Wednesday, January 20, 2010

आधुनिक-बहक-बोध

कुछ अच्‍छे घरों के बिगड़े बच्‍चे थे, कुछ तंगहाली की गालियों पे चलके, दहल के, तो कुछ चोटगड़ी मोहब्‍बत की फटी छातियां छिपाकर आये थे, मतलब ज़माने के सताये थे. और हरमख़ोर ज़माना हमेशा खराब होता है, टॉम और जेरी के किस्‍से फकत टीवी पर हंसाते हैं, बाहर जो टहलता मिलता है कॉमिक नहीं, वहशत की किताब होता है.

ख़ैर, बच्‍चे हंस नहीं रहे थे, उनकी तो खासी लगी पड़ी थी, जिन दाढ़ीधारी सींक-सयाने भाई साहब से मुलाकात हुई, वह अलबत्‍ता बड़ी रहस्‍यभरी मुस्‍की मुस्‍करा रहे थे, कभी जेब में हाथ डाल तो कभी निकाल रहे थे, एक बेसिक मंत्र था, ‘इस हरमख़ोर ज़माने को बदलने की ज़रुरत है, साथियो!’ उसी की महीन, मल्‍टीपल पैकेजिंग उछाल रहे थे.

अच्‍छा कैच था, बच्‍चों ने कैच किया, थोड़ा आगे जाकर किक हुए, कुछ और आगे, कुक हुए.

घिसी हुई कहानी बड़ी पुरानी है, हर दशक एक नया संस्‍करण छपता चलता है, कैच-कैच, कुक-कुक, हुक-हुक.

बाकी ज़माना हरमख़ोर जो है, उसके बदलने की बात सपने में देखी किसी रंगीन विज्ञापन का सीनारियो है, मन हहसकर कभी बैकेट का पोत्‍ज़ो तो कभी फ़ो का दारियो है, हमारी तो नींद उड़ी रहती है, आपकी में दिखे तो ज़रा कांखकर दम लगाइएगा, मायकॉव्‍स्‍की पुकारियो हे?

3 comments:

  1. बसंत पंचमी कि हार्दिक शुभकामनाएं

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  2. modernism in literature !
    ज़माना तो खैर है ही हरमखोर...

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  3. "बाकी ज़माना हरमख़ोर जो है, उसके बदलने की बात सपने में देखी किसी रंगीन विज्ञापन का सीनारियो है, मन हहसकर कभी बैकेट का पोत्‍ज़ो तो कभी फ़ो का दारियो है, हमारी तो नींद उड़ी रहती है, आपकी में दिखे तो ज़रा कांखकर दम लगाइएगा, मायकॉव्‍स्‍की पुकारियो हे?"

    kyaa poore honge hapane jo sapne mein dikhe vogopan?
    itnaa asaan hotaa to roj man pasand sapne dekhe jaa sakte hai.

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