Friday, December 31, 2010

जय हो.. गुलज़ार वाला नहीं..

आज की रात, या दिन ही, कैसे गुज़र जाने दें? 'अन्‍नदाता' के अनिल धवन की तरह गाने में डूबकर सुहाना सोचने लगें? मगर वह फिर सलिल चौधुरी की रसभरी में सराबोर भरे रहना भले हो, अनिल धवन के फटियाले रोमान में बंधे रहना न होगा? जबकि दुनिया असांज के विधान और स्‍टीग लार्सन के नये रोमानों में परिभाषित हो रही हो? पिछले दो दिनों में मिलेनियम ट्रिलजी की एक, दो, तीन, तीनों फ़िल्‍में देखी और देखकर थोड़ा सनसनीखेत हो रहा था कि एक यह भी है अपेक्षाकृत साफ़-सुथरे 'लोकतंत्रीय' स्‍वीडन की बेरोक-टोक यातनादायी पापलीला. अफ्रीका वाला खेला तो हमें कापुचिंस्‍की ढंग से 'सूरज की छांह में' दीखा और समझा ही गए हैं. समझना चाहें तो भारतीय माया हमें नीरा रडिया और ए (अद्भुत) राजा समझा ही रहे हैं, दीगर बात है कि हम उनके बीटवीन द लाइन्‍स पढ़ने की जगह मनमोहन और मौंटेक‍ सिंह की सार्वजनिक माया पढ़कर ही भारतीय यथार्थ का उन्‍वान करते रहना चाह रहे हैं. दुनिया रंग रंगीली? सच्‍ची म? कितनी? रात एक ऑस्‍ट्रेलियन फ़िल्‍म देख रहा था, मन फिर से घबराकर सलिल चौधुरी गुनगुनाने को उद्धत होने लगा..

सवाल रहता ही जाता है कि कैसे गु़ज़ारें, दिन या रात जो भी, बेल्जियन 'आठवां दिन' वाला लौमहर्षक वायवीय जीवन जीने लगें? मगर पड़ोस फ्रांस में फिर सीनियर शाब्रोल की 'कॉमेडी आफ़ पावर' दिखना बंद हो जायेगी?

बाबू असांज आप कुछ रास्‍ता सुझाते हैं? अदरवाइस हम‍ पिटवैयों के पास पुराना अमीर खुसरो वाला भजन है ही, 'बड़ी मुश्किल है डगर पनघट की'..

जय हो नवका साल, तोहार स्‍वागत है हरमख़ोर..

Monday, December 27, 2010

अभागे का भूगोल..

ब्‍लॉग की लिखाई के बहुत दिन हुए. ऐसा नहीं कि पड़ोस की किसी ज़हीन बाला के पीछे भागकर जैसलमेर या जापान गया था, या बीच 'भागे' में धराकर (इंटरसेप्‍टेड) पिटाकर बिछौने पर गिरा हुआ था, नहीं, ऐसा कुछ अतींद्रीय नाटकीय रुमानी भी घटित होने से 'भगा' रहा, जो भागना है वह मैं कहीं दिमाग़ की दुनिया में ही भागता रहा (लिखने से खुद को छुपाता, बचाता रहा) और देखिए, घटनाविहीनता के विपन्‍न इतने दिन निकल गए और 'अभागे' भूगोल में मैं वापस सन्‍न खड़ा हूं कि हाय, कितने दिन निकल गए, बहुत निकले. बहुत हुआ.

कुछ चौंके हितैषियों ने डेढ़ लाईनों के पत्र भी लिखे, कि अज़दक किधर हेराया? बौराने की बीमा-पालिसी के दिन खत्‍म हुए? मैं चुप पटाया अपने पैरों के नाख़ून तकता रहा (उनकी नीली नेल-पालिश करने के अरमानों पर उधारी का गरम पानी गिराता), अनमना कि ऐसे मौलिक प्रश्‍नों का क्‍या 'अभागा' उत्‍तर दूं? दूंगा भी तो वह ठीक से देना न हो सकेगा. ठीक से कुछ भी न हो सकेगा. क्‍योंकि ठीक-ठीक से अपने ठेके पर मैं ही कहां ठीक हुआ हूं. मगर फिर, कहने का क्‍या मतलब, जब लोग हित व लोक की चिन्‍ता करनेवाले हों, समझनेवाले न हों.

ओह, जीवन में कितना सारा समय (और जापान) बीतता चलता है, जबकि आपस की ज़रा समझ बन सकती है मगर बनती चलती नहीं. ज़रा सा धीरज और थोड़ी सी शिक्षा हमें मनुष्‍य बना सकती है, मगर मनुष्‍य होने की जगह हम बिग बॉस और बरखा दत्‍त की थेथरई देखने में अपने मनुष्‍यत्‍व से गुमे रहते हैं. समय बीता जाता है. रोज़. आप न हमसे मिलने आते हैं. न मैं अपने भूगोल से निकलकर आपतक आपको समझने पहुंचता हूं. कहीं पहुंचता भी हूं तो कातरता से आपके पीठ पीछे फुसफुसाकर माफ़ी मांगता कि मित्र, समझ रहे हैं न?

लाचारियों के समयखाये कैसे गिरह हैं ये, और इस निठल्‍ले ठाठ के प्रियवर, काट क्‍या हैं? भागे के अभागे में अटका सोच रहा हूं. आप रहे हैं?

Monday, November 1, 2010

लदर फदर धम्‍म धड़ाम..



बेचैनियों की लदर-फदर रेल उड़ी जाती धम्म–धडाम. कहीं एक औरत चीख़ती किसी के बक्सा छूटता, बच्चा कोई रोये चला जाता एक साहब गालियां बके, पैर के बोझ और माथे के रोश में समझ सकने का सुभीता न होता कि भीड़ में एक मुसाफ़ि‍र क्यों गर्दनियाया जा रहा है, मुंहजोर चुपचाप मार सह लेने की जगह अपनी सफ़ाई में क्या बोले रोये क्यों जा रहा है. कहने का मतलब ऐसी ठेल-पेल उसमें क्या समझदारी छांटी जा सकती. बाहर दिन है कि रात इतना तक पूरे आत्माविश्वारस से आंका नहीं जा सकता. जादे से जादा प्रतीक में बिन सिंखचों की जेल का बिम्ब बांटा जा सकता.

मगर लेनेवाले जेल का बिम्ब नहीं म्युचुअल फंड का डिटेल पूछ रहे हैं. कहते हैं अगले साल कहीं से आने की उम्मीद है, पैसा लगाकर इस साली रोज़ की हाय-हाय से मुंह मोड़ लेना चाहते हैं, मौका बना तो बनेगा कैसे नहीं, अपने को ऊपरी सिरों से कैसे भी तो करके जोड़ लेना चाहते हैं, वर्ना क्या है साहब, इस रेल में बैठे-बैठे मर जाओगे, आपके कुत्ते तक को खबर न होगी! गुड़ाखू रंगे दांत के एक दूसरे सज्जन हैं, हेंहिंयाते चिंहुकारते हैं, अरे हुजूर, अपन लोग तो यहां इतने में ही फ़स्सकिलास हैं, आज़ के ज़माने में ऊपरवाला सबको रेल और घर में जलाने लायक तेल भी कहां देता है? आप पढ़ते होंगे अंग्रेजी अख़बार हम रोज़ नंगी आंखों गरीबी देखते हैं. तो आप लगाइए फंड, हमारा तो फंडा है हाथ में डंडा हो और ऊपर चढ़े आनेवालों के खिलाफ़ बाजू में बंधा गंडा. मां के जने पिल्लों की ऐसी बजायेंगे कि साले कश्मीर क्या गंधार जाके अपनी नानी की बरसी मनायेंगे! उसके बाद हें-हें जिसके ऊपर काफ़ी हो-हो, अच्छी खासी हंसी हो गई, इतनी कि कुछेक गर्दन का पसीना और होंठों का पानी पोंछने लगे.

एक डोलते से शराबी रहे होंगे, शराब की जगह बात से हलक पूरने लगे, सामने बैठे आदमी से बेमतलब यहां का और वहां का पूछने, कहां घर हुआ, कहां जाते हैं किसको बनाते हैं जैसी रवानियां, समय भरता रहे की कहानियां. हाथ पर पट्टी चढी थी चेहरा कुम्हलाया हुआ था, साफ़ दीख रहा आदमी सताया हुआ था, घबराकर उगलने लगा, क्या बनाऊंगा साहब, खुद बना हुआ हूं, आंख तक करजों में डूबा, कहां जाऊंगा, आप बताओ पंजाब निकल जाऊं कि कश्मीर? इस पर चहकते शराबी डोलने लगे, कश्मीर कश्मीर बोलने. किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई कौन है कश्मीरी, इसके पहले कि बम निकाले साले को चीर डालो, हा हा हा की हंसी होने लगी, रेल डूबती रही जहालत में लोग लुढ़कते रहे.

एक पहाड़ी फौजी ने उनींदे में मलते आंख खोली, जैसे बहुत देर हो गई जैसे अब कुछ भी करना सम्भव नहीं. किसी ने पूछा नहीं फिर भी कमर का बेल्ट कसता बताता रहा फौजी गांव लौट रहा हूं हालांकि अब कुछ है नहीं गांव में, मगर यही छुट्टी थी फिर ड्यूटी बजाने छत्तीसगढ़ लौटना है. बेचैनियों की रेल उड़ती दौड़ती रही धम्म धड़ाम..

Thursday, October 28, 2010

लतीफ़ा..



कौन जानता किसे मालूम धुंधलके की यह दीवार कभी धंसेगी, भटकता किसी दिन जो पहुंच ही गया तब भी क्‍या ख़बर दीवार के पार तुम हाथ हिलाते, मुस्‍कराते मिलोगे ही?

छू लोगे गाल पूछोगे हाल, और मैं एकदम से लजाता, घबराता बुदबुदाने लगूंगा कि हाल के बारे में हम किसी और दिन बात नहीं कर सकते, आज सिर्फ़ एक लतीफ़ा सुनाता बनूं?

और फिर जैसाकि ऐसे मौकों पर होता, हमेशा होता है, लतीफ़ा एकदम याद नहीं आयेगा, झेंप छुपाने को मैं हंसने लगूंगा, और मेरी तक़लीफ़ बढ़ाने को तुम मुस्‍कराने, कि अच्‍छा है बिना लतीफ़े के भी हम हंस रहे हैं.

मैं हंसता अकुलाया कहूंगा मगर दोस्‍त, हम फंसे हुए हैं. धुंध का यह कैसा गहरा है साहित्‍य है समाज है, हमारे समय का कैसा अनसुलझा राज़ है? कैसी है तलवार, काठ की और दीवार मिट्टी की जिस पर पटकता, पीटता हूं कि घायल होता रहता हूं मगर ख़ून के छींटे उड़ते नहीं, धुंध कोई छंटती नहीं, युद्ध किस दिशा गई जैसा सूत्र हाथ कभी चढ़ता नहीं?

दीवार के पार वह जो व्‍यक्ति मिला होगा जो शायद तुम ही होगे, या तुमसा कोई दोस्‍त, या मैं ही होऊंगा अपने से मिलने दीवार के पार पहुंच गया होऊंगा, एकदम से सुन्‍न गुम हो जायेगा. या धुंध में ऐसी ही तस्‍वीर दीक्‍खेगी साफ़-साफ़. लिपटे शर्म के लिहाफ़ में मैं प्रार्थना करूंगा हे ईश्‍वर, मुझे मेरा लतीफ़ा याद दिला दे.

(ऊपर का चित्र सुधीर पटवर्द्धन की पेंटिंग है)

Tuesday, October 26, 2010

खिलेगा तो देखेंगे..

घर लौटकर ताज्‍जुब हुआ. मतलब पत्‍नीजी तो रसोई में ही थीं मगर बाहर अहाते में एक नया खूंटा बंधा था, खूंटे में बकरी बंधी थी. जब गया था तो पत्‍नीजी के पीछे चुनमुन, ढुनमुन, किन्‍नी और दुलारी ही छोड़कर गया था, अब देख रहा हूं घर के बंधे बजट में जुगाली करने एक नया सदस्‍य आया हुआ है (एक पुराने कापी से पन्‍ने फाड़-फाड़कर ढुनमुन बाबू बकरी के मुंह में डाल रहे थे, बकरी बिना देखे कि कैसी कापी के कैसे पन्‍ने हैं प्रेमभाव से उनका भक्षण कर रही थी).

