Saturday, January 16, 2010

काली - सफ़ेद

क्यों होती है इतनी बेचैनी? अचानक हहसकर मन चाहता है किसी की गर्दन रेत दें, या फिर पलटकर गाल काट लें. मालूम नहीं फिर शायद यह भी उस बेचैनी का ही प्रताप होगा कि मन ऐसा कुछ भी करने की जगह साहित्य की सोचने लगता है, क्यों सोचने लगता है? महीनों-महीनों की लंबी नींद के बाद आँख जब कैमरे के पीछे खुलती भी है, ईश्वर हरामखोर का बेड़ा गर्क करे, तो ससुरी अरमान जो हैं वो दो मिनट के आगे दौड़ नहीं पाते. मतलब हाँफ़ने लगते हैं, उम्र हुई, वीडियो अपने लेंग्थ से ज़ाहिर करने लगता है? वीडियो देखिये, साहित्य की नहीं, हमारे नजर की सोचियेगा.

5 comments:

  1. अद्भुत ,किंभुत प्रस्तुति । खास तौर पर दृश्य ।

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  2. ये बात बेहद रुची.."वास्तविकता का जो क्षण हमने जिया नही है साहित्य उसका substitute है..!

    वीडियो आपकी करिश्माई और तनिक रहस्यमयी सी इमेज को पुष्ट करती लगी..! शायद ये night- venture की वज़ह से...!

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  3. बात है इसमें.. एक यूनिटी है.. कहानी भी.. छवियां भी दिलकश हैं.. बस स्त्रोत (strot) खटका..आप शायद स्रोत्र (srot) कहना चाह रहे थे..
    एक दूसरा शब्द स्तोत्र (stotr) भी होता है : स्तुति पद्य..

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