Saturday, January 23, 2010

लिखना..

जानता हूं बेमतलब है, अंधों के अखाड़े रंग सजाना कंटीले झाड़ पर रेशमी रुमाल फैलाना है, फिर भी रोज़ घिसता, घिसे, लिखता लिखे जाता हूं, अपने को फुसफुसाकर बताता, लिखना लिखना.

और सच जानिए, वज़हविहीन, मक़सदहीन है भाग-भागकर मेरा यह गिरना, रात-बिरात की हूक, सब सोये हों जब अल्‍लसुबह की जागे की हांक, ज़माने के सताये हों का राग दुश्‍वारी गाना, थेथर बेहयाइयों के ऊलजुलूल सीटी बजाना. कभी कोई दबी आवाज़ शिकायत भी करता कि देखा भाषा ने और शर्म से सिर गड़ाये रही.

भाषा मुंह नहीं खोलती तो दिल टूटता है और सन्‍न ख़ामोश सर्दीली रात मैं खुद से एक मारखायी, ललियायी जिरह में उतरता कि यह क्‍या ज़ि‍द है कैसा पागलपन, क्‍या आदमी हो वह तुम्‍हें जानती तक नहीं और तुम जीभ जलाये, जंगल में घर और घर में जंगल फैलाये फिरते हो?

चुपचाप आह भरना, ऐसे सवालों पर क्‍या ज़ि‍रह करना, लिखना भाषा के इकतरफा मुहब्‍बत में डूबे लुटते रहने का फसाना भर हो तो आदमी बोले, बताये, फंसनी सुलझाये, मगर हुज़ूर, यहां तो जाने कैसी रोपनी और कैसी कटनियों के क्‍या-कितने मल्‍टीपल एंगल हैं, भागने-भगाने और फिर रहते-रहते किसी मद्धिम, गहरे तान में गुम जाने की सुसुप्‍त, गुप्‍त एक और ही कहानी है, कभी थोड़ा-थोड़ा हमें समझ आता है, पेंचोख़म ज़्यादा तो अभी खुद तक को भी ‘जनवानी’ है!

जो हो, अंदर फैलता चढ़ा चले, है कुछ वैसा बड़ा लेकिन नशीला कारोबार, भले प्रकट झींकना, चूल्‍हे पर उबलना, तपती रेत में गिरे जलना और बरसाती कादो में लिथड़ाये रगड़ना दीखता हो, उससे आगे तो मामला लजाये और उन लजाइनों में लहलहाये की है, गर्वीले पतंग की तरह ऊपर ऊंचा चमकते और सफ़ेद तश्‍तरी पर अनार के दानों-सा ललियाये की है, होंठ पर होंठ धरने की लरज़ाहटों, और ऐंठ से बिजलियों के दमकने के ख़ूरंदेज किस्‍से हैं, कांपती कौंध गई सी शायरी है, अंतरंग के सुनहलों की सुरभरी आह, डायरी है..

बेमतलब की दौड़ में मायनों के भेदभरे रपटन हैं, आंख फैलाये बच्‍चे की सजीली ऊबटन है, लिखना जंगली आग में दहकती दिलकश शराब है, गहरे में उतरकर हलक का सूख जाना, सनसनाती धमक में भागना और भभकती लपटों में खुद को 'लौवाये', भीजाये जाना है, लिखना लड़खड़ाये गिरे जाना, दर-दर दौड़ना तिल-तिलकर मरना है.

लिखना.

10 comments:

  1. बेमतलब इसलिये लग रहा है प्रभो कि आप केवल अपने लिये लिखते हैं, पाठक के लिये नहीं.

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  2. घोस्ट बस्टर जी जो दूसरों के लिये लिखते हैं वो लिखते नहीं बस अदाबाजी करते हैं ।

    लिखना ... पूरी ईमानदारी के साथ , सिर्फ अपने से बातचीत होती है , अपने अंतरतम के शिनाख्त की कवायद होती है , अपने सुर को खुद ही पहचान , उसकी तान होती है , अपनी आत्मा की अपने ही नशे की आवारा दिल तोड़ देने वाली बहक होती है .. बहुत कुछ होता है ..लिखना

    बस सिर्फ उतना भर ही नहीं होता जो आप समझ रहे हैं .. किसी इंटेंस डायलॉग को पॉपुलर डिमांड की कसरत का फॉरमुला समझना ? होता होगा ऐसा भी लेकिन हर जगह हो ..ये कतई ज़रूरी नहीं

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  3. लिखना जंगली आग में दहकती दिलकश शराब है.

    क्या बात है !

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  4. I would say that their is some substance in Ghostbuster's comment and also in the comment made by Bhupen earlier.

    Although writing to some extent is very intimate experience, yet the purpose of writing and the overall meaning of human experiences, if, they are spelled out in any form of art is to communicate with others and give it some other meaning in wider social context.

    In a way by writing the individual's thoughts or even the process of juggling with these ideas, comes with responsibility.

    I do not mean that you write in the simplest form or devoid your writing from contents that weave a complex pattern. But it has to be somehow comprehensible.

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  5. @स्‍वप्‍नदर्शी जी,
    किताब लिखकर आपके हाथ में नहीं दी है, ब्‍लॉग पर लिखा है, तो? यहां लिखना, बाज मर्तबा बहकना, फुसफुसाकर चुप रहना, फिर आग की तरह सुलगते रहना भी है, मगर ख़ैर, आप वह क्‍यों समझेंगी.. और मैं कितनी दूर आपको समझाये, वह भी फिर अपनी बहक, गाये, फिरुंगा?

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  6. हिन्दी पाठक को किस्से-कहानी ,गोलगप्प से निकाल सरस्वती । सोद्देश्यता की राजनैतिक चाकरी मूल्य से मेरा पीछा छुडा । स्कूलों के मास्टर जी ,जो अब लेक्चरर भी हो गये हैं यंहा -वंहा ,कब तक गद्य के आखिरी सफे पर 'मॉरल' चेपते रहेंगे ।
    विजय शर्मा

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  7. लिखना लड़खड़ाये गिरे जाना, दर-दर दौड़ना तिल-तिलकर मरना है.
    ***
    अपने आप को फुसफुसा कर बताना, यूँ लिखना, कुछ भी बेमतलब नहीं...
    इस फुसफुसाहट का महत्त्व कोई उससे पूछे जिससे शब्द रूठ गए हों, जो मौन सुनते सुनते उकता गया हो, ऐसे कई हैं जिनके लिए ये फुसफुसाहट संजीवनी हो सकती है.
    इसे बेमतलब न कहा जाए.

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  8. मन की गांठ इतनी आसानी से तो ना ही खुलेगी.....बँधती जरूर है...

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    1. उस बंधे हुए को खोले का कोई तो टैबलेट होगा, इंजेक्‍शन, प्‍लीज़, बताइये.

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