पल भर को मैं भयाक्रांत हुआ कि कहीं ऐसा न हो हरामी बकरी को मेरी कविताएं खिला रहा हो! लपककर ढुनमुन के हाथ से कापी झपटी तो देखा, कविताएं ही थीं!

इस हिंसा के प्रतिकार में ढुनमुन लाल एकदम से छूटकर बरसने लगे. माने पैर पटक-पटककर रोने लगे. किन्‍नी अपने भाई की रक्षा में मेरे हाथ से कापी खींचने लगी, ‘बकली भूकी है पप्‍पा, पिलीच!’

’और मैं नहीं हूं?’ मैंने चीखकर कहा, ‘मुझको कोई खिलाने आता है?’

’वैसा नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो,’ पत्‍नीजी रसोई की खिड़की से झांककर बोलीं.

मैं पत्‍नीजी के झांसे में फंसनेवाला नहीं था. अपनी गर्जना बनाये हुए सवाल किया, ‘तो फिर कैसा समझूं, बताओ तुम! ये चार तो पैदा किये हैं इसकी मुझे जानकारी है, फिर ये पांचवां कैसे कहां से आ गया?’

नज़दीक जाकर बकरी के कान छुए, प्‍लास्टिक के नहीं थे, सो ज़ाहिर है बकरी चीन से नहीं यहीं कहीं पड़ोस से आई थी, मगर यहीं मेरे घर क्‍यों आई थी? जहां पहले ही चार छोटे बच्‍चों के दूध का खरचा और कविता की कापी की रक्षा का धुंध भरा था?

‘इसे यहां कौन लेकर आया है?’ मैंने आंखें तरेरे सवाल कि‍या.

‘मैं नहीं लाया हूं.’ आंखें तरेरे जवाब चुनमुन ने दिया, उसी तरह जैसे बंबई के किसी सिविल कोर्ट में जज के आगे राज ठाकरे जवाब देते और जज घबराकर कोई मराठी फिल्‍म का गाना गुनगुनाने लगता. गाने की जगह मैंने चुनमुन के कान उमेंठने का आनन्‍द लिया, ‘मुझी से होशियारी? लाना ही था तो एक गाय नहीं ला सकते थे? भैंस ले आये होते बारह लीटर दूध देती, पावभर दूध पीकर हमें भी रात का सोना नसीब होता? रात में डरावने सपने न आते?’

चुनमुन ने झटका देकर मेरी पकड़ से अपने कान खींच लिए, वैसे ही जैसे आनेवाले दिनों में कलमाडी और शीला दीक्षित न्‍याय की पकड़ में आने से अपने को उबार लेंगे. अलबत्‍ता किन्‍नी दौड़ी आई और मुझसे चिपटकर बोली, ‘मेने बी सपना देखा पप्‍पा! बौत डेलावना, पिलीच?’

अपनी बहन की देखादेखी दुलारी भी भागी-भागी आई, मेरे ऊपर गिरकर बोली, ‘पप्‍पा, पप्‍पा, मैं तुमारे सिर पे चरुंगी, पिलीच?’

दुलारी को सिर और किन्‍नी को गोद में फंसाने की अपनी पहचानी पोज़ि‍शन लेकर मैं अब पत्‍नीजी से मुखा‍तिब हुआ, ‘चैन से मैं इस घर में कभी रहूंगा या नहीं तुम आज मुझे जवाब दो!’

‘नहीं रहोगे,’ पत्‍नी ने हंसते हुए चाय का टूटा कप मेरी ओर बढ़ाया और अच्‍छे कप से खुद एक घूंट चाय का लेकर बोली, ‘थोड़ी देर के लिए बच्‍चे खुश हो रहे हैं, तुम्‍हारी आंखों में गड़ता है? ढुनमुन अपनी रोटी किसी को नहीं देता, कितने प्‍यार से अपनी कापी बकरी को खिला रहा था? तुमने आकर सब खराब कर दिया!’

किन्‍नी मुझे चिकोटी काटने लगी, मानो सब खराब कर देने की सज़ा मुकर्रर कर रही हो. दुलारी पहले ही सिर के बचे बाल खींच रही थी. पत्‍नीजी ने गहरी सांस छोड़कर कहा, ‘असल बात है बच्‍चे बकरी को प्‍यार कर रहे हैं, तुम्‍हें डाह हो रही है..’

मेरे ज़रा से बालों को खींचने से शायद ऊबी हुई दुलारी ने सिर झुकाकर मेरे गाल की पप्‍पी ली, बोली, ‘मैं तुमको बी पियार करती हूं पप्‍पा, बौत करती हूं!’

’अरे मज़ाक हो रहा है यहां? मेरी कविता बकरी को खिला दी, पता नहीं और क्‍या-क्‍या खाया हो इस मरदूद ने, और मैं पूछ रहा हूं कहां से आई है तो कोई जवाब नहीं दे रहा? मेरी अपनी सगी पत्‍नी मुझे टूटे कप में चाय पिला रही है इस सबका मतलब क्‍या है!’ मैंने चिल्‍लाकर कहा जिसके जवाब में ढुनमुन जो अभी तक रो रहा था एकदम से चुप हो गया. किन्‍नी जो सबसे आंख बचाकर मुझे चिकोटी काट रही थी अब मेरे नाक से नाक लड़ाने लगी. चुनमुन की बांहों में लिपटी बकरी हर्षातिरेक से मुंह ऊपर उठाये मिमियाने लगी. मैं पत्‍नीजी की आंख से आंख लड़ाने के लिए अकुलाने लगा, जबकि वह, मुझसे लापरवाह, बच्‍चों और बकरी के नेह में नहायी, विनोदकुमार शुक्‍ल के लिखे वाक्‍य के मीठे से अपनी साड़ी सजा रही थी, ‘प्रेम से कोई दो शब्‍द बात कर ले तो पूरी पृथ्‍वी में कोई दुश्‍मन नहीं ऐसा लगता था.’

(यह ख़ास दरभंगाकुमारी सिन्‍हा के लिए)

Sunday, October 24, 2010

हाय रे पंजाबी सुहाना..



पंजाबी लैंडस्‍केप पर विजय सिम्‍हा की घुमाई की एक रपट है, रपट से ज़्यादा मर्सिया है, मर्दाना तो कतई नहीं है.. पूरी रपट 'तहलका' में यहां पढ़ सकते हैं.

Saturday, October 23, 2010

भूल जाओ भाव..

भूल जाओ भाव
बस सामने देखे चलो
दिखी दूर अंधड़
हेराये के लंगड़ अपनी
बिन पालों वाली नाव?

डगराये डोलती अभी डूबी नहीं है
तुम ऊबे हाथ झाड़ रहे हो, या जाने
अंधारे संझा की मोहब्‍बत नहाये
गहीन ज़ि‍रह अपने उतार रहे हो
दिखता है झुराये झोले में तीन ग़लत पहाड़ा
कवनी का मुंहकाटा एक कवनो का छोहाड़ा
या, मन की कठफोड़ी में हाड़काटा जाड़ा?

सारे गुल-गपाड़े उड़े होंगे, मुंह उफनती पानी में पड़े
कोई दूर कहीं गाता होगा दिल के हहलने का गाना
या कि तुम ही होगे, बुनते अपने बहलने का बहाना
रहते-रहते चौंक जाते, टटोले खुद को टोह लेते
कि महज़ ख़याल ही तो नहीं है
कि नाव कहीं खाली तो नहीं जा रही?
कि कहीं ऐसा तो नहीं
कि मैं भाव खाकर नहीं ही डूब रहा?

इतने पर भी..

ज़रा सी जगह के ज़रा से जीवन में बहुत सारी लाचारी होगी, नकचढ़े उधार भरमार होंगे इच्छाओं के बुखार. देह डोलाता मुंह बिराता कोई एक बीमार भी होगा, कदम-कदम दांत निपोरे सिगरेट बढ़ाता, कि जलाऊं, धुआं उगलोगे? बलगम? कोई एक लड़की होगी हाथ हिलाती भुले शहरों की छूटी छींट की साड़ि‍यों के चोटखाये किस्सों की हाय-हाय मिटाती, पोंछ-पोंछकर सजाती, चेहरे के उड़े रंग को आंखों के नम से हटाती, गोद में छुपा हिसाबी रजिस्टर जोहती, कि यह आपने जो बारह पंक्तियां लिखी उसके पांच-पांच सौ के तीन नोट काट दूं, काफी होगा, कि कहीं ज़्यादा तो नहीं दे रही? मैं हंसने लगता, या लगभग रोता. या लगभग हंसता लगभग रोता हुआ दीखता बात एक ही होती. लगभग जयहिन्द की तर्ज़ पर बड़े देश की नागरिकता से छिटकता अपनी अदद एक ज़रा सी ज़मीन में मुंह बचाये चला आता, गुस्से में पीछे खाली जगह हाथ का चप्पल फेंकता दिलदारी की बेहयायी गुनगुनाता. हालांकि हैरत होती, देरतक फिर होती ही रहती, कि ऐसे में भी कैसे तो तरंग फूट आता है बिछा दिखने ही लगता है रंग. कैसे तो इत्ते से, बित्ते भर के देश में इतनी बड़ी जिजीविषा कमरतोड़ दुश्वारियों पर भी हाय, बेहया खिलाने ही लगती उमंग.

Friday, October 22, 2010

तारों भरी रात..



बूढ़ी मां के बालों की तक़लीफ़ में गुंथी होती
या त्यौहारी बुढ़ऊ तिरपाल के छत टंकी, बेसुरी
या वह कोई विदेशी लेखक होता किताब होती
जिसके पन्नों में छुपी द‍‍क्-मक् चमकीली लखती
हज़ारों, हज़ार जुगनुओं की बारात होती, हाय
वह कैसी तो तारों भरी रात होती

बूढ़ी नहीं थी जब मां सीढ़ि‍यों पर बिछलती गिरी थी लगभग
लपककर लोप लिया था मैंने, रसोई से छूटकर भागी दीदी का
सहमा भय अपनी जगह अटक गया था मां खिल गई थी
तब भी दिखी थी ऐसी ही चमकीली, छाती में चुभती नुकीली
तारों भरी रात, या जब बीमार बुन्‍नन नहीं किसी की सुन रहा था
अपने होने में दहल रहा था तब थपकियों बहलाये रहा
आंगन घूमता रातभर कांधे उसे सुलाये रहा, रौशनी झर्-झर्
गिरती रही थी उंगलियों के पोरों तक पर चमकती

अब कितना तो चश्मा मलना होता है, या चौंक-चौंककर
अधूरी नींद बीच जगना, सासाराम और सुहावनपुर के आसमानों
में कितने डोर छूटते हैं, पतंगें फड़फड़ाती, फिर भी नहीं आती
सपनों तक में नहीं आती, कि आई हूं बताने कि नहीं आऊंगी
और मुंह बिराती तारों भरी रात, शायद इसीलिए इतना
ताज्जुब होता रहा आपका उदास होकर कहना कि कैसे तो
कह लेते हैं कभी इतनी सहजता से आप मन की बात
सुना मैंने, मगर नहीं भी सुन रहा था, क्योंकि मन बझा था
कहीं और, अचक्के फिर इतने दिनों बाद दिख गई थी
हाय, जुगनुओं का सफ़ेद लालटेन झुलाती
हुमस में मन नहलाती, वही तारों भरी रात.

Wednesday, October 20, 2010

जौने डगर तुम दरस आये सजन..


