Saturday, January 30, 2010

बिखरे हुए.. जैसे बिखरी बोली..

सिर ओले पड़ेंगे, उंगलियों पर घमौरियां उगेंगी, आवारा कोई बिल्‍ली आकर बरौनियां चूम जायेगी, प्रभुवर, ऐसे में गाल कौन ज़बान मचायेंगे? मतलब भाषा कौन राह, रस्‍ते, पगडंडी, राजमार्ग जाएगी, हमें बुझाएगी? ‘दुनिया को कैसे देखें!’ तो कोई नहीं ही बतायेगा, किस ज़बान में देखें का रास्‍ता कोई सूझायेगा? चारखाने के शर्ट में ट्रक के पुआली पर खजुआये देह ‘अरी होS गोरिया कहां तोरा देस हो, इश्किया के कवन-कवन भेस हो?’ गाना गाके हम मल्‍टीप्‍लेक्‍स का परदा के बाहिर लैंग्‍वेज का मल्‍टीप्‍लूरल डैसेक्‍सन पर काबिज हो जायेंगे, और सफलता-विह्वलतापूर्वक बहिरयाने में सक्‍सेसफुलो होंगे? कैन देयर बी अ लाइट इन दिस डार्कली, ब्‍लडिली कलरफुल टनेल ऑफ़ लिंगोइस्टिक मैडनैस? व्‍हॉट इज़ इश्किया? इश्‍क पिया, पिया?

भाषा के सवाल पर आदमी घबराकर प्रोफ़ेसर बुराक्‍वॉस्‍की के पोथों के पन्‍ने जीमने नेशनल आर्काइव की ओर कूच करेगा, मगर रास्‍ते में ही कहीं एक रीजनल वैरिएंट उसकी गरदन रेतने लगेगी! तमिल, मलयालम, राजस्‍थानी के अनंत तो अभेद्य होंगे ही, खांटी भोजपुरिया भी किसी गठे थ्रीलर का न सुलझता भेद ही होगा-

‘तीन जाना रस्‍ता के होने ठाड़ा रहुअन, भइय्या, अऊर अन्‍हारा में लुकाइल एगो जनाना रहुए, कवन तS एगो पुरकना फिलिम के एगो गाना रहुए, ऊहे गावत रहुए, मेहरारु जात के जरा हिम्‍मत देखीं? मुंह में गिलौरी दाबल दिसासर भुइयां बुलेट बहिरयावते रहुअन, तबहियें तS दन्‍न देना फैरिंग दग्‍गल! केहु के अंजादे न भइल कहंवा से बुलेटिया आइल, कहंवा गइल!’

ओह, समवन शट अप दिज़ वॉयस, प्‍लीज़, हमारे अंतर्तम की अंतरंग ज़बान क्‍या है? घर के परदों, चाह की प्‍याली, किताबों के भीतर दबी दुनिया के परे हमारे मन के खाली बनों की? यहां से निकलकर वहां, वहां से निकलकर यहां, दोस्‍त और दिलदार, फूफा और फटे प्‍यार के बीच हम सहूलियत के शाब्दिक पटरों पर बैलेंस बनाते संपर्क-संबंध की नदी पारते हैं, भाषायी चिचरिकारियों का एक बीहड़ भूगोल बुनते फिरते हैं, एक लयकारी नयनाभिराम भाषाबंद का अंतरंग लहकलोक बुन पाते हैं? कोई अन्‍य दिखाने लगता बताने लगता है डाक्‍टर सर्हषोदन सहाय ने इस सवाल पर यह कहा है, पंडित अनुमोदन मिसिर ने उस सवाल पर वो, हम खुद क्‍या किस ज़बान में कह रहे हैं, सोचकर हम गड़बड़ाने और घबड़ाने कभी नहीं लगते..

अच्‍छा होता अगर संपर्क भर की ज़रुरत का सवाल होता, अंग्रेजी होती ही भले हम उसे अभी भी ठीक-ठीक जानते न होते, मगर फिर यह सवाल होता कि वह हमारे अंतरंग के उछालों को कितना-कितना पहचानती होती?

सत्‍ता ताक़त के घोड़े पर सारे अंतरंगों को रौंदती, बेमतलब, इतिहास का कचड़ा बनाती निर्ममता से आगे जाने किस भविष्‍य में बढ़ी जाती है, भाषा की मासूम चिड़ि‍या, महीन तितलियां जाने फिर किस सूने ज़हान, छितराये आसमान में अपने पतंग फेंकती हैं, मन के आसमान में एक आततायी, चैन हरे जाने वाले तक़लीफ़ से अलग, ठीक-ठीक फिर उड़ता क्‍या है? मन की गोलियां, मीठी बोलियां?

