Tuesday, January 5, 2010

कमस्‍तर, कनस्‍तर भर..

साइकिल पर भारी कनस्‍तर बांधे थे (तेल था क्‍या था?) उसी की थकान रही होगी, हांफते, एक खंभे साइकिल टिकाकर वहीं सड़क के कोने बैठ गए, मैंने एकदम चीख़कर कहा, क्‍या गजब करते हैं, बाबूजी, ऐसे ही सड़क पे बैठ रहे हैं? कोई देखेगा क्‍या सोचेगा? हमीं देख रहे हैं, कौनो अच्‍छा लग रहा है? उठिये, उठिये, अरे?

ठंड और थकान में नाक से कुछ पानी निकल आया था, उल्‍टे हाथ उसे पोंछते हुए बाबूजी अपना चिमरिख चारखानेवाला रुमाल खोजने लगे, ‘विज़न में सबची अच्‍छे-अच्‍छे आये ऐसा सपनों में नहीं आता, बाबू, थक गए हैं, थोड़ा थिर रहने दो!’ (बाबूजी को कौन बोलता कि चरखाना का रोमाल बेथा खोज रहे हैं, ऊ आपका पीठ पीछे सुलीता का मम्‍मी आपका मुहब्‍बत में ओड़ा के ले गईस है! हम तो नहींये बोलते. बोल नहींये रहे थे, सुन रहे थे, बाबूजी कंटिन्‍यूस, डेस्‍टर्ब हिम नाट).

‘कौनो ज़ादा का फरमाइश नहीं कर रहे हैं न, देन? लीव मी अलोन फॉर अ मिनिट, विल यू?’

अच्‍छा अच्‍छा अच्‍छा, तब बाबूजी अंग्रेजियो में बतियाएंगे? ऊहो डेहली वाला? सच्‍चो, एक मिनिट के लिए हम एकदम से अकिंचन हो गए. सीएटी कैट, कैट माने दिमाग में कौनो तस्‍वीर नहीं बनी फिर बीएटी बैट माने घबराकर आंख गिराकर उजाले में देखने लगे, माने अंधारे में सोचने लगे कि सब सचमुच का हकीकत देख रहे हैं कि सपना का गेवाकलर का फरेब है? तड़ से इसके पहले कि बाबूजी का टोका-टोकी में गड़बड़ा जायें, पूछ लिये, ‘बाबूजी, एगो बात बताइयेगा, जल्‍दी? अलसर मी इन वल मिल्‍ट? हूं? ई दिल है कि रात है, सामने सोगहग आप हैं कि सिरिफ आपकी बात है? तेलस्‍मी उलझा जज्‍बात है, बोलिये?’

मुरचाखाये पुरनके साइकिल पर ओतने भारी कनस्‍तर ढोवैये बाबूजी की थकान को देखकर, सीरियसली पूछिये तो हम बुरी तरह उदास हो गए थे, लेकिन सिहराते जाड़े के डंक के बचाव की बेकली होगी जो हम चहकते बाबूजी से इन्‍फर्मेल्‍टी का नाटको खेल रहे थे. मगर बाबूजी कहां खेल रहे थे. खेल रहे थे तो हमारे साथ नहीं खेल रहे थे. मतलब हमरी बात का जवाब देने की जगह मेजर बलवन्‍त की तरह होंठ गोल करके सीटी छोड़ रहे हैं जैसी एक्टिंग करने लगे, फिर जल्‍दी ही एक्टिंग से ऊबकर मोम्‍मद रफी का ऊ मरफी वाला गानो गाने लगे- ओ मेरे साहे खूबां ओ मेरे जाने जनां, तुम मोरे पास होते हो तो कोई दूसरा नहीं होता!

अरे, लीप हिम अलोन फोर टु मिनिट एही बास्‍ते? कि अंग्रेजी के ऊपर जम्पिन करके आप रफी जी का पेड़ पे चहड़ जाइए? बाबूजी के बाबूजीत्‍व पर शोभा देता है? कोई देखेगा, सपने के चरखाने, करखानो में ही सही, का सोचेगा? दिसम्‍मर की बीतती संझा कहीं बीती बिसरा चुकी थी, आगे अंजोरिया रोड का ठंडाइल, कोहराइल मुंह पर मीठा थपकन धीमा-धीमा बजा रही थी, उदासी में नहाये हम्‍मों चोन्‍हाकर सुर छेड़ने लगे, ‘सब्‍बेरे वाली गारी से चल्‍ले जायेंगे, हो जी, कुच्‍छ लेके जायेंगे, कुच्‍छ तोके देक्‍के जायेंगे, तोरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्‍खा का है, ओ जालेमन?’

हम मुंह उठाये गाय रहे थे, बाबूजी मुंह नवाये सुन रहे थे, कोई तीसरका था जाने कब काने झुककर फुसफुसाया कौनो से स्‍लावो जीज़ू वाला केताबी गुल मंगाये थे, बाबू, डेहली से, चहुंपा अभी तलक कि नहीं?

मन अब दुबारे उदास हुआ, बैकग्रउंडी में कवनो मैक टेरने लगा, ‘दोस्‍स दोस्‍स ना रहा, प्‍यार प्‍यार ना रहा, जिन्‍नगी तोरा हमें ऐतबार ना रहा!’

जै जाल जैनून जंजाल, जलवरी!

1 comment:

  1. ऊ आपका पीठ पीछे सुलीता का मम्‍मी आपका मुहब्‍बत में ओड़ा के ले गईस है! हम तो नहींये बोलते. बोल नहींये रहे थे, सुन रहे थे, बाबूजी कंटिन्‍यूस, डेस्‍टर्ब हिम नाट).


    माय गूड्नेस...
    हँसते-हँसते बुरा हाल है...
    आपका पतनशील साहित्य दरअसल सबसे ज्यादा सृजनशील साहित्य लगता है...

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