बापजी सबसे आगे थे. हमेशा रहते. पीछे के चार कदम की छूटी जगह के बाद नीलम, सर्बेसर, दिलीप, सुकांत, नगीना होते. गोदी में मझलका छौंड़ा और पवनी को ढोती काकी और फुआ उसके बाद. अम्‍मा सबके आखरी में. अम्‍मा को देखके यही लगता कि बापजी के शुरु किये काम (धड़ाम!) को चुप्‍पै, अपनी सामाजिकता में जोड़ और सिल रही हों. सब चैन से फुसफुसाते-बुदबुदाते चलते होते, एक अकेला बंटू ही पगहा तुड़ाये पाड़े की तरह घमासान का धूल उड़ाये फिरता. भागकर कभी बापजी का पाला छू लेता फिर हांफे-हांफे उसी सांस पवनी को जीभ बिराता दौड़ा अम्‍मा के पास लौटकर डायलाग मारता, ‘अब अम्‍मा?’
अम्‍मा चुप रहती. बंटू बाल झटकता, छूटा वापस भागता तब अलबत्‍त पीछे से कहती बहुत दौड़ो नहीं, कंकड़-पत्‍थर लग जाएगा.
मुझसे नहीं कहती. जबकि मुझे कंकड़-पत्‍थर लगता रहता था. कदम-कदम पर. न लगे तो खाली-खाली लगता और तक़लीफ़ होती. लगने से तो होती ही. मैं फुत्‍कार मारता अम्‍मा को सुनाता बोलता, ‘किसी को नहीं दिख रहा कितनी चोट लगी है! क्‍यों संगे लेकर आये मुझको? जाओ जहां जाना है तू लोग, हम कहीं नहीं जा रहे!’
अम्‍मा चुप रहती. क्‍या फ़ायदा टंटा बढ़ाने का. जवाब नगीना या सर्बेसर में से कोई देता, इस लड़के को साथ लेकर कहीं जाना मुश्किल है.
काकी पीछे से जोड़ती करते रहो बखेड़ा. पहिलका पांत खाके उठ जाये इसके पहिले पंगत में चहुंप जायें ऐसा नसीब होगा कबहूं ऐ जीवन में?
आगे बापजी आवाज़ लगाते कौन है हो, चप्‍पल हाथ में लेके चल रहा है?
कितनी तक़लीफ़ होती है. सब साथ चलते हैं, बात कोई नहीं समझता. फुआ, काकी से तो उम्‍मीद करना व्‍यर्थ है गंवार औरतें­­­­­. मगर अम्‍मा ही क्‍या समझती है. साथ नहीं चल रहा साफ़ दीख रहा है फिर भी ये औरत नहीं देख रही! घिसटाये-घिसटाये का सफर करना, क्‍यों करना, जाओ जहां जाते हो, मैं नहीं जाता तुमलोगों की संगत में!
फिर हारकर हूक-सी छूटती, चीखता कहता हूं, ‘मैं कितना अलग हूं, अंधे हो सब, दिखता नहीं?’
बंटू अपनी भाग-दौड़ रोककर आवाज़ लगाता है हम भी अलग हूं, देखे? फिर थोड़ी दूर भागा जाता और पलटकर कहता, हां, अब देखो, दिखा?
बापजी भारी गले से खखारकर पूछते हैं बेल्‍ट से मार खानेवाला काम कौन कर रहा है हो.
ओह.
इतने में कोई गौरैया जाने कहां से भटकी बगल में आकर साथ-साथ चलने लगती; हैरानी से तकती जैसे मैंने उसका कुछ बिगाड़ा हो, फिर ऐसे सवाल करती जैसे सुनकर किसी के चोट न पहुंचे, ‘भैया, एक ज़रा सी मदद करोगे, बताओगे मैं कौन? मैं भी सबसे अलग हु? कि सबके जैसी ही ठहरी? असल बात है मैं किसी को कष्‍ट देना नहीं चाहती! और वह पीतल का पत्‍ता भैया?
अपने बाजे-गाजे की धज में एक बूढ़ा बैंडवाला है, अपने गुरुप से छूटा संगीत नहीं लोटा भर पानी और बीस रुपयों की खोज में भटका दिख रहा है. मुझसे पूछता है, हम भी साथ चले चलें भैया? हुआं खाने का इंतजाम है? और कुछ नहीं बस चार रोटी खायेंगे, साव के यहां पिछले महीने भोज था उसके बाद पेट में पेटभर खाना गया नहीं, कसम से!
और मन की खुराक का क्‍या? कोई उसके बारे में सोचता है? सोचेगा?
ओह. और देखिए, अब अम्‍मा के पीछे एक पुलिसवाला अपनी साइकिल चोरी-चोरी लगाये चल रहा है. जैसे जाने इतने लोग भारत-छोड़ो का आंदोलन छेड़ने का कोई फोटो खिंचवाने जा रहे हैं या और मालूम नहीं क्‍या. थोड़ी देर में बेहयायी से नगीना के बंडल से बीड़ी लेकर सुलगा रहा है­. वही पुलिसवाला, और कौन? बैंडवाले से जौने डगर तुम दरस आये सजन गाने की फरमाइश कर रहा है!
अम्‍मा चुप रहती है. जबकि काकी और फुआ अपने मंझलके छौंड़े और पवनी में बझे होते, अकेला मैं ही पैर पटकता कांपता दिखता होता कि चाहे जो हो जाये मैं आगे एक कदम नहीं रखूंगा!
गौरैया ताज्‍जुब से ठहरकर सवाल करती, एक कदम नहीं? एक मेरे जितना, छोटा, कदम?
पुलिसवाला आसानी से बापजी से दोस्‍ती गांठ लेता; बापजी हंसते-हंसते हाथ ठोंकते उसे मना करते कि वह खैनी नहीं खाते. उनके घर में कोई नहीं खाता.
ज़हर? ज़हर खाता है कोई घर में? मैं चीखकर कहना चाहता, मगर गौरैया फिर सवाल करके मेरा जीना दुलम करेगी की सोचता चुप रहता और दो कदम दायें चलकर फिर बायें चला आता.
(बेबी नेगी के लिए)

Monday, October 18, 2010

जितने दिन होंगे..



कितने दिन छूटेंगे, जैसे मन से रगड़ खाकर आंखों का सूखा लोर छूटता है
कितने दिन उड़ेंगे जैसे गाल छुआकर चिरई मनोहारी अपनी पांख मन की आंख खोलती है
कितने दिन होगा कि नीले पीले कत्थई धानी सुर्ख़ लाल के बीच गुज़रती, रंग बहलती
सारी सियाह लकीरों को तुम ठीक-ठीक पहचान लोगी, अपनी नाओं को रिसायकल बिन में
धरकर अपनी हांओं का सजीला डेस्कटाप कर लोगी. कितने दिन मैं कहूंगा विचार तो वह
विचार ही होगा, मेरा उनींदा व्यभिचार या तीन सौ बारह टके का व्यर्थ अहंकार नहीं होगा
हसूंगा तो हंसता घबराया या खुद को ज़माने से लजाया न दीखूंगा, न अपनी बरजोरी में
बहकाता, तुम्हारी उलझनों में तुम्हें और गिराता, अपने हत्भाव की सलीब पर चढ़ जाता दिखूंगा

कितने दिन होंगे पाखी हंसती सवाल करती होगी उडूं
और मैं चौंककर मुंह तकता कि अरे, क्या?

कितने दिन होंगे
जितने भी दिन होंगे.

Sunday, October 17, 2010

बेबी क्‍यू..



चित्र को बड़ाकार देखने के लिए उसपर चटका लगाकर उसे एक नई खिड़की में खोलें..

..और हां, मालूम है फिनिशिंग नहीं है, मगर वह मुझी में कौन-सी है? और अंतत: यह बेबीवर्ल्‍ड नहीं है? और यूं भी सब सोने पर सुहागा यहीं हो जाएगा तो चारकोल में चिचरियां छुपाने की तब ज़रुरत कैसे पड़ेगी? हद है.

(यह खास बेबी पंछी कुमारी और नितिन की बेबी पाखी प्‍यारी के लिए)

Friday, October 15, 2010

उलटे सीधे, ज़्यादा उल्‍टे..

औरत सोचती होगी आदमी लगभग लेटा होगा, टॉम वेट्स बेसबब तकता होगा, जूतों को न देखता होगा..


Monday, October 11, 2010

एक ज़रा सा समय..





(चित्र को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकयाकर नई खिड़की में खोलें.)

Thursday, October 7, 2010

रात के खेल, और सुबह के

सोते में आदमी कई मर्तबा घबरायेगा, मूंदे आंख कई सारे हिसाब करेगा, चौंककर खुद को सोता तकेगा कि यह क्‍या शख़्स है समय उमस की कैसी रात है, भूंकते कुत्‍तों के लहराते नातों में आख़ि‍र क्‍या सोचता वह गीली नींद को लोरियां सुनाता होगा, झपकियों में डूबे क़ि‍स्‍सों की कितनी अधभिड़ी खिड़कियां होंगी जिनकी खड़खड़ाहटों पर उनींदा जागा हड़बड़ की साइकिल चलाता. खार खाया फिर खुद को समझाता कि क्‍या बेहूदगी है साइकिल पर निकलने का यह समय नहीं और ऐसे सफ़र बेसबब यात्राओं का रोमान हैं झांसा हैं, फेसबुक वाली दोस्तियां और कॉमनवेल्‍थ खेलों की चकमक राष्‍ट्रीयता का फांसा. घबराहट फिर किसी दूसरी तान पर चढ़ एक नया गान शुरु करेगी, नींद जागी रात की आंखें मलती खुलती सुबह का ध्‍यान, और सुब्‍बालक्ष्‍मी का भजन न भी होगा तो खड़खड़ाते क़ि‍स्‍से मिलेंगे खिलखिल हंसी हंसते कि बाबू, मुंदोगे आंख कि हम शुरु करें खेल?

Sunday, October 3, 2010

हमरा नै, ऊ बूढ के कसूर है जो अपरील के चेट्ठी तोके अब अट्टूबर में भेंटा रहा है!

प्रेम परकास प्रियतमा बेबी कुमारी राय का सखी सकीना को पत्र..


का हमर डारलीन सखी, सब भुला गई, हो? ऊ दांती काटा वाला कसम खाई थी, कि हमरे तुमरे जीबन में चाहे जो हो, जौन कोई हो, हमरे आपस के परेम का ई पांचवा जलम है, और तू, सकिनिया!.. अभी पांचों साल नै हुआ और सब बिसरा दी रे? ऊ सुनीतवा का जेठ का दमाद है ऊहे बोल रही थी तुम हमरे बारे में अनाप-सनाप बीष फैला रही हो, काहे रे, सकिनिया? तुमको करेजा का भीतरी का सब कहानी बोले, मन-मंदिर का राज खोले, बहीन से जादा का तुमको मर्जादा और इज्‍जत दिये, एही दिन का बास्‍ते रे, चोट्टी? हमरे हाथ में अब तीन तोला का कंगन और गरदन में सतलड़ा हार सोभित है, इसीलिए तू डाह से मर गई, एतना छोट हो गई रे, तू, सकिनिया?

हमरे दुख का तोको कवना अंजाद नै होगा! इतना तो ऊ मुंहजार परेम परकासो से दिल जोड़े और तोरे से नै हुआ था, जेतना तोर बिस्सासघाती से हुआ! हां! ऊ तो सीता मइया का अहसानी हुआ कि दमादजी दही में जलेपी बोर-बोर के ई सब कहानी बता रहे थे तब तोहरे जीजाजी बंटुआ को अपना हीरो-होंडा पे लेके ऐसक्रीम खिवाये गए थे. मोबैल पे फोन करके हम उनको वहींये से हाल्टिन में रोके रखे कि जरा कंपौंडर जी के हियां से हमरा कांधा का दरद वाला दवाइयो लिये आइएगा! नहीं तS ऊ आज नजीके रहते तS मालूम नहीं शंक़ र भगवान ई घर में कवन अनर्थ घटता!

हरमखोर, एतना अशानी से भूला गई कि बचपना में हमलोक एक दूसरका का दांत काटल अचार और आम का फांकी सब खाये हैं? और तब्‍बो तू हम्‍मर टाप सीकरेट सब हेहर-होहर फइला रही है रे? तोहरा से कवनो छुप्‍पल है रे सकिनिया कि त्‍याग में केतना बरीस हम अपना मन मारे? अऊर जवनो किये भी, सब तोहरे जीजा का सुख का बास्‍ते किये? नै तो ऊ परेम परकास को कब्‍बो हम अपना केवाड़ी पर गोड़ ठेकाने दिये थे, नै तू बोल? मन का गवाही अऊर इंतहाई सब जानके मुंहजार तू हमरा पे इल्‍जाम गिराती है, अऊर हम तोहरा को जलम-जलम का बहीन समझते रहे? गे सीता मइया, ई भटकल सखी का पाप माफ करना, हो माता!