Wednesday, January 27, 2010

औरतों के देश में..

जिधर नज़र घुमाओ, वही नज़र आतीं, गजब नज़ारा था. अखाड़े की लड़ाई के वक़्त जैसे पेड़ों के डाल और छतों के मुहाने तमाशाई बच्‍चों से पट जायें, शादी के घर जैसे नहान-घर अटा-बझा रहे और चाय के कप पर कप खाली होते रहें, मगर गिलास भर पानी पाना एकदम मुहाल हो और सत्‍यनारायण कथा वाले घर के दालान में अपनी खोयी चप्‍पलें, कुछ उसी तरह से बकिया का सब गायब भले न हुआ हो, जाने कहीं छिप गया था, जो प्रकट, गोचर था वह जच्‍चे वाले घर में बसाइन कपड़ों-सी हर तरफ फैली औरतें ही औरतें थीं.

कोई लहसुन छील रही थी, कोई माथे के ढील धो रही थी तो कोई मेहंदी बीन रही थी, और ताज्‍जुब की बात, सब गुनगुना रही थीं. चौंके के असमंजस में ही एकदम से उछलकर सवाल छूटा होगा, ‘क्‍या गुनगुना रही हैं?’

तिस पर एक तमककर मुड़ी थी (‘गंगा जमुना’ की बैजंतीमाला कि ‘गाईड’ की वहीदा रहमान की तरह?), ‘हम जमीन वालियां हैं, बाबू, हमसे न गुनगुनवाओ, आसमान उड़ाओ! यही जरा दुनिया है, गाकर हम कहां जायेंगी?’ इतना बोलकर तमक कुमारी फिर वापस अपने गाने में उड़ने लगीं..

नीले आसमान में सस्‍ते छापेवाले कुछ फूल से खिल गए, या कुछ रंगीन तितलियां सी उड़ीं और नज़र झपकते में औरतों के छापेदार कपड़ों में लुका गईं!

हुमसभरा बच्‍चों का शोर गूंजता, शोर करते बच्‍चे दीखते नहीं. कोई औरत थपथपाती उस न दीखते को पुचकारकर चुपा देती, फिर हौले अपने गीत में लौट जाती, अपने बझेपने में तैरती, डूबी डोलती.

मैंने हारकर जुसेप्‍पे से सवाल किया, ‘ये मध्‍य प्रदेश की, मंगोलिया की, बुरकिना फासो, मैंक्सिको कहां की हैं औरतें? हमारा सुख-दुख सुनने के, मेरा हाथ अपने हाथ लिये, गाल से गाल सटाने के, गाये जा रही हैं, क्‍यों? किस जबान में गा रही हैं? पहले तो इनका देश क्‍या है, कोई आइडिया होता है, आं? ओ पतली, लंबी चोटी वाली हसीना.. ?’

जिसे पतली, लंबी चोटीवाली कहकर चिन्हित किया था, उस हसीना ने अपने बाल उतार लिये, अपने गंजेपने पर चुनरी फेरती बोली, ‘हमारा कौन देस? देस होता तो हम औरतें होतीं?’

एक उमिरदराज, पुरइन थीं, मुंह में मुसलमानी हुक्‍का गुड़गुड़ाती बोलीं, ‘औरतों बदे देस खोजे कवनो आसान काज है? चहुंओर घुमि आओ, सब्‍बे तरफ औरतन भेंटायेंगी, उनका देस न देखोगे. औरतन की आंख में बस गाना है, सो ही उनका मुलुक, मुलक के राह और पगडंडी, बूझे? मगर तुम बजार के अमदी, कइसे बूझोगे?’

मिट्टी के पुते हुए आंगन से नीले दरवाज़े पर एक औरत तानपूरे की शक्‍ल का एक अफ्रीकी बाजा उठाये बाहर आई, इमली की शक्‍ल का एक बड़ा, भारी वृक्ष था जिसकी फुनगी पर बसंती पंखोंवाली एक चिड़ि‍या सोचती बैठी थी कि उड़ना इतना मुश्किल क्‍यों होता है, उड़ने से ठीक पहले मन इतना घबराता क्‍यों हैं?

