Friday, January 22, 2010

औरत के आदमी की जातक-कथा

कुकुर, बिलार, मोर, सियार, तोता, मैना, हिरन, अनार; बरगद, भालू, सोना, जंगल, सेम की बाती, ख़ूंखार डकैत बराती; सबके बीच चौकन्ना अकेला भागता है आदमी, जैसे नींद और ऊब में घिरी, गिरी, चांदनी के पीछे दौड़ता हो चांद, बेसुध, भाग-भाग-भाग!

एक पिटे हुए कस्बाई ट्रांस्फॉर्मर के टिमटिमाते, कभी अंधाते सेज पर, या शायद खस्ताहाल रात की घिसी हुई मेज़ पर, एक मुखौटा चढ़ाये बुढ़ऊ जातक कथावाचक प्रकटते, ‘हो-हो-हो’ करके टोकते हैं, आदमी को रोकते हैं, ‘यह क्या कर रहे हो, बाबू, एकदम हमारा गोगां बिगाड़ रहे हो, अनार-वन के सुहाने सेट में सस्ता मौसमी अमरुद उतार रहे हो?’

आदमी यकबारगी गड़बड़ा जाता, बहती रौ में लड़खड़ाता जाता, मानो सात बारह की अर्ली स्पेशल में सवार होने की जगह अभी भी पिछली रात के रेलों और सुबह पानी के झमेलों में खुद को फंसा पा रहा हो, चाय की पहली सूखी डकार की जगह, रोती हुई कमज़ोर आवाज़ में जाने कब की पुरानी शिकायत पचा नहीं पा रहा हो, चुप रहने की जगह खामखा गा रहा हो.

आदमी चिल्लाया, घोड़े का दृश्य में आना बाद को था, पहले वही हिनहिनाया, ‘प्रभु, आप ही कष्ट निवारण करो, हमारे अंधेरे उजियारा बरो! पैर में चप्प‍ल पहले ही टूटे थे, अब जाने कौन लोग हैं सिर पर स्नीकर्स दौड़ती जाती है, आंख मुंदते ही बहकने लगते हैं, नीचे थिरकते घोड़े की भागती सवारी होती है!’

नाटकीय एंट्री की तर्ज पर घोड़ा दृश्य में आया, प्रतिवाद में नथुने फुलाये, आगे का पैर हवा में उठाया, ‘बच्चा, माफ़ करो, इस उलटे कथानक में फंसी हमारी छवि साफ़ करो, मैं प्रतिबद्ध सामाजिक प्राणी हूं, मिसगाइडेड एडवेंचर हमारे तुर्की रिश्तेदारों में सहता होगा, हमारी रगों में ब्राह्मण पानी है. फिर वैसे भी इन दिनों में उस खोयी औरत की स्टोरी फॉलो कर रहा हूं जो काम से घर लौटती और देर तक घर में खुद को ढूंढती रहती है.’

खोयी? खोयी?

आईने के आगे खड़ी आईने में दिखती औरत से फुसफुसाकर, रहस्‍यभरी आवाज़ बनाकर पूछती वह औरत जिसके साथ घर में दाखिल हुई, वह कहां है कहां है कहां है?

रंगीन फुंदनियों की झूलनी झूलते रहते, कथाएं, फूलते, रहते, एक मोर नाचता दीखता, जिसे फिर लोग मगर देख नहीं पाते.

1 comment:

  1. प्रमोद जी बहुत दिनों के बाद ब्लॉग दर्शन करने निकला. क्या तुकबंदी में उलझे हैं आप ? कभी कितने अद्भुत पीस लिखे थे आपने! दिल्ली की ठंड को कैसे 'शब्दों की भाषा' में विजुवलाइज कराया था! उसको बार-बार याद करता हूं. बाहर निकलिए ताकि अपना भी दोबारा ब्लॉग पढ़ने का मन करे.

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