जब ई बंटुआ को अपना उघारे पेट (अब ई पहिलका वाला थोरे हैं, नवकरी का बाद, पइसा का संतोख से पेट तनी बहरी फेंका गया है!) पर ठाड़ा करके दूनो बाप-बेटा हेंहें-ठेंठें का खेला करते हैं, तS सच्‍चो, सखी, तू नै बूझेगी केतना हमर मन में तिरिप्ति‍ ब्‍यापता है.

बंटुआ के गाल पर लहसून का वइसे ही छूटल निसान है जइसन ऊ गुंडा के था. साबित्री का गोतनी बोलती है अईसन दाग वाला का किस्मत खूब बुलंदी पर होता है! हम्‍मो आह ले के सोचते हैं एतना दुख का बाद सुख पाये हैं तS ईश्‍शरजी किरिपा करेंगे और बंटू बाबू को आगा अच्‍छा ही राहे रखेंगे.. ईहो रात-दिन बंटू-बंटू कै के घर भर कोहराम किये रहते हैं! जीबन में एगो कमी था, शंकर भगवान ऊहो पूर दिये. अब गरदन पे हारो है और करेजा से लग्‍गल बंटुओ है, हमको कौची का कमी है, सखी?

लेकिन हम्‍मर ई सोना जइसन गिरहत्‍थी पर तू आग काहे ला उछाल रही है, बहीन?

तोहरे भानजा के मम्‍मी,
बेबी कुमारी राय

अप्रैल 22, 2010.

(जिज्ञासु पाठक सारी चिट्ठियां एक जगह हंस के ताज़ा अक्‍टूबर, 10, 2010 अंक में पढ़ सकते हैं)

Friday, October 1, 2010

एवरीवन इज़ एवरीवन, देन हू द हेल इज़ मी?.. एक घोड़ागप्‍प..


रास्‍ते में जगह-जगह आंखों के आगे एक बैनर लहराता रहा, 'अक़ल घास चरने गयस्‍त!', या यह महज़ घोड़े का दृष्टिभ्रम था? जो दीखता सा दिख रहा था वह ख़यालों में पहले कभी देखी तुर्की या फारसी शायर की पंक्ति थी, जो घूम-घूमकर फिर नज़रों के सामने एक दीवानगी का ताना बुन रही थी? संभवत: जंगल के सियाह सन्‍नाटे में अपने टापों से अलग, साउंडट्रैक पर बज रहे मारिया कालास की आवाज़ में पुच्चिनी के आरिया का असर होगा जो घोड़े को मूर्खता की हद तक मदहोश बनाता रहा होगा. यही वज़ह होगी जो बैनर-विचार और संगीत‍ दोनों के असर के बावज़ूद इतनी देर वह अपना हिनहिनाना भूला रहा, और दौड़ की वहशी भूख में सरपट अंधेरों में तब तक दौड़ता रहा जब तक उसके नथुने धुआं और बड़ी आंखें पानीभर न होने लगीं..
वह तो मारिया कालास और पुच्चिनी की मोहिनी से काफी दूर आकर अचानक घोड़े को खबर हुई अंधेरा वैसा तरल और मेलॉडियस नहीं जिसकी सवारी में वह कहां से निकलकर जाने कहां चला आया था.. और अंधेरे के इस जाने किस गहीन छोर पर आकर 'जुएलथीफ़' के क्‍लाइमैक्‍स के देवानंद की तरह सच्‍चाई सामने खुल रही थी कि आप किसी का भरोसा नहीं कर सकते, फ़िल्‍म की नायिका का भी नहीं. हालांकि यह जानने में घोड़े को थोड़ा वक्‍त लगा कि उसका सवार अधबीच जोख़िम से हाथ झाड़कर फ़रार हो चुका है. सिर्फ़ जाना ही घोड़े ने, गो भरोसा करने में अभी भी तक़लीफ़ हो रही थी. समझदार मनीषी कह गए हैं जीवन में आदमी को किसी का भरोसा नहीं करना चाहिए, चार्ली कॉफमन की फ़िल्‍म 'सिनेक्डकी, न्‍यूयॉर्क' में एक पादरी अपने सरमन में दु:खकातर कहता दीखता भी है:
“There are a million little strings attached to every choice you make. You can destroy your life every time you choose. But maybe you won't know for 20 years... and you may never, ever trace it to its source. And you only get one chance to play it out. Just try and figure out your own divorce. And they say there is no fate, but there is, it's what you create. And even though the world goes on for eons and eons... you are only here for a fraction of a fraction of a second. Most of your time is spent being dead or not yet born.

But while alive, you wait in vain... wasting years for a phone call or a letter or a look... from someone or something to make it all right. And it never comes, or it seems to, but it doesn't really. So you spend your time in vague regret... or vaguer hope that something good will come along. Something to make you feel connected. Something to make you feel whole. Something to make you feel loved. And the truth is... I feel so angry. And the truth is... I feel so fucking sad. And the truth is, I've felt so fucking hurt for so fucking long. And for just as long, I've been pretending I'm okay... just to get along, just for... I don't know why. Maybe because no one wants to hear about my misery... because they have their own. Well, fuck everybody. Amen.”
'ओह, यह पादरी की भाषा है? फ़िल्‍म और सांस्‍कृतिक अनुसंधान की भाषा है?', घोड़े को एक बार फिर भरोसा नहीं होता कि उसे सचमुच किसी पर, किसी पर भी, भरोसा करने का अधिकार नहीं. शायद अच्‍छा होता रास्‍ते में वह मकई की बालियों की मोहब्‍बत में न पड़ा होता, जो बाद में- उस छोटी मुस्‍कराती बच्‍ची की ही तरह- भीमकाय विज्ञापनों का तिलिस्‍म साबित हुए. घोड़ा आंखें फेरकर फिर से मारिया कालास और पुच्चिनी के आरिया को याद करने की कोशिश करता है, मगर जैसा यह अनर्थी, अमंगलकारी समय है, एक बार फिर चार्ली कॉफमन की फ़ि‍ल्‍म के अंत का वॉयसओवर अंधेरों में उस पर तीर बरसाने लगते हैं:
“What was once before you, an exciting and mysterious future... is now behind you, lived, understood, disappointing. You realize you are not special. You have struggled into existence and are now slipping silently out of it. This is everyone's experience.Every single one. The specifics hardly matter. Everyone is everyone. So you are Adele... You are Ellen. All her meager sadnesses are yours. All her loneliness. The gray, straw-like hair. Her red, raw hands. It's yours. It is time for you to understand this. As the people who adore you stop adoring you... as they die, as they move on... as you shed them, as you shed your beauty, your youth... as the world forgets you, as you recognize your transience... ...as you begin to lose your characteristics one by one... as you learn there is no one watching you... and there never was, you think only about driving. Not coming from anyplace, not arriving anyplace... just driving, counting off time. Now you are here. It's 7:43. Now you are here. It's 7:44. Now you are gone.”

Wednesday, September 29, 2010

रिपोर्ट ऑन द करेंट स्‍टेट्स ऑफ़ चतुरानन..

फ़िलहाल गा रहे हैं. अभी थोड़ी देर पहले खुजा रहे थे. चतुराननजी को एकदम तेज़ी से हंसी आती है. वैसे ही जैसे एकदम तेज़ी से फिर बुखार भी चढ़ता है और सामनेवाले को चप्‍पल-चप्‍पल पीटने के लिए तरपसीना होने लगते हैं. (प्रसंगवश सूचना दी जाती है कि 'तरपसीना' शब्‍दचर्चा विद्युत-विचार संचयन की खंगाल से प्राप्‍त नहीं हुआ है, वरन एक अन्‍य होनहार ब्‍लॉगर के पराक्रमों से मान्‍यवर चतुराननश्री की सेवाओं तक पहुंचा है, जो दुर्भाग्‍यवश हिन्‍दी साहित्‍य के एमएपने से सुशोभित नहीं हो सके. हैं.) ख़ैर, बात करेंट स्‍टेटस की हो रही थी, जो बावज़ूद फेसबुक की नेकनीयती के, प्रवहमान स्थिरता को प्राप्‍त नहीं हो पा रही है. वज़ह साफ़ है कि चतुराननजी वर्तमान में (जो ऑलरेडी अतीत की डोर में बंधा, पिछड़नवस्‍था में पीछे छूटा जाता है!) बौखलाये हुए हैं. बार-बार घबराकर टीवी चैनल बदल रहे हैं (जो अपनी टुच्‍चावस्‍थाओं के दुर्योग में यूं भी कभी सम्‍भल, दहल और बहल रहे हैं. बदल तो रहे ही हैं. प्रकृति का नियम है. राजनीतिक पतन की भयकारी स्थिरता से अलग हर शै कहीं से निकलकर कहीं घुसी जा रही है. अपनी हस्‍ती में गुमे बाबू शारुख तक अब थ्री डी एनीमेशन में अपने को खोजने निकल रहे हैं, 'आल इज़ वेल' का गाना गानेवाला नायक 'पीपली लाइव' की रंगरेजी रंग रहा है. सो, ऑल इज़ नॉट वेल एंड स्‍टेबल. वहां भी तो क्‍या वो गाना था 'बहती हवा सा था हो..'

तो किसी होशियार मौकापरस्‍त बौद्धिक की ज़ुबान में कहें तो द ओन्‍ली थिंग दैट इज़ स्‍टेबल इज़ द इनस्‍टैबिलिटी. चतुराननजी के स्‍टेट्स के बारे में बात करना मतलब सिर्फ़ उनकी अस्थिरता को और प्रोवोक करना है. जबकि मुकेश का 'चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही' गाते वे थोड़ी देर पहले देखे भले गए हों, सच्‍चाई है फैसबुक ने उन्‍हें पीरहरंकर केसरीवाल के 'भारत की आवाज़' को लाइक करते हुए रजिस्‍टर न भी किया हो, यू-ट्यूब पर खोज ये और खोज वो देखकर एक्‍साइट होते ज़रुर देखा है, एंड दैट प्रूव्‍स फॉर वन्‍स एंड ऑल दैट द परसन कॉल्‍ड श्री चतुरानन इज़ नॉट इन द करेंट स्‍टेट ऑफ़ हिज़ बीइंग. मीनिंग इनस्‍पाइट ऑफ हिज़ सिंगिंग 'एकला चालो' ही इज़ नॉट इम्‍पीलिमेंटिंग इट विद मोरल विगर एंड द ट्रू आर्टिस्टिक ऑनेस्‍टी!

एंड दैट इज़ द रियल रिपोर्ट ऑन द करेंट स्‍टेट ऑफ़ नॉट ओन्‍ली सम ओब्‍स्‍क्‍यूर श्री चतुरानन, बद आफ द होल नेशन इटसेल्‍फ़. द लैक्‍ ऑफ मोरल विगर एंड (फोरगेट आर्टिस्टिक) व्‍हॉट्सोवर एनी ऑनेस्‍टी! इसलिए भी श्री चतुरानन जी की ऐसे छिछले दुराग्रही विरोधों का कोई गहरा अर्थ नहीं जिसमें किसानों के असल चित्रण के लिहाज से वह 'पीपली लाइव' को भयानक तौर पर असफल बता रहे हैं, और उसके आगे चंद क्षणों तक हौले-हौले मुस्‍करा रहे हैं. क्‍योंकि जैसे ही उन्‍हें इत्तिला दी जाती है कि फिलिम सूरतेहाल किसान का किस्‍साए-गोदान नहीं, मुल्‍क के नैतिक-पतन की कॉमिकबुक फेयरी स्‍टोरी है, बाबू चतुरानन झटके में फिर तरपसीना और छड़नगीना होने लगते हैं, और एक बार फिर उन्‍हें करेंट स्‍टेट्स की फेसबुकीय रस्‍सी में बांधना दुश्‍वार होने लगता है, भले माननीय श्री पहरेवाल इस बेीच सुरैया से 'दिले नादां तुझे हुआ क्‍या है' की आवाज़ निकलवा रहे हों, अवाम का भवदोहन करके उसे ग़लत मौके व जगह पर रुला रहे हों..

यह पाकिस्‍तानी फ़साना है, मगर ज़रा इसे सुनकर भी रोयें?

Friday, September 24, 2010

असेहजनावस्‍थाओं की सहेजनाएं..