जुसेप्‍पे की आंखों के कोर एक बूंद आंसू आकर अटक गया था, लेकिन हमने उसकी बाबत बात नहीं की. हवा में औरतों का अजनबी गाना चुपचाप कांपता, थरथराता रहा, उसी पर कान लगाये उसे बूझने की जुगत में उलझे रहे.

सपना..

सपने देखना, और

थककर सोने जाना

जागकर फिर देखना

व्‍यौहारी, दुनिया-निहारी

कनिया चौंकी पूछे जो

आये किधर से और

जाओगे किधर, बाबू

मीठे लजाकर कहना,

जी, सपना, सपना?

Tuesday, January 26, 2010

काम के सबक

दौड़ना दायें बायें, दौड़ना जिधर मिले रस्‍ता. दौड़ना कि छाती मुंह को आए, और ज़बान पैर के छालों-सा छिले जायें. फिर भी दौड़े चले जाना, जैसे ज़िंदगी की आखिरी दौड़ हो. कि न दौड़ने से कठुआता काट खाता, थरथराता हो मन. कि दौड़ते रहना ज़ि‍न्‍दा होने की इकलौती वज़ह बन जाए, फिर.. हां, फिर.. हांफें ढेर होना मुंह के बल गिर पड़ना.
ज़माने, ज़मानों बाद फिर कभी जो इक अजनबी सांझ एक मनभींजा साथ पूछे, सलीके से मुस्‍कराकर मीठे जवाब देना कि दौड़े थे भरपूर, हां, कभी तुमने भी इक मर्तबा प्‍यार किया था, उतरे थे एक जलती नदी धंसे थे नाक तक नशे में गहरे, इक मर्तबा डूबे थे हुए थे समूचा आदमी, फिर बेहोशी में खुद को उबार लिया था.
देखते-देखते देखे होंगे कई नगर, मंजर, दिल के उलझे तागों की लसर-भसर, कई दीवाने सारे, रसभरे गाने कई.
हर बार करीने से मतलबी मुस्‍कराहट इक पहन लिया होगा, बेमतलब-सा किस्‍सा एक गढ़ लिया होगा.

रोज़ का किस्‍सा..

खुद से बचाकर रोज़ लिखोगी फिर वही नाम, रोज़ मिटाओगी. मुझसे कहोगी का सवाल कहां उठेगा जब खुदी से इतना छिपाओगी. मैं अचानक पुरानी फटी कमीज़-सा जो फड़फड़ाऊंगा बिसराये बंद ख़्यालों में, हाथ झटकोगी, तिलमिलाओगी बेवज़ह बच्‍चे पर बरसोगी, आह, मुझसे दो बात कहने करने को कितना तरसोगी. मैं अंधा आवारा गिरूंगा अपनी आहों पर, इस उस जाने किन अजनबी बेमुरव्‍वत चाहों पर, बेमतलब कहानियों के ताने बीनता फिरूंगा, तुम ही तो सुनती हो, सुन लोगी हर जगह के भोले बचकानेपन में अफ़साने बुनूंगा, कुछ सुरे-सिरफिरे गाने, बनूंगा.

जानता हूं चाकू से कुरेदती दिल कितना मोहब्‍बत करती हो, और उतने ही साफ़ यह भी कि, उंगलियों पर गिन-गिनकर कितनी, नफ़रत. लेकिन सच पूछो तो हम दोनों ही कहां जानते हैं मोहब्‍बत किस चिड़ि‍या का नाम, आये हैं जिधर जिस शहर से जानते होंगे थोडा़-बहुत क्‍या कैसी दुनिया है, मगर जाते जिस ओर जानते कितना उस गांव की पहचान?

फिर भी जाने क्‍या आवारापन कुहरीले घन हैं, तुम्‍हारे मलिन मन की खिड़कियों पर बगाहे भटके गोरैया की तरह फुदकता, चहकता मिलूंगा, तुम छनौटा खींचकर मारोगी तो उनींदे तुम्‍हारे सपनों के ठोर, अपने होंठों से सील दूंगा. मीठे, मार्मिक थोड़े उन सुहाने क्षण हम एक-दूसरे को कितना जान लेंगे, लेकिन यह भी ग़ज़ब होगा कि जल्‍दी ही, उतनी ही निष्‍ठुर निर्ममता से, फिर अपने-अपने अकेलेपन की चादरें भी तान लेगे.

Monday, January 25, 2010

बयान..

