Thursday, January 7, 2010

बिना शीर्षक

लस्‍तम-पस्‍तम कांपते पैर धरना, धूलसनी पीकभरी सीढ़ि‍यां चढ़ना, देखना मत देखना, मत, पैरों को एक के बाद एक आदत में किस बेहयायी से चले जाते हैं, नहीं बतलाते अंतरंग संगी, गुज़रे इतने वर्षों के तुम्‍हारे साथी क्‍यों फिर उन्‍हीं अंधेरों तुम्‍हें रोज़ रोज़ रोज़ छोड़ आते हैं.

चुपचाप, कविता रहती वहीं कहीं, उसी हवा, झरती झरती, जैसे ओसनहायी रात उड़ी जाये गरीब की फटी चादर, किसी दूसरे मुल्‍क छूट आया हो-सा अपने ही बचपन की वह बेग़ैरत याद, टूटे दिल के कितने तो बेमतलब, बेमुरव्‍वत क़ि‍स्‍से, उन्‍हीं पहचाने पेड़ों, दीवारों पर सिर गिराती, एक हुमस में उमगकर एक बार फिर बिखरती झरती, झरती जाती.

आईने में रोज़ रोज़ जो दिखता है तुमको तुम्‍हारा, बहुत मुश्किल है लेकिन, उससे बचा कर, अपने उस ध्‍वस्‍त व्‍यक्‍त से छुपा कर, देखना अगर कभी हाथ आती है, किस ज़बान और किन बोलों में क्‍या तार और कौन बारह शब्‍द फुसफुसाती है, आंख में थोड़ा खून लिये पूछना कविता क्‍या बताती है, सचमुच किसी काम आती है?

घिसे रंगों की, लदर-फदर के बोझ, बेमतलब प्रसंगों की, यही होगी दुनिया, कांपती उंगलियां और ‘घन्‍न-घन्‍न’ डोलता पंखा, फटे पन्‍नों की फड़फड़ाती बातें होंगी और सियाह सिर गिराये आहभरी रातें, मालूम है मुश्किल है लेकिन अंधेरे में टटोलकर टोहना, पूछना मोहब्‍बत से, क्‍या कविता, क्‍या है, बोलोगी, बताओगी तुम्‍हारी सौगातें..

7 comments:

  1. अंधेरे में टटोलकर टोहना, पूछना मोहब्‍बत से, क्‍या कविता, क्‍या है??????

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  2. मुक्त गद्य के गल्प में गोते लगा रहे है.. सोच रहा हूँ शुभानल्लाह कहू या माशाल्लाह...?

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  3. कुश भैया ई मुश्किलात का बख़त होत है...
    गोते लगा लो बस...

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  4. कोहराम मचा रखा है आपके पोस्ट ने... लफ्फाजी करना मुझे भी पसंद है लेकिन ऐसी रचनात्मकता हो तो सार्थक अन्यथा ...

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  5. सर जी बुद्धिमान लोग इसे कविता की परिभाषा में डाल सकते है ....

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  6. "घिसे रंगों की, लदर-फदर के बोझ, बेमतलब प्रसंगों की, यही होगी दुनिया,"

    ज्यादा नहीं गुरुदत्त की फिल्म का गाना है,
    ये दुनिया अगर मिल भी जाय तो क्या है?......
    ये दुनिया ये दुनिया ये दुनिया..........
    sun ke thodee der ko jee jud jaayegaa.

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