कोई तरीका होता होगा लोग सहेजकर रखते हैं, कुछ ज़रा पसरे अंतराल पर बंबई की अपनी छोटी दुनिया में लौटा हैरतमंद हो रहा हूं मगर सच्‍चाई है मेरे पल्‍ले सहेजने की यह चतुराइयां नहीं पड़ रहीं, और ऐसा नहीं कि झोले में अंटीं चंद नई किताबों को बाहर हवा में निकाल सकुचा और शरमा रहा हूं कि पहले ही बिखरी इतनी सारी किताबों के बीच उनकी क्‍या जगह बनाऊं, अपने इस 'सकुचाने' और 'शरमाने' के इमोशन का भी ठीक मालूम नहीं कि इन्‍हें कैसे और कहां सहेजकर धरें.

और यह भी खबर है कि यह असमंजस ज़्यादा देर बना रहा तो फिर एक 'घबराहट' भी बनने व बुनने लगेगी, और फिर एक उसके सहेजने का भी काम निकल आएगा, और मैं हजारहा हाथ झटकूंगा, सहेजना उसे भी फिर होगा ही!

पता नहीं लोगों में क्‍या हूनर होता है कैसे होता है जो सहेजते रहते हैं. अच्‍छी-अच्‍छी मुश्किलों को आसानी से सहेज लेते हैं. उसके बाद हंसते भी दीखते हैं. कॉमनवेल्‍थ के आयोजकों को देखकर पूरा समाज सबक ले ही सकता है, मुझसे कुछ नाकारा ही होंगे जो मुश्किलों में मुस्‍कराने का सबक लेने की जगह ऐंठ-ऐंठकर फूटते रहते हैं. फिर उस फूटे हुए को सहेजने का काम आता है तो फटे दूध की तरह फैल जाते हैं, मतलब ऐसी किसी असहजावस्‍था में चले जाते हैं कि न खुद और न ही समाज उनसे कोई सबक ले सकता है.

विगत दो महीनों में जो चार और छै जगहें गया और ठहरा होऊंगा, रहते-रहते ऐसे मौके निकल ही आते कि सहेजने की ज़रुरत बनती और साफ़ नज़र आने लगता सहेजना असम्‍भव है. कम से कम मेरी उपस्थिति में तो है ही. फिर बनावटी हंसी का नहाना नहाने लगते. बुखार का बहाना बनाकर चेहरे पर चादर खींच लेते, या बुखार की घबराहट में ऋषिकेश टहलने निकल आते और फिर चूतियाटिक तरीके से मीलों पैदल चलकर व्‍यर्थ होते होते. मतलब कुछ भी सहेज सकने की व्‍यवस्‍था का एकदम फटा दूध हो जाता और फिर उसमें मिठाई और पकौड़ियां तली जातीं.

पता नहीं लड़कियां अपना सौन्‍दर्य और सुकुमारता कैसे सहेजे रखती हैं और सुलझे शरीफ़ लोग अपना विवेक, मैं एक ज़रा सा ड्राइंग किट अपनी संगत में लिए था, उसे सहेजना तो दूर खोलकर नज़र के सामने फैलाना तक दुश्‍वार बना रहा. बाकी चीज़ों के बीच वह कुछ इस तरह दबी, छुपी रहती जैसे बचपन की व्‍याहता कोई गंवई पत्‍नी हो जिसके उछलकर सामने आ जाने के खौफ़ में मैं हर वक़्त पीला पड़ता होऊं. साथ के छै जोड़ी कपड़ों में तीन को भी यही शिकायत है कि सारे समय हमारे साथ सौतेला बरताव किये रहे, हमसे पीठ किये जाने वो किन घरों के क्‍या कपड़े थे जिनको सिर और कांधे बिठाते फिरे!

मैं सुन नहीं रहा. क्‍या फ़ायदा इतना सब व्यर्थ सुनने का. सहेजन की सहजावस्था नहीं बनेगी, यह मेरा मन भी जानता है और असहज बना रहता है. मगर दिक्‍कत है उस असहज बने मन को भी एक पायंट के बाद सहेजने की ज़रुरत बनती है, मगर फिर, यहां इसमें कैच यह है कि इतना सुलझाव और इतनी शराफ़त झोले में मेरे अंटती नहीं, और झोला फैलने लगता है तो वह जगह मेरे लिए अंड़सने लगती है. माने कैच है मगर नो बॉल वाला है. ज़ाहिर है कुछ लोगों में टैलेंट होगा नो बॉल वाले सिचुएशन के कैचेस को भी एक सर्टेन ऑथेंटिसिटी दे देते हैं. हंसते-हंसते दौड़ लेते हैं, बिना दुबारा सोचे यहां और वहां ये और वो बकवास बोल लेते हैं, उड़ लेते हैं, मैं गिरा और घबराया होता हूं, ख़ामोशी से असहजता में अपनी असेहजनावस्‍थाओं में लौटता हूं..

कांपती खड़ी या जाने खोई, किसके जानिब सोई ज़ेबुनिस्‍सा..

मुंह पर चुन्‍नी ढांपे सोते में ज़ेबुनिस्‍सा के पोर-पोर जगे रहते और खुली आंखों लगता सामने की सूनी हवाओं से टकराकर गिर पड़ेगी.
तालिब तीन कदम की दूरी पर अपना सामान सहेज रहे थे मगर अटकी सांसों में फड़फड़ाती ज़ेबुनिस्‍सा को लगे कि बीच में बाज़ार-हाट, पहाड़ों की कैसी दुरियां हैं जो उसकी नाभि के अतल से ऐसी बेहया हूकें फूटकर हवाओं में गूंजी फिरती हैं और यह आदमी कैसा तो आदमी है जो उन बिजलियों में पिघलकर राख नहीं हुआ जाता!
तालिब होश में होते जब उन्‍हें ज़ेबुनिस्‍सा की तोतारंगी चुन्‍नी की सलवटों में बेचैनियों की दम तोड़ती कहानियों का ख़याल होता, मगर झोले में लापरवाही से कागज़ धरते तालिब मियां का मन हसीना बी की गुफ्तगू में चाय की सुड़कियां लेता बैठा था. कलकत्ते वाले ज़ाकिर मामू की बात हो रही थी या उनके साढ़ू भाई का जाने कोई तो किस्‍सा.
ज़ेबुनिस्‍सा के मन हुआ डांटकर हसीना बी के चुप करा दे, कि आप ये कहां-कहां की बकवासी बक्‍से खोलकर क्‍यों बैठ जाती हो? उबले सूरन के छिलके काढ़ रही हो, चुप्‍पै वही और सामनेवाले को उसका काम करने नहीं दे सकतीं?
मगर मन का लिखा ज़बान से छनकर बाहर आ जाये ऐसी खुशनसीबी कहां होती है. कितनी ही बार तो ज़ेबुनिस्‍सा ने ख़याल किया है कि आहट पाते ही सीढ़ियां भागती बाहर सेहन के अकेले में कहीं इन्‍हें घेरकर एकदम से मना कर दे कि आप क्‍यों आते हो, मत आया करो हमारे हियां! कितनी तो दफा ऐसे मौके बने भी हैं कि सीढ़ियां उतरते ज़ेबुनिस्‍सा को तालिब के आने की आहट हुई है, उसका घर में दाखिल होना एकदम से अपने मन के आंगन में फैलकर बिछते जाने की हक़ीक़त सा उसपर तन गया है! वैसे में फिर जाने क्‍या होता है कि ज़ेबुनिस्‍सा के कंधे पिघलते मोम सा जलने लगते हैं. पैर आंगन के खंभों सा भारी हो जाता है और ज़बान पल भर को फड़फड़ाती भले हो, हलक से एक फीका 'सलाम!' तक बाहर नहीं आ पाता..
अभी ज़रा मुद्दत पहले की तो बात है ज़ेबुनिस्‍सा खांची-खांची भर गोबर लिए छत पर उपले काढ़ आती थीं, या सलमान की उस फिल्‍म का गाना गुनगुनाती डेढ़ सेर आटा गूंथ लेतीं, और तो और तबकी वो चुन्‍नी के सिरे जाने कहां से नासपीटा जो एक तेलचिट्टा दिख गया था तो कैसे तो वह हाथ का झोला लिए-लिए सीधे छत से छलांग लगाये अंगने कूदी गिरी थीं. हंसते-हंसते हसीना बी दोहरी हुई जातीं कि ओह, एक ज़रा से जनावर के छू लेवे का अइसा खौफ, फिर कवनो मरदाना के हाथ पड़िहें तब्‍ब तो बड़ जुलूम होई जाय, जेबुनिस्‍सा दुलारिन, हैंय?
मुंह से धुआं उगलती ज़ेबुनिस्‍सा का जवाब होता, हमार दिमाग फिरा है जो हम खुद के छुवाये जईहैं कहूं!
हसीना बी के एक चाचाज़ाद भाई थे मैमून, कच्‍ची उम्र में घरवालों ने शादी कर दी थी, कच्‍ची ही उम्र में बीवी दो बच्‍चे जन कर गुजर गई थी, कोयले का चूरा बेचकर चार पैसा कमा लेते थे और बहन की हमदर्दी के आसरे उम्र के बयालिसवें साल ज़ेबुनिस्‍सा को निकाह पढ़वाकर अपने यहां लिवा लाने की उम्‍मीद पाले बैठे थे. माथे में वही तस्‍वीर होगी जो हसीना बी हंसती अपनी ननद को छेड़तीं, काहे, मैमून तोको छूहहैं नाहीं? अइसने करंट खायके भागे फिरौगी, बताव?
भौजी की बात से ज़ेबुनिस्‍सा की देह में आग दौड़ जाती. मन करता कोई धड़धड़ाती रेल आए और उसपर से गुजरकर उसका नामोनिशां खत्‍म कर दे! फिर छत के कटे हुए आसमानी हिस्‍से पर नज़र जाती जहां सरसराता आवारा उड़ता कोई पतंग दिखता और उसके उड़ने के शोर में ज़ेबुनिस्‍सा के लगता मंजा लगे तागे उसकी छाती को दायें-बायें लगातार चीरे जाते हों! अक्‍सर ऐसे में ही होता जब बाजू वाले फाटक पर तालिब मियां के गेट पर स्‍कूटर खड़ा करने की आवाज़ आती, और लगभग हमेशा ही ज़ेबुनिस्‍सा का जी करता वह किसी सूरत भागकर जाये सकीना का गला घोंट आये जिससे कि तालिब का निकाह तय हुआ था.
क्‍यों होते हैं निकाह, और होते हैं तो फिर आसमान में कोई क्‍यों छोड़ता है उडने को पतंग. और पतंग इस कदर हल्‍का होता है तो ज़िन्‍दगी क्‍यों ऐसी भारी हुई छीलती जाती है छाती? बहुत सारे सवाल होते जिन्‍हें ठीक आंचल में सजाना नहीं जानती ज़ेबुनिस्‍सा, वैसे ही जैसे अब तक हम नहीं जान पाये मौके पर हंसना, मौके पर रोना!

Monday, September 20, 2010

दैट गर्ल इन येल्‍लो बूट्स व अन्‍य ऐसी ही कोई तो स्क्रिनिंग..

पता नहीं दिल्‍ली शहर था या बिल्‍लीनगरी कोई और. झालरसजी कईरंगी हाथी की बारात थी, मेट्रो चढ़कर बस उतरकर ट्रैफिक के जगर-मगर के अधबीच मैं लहरा रहा था, शुरुआत किसी लाउडस्‍पीकर पर हुआ होगा, धुन में फंसा वन्‍दनगान गा रहा था. हवाओं को रगड़ता दबंग, रंगबाज कोई ईनोवासवार चील होगा, नज़दीक हिलगते खबर करी लोकतंत्र में आकार और आयतन को बीच-बीच में झेलना बच्‍चा, सामाजिक मजबूरी है, हथपना निभाना पड़ता है, वर्ना जानते तुम भी हो जो गा रहे हो वह मेरी ही अर्चना है; अगली और उसके बादवाली सड़क पर भी जो सुनोगे सबकहीं दिखे हाथी की खाल, मगर तराना हमारा ही होगा. अख़बार और टीवी वाले जिंगल्‍स जिससे करायें, कंटेंट मैनेजमेंट हमीसे कराते हैं, गाना हमारा ही सुनाते हैं, दैट्स द चार्म ऑफ़ द गेम.