सोचिए तो, इतने महीन जायकों को बगलिया थाली भर भात, सेम की तरकारी से अभी भी पसीज जानेवाले एक बिहारी की बौद्धिक लाम क्‍या होगी, न हासिल डकारों में घिरा-गिरा होगा, उतरने को लगाम होगा, ऊपर उठकर फैलने का वितान कहां होगा? लेकिन देखिए मज़ा, फिर-फिर खराब होता हूं, गहरे तक डूबी शराब होता, आंख गिराये तलवार की धार, देह चढ़ाये तोप के मुंह रोज़, चीख़ता, हां, अब दाग़ो! रोज़.

जानता हूं डॉक्‍टर और बीवी की तरह ज़रुरी है पैसों के पंख होते हैं, मगर हमें धौंस न दिखाइएगा पैंसों की झंडिया न लहराइएगा, क्‍योंकि उम्र के गहिर गड्ढे फलांगकर इतना जान लिये हैं पैसा हमारे दरवाज़े सहता नहीं है, पैसों को हम सुहाते नहीं, वैसे ही जैसे प्रशस्ति हमें बुलाती नहीं, न मुंह के एक फीके पान से ज्यादा हम उसका भाव खा पाते. मुंह के ज़र्दाइन में दिल्‍ली धोबी-घाट लगता है और मार्मिकता के आख्‍यान के पढ़वैये कई कबिबर देहाती-हाट के चिरई तिवारी, थोड़ा कंटीला गाना है, पार्टनर, माफ़ कीजिएगा, वैसे ही जैसे ज़रा कम राजनीतिक हुए होने की तक़लीफ़ हम भूल नहीं पाते, मगर साथ ही, राजनीतिक तीव्रगामियों की चिरकुट झूलों पर झूल भी नहीं पाते!

बंद समाज के इस अंधेरे अघोरी आधुनिक राग को कहीं जो ज़रा जगह मिले, खालिस देसी म्‍यूज़ि‍कल के चार नोट बनें, कोई दूसरा भी गुनगुनाये, मीठी आग जला जाये, थोड़ा साथ चले थोड़ा आगे तक हमें भी लिये जाये.

Saturday, January 23, 2010

लिखना..

जानता हूं बेमतलब है, अंधों के अखाड़े रंग सजाना कंटीले झाड़ पर रेशमी रुमाल फैलाना है, फिर भी रोज़ घिसता, घिसे, लिखता लिखे जाता हूं, अपने को फुसफुसाकर बताता, लिखना लिखना.

और सच जानिए, वज़हविहीन, मक़सदहीन है भाग-भागकर मेरा यह गिरना, रात-बिरात की हूक, सब सोये हों जब अल्‍लसुबह की जागे की हांक, ज़माने के सताये हों का राग दुश्‍वारी गाना, थेथर बेहयाइयों के ऊलजुलूल सीटी बजाना. कभी कोई दबी आवाज़ शिकायत भी करता कि देखा भाषा ने और शर्म से सिर गड़ाये रही.

भाषा मुंह नहीं खोलती तो दिल टूटता है और सन्‍न ख़ामोश सर्दीली रात मैं खुद से एक मारखायी, ललियायी जिरह में उतरता कि यह क्‍या ज़ि‍द है कैसा पागलपन, क्‍या आदमी हो वह तुम्‍हें जानती तक नहीं और तुम जीभ जलाये, जंगल में घर और घर में जंगल फैलाये फिरते हो?

चुपचाप आह भरना, ऐसे सवालों पर क्‍या ज़ि‍रह करना, लिखना भाषा के इकतरफा मुहब्‍बत में डूबे लुटते रहने का फसाना भर हो तो आदमी बोले, बताये, फंसनी सुलझाये, मगर हुज़ूर, यहां तो जाने कैसी रोपनी और कैसी कटनियों के क्‍या-कितने मल्‍टीपल एंगल हैं, भागने-भगाने और फिर रहते-रहते किसी मद्धिम, गहरे तान में गुम जाने की सुसुप्‍त, गुप्‍त एक और ही कहानी है, कभी थोड़ा-थोड़ा हमें समझ आता है, पेंचोख़म ज़्यादा तो अभी खुद तक को भी ‘जनवानी’ है!

