा ली, अपने बायें पैर से हाथ हमेशा के लिए धो लिया. यह वही दिन था जब नेपाल की तलहटी में गोरखपुर के रास्ते धीमाल नामके गांव में, बाढ़ की चपेट में, कुल एक दिन में इकसठ लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, ठीक इसी दिन दांतेवाड़ा के एक फ़कीर ने हवा में अनुपस्थित, मगर अपनी नज़रों में दिख रहे, मखमली कोमलता में लिपटे संगीत को पहचान लेने और उड़ीसा के मयूरभंज में एक पोपले मुंहवाली बुढ़िया के नज़दीक ‘वह’ कहीं पाया जाएगा का सूराग दिया था.
रातभर रेल के सफर के तीन दिन बाद, जून की गर्म दोपहर मयूरभंज की इस और उस, जाने किन-किन गांवों की खाक छानते हुए मैं और जुसेप्पे एक वहशी दीवानेपन में पोपले मुंहवाली उस बुढ़िया की खोज में लगे रहे जो हमें हमारे क्लैरिनेट के संगीत तक पहुंचने का रास्ता बताती, और अंतत: दिन ढलते-ढलते वह मिल ही गई..
(बाकी..)
गुम के पहले के बाकी टुकड़ों का लिंक: एक, दो, तीन.
Dec 1, 2009
दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!
इस सत्य तक पहुंचने का अलबत्ता कोई सूराग नहीं कि निकोलस यादव को उसके प्रश्न के वाजिब उत्तर कभी मिले या नहीं, या अंततोगत्वा यही कि मखमल के एक पुराने कपड़े में क्लैरिनेट लपेटे बिहार और बंगाल के सूने मैदानों और उदास जंगलों में भटकते पथिक की अपनी रसधुनी खोज को यादववंशी निकोलस आखिरकार किसी मुकाम तक कभी पहुंचा सका या नहीं.
निकोलस का तीसरा बेटा जो ढेरों वर्ष अंकगणित में माथा फंसाये रखने के अनंतर अंतत: इंग्लिश कंपनी के बिजली विभाग में पंजाब में दूसरे दर्जे का अफ़सर नियुक्त हुआ और सारी उम्र तपेदिक की शिकायत और भय में रहने के बावजूद मौत जिसकी मेंहसाना, जिला- होशियारपुर के एक सब-स्टेशन की मरम्मत के दौरान बिजली के झटकों में उलझकर हुई; उसकी बड़ी बेटी की चौथी औलाद जो एक एंग्लो-इंडियन आया की मोहब्बत में सबकुछ दावं पर लगाकर हांगकांग (या शायद सिंगापुर) भाग गया था, खुदरा कपड़ों के धंधे में जिसने जो थोड़े पैसे कमाये, उसके कहीं दुगने से ज़्यादा शराब और मांदारिन बालाओं पर तबाह करके एक निहायत बेवक़ूफ़ और बरबाद मौत मरा; उसकी फूफीजाद बहन के पोते की इकलौती औलाद, इलियाद क्वेंतिन, जो क्यूबेक, कैनडा में इन दिनों लंबी बेरोज़गारी के बाद पिछले तीन महीनों से एक पब्लिक सर्विस कंपनी की वकीली करता पाया गया, उसके काग़ज़-पत्तरों में मास्टर, वीज़ा कार्ड और वोदाफ़ोन जैसी कंपनियों के अपनी सर्वविदित सार्वजनिक पहचान से अलग, पोर्नोग्राफिक सर्विसिंग से कमाई अकूत कमाई के ढेरों गुप्त आंकड़े हैं, लेकिन डेढ़ सौ पन्नों के उस बड़े फोटोकॉपीड और प्रिंटेड अंबार में कहीं एक जगह भी क्लैरिनेट-मैन का ज़िक्र तक नहीं है. अंग्रेजी में जैसी की कहन है, दैट इज़ अबाउट ऑल देयर इज़!
हालांकि दूसरी ओर, आश्चर्यजनक रुप से महाराष्ट्र और दिल्ली की मैट्रोपॉलिटन ‘चमकाइयों’ से बाहर निकलते हुए मीडिया में मधुर भंडारकर ने ऐलान किया है कि कॉरपोरेशन, फ़ैशन और जेल के जंगले में झांकने के बाद अब उनका इरादा उड़ीसा की जंगलों की ओर कूच करने का है. मीडिया का एक धड़ा इसे माओवादियों में उपजी नई दिलचस्पी और हिंदी सिनेमा में नई संभावना के बतौर पेश कर रहा है, जबकि मीडिया का ही एक अन्य सनकी ग्रुप इसे क्लैरिनेट-मैन की मुख्य धारा में वापसी के सिने-शाहकार के क़यासी रंगों से रंगते थक नहीं रहा है. मालूम नहीं भोर का शुरुआती क्षण है, या बीच दोपहर भूख के अंदेशे की पहली चोट, अवचेतन में कहीं मैं एक दबी बुदबुदाहट सुनता हूं, ‘सच नहीं सपना होगा, और सपना होगा तो उसका ठीक मतलब क्या होगा?’
पंद्रहवी सदी के स्पेन में एक अबादेल ज़ोहराब मसूदी नाम के अध्येता हुए गए, ‘सभ्यताएं कैसे बाज़ार के रास्ते गईं’ विषय पर जनाब ज़ोहराब मसूदी ने चार महत्वुपूर्ण ग्रंथ लिखे, जिनमें अब लगभग सभी अप्राप्य हैं, एक बिगड़े पॉलिश अनुवाद की कुंजी के फुटनोट्स में अलबत्ता तीन जगह मसूदी का ज़िक्र है, अंग्रेजी में अनुदित एक उद्धरण भी है, “a dream is a garden of devils, and all dreams in this world were dreamt long ago. Now they are simply interchanged with equally used and worn reality, just as coins are exchanged for promissory notes and vice versa, from hand to hand…”
मगर ताज़्ज़ुब की बात, क्लैरिनेट-मैन का ज़िक्र यहां भी, कहीं एक बार भी, नहीं है!
(बाकी..)