मैं घबराया गा रहा था, अब चीख़ता सुस्‍ताने लगा, आप कौन हुए, चील भाईसाब, कैसा तो अच्‍छा सलेटीसजा ओह हमारा दुलारा अंडरडॉग हाथी, आप खामखा उसपर चिल्‍ला काला गिरा रहे हैं? अच्‍छा-खासा कान पर आईपॉड चढ़ाये भूला हुआ था झोले में तीन कमीज़ें लिए उन्‍हें धरने की जगह ढूंढ़ रहा हूं, और इस उस व किसी भी शहर जाके जगह की किल्‍लत से पार पाना नहीं ही होगा. भौतिकता में ज़रा जगह हाथ आएगी भी तो मनमनोरम की मलिनता के अन्‍य अध्‍याय खुलेंगे, स्‍वयं से विस्‍थापन के विहंगम कैनवास तन जाएंगे, बुनेंगे; अचक्‍के में दहशतज़दा हाथ-पैर भांजता रिरियाने, फिर वही मालिकगान गाने लगूंगा? कितने तो काम लगे हुए थे ओमप्रकाश दीपक का वह उपन्‍यास है 'कुछ जिंदगियां बेमतलब' के मानिंद माथे और मुंह पर, सबके नीचे से आप दरी खींच रहे हैं?

ऐंठ पैठ आत्‍मासवार चील दिखता था अब नहीं दीख रहा, धमकती मैट्रो दौड़ती है, देह पर एसी की हवा गिराये मैं बाकी में जल रहा हूं, न दिख रहे सब हिस्‍सों में पिघल रहा हूं. कविता में समय पढ़ने से हारा हुआ समय में कविता खोजता सिर धुन रहा हूं, स्‍कूल की पुरानी कापियों में इतिहास और इतिहास के पन्‍नों के हास का हिसाब कर रहा हूं, कि समय विछिन्‍न दाढ़ खुजाता देख सकूं कि अपनी सहूलियत के साधनों में यहां और वहां लोग (इधर ये उधर वे, और उसके बाजू वे, वे, वे और वो भी) समय और समाज को (गोड़, और देह के अन्‍य हिस्‍से हिलाते हुए) कैसे देख रहे हैं.

बहुरंगी अंतरंग का विस्‍थापन बजता रहता है चौबीस घंटे छिन-छिन, कान में वह नहीं गिरता शीशा कहीं किसी के.

चील की हंसी सुन पड़ती है, मैं तीन कमीज़ों को कहां, किधर धरूं की भूल चहकता हूं गुरु, हथबारात की रात के बाद हम अगला तमाशा क्‍या देखने जा रहे हैं?

Wednesday, September 15, 2010

समर क्षण..

जीवन में बहुत सारे क्षण थे. उन बहुत सारे क्षणों के बाहर फिर और क्षण थे (जिनके मापने की मशीन होती और माप को डेटाबंद करने का विज्ञान, और फिर उस विज्ञान की नौकरी पर अपना रोज़मर्रा जीनेवालों के जीवन में ऐसे ही और अन्‍य होते, क्षण. चुपचाप चले आते. या खोये-खोये झरते होते).

समर गलियारे की दीवार पर ढलती दोपहरी की गिरती रौशनियों को निरखता सोचता अच्‍छा, यह मेरे देखे, जिये के क्षण हुए.

जैसे कटे नाखून, कांधे की फुंसी, मसूड़े की सूजन, धूप में जलते लोहे से नंगी पिंडली का रगड़ खा जाना, खौलती चाय को हड़बड़ में गैस से हटा लेने की कोशिश में हाथ का जल जाना जीने के अन्‍य क्षण हुए होते.

क्‍लास से बाहर गलियारों में घूमते, चुपचाप कैंटीन में बैठे किसी दोस्‍त या एक गिलास पानी का इंतज़ार करना व ऐसी ही जाने कितनी दूसरी चुपचाप की चुप्पियां भी जिये की अर्थवत्‍ता के क्षण ही होते?

एक मर्तबा समर दोमंजिले की बालकनी से गिर पड़ा था. दरअसल समर के जीवन में चार ऐसे मौके रहे हैं जब वह अलग-अलग ऊंचाइयों से गिरा- मैं गिर रहा हूं जैसा महसूस करता गिरा- है, उन सबकी जीवन के सकारथ क्षणों में गिनती होगी?.. समर नहीं जानता.

क्षण और उसे डेटाबंद करके विज्ञान की तरह बरतनेवाले जानते हों तो भी चुप हैं..

भूरी काली मिट्टी से कूदकर एक हरा मेंढक गंदले पानी के पोखर में छलांग लगाता है. मेंढक के जीवन में उमगन व निस्‍पृहावस्‍था में छलांग लगाने के अगढ़, परिमार्जित दोनों ही तरह के किंतु अनगिन क्षण हैं, अलबत्‍ता उनकी व्‍यवस्‍था बनाने की उसमें सूझ नहीं. मेंढक की जुबान समझनेवाला कोई विज्ञानी होता तो उसके जवाब में संभवत: मेंढक टर्राता जवाब देता अच्‍छा है, मैं मेंढक ही हुआ.

सुनिधि भी छिनकती, छिनकने के क्षणों वाली सुनिधि बनी, रिक्‍शे से उतरती है, कि आईंदा फिर कभी बक्‍सेवाली गली से रिक्‍शा नहीं पकडेगी, और पकड़ेगी तो इस पतली मूंछवाले के रिक्‍शे पर तो नहीं ही चढेगी. मगर बक्‍सेवाली गली के रिक्‍शे से घर लौटने की अप्रीतिकरता के मौके भी सुनिधि के जीवन में कितने हुए. जैसे छोटे मौसा के छप्‍पन नंबर बस में चढ़कर पूरे रास्‍ते फिर कूढ़ते रहने के मौके.

अंधेरे में आंख खोले आत्‍महत्‍या की सोचते रहने के क्षणों का एक ख़ामोश अंतरंग, गुप्‍त संसार होता.

वैसे ही जैसे मिठाई या जीभ पर खटाईपड़े चटनी की विशिष्‍ट खटास का. इमली के पानी और कूटे हुए मिरचे के तीते का.

सूखे बालों में कंघी के रगड़ने, आईने में दांत निकालकर हंसने, या पेड़ के तने को निशाना बनाकर पेशाब करने के फिर अलग से ही क्षण होते.

मतलब ऐसे बहुत क्षण होते जब समर जीवन के बिखरे क्षणों की सोचता, अलबत्‍ता उन्‍हें मतलब में बुनकर समझ के करीने में गूंथ लेने का ख़याल सोचते ही उसके पसीने छूटने लगते. पसीने छूटने के जीवन में ढेरों क्षण होते, उनका विशिष्‍ट राजनीतिक महत्‍व समझ आ जाये, ऐसे क्षण तो विरले ही होते..

Monday, September 13, 2010

ला पेतीत बोहेमियें.. और दो लड़ाकिनियां, ऑलमोस्‍ट बिल्लियां ही, ऑन सम हॉट टीन रूफ..


झींक के, गाल बजाके, नज़र चुरा के, महटिया के, मान लें कि सामाजिक सौजन्‍यता की दूकान से हम हाथ झुलाये टहलकर लौट आने वाले हुए. सो सिगरेट खरीदने और गोड़ ढीला करने बेहया, बे-हवा की गुड़गांवी सांझ की धूप में बाहर निकलें, बकिया पंखे की हवा के नीचे के सीमेंटेड घास पर लेटे रहें, सोचते ओह, कैसे तो हम बोहेमियन हुए. भीतर-भीतर हौंड़ाये लगता रहे कि तसल्‍ली में पड़े हैं, आंखों को मूंदते ही दुनिया और उसमें अपने होने की एक तस्‍वीर बुन जाएगी; आश्‍वस्‍त हो लेंगे, और धीमे-धीमे सरकता एक दिन अपनी उदासियों में सिहर, हौले-हौले फिर वह भी गुज़र ही जाएगा.
मुंदी आंखों वाले देह पर न दिख रही बिल्लियां दौड़ती, ऊधम बिखेरती होंगी. जाने किन गजनों के जले बालों में खुर फंसातीं, पलकों पर नेह के नाखुन चलातीं, पूछतीं मासूमियत से सपना देखते हो? सपनों में क्‍या दिखता है, तोपखां? मैं कहूं हटो, हटो, बिल्लियां तो हंसती बेग़ैरत जवाब दें, ह: ह: ह:, आंखें तुम्‍हारी चबा जायें, कलाकार? ऑर समथिंग ऑव दैट सॉर्ट?
बिल्लियों से जिरह की फिर सूझे मेरे पास भाषा नहीं है, न सलीके से उनसे सुलट लेने का उत्‍कट उत्‍साही हौसला. बिल्लियां शायद वहां हैं भी नहीं जहां मैं अपने पलकों को कांटागड़ा पा रहा हूं, वह कुछ और ही है जो अचेतन के अबूझघामों के खंभे नोंचता, नाचता फिरता है.
चप्‍पल कहीं गिरे होंगे लाइटर कहीं, हम गिरे अपने सिरों में सोचते पेतीत बोहेमियनपने के और क्‍या कैसे आभूषण गढ़ लें. कि निकल जायें बाहर, एक और सिगरेट की तरह जल लें.
और नीचे यह लड़नियां पॉडकास्‍ट है, ज़रा नैतिकताओं, स्‍पीड और स्‍वर-प्रोसेसिंग के सेंसरों से होता, आया जाता है..

Wednesday, September 1, 2010

लहकियां: बस ज़रा सी लहरायी हुई..





(स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए कृपया उन्‍हें चटकाकर अलग पृष्‍ठ में खोलें.)

Tuesday, August 31, 2010

शहर को कैसे देखें उर्फ़ बातें बनाना..

हाथ की उंगलियों पर गिनी जा सके जितने दिनों वाली गुडगांव से पहचान है, मगर जितने दिनों की और जैसी भी है, उसमें सन्‍न और सुन्‍न होता रहता हूं कि शहर को कैसे देखें. और फिर उस दिखते हुए की किन रुपों में पहचान करें. बहुत बार अहसास होता है कहीं बाहर छूट गई हवा और अटकी हुई धूल का कोई दूर तक पसरा सैरा है जिस पर आंखों को थकाने की गरज में एक सिलसिले में सीमेंट और शीशों की दीवारें उग आई हैं. और एसी की चहारदीवारी में कैद खरीदारियों को निकले सफरियों के लिए शीशाघरों के रास्‍ते होंगे शहर के रास्‍ते, उस खरीदारी से बाहर खड़ों को जाने कैसी दीखती होगी वह दुनिया, मैं देखना चाहता हूं तो दीखता है धूल और गुबार पीटकर गुज़रा है कोई आततायी घुड़सवारों का लुटेरा दल, और उसके बाद रेगिस्‍तानी गांव के निस्‍संग वीरानों में दूर लोहे के जालों में उलझी गुज़रती दीखती है चांदी की धुधली, खिलौनागाड़ी सी अवास्‍तविक मेट्रो रेल, जैसे शहर सांप के उनींदे सपने में कोई सुनहला केंचुल उतर आया हो!

मालूम नहीं शहर में रहनेवाले कैसे देखते हैं अपना शहर. बहुत बार चौंककर देखने की कोशिश की है मैंने मुंबई, हमेशा एक उदासीन हंसी में बंबे और बंबई दीखी है. और बहुत बार तो अपने परदों में उलझा मलाड और जोगेश्‍वरी के बीच सिर्फ़ अंधेरी का अंधेरा ही दिखता रहा है. और बहुत-बहुत देर तक दिखने के बाद आंखें मुंद जाती हैं तब सपने में शहर नहीं दिखता, शहर की आवाज़ें आपस में एक-दूसरे पर गिर पड़ती सुन पड़ती हैं. कैसे देखते हैं शहर को, आप समझते हों शायद शहर देखने की तमीज? मैं सिर झुकाये हवा में गिरते धूल की आवाज़ों को सुनता हूं, शहर को कैसे देखूं की सोचता हूं, देख नहीं पाता.

बड़े शहर छोटे शहर. एक-दूसरे पर गिरते शहर. कंगली ठठरियों पर चांदी का वरक चढ़ाते शहर. किसी पुरानी याद पर गैरतपने का गिरह गांठते. राह में आते ठेलेवालों को हटाते, लगभग शरीफ़ लोगों को बकरियां बनाते, खेतों के बीच सीमेंट बिछाकर रिसोर्ट उगाते, गुंडों को परवरदीगार बुलाते, बड़े छोटे, कैसे-कैसे तो शहर.