जो हो, अंदर फैलता चढ़ा चले, है कुछ वैसा बड़ा लेकिन नशीला कारोबार, भले प्रकट झींकना, चूल्‍हे पर उबलना, तपती रेत में गिरे जलना और बरसाती कादो में लिथड़ाये रगड़ना दीखता हो, उससे आगे तो मामला लजाये और उन लजाइनों में लहलहाये की है, गर्वीले पतंग की तरह ऊपर ऊंचा चमकते और सफ़ेद तश्‍तरी पर अनार के दानों-सा ललियाये की है, होंठ पर होंठ धरने की लरज़ाहटों, और ऐंठ से बिजलियों के दमकने के ख़ूरंदेज किस्‍से हैं, कांपती कौंध गई सी शायरी है, अंतरंग के सुनहलों की सुरभरी आह, डायरी है..

बेमतलब की दौड़ में मायनों के भेदभरे रपटन हैं, आंख फैलाये बच्‍चे की सजीली ऊबटन है, लिखना जंगली आग में दहकती दिलकश शराब है, गहरे में उतरकर हलक का सूख जाना, सनसनाती धमक में भागना और भभकती लपटों में खुद को 'लौवाये', भीजाये जाना है, लिखना लड़खड़ाये गिरे जाना, दर-दर दौड़ना तिल-तिलकर मरना है.

लिखना.

Friday, January 22, 2010

औरत के आदमी की जातक-कथा

कुकुर, बिलार, मोर, सियार, तोता, मैना, हिरन, अनार; बरगद, भालू, सोना, जंगल, सेम की बाती, ख़ूंखार डकैत बराती; सबके बीच चौकन्ना अकेला भागता है आदमी, जैसे नींद और ऊब में घिरी, गिरी, चांदनी के पीछे दौड़ता हो चांद, बेसुध, भाग-भाग-भाग!

एक पिटे हुए कस्बाई ट्रांस्फॉर्मर के टिमटिमाते, कभी अंधाते सेज पर, या शायद खस्ताहाल रात की घिसी हुई मेज़ पर, एक मुखौटा चढ़ाये बुढ़ऊ जातक कथावाचक प्रकटते, ‘हो-हो-हो’ करके टोकते हैं, आदमी को रोकते हैं, ‘यह क्या कर रहे हो, बाबू, एकदम हमारा गोगां बिगाड़ रहे हो, अनार-वन के सुहाने सेट में सस्ता मौसमी अमरुद उतार रहे हो?’

आदमी यकबारगी गड़बड़ा जाता, बहती रौ में लड़खड़ाता जाता, मानो सात बारह की अर्ली स्पेशल में सवार होने की जगह अभी भी पिछली रात के रेलों और सुबह पानी के झमेलों में खुद को फंसा पा रहा हो, चाय की पहली सूखी डकार की जगह, रोती हुई कमज़ोर आवाज़ में जाने कब की पुरानी शिकायत पचा नहीं पा रहा हो, चुप रहने की जगह खामखा गा रहा हो.

आदमी चिल्लाया, घोड़े का दृश्य में आना बाद को था, पहले वही हिनहिनाया, ‘प्रभु, आप ही कष्ट निवारण करो, हमारे अंधेरे उजियारा बरो! पैर में चप्प‍ल पहले ही टूटे थे, अब जाने कौन लोग हैं सिर पर स्नीकर्स दौड़ती जाती है, आंख मुंदते ही बहकने लगते हैं, नीचे थिरकते घोड़े की भागती सवारी होती है!’

नाटकीय एंट्री की तर्ज पर घोड़ा दृश्य में आया, प्रतिवाद में नथुने फुलाये, आगे का पैर हवा में उठाया, ‘बच्चा, माफ़ करो, इस उलटे कथानक में फंसी हमारी छवि साफ़ करो, मैं प्रतिबद्ध सामाजिक प्राणी हूं, मिसगाइडेड एडवेंचर हमारे तुर्की रिश्तेदारों में सहता होगा, हमारी रगों में ब्राह्मण पानी है. फिर वैसे भी इन दिनों में उस खोयी औरत की स्टोरी फॉलो कर रहा हूं जो काम से घर लौटती और देर तक घर में खुद को ढूंढती रहती है.’

खोयी? खोयी?

आईने के आगे खड़ी आईने में दिखती औरत से फुसफुसाकर, रहस्‍यभरी आवाज़ बनाकर पूछती वह औरत जिसके साथ घर में दाखिल हुई, वह कहां है कहां है कहां है?

