Sunday, January 17, 2010

संगीन, रंगीन

कहानी के कितने गहिन रंग. सोचता है आदमी, अचकचाए, असमंजस के तार पर सवार देखने निकलता है बनी-बुनी जाती होगी कैसे कहानियों की शराब, खिलती खिली बहार. इतनी आसानी से कुछ हाथ आता है? पौने चार मिनट का वीडियो दाँत निकाले आदमी की खिल्ली उड़ाता है.

1 comment:

  1. कहानियाँ रची जाती हैं / मिलती कहाँ हैं ? ye vala bhi badhiyaa lagaa

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