देहरादून की तरफ निकलते हुए सोच रखा था इस बार पहाड़ के कई एक शहर देख आऊंगा. ठीक-ठीक देहरादून देखना भी संभव न हुआ. अपनी बदइंतज़ामी से अलग बरसात दिखती रही, खबरों में पहाड़ का फटना गूंजता रहा, या यह कि क्‍या खाकर इस शहर में ककड़ी किलो चालीस के भाव और खुबानी सौ के बिक रहा है. एक दोस्‍त ने कहा देहरा जा रहे हो वहां पानू खोलिया को देख आना, देहरा में किसी दूसरे ने खबर करी बाबू, उसके लिए हलद्वानी जाना. ज़ाहिर है हम नहीं गए, नहीं देखे. मतलब वही कि मालूम नहीं कैसे देखते हैं.

चलते-चलते आखिर में अपनी थेथरई में कुछ तुकमंदी:

बात में बात में बात हम बनायेंगे, तुम फिरी-फिरी आना. आंखें फैलाये गिरी जाना. हम हंसें इठलायेंगे, बाद को होगा कि शरम में सिर नवायेंगे, तुम उठाना, हमारी बनी बातों को नीचे गिराये जाना..


Saturday, August 21, 2010

छुपे की कुछ तस्‍वीरें..

छितराई-छितराई और थोड़ी सी ही हैं, और भी होतीं, मगर फिर, आसमान में बहुत बादल और जमीन पर ढेर सारा पानी बना रहा है. अभी भी वैसा ही कुछ और भीतर घुमड़ती अनिश्चितता है..















ज़्यादा तस्‍वीरें सुदर्शन जुयाल ने ली हैं. अतिरिक्‍त मैंने और एकाध सुषमा नैथानी ने ली हैं. तस्‍वीरों की दुनिया उत्तराखंड के जौनसार क्षेत्र के चकराता और ईछला गांव व आसपास का संसार है.

(यह ख़ास घुघूती के लिए)

Sunday, August 1, 2010

छुट्टी के दिन का जाने कैसा तो कोरस..

नालायकी और लायकी के बीच घिरती, घूमती एक गुफ़्तगू.. ज़रा ज़िंदगी की टेक, थोड़ा साहित्‍य के महीन अनुराग, कुछ अपने को कहते, सुनते, समझने के आह, आह्लादकारी सुख.. और हां, वही प्रत्‍यक्षा बी और पिरमोद सिं बोलते हुए..

Friday, July 30, 2010

पहाड़े पहाड़े एक पॉडकास्‍ट..

कुछ मौके होते हैं, आदमी का चुप रहना बेहतर. जितना मैं हो सकता हूं, या नहीं हो पाता हूं, उतना चुप रहने की कोशिश करता भी हूं. मगर यह भी सही है कि बहुत सारा आदमीपन फिर भी कहीं छूटा रह ही जाता है. दो रात पहले उस एक गली में छूटता और डेढ़ दिन पहले फिर अपनी कोई एक बदजुबानी में.. ख़ैर, तो मुंह खुल ही जाता है (और फिर बेहया, बदजुबां खुला ही रहता है) और लरबोरियां अपने को गाने, सुनाने लगती ही हैं..

तो अच्‍छी चाय और अच्‍छे ऑर्गेनिक नमकीन की संगत में ऐसा ही कुछ गाये जा रहा हूं, पी. बी. जाने क्‍यों कैसा आनंद है वैसा ही कुछ बोलाये भी जा रही हैं.

कोई ग़लती और फूहड़ता हुई हो तो मैं और सिर्फ़ मैं ही उसका जिम्‍मेदार हुआ.

जो अच्‍छा है वह खास बबुनी प्रत्‍यक्षा और उनके नेक़ इरादों के लिए..

पठन-पाठन के थकेलों की तकलीफ़..

थक गया हूं. पस्‍ती की एक खास स्थिति में अंग के इधर और उधर, सब किधर पिराते रहने का जो एक दर्दभरा अहसास बनता है न, वैसा ही कुछ. और इस थकनन में मैं अकेले नहीं हूं. अब्‍बास, लल्‍ली, चतुरानन और रामकीरत भी खड़े हैं. इधर-उधर खड़े हैं, मगर खड़े हैं. थके हुए. गाल खुजाते हुए. सिर झुकाये. सिर्फ मुनिया ही है जो चुपाये रहती है, कोंचने पर भी कुछ कहने, कमिट करने से अपने को बचाती है. मगर उसकी चुप्‍पी की संगत में आधा घंटा बैठ जाइए, विदाऊट डाऊट देख लीजिएगा कि वह भी थकी हुई है. कोई बंबे वाला होता तो वैसे भी दू मिनट में बोल ही देता कि सब साले, थकेले हैं!

अब्‍बास को डेढ़ घंटा पहले फोन करके सवाल किये, का मियां, हिन्‍दी में अच्‍छा नवका क्‍या पढ़ रहे हो? अब्‍बास एक मिनट चुप रहने के बाद जवाब दिये नवका होगा, मगर अच्‍छा है कुछ? है तो हमको खबर नहीं है, आपको है तो बता दीजिए, हम पढ़ने लगें?

छोटका बाबू विष्‍णु से पूछे तो बोले अरे, कैसे नहीं हैं, ब्रह्मा हैं, उनको चंपानन पुरस्‍कार मिला है? महेशो हैं, उनको पहले ही मिल चुका है! अपराजेय आनंद है, आनंदविथी है, आदि अनादि, और भी जाने क्‍या-क्‍या. आनंद लेना सीखिए, लेते-लेते आनंद लेने की आपको तमीज आ जाएगी?

खुद से घबराये हमने रामकीरत को डांटकर कहा साले, जरा तुमसे उत्‍साहित होते नहीं बनता, विष्‍णु होते रहते हैं, जरा साहित्यिक अनुराग का ककहरा उधारी लेकर जीवन धन्‍य नहीं कर सकते?

बाथरुम में कहीं छुपाके रखे थे, वहां से बीड़ी सुलगाये लौटे और तब रामकीरत ने ठंडे मन जवाब दिया, भइय्या, बह्मा, बिस्‍नु, महेस का तेलबंदी का कहानी का हम बेकीरत आदमी कौ ची करेगा, कर सकेगा, आपै बताइये? हमरे मन में मीठे आंच की कौनो अगरबत्ती जलनी चाहिए, नहीं जलती हो तो जबरिया भजन गाने लगें? गायेंगे तो आप उसे मन की मोहब्‍बत में घुला अनुराग बुलाइएगा?

लल्‍ली बरसात का पानी में लेसराया साड़ी समेट रही थी, मने असमंजस था कि कड़ाही में चूड़ा भूज लें कि पाव भर पकौड़ी छान लें, उखड़े मन छनछनाई बोलीं, तुमलोक को सरम नहीं लगता कि इसके और उसके पीछे साहित्तिक अलता सजाते चलते हो? सोहर गाते हो तो अइसा जेमें दू आना के जलेबी जेतना भी मिठास नहीं है, और हमरे छिनके मन को अपने बभनई में उलझाते हो? हमरे बिस्‍वास को? हमरे मन के अंतरंग के अनुराग को?

लाल, पीला और ओकरे बाद चूल्‍हा से कड़ाही उतारकर सगरे नीला हुई अंगना में लल्‍ली लौटीं तो फिर वइसे ही फैले-फैले बमगोला दागे-दागे बोलीं, आदमी एगो किताब हाथे में लेके बिछौना में ढेमलाता है तो काहे खातिर, कि मन के गहिरे कवनो रागवन के सफरी में निकले, कि ना? कि छुच्‍छे सब्‍दसंग्रह और ज्ञानसंचय से सिरफुटव्‍वल खेलत फिरे जी?
भागो तूलोक हियां से, तूलोक का पीछे दू पैसा का पकौडियो बरबाद करे का जी नहीं है!

अब्‍बास को फोन पर मैंने दीदिया का किस्‍सा सुनाया, मियां बाबू, अपनी पुरानी आदत के मुताबिक तीन मिनिट चुपाये रहने के बाद बोले कौन नवका बात बोल रहे हैं, ई सब सुन-सुन के भी अब मन मुरचाइल हो गया है, और थकाइये मत!

कहने का मतलब जल्‍दी ही हम अपनी पुरनकी, पहचानी थकनवस्‍था में लौट आये. अब्‍बास, लल्‍ली, रामकीरत वहां पहले से लौटे हुए थे ही्. मुनिया का भेद अभी भी साफ होना बाकी था. मगर फिर, मुनिया हमेशा की नन-कमिटल रही..

Sunday, July 25, 2010

बाहर, ऑलमोस्‍ट..

बाहर निकल रहा हूं. नहीं, इसलिए नहीं कि कमरे में पानी इकट्ठा हो गया है. जो बाहर हुआ है उस पर ज़रा नज़र चली जाएगी की उम्‍मीद में. या अगर नहीं हुआ है तो उस पर. कहीं तो नज़र जाती रहेगी ही. बेचारी नज़रों का क्‍या है उड़-उड़कर कहां-कहां चली जाया करती है. उड़-उड़कर मैं नहीं जा पाता तो बीच-बीच में किसी तरह बस्‍ता बांधकर यहां और वहां पहुंच जाने की कोशिश करता हूं. कि शायद वहां से कहीं और आगे पहुंचना संभव हो सके. तीन कदम आगे. या तीन लाख वर्ष जैसा ही कुछ. उम्‍मीद करने में हर्ज क्‍या है. उम्‍मीद न करुं तो आपसे कभी मिलना न हो पाएगा. न आपका कभी भाषा के पार मुझे पहचान पाने की कोई सहूलियत, सूरत बनेगी.

वैसे सूरत हम बनाना कब चाहते हैं. सूरत बनाने की सोचते में हाथ कांपते हैं. हाथ कांपना ठहर जाने के बाद भी देर तक मन का कांपना बना रहता है. वैसे में हम चाहने लगते हैं अच्‍छा हो कोई सूरत न ही बने. जैसा, जो भी अपना सा रूप लिए हम अपने से में बने रहें.

अपने से में हम बने ही रहते हैं. उसी बने रहते में फिर बाहर भी निकल आते हैं. कम से कम मैं तो निकल ही आ रहा हूं. तीन लाख वर्ष आगे शायद न पहुंच पाऊं, तीन कदम ही आगे निकल चलूं. आप शायद दिल्‍ली में दीखें, मुस्‍करायें और जीवन- ज़रा सा, ज़रा सा और कम बुरा बन सके? या बेहतर? दिल्‍ली आपको सुहाती न हो तो हम कहीं और बाहर मिल लेंगे, मैं पहाड़ पर बारिशों में घिरा कहूंगा हूं यहीं कहीं, आप जोर-जोर से कहियेगा कहां कहां? फिर हम हंसने लगेंगे. हंसी न आये तो भी उसकी एक कोशिश कर लेंगे. यकीन मानिए ऐसी बुरी बात न होगी. यूं भी एक कोशिश कर लेने में कोई हर्ज नहीं. बीच-बीच में बाहर निकल ही जाना चाहिए. बाहर बारिश होती हो तैसे में भी. नहीं, आप हमारे साथ इत्तफाक़ नहीं रखते? (इत्तेफाक़ में नुक्‍ता लगाने के हद तक भी नहीं?) निकलना अच्‍छा ख़याल नहीं? लेकिन मैं तो ऑलमोस्‍ट पैर बाहर रख चुका हूं, दोस्‍त? फिर मोड़ लूं, ज़रा सी उम्‍मीद बांधे हूं उस पर फिर पानी गिर जाने दूं?

आप ज़रा सा अच्‍छा नहीं सोच सकते? अपने खातिर न सही, मेरे ही लिए? बार-बार बस्‍ता बांधना आपको हंसी-खेल लगता है? जबकि बाहर बरसात हो रही हो? जबकि मैं बाहर बरसात में खड़ा होऊं? हंसते हुए बेहयायी से, बेमतलब, चीख़ता फिर रहा होऊं कि देखो, निकल रहा हूं?