रंगीन फुंदनियों की झूलनी झूलते रहते, कथाएं, फूलते, रहते, एक मोर नाचता दीखता, जिसे फिर लोग मगर देख नहीं पाते.

Wednesday, January 20, 2010

ओ सफरिये, ओ..


फटफटिया से निकल जाना सीरिया, वहां से कोहे-माहिर पहुंचना, रस्‍ते के किसी सस्‍ते कहवाघर पूछना कोई जानता है ज़मदूल-ऊलैब-बिन ताहिब, उसके खानदान का खुराफाती किस्‍सा? कब किस गांव से निकले, कब समुंदर पार किया, लुटेरे के धोखे में कब स्‍पेन के जंगख़ार देहात पहुंचे, एक ज़िंदगी-लुटी आर्मेनीयन हूर का बेड़ा पार किया, लब्‍बोलुबाब यह कि बत्‍तीस की चढ़ी उम्र गारत हैजे के हाथों मरने के पहले कहां-कहां क्‍या गुलज़ार किया.
या उत्‍तरी कोरिया के सन्‍न, सुन्‍न विकराल, मोहजाल से छूट दिखना पच्छिमी अफ़रीका के चमकीले, हरीले मैदान, ज़िंदगी के धमकते धम-धम लोहुलुहान में. काठ के बस की जगर-मगर छत पर झंझावात होगा, एक टांगकटे लड़के के हाथ ऑटोमैटिक बंदूक होगी, एक पेटभारी जनाना के कांधे पर मुर्गा सुहाना, उसके आवारा ठोर से छूटता कोई पुराना तराना होगा, दहलते धकधक तुम्‍हारे दिल में मगर कपुचिंस्‍की का कोई सजीला फ़साना होगा?
या बिछलती साइकिल से फिसलता दीखना किसी सिसिलियन सूनसान में, दूर मुहानों पर समुंदर नीली, महीन, डूबती-उतराती होगी, कहीं दूर गायब एकॉर्डियन की मीठी ऐंठ मन को छकाती, एक दीवानी ललक साइकिल के चमकते लोहे से उठकर नज़रों के हल्‍कों पर पसर-पसर जाती होगी..

आधुनिक-बहक-बोध

कुछ अच्‍छे घरों के बिगड़े बच्‍चे थे, कुछ तंगहाली की गालियों पे चलके, दहल के, तो कुछ चोटगड़ी मोहब्‍बत की फटी छातियां छिपाकर आये थे, मतलब ज़माने के सताये थे. और हरमख़ोर ज़माना हमेशा खराब होता है, टॉम और जेरी के किस्‍से फकत टीवी पर हंसाते हैं, बाहर जो टहलता मिलता है कॉमिक नहीं, वहशत की किताब होता है.

ख़ैर, बच्‍चे हंस नहीं रहे थे, उनकी तो खासी लगी पड़ी थी, जिन दाढ़ीधारी सींक-सयाने भाई साहब से मुलाकात हुई, वह अलबत्‍ता बड़ी रहस्‍यभरी मुस्‍की मुस्‍करा रहे थे, कभी जेब में हाथ डाल तो कभी निकाल रहे थे, एक बेसिक मंत्र था, ‘इस हरमख़ोर ज़माने को बदलने की ज़रुरत है, साथियो!’ उसी की महीन, मल्‍टीपल पैकेजिंग उछाल रहे थे.

अच्‍छा कैच था, बच्‍चों ने कैच किया, थोड़ा आगे जाकर किक हुए, कुछ और आगे, कुक हुए.

घिसी हुई कहानी बड़ी पुरानी है, हर दशक एक नया संस्‍करण छपता चलता है, कैच-कैच, कुक-कुक, हुक-हुक.

बाकी ज़माना हरमख़ोर जो है, उसके बदलने की बात सपने में देखी किसी रंगीन विज्ञापन का सीनारियो है, मन हहसकर कभी बैकेट का पोत्‍ज़ो तो कभी फ़ो का दारियो है, हमारी तो नींद उड़ी रहती है, आपकी में दिखे तो ज़रा कांखकर दम लगाइएगा, मायकॉव्‍स्‍की पुकारियो हे?

Tuesday, January 19, 2010

फिर बैतलवा डाल पर..

वापस पॉडकास्‍ट के सुर पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं, धीमे-धीमे..

Sunday, January 17, 2010

संगीन, रंगीन

कहानी के कितने गहिन रंग. सोचता है आदमी, अचकचाए, असमंजस के तार पर सवार देखने निकलता है बनी-बुनी जाती होगी कैसे कहानियों की शराब, खिलती खिली बहार. इतनी आसानी से कुछ हाथ आता है? पौने चार मिनट का वीडियो दाँत निकाले आदमी की खिल्ली उड़ाता है.

Saturday, January 16, 2010

काली - सफ़ेद

क्यों होती है इतनी बेचैनी? अचानक हहसकर मन चाहता है किसी की गर्दन रेत दें, या फिर पलटकर गाल काट लें. मालूम नहीं फिर शायद यह भी उस बेचैनी का ही प्रताप होगा कि मन ऐसा कुछ भी करने की जगह साहित्य की सोचने लगता है, क्यों सोचने लगता है? महीनों-महीनों की लंबी नींद के बाद आँख जब कैमरे के पीछे खुलती भी है, ईश्वर हरामखोर का बेड़ा गर्क करे, तो ससुरी अरमान जो हैं वो दो मिनट के आगे दौड़ नहीं पाते. मतलब हाँफ़ने लगते हैं, उम्र हुई, वीडियो अपने लेंग्थ से ज़ाहिर करने लगता है? वीडियो देखिये, साहित्य की नहीं, हमारे नजर की सोचियेगा.

Thursday, January 7, 2010

बिना शीर्षक

लस्‍तम-पस्‍तम कांपते पैर धरना, धूलसनी पीकभरी सीढ़ि‍यां चढ़ना, देखना मत देखना, मत, पैरों को एक के बाद एक आदत में किस बेहयायी से चले जाते हैं, नहीं बतलाते अंतरंग संगी, गुज़रे इतने वर्षों के तुम्‍हारे साथी क्‍यों फिर उन्‍हीं अंधेरों तुम्‍हें रोज़ रोज़ रोज़ छोड़ आते हैं.

चुपचाप, कविता रहती वहीं कहीं, उसी हवा, झरती झरती, जैसे ओसनहायी रात उड़ी जाये गरीब की फटी चादर, किसी दूसरे मुल्‍क छूट आया हो-सा अपने ही बचपन की वह बेग़ैरत याद, टूटे दिल के कितने तो बेमतलब, बेमुरव्‍वत क़ि‍स्‍से, उन्‍हीं पहचाने पेड़ों, दीवारों पर सिर गिराती, एक हुमस में उमगकर एक बार फिर बिखरती झरती, झरती जाती.

आईने में रोज़ रोज़ जो दिखता है तुमको तुम्‍हारा, बहुत मुश्किल है लेकिन, उससे बचा कर, अपने उस ध्‍वस्‍त व्‍यक्‍त से छुपा कर, देखना अगर कभी हाथ आती है, किस ज़बान और किन बोलों में क्‍या तार और कौन बारह शब्‍द फुसफुसाती है, आंख में थोड़ा खून लिये पूछना कविता क्‍या बताती है, सचमुच किसी काम आती है?

घिसे रंगों की, लदर-फदर के बोझ, बेमतलब प्रसंगों की, यही होगी दुनिया, कांपती उंगलियां और ‘घन्‍न-घन्‍न’ डोलता पंखा, फटे पन्‍नों की फड़फड़ाती बातें होंगी और सियाह सिर गिराये आहभरी रातें, मालूम है मुश्किल है लेकिन अंधेरे में टटोलकर टोहना, पूछना मोहब्‍बत से, क्‍या कविता, क्‍या है, बोलोगी, बताओगी तुम्‍हारी सौगातें..

Tuesday, January 5, 2010

कमस्‍तर, कनस्‍तर भर..

साइकिल पर भारी कनस्‍तर बांधे थे (तेल था क्‍या था?) उसी की थकान रही होगी, हांफते, एक खंभे साइकिल टिकाकर वहीं सड़क के कोने बैठ गए, मैंने एकदम चीख़कर कहा, क्‍या गजब करते हैं, बाबूजी, ऐसे ही सड़क पे बैठ रहे हैं? कोई देखेगा क्‍या सोचेगा? हमीं देख रहे हैं, कौनो अच्‍छा लग रहा है? उठिये, उठिये, अरे?