Thursday, July 22, 2010

छोटे लाल

खिड़कियों के शीशों पर छोटी बूंदें बजती रहती है सारी रात. जैसे जेब में ज़रा सा पैसा बजता है. जैसे मेरे ज़रा से शब्‍द. ताव खाते रहते हैं. शब्‍दों से दूर खड़ा मैं कभी देख पाता हूं कि बज रहा हूं. अपने लघुकायपने में सारंगी जैसा सिरजने की कोशिश सा करता कुछ. सन्‍नाटे में छोटी आवाज़ें घन्-घन् घूमती कोई पुकार बुनती रहती हैं.

देर तक रोता रहा बच्‍चा कभी चौंककर कान लगाये सुनता है.

कि यह क्‍या है जिसका बजना मेरे विलाप से भी ज़्यादा भीषणतर बनता चलता.

छोटी बातें हैं. ज़रा ज़रा सी की. जैसे एक चूहे का बड़े कमरे में चले आना. छोटी गिलहरी का पीपल की नोंक पर पहुंच जाना. छोटों की बड़ी बातें. छोटी बड़ी बातें.

रॉकेट सिंह: सेल्‍समैन ऑफ़ द ईयर’ में छोटेलाल मिश्रा का फैल जाना. बड़े पुरी का और छोटे होते हुए जाना. शिमित अमीन की स्क्रिप्‍ट की छोटी ग़लतियों का फ़ि‍ल्‍म की बड़ी विफलता में बदल जाना.

मिस्‍टर एंड मिसेस 55’ के आखिर में नायिका का एयरपोर्ट पहुंचना छोटी ही बात होती है. मगर उसके मतलब बड़े बन जाते हैं. जैसे ‘गाइड’ के आखिर में मरते राजू के पास रोज़ी का लौट आना.

जैसे आपकी ज़रा सी हंसी. और मेरा चुप बने रहना.

या मेरे चुप बने रहने पर आपका हंसने लगना.

छोटी ही बातें हैं. जैसे आलोक राय की छोटी किताब. शम्‍सुर्रहमान फ़ारुकी की. पतली. मगर कितनी सारी हंसी है जिसमें. या चुप्‍पी. बीच फांक कटे समूचे आधे-आधे गांव.

(एक और किताब हुई. प्रैस से नई और ताज़ा-ताज़ा आई. बाबू विजय शर्मा की. 'दिमाग़ में घोंसले' छोटी ही है. मगर घोंसले बड़े हैं.)

बड़े भूगोल का वह भी कैसा छोटा इतिहास बना रहा. द ग्रेट आर्क. राष्‍ट्रीय विरासत की महत्‍वपूर्ण थाती हो सकता था, नहीं हो सका. महाराष्‍ट्र के छोटे हिंगनघाट में विलियम लैंब्‍टन की एक छोटी सी समाधी है, बड़ा राष्‍ट्र एक बड़े नायक को बिसराये छोटा बना रहा.

मैं भी सोचता एक छोटा अर्थभरा वाक्‍य लिखूं. मगर फिर उस छोटे से जूझते में दिखता अपनी बेचैनियों में भी हम बड़े छोटे ही रहते रहे.

Monday, July 19, 2010

न खत्‍म होने वाली बारिश की उस रात..

माधव मत आना उस रात, तीन पाये और चार ईंटों पर टिके तखत की इस दुनिया का सब सन्‍तुलन तोड़ जाओगे, मैं आईने के सामने खड़ा सी‍टी बजाने से फिर कतराता फिरुंगा, वैसे भी उस रात न खत्‍म होने वाली बारिश बरसती होगी, छत के टपरे से ज़्यादा दिलों पर बजती, किसी और घर रात काट लेना, माधव, यहां मत आना. मेरी हर बात पर हंसने लगते हो, ईश्‍वर के लिए उस रात बख्‍शना. उन लड़कियों के नाम जो तुमसे जाने कैसे दु:ख पाती रहीं, दु:खकातर छूटी फिर ताउम्र मुंह चुराती रहीं, छत के मुंडेर के वे मोर जिनका जीना तुम हराम किये रहे, बच्‍चों का ग्राइप वॉटर चुराते, पूजाघर के मिश्री के ढेलों से अपनी गिनती सजाते उन सब के नाम मत आना माधव, उस रात मत आना. इस उम्र में आकर अब कुछ चीज़ें हैं जिसका सामना करने से डरता हूं, ख़ास तौर पर जब पूरी रात बरसात बरसती रहे.

माधव मत आना उस रात, फुसफुसाकर मंत्र सा मैं पढ़ता हूंगा दीवारों पर, अचार के सूने बयाम मुस्‍कराते होंगे, टूटे बकल का बेल्‍ट नम हवा में कांपकर फुफकारता, और तुम लापरवाही से दरवाज़े के भीतर पैर धरोगे, घुटने तक गीली पतलून गंदगी में औंचाये, हाथ पटकते बे-लजाये, जैसे उम्र के इतने वर्ष बीते का कोई ख़याल ही नहीं, कि जैसे ज़िंदगी तो शुरु हुई अभी एकदम अभी, कि हकबकाया मैं गुस्‍से से ज़्यादा शर्म में नहाया लरज़ता फिरुंगा कि तुम्‍हें मना किया था, मगर माने नहीं तुम, कि मैं कोई मज़ाक का कैलेंडर नहीं जिसे तुम जब कभी झांकने चले आओ, कांख से छेड़ने आंख से झाड़ने की निरर्थक कहानियां बनाओ. हां, निरर्थक.

माधव मत आना उस रात मैंने कहा था तो कोई मतलब रहा होगा. रिक्‍शे पर कपड़ों के नीचे छिपी किसी पैर की उंगलियां दिखी होंगी, किसी ने एक नाम कहा होगा या ग़लती से हमने खुदी को किसी ख़ास नज़र देख लिया होगा, कुछ बात रही होगी माधव, कोई छुटा तागों में उलझा तिनका और वह सनसनाती रात, कि बरसने की आवाज़ों से मैं एकबारगी चौंक गया हूंगा, कि अचानक पानी के चमकते तीरों में एक पगडंडी खुल गई होगी, मुसलाधार में चीखा किसी का सुन पड़ा होगा, जबकि हक़ीक़त में सिर्फ़ बरतन कोई फ़र्श पर गिरा होगा, लेकिन मैं दहल गया हूंगा, ख़यालों की सब सिटकिनियां चढ़ा ली होंगी. और इस तरह ख़यालों के तहखाने में और गहरे गिरा हूंगा.

माधव मत आना उस रात कहता-कहता मैं थक गया हूं माधव. तुम्‍हें मालूम है तीन जोड़ी मोज़े और चार कमीज़ों को तहाकर सहेजने की मुझे फुरसत नहीं, विटामिन और तकिये के नीचे कहां धरा था क्रॉसिन की गोलियां बटोरने की तो हर्गिज नहीं, मैंने कितने वक़्त से तुम्‍हें चिट्ठी लिखी नहीं और राज्‍य परिवहन निगम की बस की खिड़की से बाहर क्‍या नज़ारा दिखता है उसकी तो सपने में भी याद नहीं. तुम समझ सकते हो माधव मैं कितना संभलकर चलता हूं, पैर दुबारा किसी हाल ग़लत न पड़ें की संजीदगी में सिर से पैर तक बस इतने में ही यकीं रखता हूं, तुम आकर फिर मुझे सपना दिखाओ, बताओ जीवन कैसा अनोखा है और हम मन की नाव और मोहब्‍बतों के गांव पर बैठे इस घनेरे से बाहर के अजाने अंधेरों में कूद पड़ें, ओफ़्फ़, माधव इन ज़रा सी रुपल्‍ली के चप्‍पलों को चटकारते, मेरा दिया चाय उतारते ऐसे ख़याल कहां से आते हैं तुम्‍हारे भेजे, इक ज़रा सी शर्म नहीं आती?

माधव मत आना उस रात क्‍योंकि न खत्‍म होनेवाली बारिश से अलग वह कोई और रात भी होगी तो भी मैं इसी तरह डरा अपने कोने मिलूंगा, बेमतलब घुटने की थपकियां बजाता, पड़ोसी के कोई सस्‍ता चुटकुला सुनाता. मैं नहीं चाहता कि तुम फिर बताओ हम क्‍यों भागे थे घर से या बस की छत पर उस आवारा रात एक कुंजरिन की मोहब्‍बत में हम क्‍यों पिटे चार शोहदों से, और कुंजरिन का गरबीला चेहरा देखकर पिटे भी खुश रहे थे. तीन-तीन दिनों तक भूखे रहकर हम बेहयायी से हंसते और कड़कड़ाती ठंड में सिर्फ़ सपनों की आंच पर तपते रहते. तुम्‍हें याद है माधव केया घोषाल भाग जाना चाहती थी तुम्‍हारे साथ मगर तुम थे जो नंबरी पक्‍कमख़ां, हाथ जोड़कर केया से माफ़ी मांग ली थी कि क्‍यों अपना बेड़ा गर्क करना चाहती हो लड़की, टूटी नाव के हम किसी और सफर पर निकल रहे. ओह, पागल माधव भाभी के गहने चुराकर मैं आया था तुम्‍हारे पास याद है? मैं कुछ भी याद नहीं करना चाहता माधव, यह भी नहीं कि मैं हर समय क्‍यों तुम्‍हें इतना याद करता हूं.

माधव मत आना उस रात, तीन पाये और चार ईंटों पर टिके तखत की इस दुनिया का सब सन्‍तुलन टूट जायेगा, मैं आईने के सामने खड़ा सी‍टी बजाते हुए कैसा मूर्ख लगूंगा मैं नहीं देखना चाहता. वैसे भी उस रात न खत्‍म होने वाली बारिश बरसती होगी, छत के टपरे से ज़्यादा हमारे दिलों को बजाती. और तुम्‍हारे चेहरे पर हमेशा की सजी वह कमसिन हंसी और महकती हरकतों में बिजलियां लपकतीं, मैं कातर होकर फिर बहकने लगूंगा, बारिश के नगाड़ों पर हम फिर सारी सारी रात सपना बुनते, मैं खुद को निश्‍छलता से हंसता देख चौंकता फिरुंगा, सब गड़बड़ा भरभरा जायेगा माधव, हमारी ज़हीन इतनी संगीन दोस्‍ती के नाम पर ही मत आना माधव, क्‍योंकि तुम भी जानते हो मैं सिटकिनी चढ़ाये पूरी रात दरवाज़े से देह सटाये तुम्‍हारे कदमों की राह तकूंगा. इसीलिए मत आना. उस रात किसी भी रात दोस्‍त.

Saturday, July 17, 2010

कितने जुग में रोमकथा..

विकास कहता है ’रोम वाज़ नौट बिल्ट इन अ डे’. एक दिन तो दूर यहाँ एक साल में भी अपनी रौमहर्षककथा बिल्ड हो रही है इसमें भयानक संदेह है. कितने दिन में होगी? क्योंकि होनी तो है. और कोई सुर्जप्रकाश सूरज की रोशनी की तरफ़ उंगली पकड़ के लिये तो जा नहीं रहा. सत्रह दिशाओं में मन भागता है, अहा कैसी तो हर्षीली बयार बहती है, मगर सत्रह की जगह सात काम तो कुछ वाज़िब तरीके से होते चलें? ढाई ही सही, आं? व्यासजी ने कितने दिन में महाभारत निपटा लिया था? हमको अपना यह सकारथ निपटाने में फिर इतना समय क्यों लग रहा है? जबकि मैं किसी की गांठ से बंधा हूँ और ना ही मेरा कंप्यूटर मेरे कंधे पर गिरा पड़ा है. यह अपनी स्वर्णकथा हो क्यूँ नहीं रही है? आप सब तो चिरकुट हैं ही, इस लाघव को सोचने कहने में क्या संकोच? मगर मैं क्यों इस तरह से चिरकुट हुआ जाता हूँ? कि सन्नास्थिति में खुद को तकता सन्न पड़ा रहूँ, कि स्वर्णकथा कह सकने का काम फिर मुल्तवी पड़ा रहे?

सुर्ज का प्रताप बरगद के नीचे मेरे पीढ़ा पर आकर कब बैठेंगे? बैठेंगे प्रभु? या मेरा रोम रोम कुंठित करने वाला यह रोम जाने कितने दिनों में बिल्ड होगा.