ठंड और थकान में नाक से कुछ पानी निकल आया था, उल्‍टे हाथ उसे पोंछते हुए बाबूजी अपना चिमरिख चारखानेवाला रुमाल खोजने लगे, ‘विज़न में सबची अच्‍छे-अच्‍छे आये ऐसा सपनों में नहीं आता, बाबू, थक गए हैं, थोड़ा थिर रहने दो!’ (बाबूजी को कौन बोलता कि चरखाना का रोमाल बेथा खोज रहे हैं, ऊ आपका पीठ पीछे सुलीता का मम्‍मी आपका मुहब्‍बत में ओड़ा के ले गईस है! हम तो नहींये बोलते. बोल नहींये रहे थे, सुन रहे थे, बाबूजी कंटिन्‍यूस, डेस्‍टर्ब हिम नाट).

‘कौनो ज़ादा का फरमाइश नहीं कर रहे हैं न, देन? लीव मी अलोन फॉर अ मिनिट, विल यू?’

अच्‍छा अच्‍छा अच्‍छा, तब बाबूजी अंग्रेजियो में बतियाएंगे? ऊहो डेहली वाला? सच्‍चो, एक मिनिट के लिए हम एकदम से अकिंचन हो गए. सीएटी कैट, कैट माने दिमाग में कौनो तस्‍वीर नहीं बनी फिर बीएटी बैट माने घबराकर आंख गिराकर उजाले में देखने लगे, माने अंधारे में सोचने लगे कि सब सचमुच का हकीकत देख रहे हैं कि सपना का गेवाकलर का फरेब है? तड़ से इसके पहले कि बाबूजी का टोका-टोकी में गड़बड़ा जायें, पूछ लिये, ‘बाबूजी, एगो बात बताइयेगा, जल्‍दी? अलसर मी इन वल मिल्‍ट? हूं? ई दिल है कि रात है, सामने सोगहग आप हैं कि सिरिफ आपकी बात है? तेलस्‍मी उलझा जज्‍बात है, बोलिये?’

मुरचाखाये पुरनके साइकिल पर ओतने भारी कनस्‍तर ढोवैये बाबूजी की थकान को देखकर, सीरियसली पूछिये तो हम बुरी तरह उदास हो गए थे, लेकिन सिहराते जाड़े के डंक के बचाव की बेकली होगी जो हम चहकते बाबूजी से इन्‍फर्मेल्‍टी का नाटको खेल रहे थे. मगर बाबूजी कहां खेल रहे थे. खेल रहे थे तो हमारे साथ नहीं खेल रहे थे. मतलब हमरी बात का जवाब देने की जगह मेजर बलवन्‍त की तरह होंठ गोल करके सीटी छोड़ रहे हैं जैसी एक्टिंग करने लगे, फिर जल्‍दी ही एक्टिंग से ऊबकर मोम्‍मद रफी का ऊ मरफी वाला गानो गाने लगे- ओ मेरे साहे खूबां ओ मेरे जाने जनां, तुम मोरे पास होते हो तो कोई दूसरा नहीं होता!

अरे, लीप हिम अलोन फोर टु मिनिट एही बास्‍ते? कि अंग्रेजी के ऊपर जम्पिन करके आप रफी जी का पेड़ पे चहड़ जाइए? बाबूजी के बाबूजीत्‍व पर शोभा देता है? कोई देखेगा, सपने के चरखाने, करखानो में ही सही, का सोचेगा? दिसम्‍मर की बीतती संझा कहीं बीती बिसरा चुकी थी, आगे अंजोरिया रोड का ठंडाइल, कोहराइल मुंह पर मीठा थपकन धीमा-धीमा बजा रही थी, उदासी में नहाये हम्‍मों चोन्‍हाकर सुर छेड़ने लगे, ‘सब्‍बेरे वाली गारी से चल्‍ले जायेंगे, हो जी, कुच्‍छ लेके जायेंगे, कुच्‍छ तोके देक्‍के जायेंगे, तोरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्‍खा का है, ओ जालेमन?’

हम मुंह उठाये गाय रहे थे, बाबूजी मुंह नवाये सुन रहे थे, कोई तीसरका था जाने कब काने झुककर फुसफुसाया कौनो से स्‍लावो जीज़ू वाला केताबी गुल मंगाये थे, बाबू, डेहली से, चहुंपा अभी तलक कि नहीं?

मन अब दुबारे उदास हुआ, बैकग्रउंडी में कवनो मैक टेरने लगा, ‘दोस्‍स दोस्‍स ना रहा, प्‍यार प्‍यार ना रहा, जिन्‍नगी तोरा हमें ऐतबार ना रहा!’

जै जाल जैनून जंजाल, जलवरी!